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अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेष&...

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ॥

एक मुर्ख व्यक्ति को समझाना आसान है, एक बुद्धिमान व्यक्ति को समझाना उससे भी आसान है, लेकिन एक अधूरे ज्ञान से भरे व्यक्ति को भगवान ब्रम्हा भी नहीं समझा सकते, क्यूंकि अधूरा ज्ञान मनुष्य को घमंडी और तर्क के प्रति अँधा बना देता है।
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अयाचिता निदेशानि सर्वदानानि भारत ।...

अयाचिता निदेशानि सर्वदानानि भारत ।
अन्नं विद्या तथा कन्या अनर्थीभ्यो न दीयते ॥

अन्न ,विद्या और कन्या के अतिरिक्त सभी दान बिना माँगे देना चाहिए।
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Lecturer Mechanical Engineering/Workshop Instructor - Department of Technical Education (Govt.of Haryana) - Gurgaon, Haryana

Sanskrit Jobs - Thu, 02/26/2015 - 15:13
Lecturer Mechanical Engineering job vacancies in Department of Technical Education (Govt.of Haryana) at Govt. Polytechnic Education Society Manesar Sl.No.
From Freshersworld.com - 26 Feb 2015 09:43:53 GMT - View all Gurgaon jobs
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Lecturer Bio Medical Engineering - Department of Technical Education (Govt.of Haryana) - Ambala, Haryana

Sanskrit Jobs - Thu, 02/26/2015 - 15:13
Lecturer Bio Medical Engineering job position in Department of Technical Education (Govt.of Haryana) in Narnaul Sl.No. Name of Post Qualification 1 Lecturer
From Freshersworld.com - 26 Feb 2015 09:43:38 GMT - View all Ambala jobs
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Rukmini’s Letter, Krishna’s Response

Sathya Samhitha - Thu, 02/26/2015 - 14:43
All rukmiNi did was write a letter and send it to kRSNa. He made the plan, He drove up in a chariot, He picked her up from the temple, He fought the battle, He spared the brother at Her request and He brought Her to His palace and made Her, His  queen. When the Atman … Continue reading Rukmini’s Letter, Krishna’s Response →
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Madhya pradesh Bhoj(Open) University 2015 for teaching faculty - MP Bhoj(Open) University - Bhopal, Madhya Pradesh

Sanskrit Jobs - Thu, 02/26/2015 - 14:24
Subject/ Department - Ancient History, Culture and Archeology, Education, English, Hindi, IT/ Basic Sciences, Journalism and Mass Communication, Sanskrit, Legal...
From Indiastudychannel.com - 26 Feb 2015 08:54:19 GMT - View all Bhopal jobs
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KV Gole Market interview 2015 for teachers and non teaching staff - Kendriya Vidyalaya (KV) - New Delhi, Delhi

Sanskrit Jobs - Thu, 02/26/2015 - 14:24
TGT for Social Studies, Maths, English, Sanskrit, Science, Hindi. KV Gole Market interview 2015 for teachers and non teaching staff vacancy....
From Indiastudychannel.com - 26 Feb 2015 08:54:17 GMT - View all New Delhi jobs
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KV Gole Market interview 2015 for teachers and non teaching staff vacancy - New Delhi, Delhi

Sanskrit Jobs - Thu, 02/26/2015 - 14:24
TGT for Social Studies, Maths, English, Sanskrit, Science, Hindi. KV Gole Market interview 2015 for teachers and non teaching staff vacancy....
From Indiastudychannel.com - 26 Feb 2015 08:54:17 GMT - View all New Delhi jobs
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proper meaning of Dharmo rakshati rakshitaha

samskrita Google Group - Thu, 02/26/2015 - 11:45
Dear Scholars, Please help me understanding of this sholaka Dharmo rakshati rakshitaha Thanks, Vineet
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Determination of vibhakti in Panini Sutras

samskrita Google Group - Thu, 02/26/2015 - 11:45
Can somebody help me with the logic of identifying the vibhakti of words in Panini Sutra.. The reason is that in most cases, the forms are identical in पञ्चमी विभक्ति एकवचनम् and षष्ठी विभक्ति एकवचनम्. Similarly in षष्ठी विभक्ति द्विवचनम् and सप्तमी विभक्ति द्विवचनम् e.g. 7.1.24 अतोऽम्. Here अतः
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Fate

samskrita Google Group - Thu, 02/26/2015 - 11:44
रत्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पम्कजश्री: /एवम् विचिन्तयति कोशगते द्विरेफेहा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार // ----------------------------------- P.K.Ramakrishnan http://peekayar.blogspot.com
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ADDITIONAL DIRECTOR - Archaeological Survey of India (ASI) - New Delhi, Delhi

Sanskrit Jobs - Thu, 02/26/2015 - 11:04
OR Masters Degree in Sanskrit Persian Arabic Pali Prakrit,With Bachelors’ degree with Indian History or Archaeology as one of the Subject....
From FreshersLive - 26 Feb 2015 05:34:22 GMT - View all New Delhi jobs
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ACADEMIC FACULTY 2015-16 - VERTICAL ENVOY SOLUTION PVT LTD - Lucknow, Uttar Pradesh

Sanskrit Jobs - Thu, 02/26/2015 - 00:08
ACADEMIC FACULTY 2015-16 Name of Post Subject Qualification (Post Graduate/ Graduate with B.Ed.) Experience C.B.S.E/I.C.S.E Background (1) Principal Post...
From Careesma - 25 Feb 2015 18:38:04 GMT - View all Lucknow jobs
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अन्नावर्यः (Anna)

Learn Sanskrit - Wed, 02/25/2015 - 23:33

अन्नावर्यः पुनः आन्दोलनमार्गे समुत्पद्यते। भूम्यधिग्रहणविधेयकम् अहं सम्यग् न बोधामि किन्तु अहं मन्ये अन्नावर्यः अपि सम्यग् न बोधति। अन्नावर्येण अरविन्दकेजरीवालवर्येण सह अस्मिन् आन्दोलने कार्यं न कर्तव्यम् इति मम मन्त्रणा अस्ति। अन्नावर्यस्य पूर्वान्दोलनानि सफलीभूतानि यतो हि सः निर्दलीयः आसीत्। एकेन सत्तारूढेन दलेन सह मिलित्वा सः स्वस्य प्रभावं न्यूनीकरोति।

२०१५-०२-२५ बुधवासरः (2015-02-25 Wednesday)


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राम जन्म ग्रहस्थिती

राम जन्म ग्रहस्थिती
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वाक्यपदीय के अनुसार वाक्यार्थ…..

Balramshukla's Blog - Wed, 02/25/2015 - 23:24

मीमांसा शास्त्र में वाक्य एवं वाक्यार्थ सम्बन्धी सूक्ष्म तथा विशद चर्चाएँ बहुलता से प्राप्त होती हैं। यही कारण है कि इसकी प्रसिद्धि वाक्यशास्त्र के नाम से भी है। इस प्रस्थान में दो सम्प्रदाय अत्यन्त प्रसिद्ध हैं – 1. अभिहितान्वयवाद एवं 2. अन्विताभिधानवाद। वाक्यार्थ के अतिरिक्त भी इन दोनों के सम्प्रदायों के बीच अनेक दार्शनिक विषयों पर मतभेद प्राप्त होते हैं। सबसे पहले अभिहितान्वयवाद के सम्बन्ध में चर्चा प्रस्तुत की जा रही है –
मूल अवधारणाएँ–
अभिहितान्वयवाद के प्रतिष्ठापक एवं समर्थक श्लोकवार्तिककार श्री कुमारिलभट्ट तथा उनके अनुयायी पार्थसारथिमिश्र इत्यादि हैं। इनके अनुसार वाक्य पदघटित होता है। पदों के अर्थ अभिधा-शक्ति से प्राप्त ; वाच्य, अभिहित होते हैं। अभिहित पदार्थों का पारस्परिक सम्बन्ध; अन्वय आकांक्षा, योग्यता एवं सन्निधि जैसे तत्त्वों की सहायता से होता है। इस मत में पदार्थों का अभिधान; मुख्यार्थ का बोधन चूँकि अन्वय; संसर्ग से पहले होता है, अतः इसे अभिहितान्वयवाद कहते हैं। पदों की अभिधाशक्ति उनके अर्थ बोधन में ही क्षीण हो जाती है अतः उससे पदार्थों के पारस्परिक सम्बन्ध का ज्ञापन नहीं हो सकता। पदार्थों का अन्वय अभिधा से अतिरिक्त अन्य शक्ति; लक्षणा के द्वारा माना जाता है। इस प्रकार इस मत में पदार्थ को अभिधेय तथा वाक्यार्थ को लक्ष्य स्वीकार किया जाता है -‘‘वाक्यार्थो लक्ष्यमाणो हि सर्वत्रैवेति नः स्थितिः।’’
पदार्थ पद के द्वारा वाच्य होते हैं तथा वाक्यार्थ पदार्थों के द्वारा लक्ष्य। अभिहितान्वयवाद सिद्धान्त का प्रमुख प्रतिपक्षी ‘अन्विताभिधानवाद’ है। इसके अनुसार पदों के अर्थ परस्पर अन्वित दशा में ही प्राप्त होते हैं। अतः अन्वय के लिये किसी अतिरिक्त शक्ति को मानने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अन्विताभिधानवाद के खण्डन में भाट्ट मीमांसक निम्नोक्त तर्क देते हैं –
१) परस्पर अन्वित; सम्बद्ध दशा में अर्थों की प्राप्ति मानने पर पदों के गुण, क्रिया, जाति, द्रव्य आदि अर्थ मिश्रित अवस्था में प्राप्त हाने चाहिये। जबकि ये अर्थ हमें अलग-अलग भी प्राप्त होते हैं। फलतः इस पक्ष को मानने में प्रत्यक्ष का अपलाप होता है।
२) यदि वाक्य के सभी पद परस्पर जुड़े अर्थों को प्रदान करें, तो जितने पद होंगे उतने वाक्यार्थ भी होने लगेंगे। अतः प्रत्येक पद में वाक्य कहलाने की क्षमता हो जायेगी फलतः अनेक वाक्य स्वीकार किये जाने लगेंगे।
३) लोक व्यवहार के द्वारा शक्तिग्रह के समय बालक अन्वयरहित अर्थ का ही ग्रहण करता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वह पदों का आवाप-उद्वाप करने में समर्थ नहीं हो पाता।
४) अन्विताभिधानवादी एकमात्र अभिधाशक्ति के द्वारा दो कार्य; पदार्थ एवं ; वाक्यार्थ का अभिधान मानते हैं। यह बात न्यायविरुद्ध है।
भाट्ट मीमांसकों के अनुसार वाक्यार्थबोध पदार्थबोध के बाद ही हो पाता है, अतः दोनों में कार्यकारण भाव मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।जैसे काष्ठ का प्रयोजन अन्ततः पाक क्रिया की सिद्धि ही है तथापि काष्ठ ‘पाक’ का साक्षात् कारण नहीं है। इसी प्रकार पद भी यद्यपि वाक्यार्थ के लिए ही उच्चरित होते हैं पर वाक्यार्थ का बोध साक्षात् नहीं कराते। जैसे लकड़ी अग्नि के माध्यम से भोजन पकाती है, इसी प्रकार ‘पद’ पदार्थों के द्वारा वाक्यार्थ का बोध कराते हैं। इस प्रकार पदार्थ ही वाक्यार्थ के अव्यवहित कारण हैं। पदों से सामान्य पदार्थों का ज्ञान होता है तथा आकांक्षा आदि के द्वारा अन्वय होने पर विशिष्ट अर्थ की प्राप्ति होती है। यह विशिष्ट अर्थ ही वाक्यार्थ होता है।
लक्षणा के लिए मुख्यार्थबाध आवश्यक है। अभिहितान्वयवादी इसका कारण तात्पर्य की अनुपपत्ति मानते हैं। पदों का अन्वयरहित-स्वतन्त्र अर्थ श्रोता द्वारा चाहे गये विशिष्ट अर्थ की पूर्ति नहीं करता – फलतः पदार्थ अनुपपन्न हो जाता है। पदार्थों में अन्वय के द्वारा विशिष्ट अर्थ की प्राप्ति लक्षणा शक्ति से होती है । इससे वक्ता का तात्पर्य पूरा हो जाता है तथा अनुपपत्ति का निवारण हो जाता है। पार्थसारथिमिश्र की निम्नोक्त कारिका अभिहितान्वयवाद को स्पष्टतः प्रतिपादित कर देती है –
‘‘तस्मान्न वाक्यं न पदानि साक्षाद् वाक्यार्थबुद्धिं जनयन्ति किन्तु।
पदस्वरूपाभिहितैः पदार्थैः संलक्ष्यतेऽसाविति सिद्धमेतत्।।’’
इस सिद्धान्त की मूल अवधारणाओं से परिचय के बाद हम देखते हैं कि आचार्य भर्तृहरि ने इसे किस प्रकार प्रस्तुत किया है –
भर्तृहरि द्वारा की गयी प्रस्तुति–
आचार्य भर्तृहरि, कुमारिल भट्ट एवं प्रभाकर मिश्र आदि मीमांसकों से न्यूनतम तीन शताब्दी पूर्ववर्ती हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत मीमांसा के सिद्धान्त अत्यन्त प्राचीन एवं अपेक्षाकृत प्रारम्भिक हैं। ध्यातव्य है कि भर्तृहरि ने कहीं भी ‘अभिहितान्वयवाद’ या ‘अन्विताभिधानवाद’ का कहीं नाम नहीं लिया। यह विभाजन वाक्यकाण्ड के टीकाकार पुण्यराज ने किया है। परवर्ती सभी विद्वानों ने इसका अनुसरण भी किया है। इस परम्परा के अनुसार भर्तृहरि ने अभिहितान्वयवाद सम्बन्धी तीन वाक्यार्थ-सिद्धान्त प्रस्तुत किये हैं। इनका विवरण अग्रिम पंक्तियों में प्रस्तुत किया जा रहा है –

१) संसर्ग-वाक्यार्थ
संसर्ग वाक्यार्थ पक्ष के अनुसार पदों से अन्वयरहित सामान्य अर्थ का अभिधान होने के बाद वाक्यगत अन्य पदार्थों से उनका अन्वय होता है। अन्वय द्वारा एक विशिष्ट अर्थ आता है, जिसे हम वाक्यार्थ की संज्ञा दे देते हैं । इस प्रकार इस मत को मानने वाले पदार्थ को वाक्यार्थ नहीं अपितु उनके विशिष्ट संसर्ग को वाक्यार्थ मानते हैं। पदों का अर्थ वाक्य में रहने पर भी उतना ही होता है जितना कि उनके वाक्य से अलग होने पर। पदार्थ सामान्य अर्थ होता है तथा जब वह दूसरे सामान्य-पदार्थों से सम्बद्ध होता है तब हमें संसर्गात्मक विशिष्ट-अर्थ वाक्यार्थ की प्रतीति होती है।
२) निराकांक्ष पदार्थ-वाक्यार्थ
निराकांक्ष पदार्थ-वाक्यार्थवाद के अनुसार ‘वाक्यार्थ’ वह ‘पदार्थ’ है जो सभी पदार्थों के साथ अन्वययोग्य तथा सामान्यरूप होता हुआ दूसरे पदार्थों के साथ आने के कारण आकांक्षा रहित एवं विशेष अर्थ में सिमट गया हो इस पक्ष में वाक्य एवं वाक्यार्थ के सम्बन्ध को अनुमान प्रमाण से प्राप्त माना जाता है। ‘सामान्य अर्थ वाला पदार्थ विशेष अर्थ में विश्रान्त, पर्यवसित या निराकांक्ष हो जाता है’ – इस कार्य से सम्बन्ध का अनुमान होता है। यह सम्बन्ध संसर्गमूलक नहीं अपितु असत्त्व जैसा होता है। संसर्गवाद की तरह यह पक्ष पदार्थों को साकांक्ष नहीं मानता। यहाँ पदार्थ दूसरे पदार्थों के साथ मिलकर निराकांक्ष हो जाते हैं। यह मत संसर्ग-वाक्यार्थ-पक्ष का एकदेश प्रतीत होता है।
३) प्रयोजन वाक्यार्थ
प्रयोजन वाक्यार्थ पक्ष के अनुसार किसी वाक्य में विभिन्न पदों का प्रयोग करते समय वक्ता का जो प्रयोजन होता है – वही वाक्यार्थ है। ‘‘अभिधेयः पदस्यार्थो वाक्यस्यार्थः प्रयोजनम्।’’
वाक्यार्थ वक्ता का आशय होता है। यह आशय आकांक्षा अथवा संसर्ग से नहीं अपितु वक्ता के तात्पर्य से जाना जाता है। पद अपने स्वतन्त्र अर्थों को अभिधा के माध्यम से देते हैं, जबकि वाक्यार्थ का निर्धारण ;अर्थात् पदों का संसर्गजन्य अर्थ विवक्षा के आशय से होता है। यह मत अभिहितान्वयवाद का प्राचीन स्वरूप जान पड़ता है जिसमें तात्पर्यार्थ को वाक्यार्थ के रूप में ग्रहण करते हैं।
अभिहितान्वयवाद की समीक्षा
शब्दों में तथाकथित शक्तिग्रहण संवाद के माध्यम से ही होता है। तथा संवाद हमेशा वाक्यात्मक होता है। संवाद के अन्तर्गत हमें वाक्य के अतिरिक्त पद या वर्ण की अलग प्रतीति नहीं होती। ऐसी स्थिति में यदि मीमांसक पद एवं वर्ण को स्वतन्त्र एवं सार्थक इकाई मान लेते हैं तो यह निश्चित रूप से प्रत्यक्ष की उपेक्षा तथा अपलाप है। भर्तृहरि यहाँ सामान्य लौकिक व्यवहार का तर्क देते हैं –
‘‘न लोके प्रतिपतृणामर्थयोगात् प्रसिद्धयः। तस्मादलौकिको वाक्यादन्यः कश्चिन्न विद्यते।।’’
आचार्य को इस मान्यता पर कड़ी आपत्ति है कि शब्द पहले सामान्य अर्थ को देते हैं तत्पश्चात् विशेष को। क्योंकि जिस शब्द ने सामान्य अर्थ को देना स्वीकार कर लिया, वह उस अर्थ को छोड़ नहीं सकता। यदि शब्द उस सामान्य अर्थ को छोड़ भी दे तो वह अर्थ कहाँ गया? इसका उत्तर वादी के पास नहीं है।
अभिहितान्वयवादी के अनुसार वाक्य का अर्थ पदार्थों से नहीं अपितु उनके संसर्ग नामक तत्त्व से जाना जाता है। इसका अर्थ हुआ कि वाक्यार्थ संसर्ग से प्राप्त होता है शब्द से नहीं। वाक्यार्थ के अशाब्द होने से पदार्थ भी अशाब्द हो जायेगा। ऐसा होने पर शब्द एवं अर्थ का नित्य सम्बन्ध खण्डित हो जायेगा, जो मीमांसकों के भी विरुद्ध है –
‘‘अशाब्दो यदि वाक्यार्थः पदार्थो{पि तथा भवेत्।
एवं सति च सम्बन्धः शब्दस्यार्थेन हीयते।।’’
इस दोष से बचने के लिए पूर्वपक्षी शब्दों में ही अन्वयशक्ति नहीं मान सकता क्योंकि यह उसके विरोधी अन्विताभिधानवादी का मत है। प्रयोजन को यदि वाक्यार्थ माना जाय तो वाक्यों का पारस्परिक-सम्बन्ध ठीक नहीं बैठेगा। प्रयोजन का स्वरूप मानसिक होता है, अतः उसका निश्चय एवं उसके स्वरूप का अवधारण भी असम्भव है। यह वाद केवल श्रोता की दृष्टि से विचार करता है। अभिधान के पूर्व वक्ता के मानसिक जगत् की प्रक्रियाओं का स्पर्श भी नहीं किया गया है। अतः यह मत वस्तुतः एकांगी ही है।
इस प्रकार अभिहितान्वयवाद के अनुसार वाक्यार्थ को सखण्ड एवं लक्ष्य मानना सदोष एवं गौरव-पूर्ण है।
2. अन्विताभिधानवादः मूल अवधारणाएँ तथा भर्तृहरि द्वारी की गयी प्रस्तुति
अभिहितान्वयवाद के प्रतिपक्षी अन्विताभिधानवाद मत के व्याख्याता श्री प्रभाकर मिश्र हैं। इनका दूसरा नाम ‘गुरु’ भी है, जिसके आधार पर इस मत को ‘गुरुमत’ भी कहा जाता है। इस मत की मूल अवधारणाएँ तथा वाक्यपदीय में इसके सम्बन्ध में की गई चर्चा प्रस्तुत है-

मूल अवधारणाएँ–
प्रभाकर वाक्यार्थ का कारण पदों को ही मानते हैं , पदार्थों को नहीं। इनके अनुसार पदार्थ ही वाक्यार्थ हैंऋ वाक्यार्थ पदार्थ से भिन्न नहीं है –
‘‘प्रधानगुणभावेन लब्धान्योन्यसमन्वयान्।
पदार्थानेव वाक्यार्थं संगिरन्ते विपश्चितः।।’’
पदार्थ पदों से सर्वदा अन्वित परस्पर सम्बद्ध रूप में प्राप्त होते हैं। इन अन्वय सहित पदार्थों को ही वाक्यार्थ कहते हैं।
वाक्यार्थ बोध की प्रक्रिया में सबसे पहले हमारे पास पद उपस्थित होते हैं। पदार्थों का बोध तथा वक्ता का तात्पर्य पद ही स्पष्ट करते हैं। फलतः वाक्यार्थ के बोध का कारण भी इन्हें ही माना जाना चाहिए। पदों की शक्ति तो पदार्थ का ज्ञान कराने मात्र में समाप्त हो जाती है। यदि पदार्थों में परस्पर अन्वय की शक्ति को पदों में न मानें तो अन्वय के लिए दूसरी शक्ति लक्षणा स्वीकार करनी पड़ेगी। यह प्रक्रिया गौरवपूर्ण होगी। अतः पदों में स्वार्थ एवं वाक्यार्थ दोनों की समेकित शक्ति माननी चाहिए –
‘‘पदैरेवान्वितस्वार्थमात्रोपक्षीणशक्तिभिः। स्वार्थाश्चेद्बोधिता बुद्धौ वाक्यार्थोऽपि तथा सति।।’’
भाट्टमत में शाब्द-बोध के लिए तीन शक्तियाँ माननी पड़ती हैं। 1. पदों की पदार्थाभिधान शक्ति, 2. पदार्थों की वाक्यार्थ-बोध कराने वाली शक्ति तथा 3. वाक्यार्थ को पुनः पद से सम्बद्ध करने वाली शक्ति। जबकि प्रकृत मत में केवल एक शक्ति पदों में अन्वित-अर्थ को बताने वाली से प्रयोजन सिद्ध हो जाता है – ‘अन्वयार्थगृहीतत्वान्नान्यां शक्तिमपेक्षते।’
भर्तृहरि द्वारा की गयी प्रस्तुति
१) संसृष्टवाक्यार्थवाद
अन्विताभिधानवाद के अन्तर्गत विद्वान् ‘आदिपद’ तथा ‘साकांक्ष एवं पृथक्-पृथक् सभी पदों’ को वाक्य मानते हैं। ये विद्वान् संसृष्टवाक्यार्थवादी हैं। इनके अनुसार पदार्थ वाक्य में स्थित अन्य पदार्थों से सम्बद्ध संसृष्ट,अन्वित होकर ही अस्तित्व में आते हैं। पूर्वोक्त संसर्गवाद के अनुसार पहले वाक्यस्थित पदों के अन्वयरहित अर्थ आते हैं तत्पश्चात् उनका संसर्ग अन्वय होता है। संसर्ग से प्राप्त नवीन एवं विशिष्ट अर्थ ही वाक्यार्थ हैं। जबकि संसृष्टवाद में पदार्थ दूसरे पदों के अर्थों से सम्बद्ध होकर ही प्रतीत होते हैं। अतः पदार्थों का परस्पर भाव ही वाक्यार्थ है। भर्तृहरि दोनों का अन्तर स्पष्ट करते हैं –
‘‘पूर्वैरर्थैरनुगतो यथार्थात्मा परः परः। संसर्ग एव प्रक्रान्तस्तथाद्येष्वर्थवस्तुषु।।’’
इस मत के अनुसार वाक्यार्थ पहले ही पद से प्रतीत होने लगता है, क्योंकि उसका अर्थ अन्य पदार्थों से संसृष्ट होकर भासित होता है। परन्तु यह वाक्यार्थ चूँकि अस्पष्ट सा होता है, अतः उसे स्पष्ट करने के लिए अन्य पदों का प्रयोग करते हैं – ‘व्यक्तोपव्यञ्जना सिद्धिरर्थस्य प्रतिपतृषु।
उदाहरण के लिए ‘द्वारम्’ शब्द ‘द्वारम् पिधेहि’ इस सम्पूर्ण वाक्य के अर्थ को स्पष्ट करने में समर्थ है।
प्रत्येक पदार्थ को वाक्यार्थ मानने वाले भी संसृष्ट वाक्यार्थवादी हैं, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ अन्य पदार्थों के साथ अन्वित होकर सम्पूर्ण अर्थ को प्रदान करता है – ‘‘तेषां तु कृत्स्नो वाक्यार्थः प्रतिभेदं समाप्यते।’’
२) क्रियावाक्यार्थवाद
क्रिया पद को वाक्य मानने वाले विद्वानों के अनुसार ‘क्रिया’ का अर्थ ही वाक्यार्थ है। इनके अनुसार वाक्य में प्रधानता प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति की होती है। ये दोनों क्रिया के द्वारा ही व्यक्त होती हैं। अतः वाक्य में क्रियापद का अर्थ ही प्रधानता से प्रतीत होता है। शेष नामपदों के अर्थ गौण होने के नाते क्रियार्थ के विशेषण की तरह भासित होते हैं। नाम पदों के न रहने पर भी क्रियार्थ उन्हें आक्षिप्त करके सम्पूर्ण वाक्यार्थ को स्पष्ट कर देता है – ‘‘आख्यातशब्दे नियतं साधनं यत्र गम्यते। तदप्येकं समाप्तार्थं वाक्यमित्यभिधीयते।।’’
ज्ञातव्य है कि क्रिया पदों एवं संज्ञा पदों में स्वाभाविक-साकांक्ष सम्बन्ध होता है। एक के अनुपस्थित रहने पर दूसरा उसे आक्षिप्त कर लेता है। यद्यपि नाम पदों के साथ नियत सम्बध होने के नाते क्रिया पद अकेले ही वाक्यार्थ का ज्ञान कराने में समर्थ हैं तथापि क्रिया के अतिरिक्त जो अन्य पद प्रयुक्त किये जाते हैं वे वाक्यार्थ को और स्पष्ट करने के लिए होते हैं – ‘‘क्रिया क्रियान्तराद् भिन्ना नियताधारसाधना। प्रक्रान्ता प्रतिपतृणां भेदाः सम्बोधहेतवः।।’’
समीक्षा
अन्विताभिधानवाद पदों के स्वतन्त्र अर्थों को अल्प महत्त्व देते हुए वाक्यार्थ को एक इकाई के रूप में मानता है, इसलिए वैयाकरणों की दृष्टि में अभिहितान्वयवाद की अपेक्षा यह कम दोषपूर्ण है। तथापि वाक्यार्थ बोध की इस प्रक्रिया में भी कुछ तार्किक स्खलन अवश्य आते हैं। इसके अनुसार वक्ता अर्थों का अन्वय करके उनका अभिधान करता है परन्तु श्रोता के पक्ष में वाक्यार्थ-बोध की क्या प्रक्रिया होती है, इस पर अन्विताभिधानवादियों ने स्पष्ट प्रकाश नहीं डाला है। इस प्रकार यह सिद्धान्त भी एकांगी ही है। दूसरे, यदि पदार्थ-बोधन की शक्ति पद में है तो तर्कसम्मत बात यह है कि वाक्यार्थ बोधन की शक्ति को वाक्य में माना जाये। तीसरे, पदों का अर्थ पदार्थसामान्य जाति माना गया है परन्तु इनके अनुसार पदों से विशिष्ट अन्वित अर्थ प्राप्त होता है। यह मीमांसा के जाति-अर्थवाद का स्पष्ट व्यभिचार है और वदतोव्याघात की तरह है। सामान्य एवं विशिष्ट अर्थ को एक साथ देना असम्भव सी बात है। चौथे, क्रिया जो स्वयं अपूर्ण स्वभाव वाली साकांक्ष होती है, वह पूर्ण अखण्ड, निराकांक्ष अर्थ कैसे दे सकती है। पाँचवें, इनके अनुसार प्रारम्भिक पद वाक्यार्थ बोध करा सकता है। ऐसा मानने पर ‘रामः गृहं गच्छति’ इस वाक्य में प्रत्येक पद वाक्य बन जायेगा, क्योंकि संस्कृत में तीनों पदों से वाक्य प्रारम्भ हो सकता है। इस प्रकार अव्यवस्था एवं अनिश्चितता व्याप्त हो जायेगी। वास्तविक समस्या यह है कि आदि पद, क्रिया पद अथवा प्रत्येक स्वतन्त्र पदों के अर्थ जो स्वतः अपूर्ण हैं, पूर्ण स्वरूप वाले वाक्यार्थ कैसे कहे जा सकते हैं? इस प्रकार यह मत भी वाक्यार्थ प्रक्रिया को सन्तोषजनक रीति से समझाने में असमर्थ है।
सम्प्रेषण की प्रक्रिया सदैव द्विपक्षीय हुआ करती है। इस सार्वजनीन तथ्य की इन उपर्युक्त मतों में उपेक्षा हुई है। अतः अखण्ड वाक्य एवं वाक्यार्थ को स्वीकार करते हुए वक्ता एवं श्रोता दोनों की दृष्टि से जब तक इनका विवेचन नहीं होता, तब तक वाक्यार्थ सम्बन्धी समस्याएँ यथावस्थ रहेंगी।
भर्तृहरि-सम्मत-वाक्यार्थ
पूर्वतन अध्याय में अखण्डवाक्य-पक्ष के तीन मत दर्शाये गये हैं –
1. संघातवर्तिनी जाति, 2. एक अवयवरहित शब्द तथा 3. बुद्ध्यनुसंहार। इन तीनों मतों में प्रतिभा ही वाक्यार्थ है। भर्तृहरि के अनुसार वाक्यार्थ का ज्ञान कराने की शक्ति केवल एकात्मक-स्फोट रूप वाक्य में है, अन्य में नहीं – ‘‘वाक्यरूपस्य वाक्यार्थे वृत्तिरन्यानपेक्षया।’’ अर्थात्, वाक्यार्थ-बोध में वाक्य को अपने अतिरिक्त किसी अन्य निमित्त की आवश्यकता नहीं होती। वह वर्ण, पद, पदार्थ, पदार्थ-संसर्ग अथवा संसर्ग-मर्यादा किसी की भी अपेक्षा नहीं करता। सभी सम्प्रदायों में समान रूप से सम्मत शाब्दबोध के जो आकांक्षादि सहकारी कारण हैं, भर्तृहरि उनकी चर्चा भी नहीं करते क्योंकि उनके अनुसार श्रोता को शाब्दबोध वाक्य से होता है, पदों से नहीं – जिनके लिए इन कारणों की आवश्यकता पड़े। वैयाकरण वाक्य को स्फोटात्मक, वाक्यार्थ को प्रतिभात्मक तथा इन दोनों के सम्बन्ध को अध्यासरूप मानते हैं। प्रतिभा पदार्थ से नितान्त भिन्न है क्योंकि वाक्यगत पदों को पृथक् पृथक् ग्रहण करने पर प्रतिभा का स्वरूप वही नहीं रह जाता–
‘‘विच्छेदग्रहणेऽर्थानां प्रतिभान्यैव जायते। वाक्यार्थ इति तामाहुः पदार्थैरुपपादिताम्।।’’
वाक्यार्थ की प्रतीति सम्पूर्ण एवं अखण्ड विचार के रूप में एकरस होकर होती है। अतः यहाँ अभिहितान्वय या अन्विताभिधानवादों की चर्चा का कोई अवकाश नहीं है। प्रतिभा की व्याख्या मन या बुद्धि के रूप में भी की गई है। चूँकि वाक्यार्थ ज्ञान बुद्धि के आकार से आकारित होता है, अतः औपचारिक रूप से वाक्यार्थ को भी प्रतिभा कह देते हैं। भर्तृहरि के अनुसार हमें प्रतिभा एक चमक के रूप में उद्भासित होती है। यही कारण है कि इसका ‘इदमित्थम्’ सविकल्पक वर्णन करना दुःशक है। यहाँ तक कि वक्ता या श्रोता अनुभव करते हुए भी इसका वर्णन नहीं कर सकते। फिर भी प्रतिभा को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि वह अन्तःकरण के द्वारा प्रत्यक्षतः अनुभव में आती है-
‘‘इदं तदिति सान्येषामनाख्येया कथंचन। प्रत्यात्मवृत्ति सिद्धा सा कर्त्रापि न निरूप्यते।।’’
प्रतिभा के कारण ही वाक्यगत पदों के अर्थों का सम्मिश्रण होकर एकात्मक प्रतीति होती है। मानो प्रतिभा सभी पदार्थों का विषय बनकर उन्हें अपना एकात्मक स्वरूप दे देती है। भर्तृहरि ने प्रतिभा को केवल शाब्दजगत् तक ही सीमित नहीं रखा है। इसका क्षेत्र मनुष्यों के वाग्व्यवहार के अतिरिक्त समस्त प्राणियों के सभी व्यापारों के मूलकारण तक व्याप्त है। इतने व्यापकतत्त्व की अवहेलना या अपलाप आत्मप्रवंचना ही होगी। प्रतिभा अन्तःकरण की प्रवृत्तिरूप होने के कारण परम-प्रमाण है। सभी सांसारिक व्यवहारों के मूल में प्रतिभा अवश्य रहती है – ‘इतिकर्तव्यतायां तां न कश्चिदतिवर्तते।’
प्रतिभा कभी शब्द से तो कभी व्यवहार से उत्पन्न होती है। कभी-कभी इसके प्रकट होने का कारण नहीं बताया जा सकता। इस परिस्थिति में विद्वान् इसे दूसरे जन्म के संस्कार का प्राकट्य मानते हैं। आचार्य के अनुसार जिस प्रकार कुछ विशेष द्रव्यों के परिपाक के समय उनमें नशे की शक्ति स्वतः – बिना किसी प्रयत्न विशेष के उत्पन्न हो जाती है, प्राणियों में प्रतिभा का आधान भी वैसे ही स्वाभाविक होता है। मनुष्य की प्रतिभा को जगाने के लिए कुछ प्रयत्न भी करने पड़ते हैं परन्तु पशुओं में व्यक्त प्रतिभा बिना किसी प्रयत्न के ही उद्भूत हो जाती है। इस प्रसंग में भर्तृहरि ने प्रतिभा के छः प्रकार बताए हैं , जिनका स्पष्टीकरण निम्नवत् है –
स्वाभाविकी प्रतिभा स्वभावसिद्ध होती है, जैसे वानर का शाखाओं पर कूदना आदि। स्वभावसिद्ध प्रतिभा संस्कार रूप में अनादि-अभ्यास के कारण अस्तित्व में रहती है। अनुकूल समय मिलते ही यह जग जाती है। इसका कारण पैतृक प्रवृत्ति या चिर अभ्यास भी हो सकता है। चरणनिमित्ता प्रतिभा तप इत्यादि से प्राप्त अलौकिक प्रतिभा है। यह प्राचीन ऋषियों में सरलता से दिखाई पड़ती है। अभ्यासनिमित्ता प्रतिभा चिरकालीन अभ्यास द्वारा मनुष्यों में आ जाती है। जैसे जौहरी अथवा संगीतज्ञ अपने विषयों को सूक्ष्मता एवं आसानी से जान लेते हैं। भर्तृहरि ने अन्यत्र भी ‘अभ्यासात् प्रतिभाहेतुः सर्वः शब्दः..’ कहा है। योगनिमित्ता प्रतिभा योगियों की अलौकिक क्रिया में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। अदृष्टनिमित्ता प्रतिभा उन राक्षसादियों में प्राप्त होती है जो परकाया-प्रवेशादि कार्यों में समर्थ होते हैं। विशिष्टोपहिता अर्थात् किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा किसी अपेक्षाकृत सामान्य-व्यक्ति में पहुँचाई गई प्रतिभा जैसे वेदव्यास द्वारा संजय को दी गई दिव्यदृष्टि।
भर्तृहरि ने कहा है कि शाब्द जगत् की दृष्टि में प्रतिभा वाक्यों से प्रतिपाद्य होते हुए भी सभी वाक्यों की आधार है। वह व्याकरणिक प्रक्रियाओं से परे वस्तु है। व्याकरण सम्मत क्रम आदि शक्तियों के नष्ट हो जाने पर भी शब्द-बीज प्रतिभा में सन्निविष्ट रहते हैं। अनुकूलता पाने पर वही प्रतिभा वर्ण, पद, वाक्य के रूप में पुनः विस्तृत होती हुई आभासित होती है। भर्तृहरि ने अन्यत्रभी प्रतिभा को अनादि तथा अपौरुषेय सिद्ध किया है।
भर्तृहरि के प्रतिभा-सिद्धान्त की विशिष्टता यह है कि इसमें वाक्यार्थ के ज्ञान की प्रक्रिया को उसी प्रक्रिया से जोड़ा गया है जिससे कि सभी प्रकार के ज्ञान सम्बद्ध हैं। वाक्यार्थ-बोध का स्वरूप एवं प्रक्रिया ज्ञान-सामान्य की प्रक्रिया से भिन्न नहीं है। शाब्द-ज्ञान भी चूँकि एक विशिष्ट प्रकार का ज्ञान ही है अतः उसका स्वरूप या उसकी प्रक्रिया ज्ञान सामान्य से कदापि भिन्न नहीं मानी जा सकती। दो ज्ञानों के लिए भिन्न-भिन्न मापदण्ड बिल्कुल तर्कसंगत नहीं हैं। अतः जिस प्रतिभा से अन्य सभी ज्ञान प्राप्त होते हैं वाक्यार्थ ज्ञान भी उसी से होता है। आचार्य के द्वारा प्रतिभा का प्रतिपादन एक प्रकार से ज्ञान-प्रक्रिया के क्षेत्र में अद्वैत का प्रतिपादन है। प्रतिभा न केवल वाक्यार्थ ज्ञान का कारण है बल्कि प्राणिमात्र के सभी प्रकार के ज्ञानों का कारण एवं स्वरूप है।
भर्तृहरि के इस स्वोपज्ञ सिद्धान्त ने परवर्ती चिन्तकों पर गम्भीर प्रभाव डाला है। दिङ्नाग ने इसी से अनुप्राणित होकर अपने वाक्यार्थ-सिद्धान्त को प्रतिभात्मक माना। भोज ने भर्तृहरि से प्रेरित होकर प्रतिभा के और अधिक विभाजन किये। कुमारिल एवं जयन्त भट्ट ने प्रतिभा के महत्त्व को अंशतः स्वीकार करते हुए भी उसका खण्डन किया।
इस प्रकार सर्वजनमनःसंवेद्य, अखण्ड, निरवयव एवं अनिरूप्य प्रतिभा वैयाकरणों को वाक्यार्थ के रूप में सम्मत है।


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भर्तृहरि के अनुसार आठ विकल्प….

Balramshukla's Blog - Wed, 02/25/2015 - 17:39

भाषा के संरचनात्मक-विश्लेषण के लिये भाषावैज्ञानिक, वैयाकरण अथवा अन्य दार्शनिक सामान्यतया वाक्य का ही ग्रहण करते हैं। इसका कारण यह है कि वाक्य में प्रतिनिधि रूप से भाषा के सभी अभिलक्षण प्राप्त हो जाते हैं। वस्तुतः भाषा अमूर्त्त एवं जातिस्वरूप है जिसका उपयोग या अनुमान हम वाक्य के द्वारा ही कर पाते हैं। यही कारण है कि भाषा-विश्लेषण के नाम पर प्राचीन भाषाशास्त्रियों ने सदा वाक्य का ही विश्लेषण किया। अतः वाक्य के विवरण तथा विश्लेषण से प्राप्त तथ्यों को भाषा से सम्बन्धित माना जा सकता है।
भारत में प्राचीन काल से ही वाक्य की संरचना से सम्बन्धित स्पष्ट रूप से दो मत रहे हैं – पदवाद एवं वाक्यवाद। इनमें प्रमुख मतभेद चूँकि वाक्य की विभाजन-योग्यता पर आधारित है, अतः इन्हें क्रमशः सखण्ड पक्ष एवं अखण्डपक्ष भी कहा जा सकता है। वाक्य के स्वरूप का वर्णन विद्वानों ने अपने-अपने दार्शनिक-सिद्धान्तों एव मान्यताओं के अनुरोध से भिन्न-भिन्न प्रकार से किया है। वैयाकरणों के अतिरिक्त प्रायः सभी चिन्तक वाक्य को पदों से संघटित मानते हैं। भर्तृहरि द्वारा प्रस्तुत लक्षणों में इन्हीं दो पक्षों के आठ प्रतिनिधि मत वर्णित हैं, अतः इनका सामान्य स्पष्टीकरण प्रस्तुत प्रसंग में उपयोगी होगा-
क)पदवाद
उपर्युक्त दो वादों का आधारभूत प्रश्न यह है कि भाषा की कौन सी इकाई अपने में सम्पूर्ण अर्थ देने वाली है? सखण्ड-पक्ष की मान्यता का आधार यह है कि वाक्य-संरचना में पृथक्-पृथक् शब्द एवं शब्दार्थ पहले से ही उपस्थित होते हैं। वाक्य की रचना के बाद शब्द को वाक्य का एवं शब्दार्थ को वाक्यार्थ का आधार मान लिया जाता है। अतः इस मत के अनुसार ‘वाक्य’ खण्डों से निर्मित एक सम्पूर्ण इकाई है। पदवादी पदसंघात के रूप में तो वाक्य की सत्ता मानते हैं परन्तु उनके अनुसार अर्थबोधकता वाक्य में नहीं पदों में होती है। वाक्यार्थ वाक्यजन्य नहीं अपितु पद-जन्य अर्थों का समूह मात्र है। इनके अनुसार, सम्प्रेषण के समय वर्णों एवं पदों तथा उनके अर्थों का क्रमशः निश्चय होना एक सार्वजनिक अनुभव है अतः वाक्य की अखण्डता को स्वीकार करना प्रत्यक्ष को झुठलाना है। विद्वानों ने मीमांसकों को सखण्डवाद का मुख्य पक्षधर स्वीकारा है। मीमांसकों के अनुसार पदों को एक इकाई में समन्वित एवं संघटित रखने वाले तत्त्व आकाङ्क्षा, योग्यता एवं सन्निधि हैं। ये वाक्यार्थ के सहकारी कारण भी होते हैं। मीमांसकों के अतिरिक्त नैयायिक एवं आलंकारिक भी अपने विभिन्न शास्त्रीय प्रयोजनों की पूर्त्ति के लिये सखण्डवाक्यवाद का समर्थन तथा अखण्ड पक्ष का खण्डन करते हैं।
ख) वाक्यवाद
आचार्य भर्तृहरि ने सखण्डवादियों खण्डन करके अखण्ड वाक्यवाद की प्रतिष्ठापना की है। तथ्य अथवा कल्पना के रूप में कोई भी विचार वक्ता के मन में एक इकाई के रूप में ही स्थित रहता है तथा इसकी अभिव्यक्ति भी एक इकाई के रूप में ही होती है। यह इकाई वाक्य है। ध्यातव्य है कि इसका अवगम भी श्रोता को एक इकाई के रूप में ही होता है। वर्णों एवं पदों की उपस्थिति आभासी है। ध्वनियाँ सम्भाषण की अनिवार्य शर्त हैं। इनका स्वभाव है – क्रमशः उच्चरित होना। ध्वनियों की क्रमवत्ता जो वर्ण या पद के रूप में प्रत्यक्ष होती है वह वाक्य पर आरोपित हो जाती है , अन्यथा वाक्य के अन्तर्गत दीखने वाले वर्ण या पद उसी तरह नितान्त असत् हैं, जिस प्रकार ए, ऐ आदि वर्णों के कल्पित (अ, इ, ए आदि) वर्णभाग। वाक्य को खण्डहीन सिद्ध करने के साथ ही वैयाकरण पदों को वाक्य से अपोद्धृत (निकाला हुआ) स्वीकार करते हैं ताकि भाषा-शिक्षण आदि लौकिक एवं शास्त्रीय व्यवहार सम्भव हो सकें। पदों की अवास्तविकता को सिद्ध करने में उनका तर्क है कि पदों का स्वरूप तथा अर्थ दोनों अनिश्चित तथा सन्दिग्ध होते हैं । वे स्वतन्त्र व्यवहार के योग्य भी नहीं होते। फलतः असत्य पद वाक्यार्थ की संरचना में असमर्थ हैं। वाक्य केवल उच्चरित और सुनाई पड़ने वाली सत्ता मात्र नहीं है, वह तो एकात्मक विचार है जिसका विभाजन स्वाभाविक रूप से असम्भव है। विभाजन योग्यता केवल ध्वनियों में है, जो विचार के स्तर पर स्थित वाक्य की अभिव्यञ्जक अथवा प्रकाशक मात्र हैं। उच्चारण से पहले वाक्य वक्ता एवं बाद में श्रोता की बुद्धि में अखण्डरूप से स्थित रहता है। वैयाकरण वाक्य को ही वाक्यार्थ का एकमात्र कारण मानते हैं क्योंकि पदों की सत्ता तो है ही नही जिससे कि वह कारण बन सके। भर्तृहरि शक्तिग्रह, आकांक्षा, योग्यता अथवा सन्निधि जैसे सहकारी कारणों की बात भी नहीं करते, क्योंकि सम्प्रेषण पदों द्वारा होता ही नहीं, जिसके लिए इनकी आवश्यकता पड़े। वे वाक्यार्थ को प्रतिभा-स्वरूप मानते हैं जिसके लिए अन्तर्निहित शब्द-भावना उत्तरदायी है। यह आन्तर शब्दभावना ही है जो भर्तृहरि को समकालीन दार्शनिकों की अपेक्षा कहीं अधिक वैज्ञानिक विचारक सिद्ध करती है।
भर्तृहरि ने अखण्डवाक्यवाद का पक्ष लेते हुए, प्रतिपक्ष द्वारा उठायी गयी शङ्काओं का समुचित निवारण किया है।
भर्तृहरि भाषा के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में वाक्य की महत्ता को अच्छी तरह से जानते थे। अतः आचार्य ने अपने महनीय ग्रन्थ वाक्यपदीय के सम्पूर्ण द्वितीय काण्ड को वाक्य के ऊहापोह एवं खण्डन-मण्डन पूर्वक वर्णन को समर्पित किया है। प्रथम काण्ड में जहाँ प्रतिपक्ष का लगभग अभाव सा दीखता है, वहीं इसके विपरीत वाक्यकाण्ड में वाक्य एवं वाक्यार्थ सम्बन्धी प्रश्नों एवं प्रतिप्रश्नों का अद्भुत संग्रह है। वाक्यकाण्ड के प्रारम्भिक श्लोकों में उन्होंने वाक्य संरचना से सम्बन्धित विभिन्न आचार्यों के आठ प्रमुख मत गिनाए हैं –
इनमें सखण्ड पक्ष के पाँच मत हैं, जो क्रमशः अभिहितान्वयवाद तथा अन्विताभिधान पक्ष के अन्तर्गत वर्गीकृत किये जा सकते हैं। 1- क्रम एवं 2- संघात को ‘अभिहितान्वयवाद’ तथा 1- आख्यातशब्द, 2- आद्यपद एवं 3- साकांक्ष पृथक् सर्वपद , पक्षों को ‘अन्विताभिधानवाद’ के अन्तर्गत रख सकते हैं। शेष तीन पक्ष 1- संघातवर्त्तिनी जाति, 2- एक अनवयव शब्द तथा 3- बुद्ध्यनुसंहृति, अखण्डवाक्यवाद के अन्तर्गत रखे जाते हैं।

१- सखण्ड पक्ष से सम्बद्ध मत
सखण्ड पक्ष का केन्द्रीय विचार यह है कि वाक्य से पूर्व भी पदों की वास्तविक सत्ता होती है तथा उनसे जुड़कर वाक्य निर्मित होता है। संयोगज सत्ता का खण्डसहित होना अनिवार्य ही है, अतः वाक्य का सखण्ड होना ही तर्कसंगत है। वाक्यार्थ के स्वरूप के अनुसार सखण्ड पक्ष को दो वादों, अभिहितान्वय एवं अन्विताभिधान के अन्तर्गत वर्गीकृत किया गया है।
सबसे पहले अभिहितान्वयवाद से सम्बन्धित दो मतों का स्वरूप एवं उनमें आचार्य द्वारा उपस्थापित शंकाओं का वर्णन किया जा रहा है –
क) अभिहितान्वयवाद से सम्बद्ध दो पक्ष एवं उनके खण्डन
अभिहितान्वयवाद मूलतः वाक्यार्थ से सम्बद्ध मान्यता है अभिहितान्वयवाद के अनुसार वाक्यगत पद, अस्तित्व एवं अर्थ दोनों की दृष्टि से स्वतन्त्र तथा निरपेक्ष होते हैं। पद अपने-अपने स्वतन्त्र अर्थों का अभिधान करके अर्थ में रहने वाली आकांक्षा एवं योग्यता के फलस्वरूप एकात्मक वाक्यार्थ की प्रतीति कराते हैं। पारस्परिक सम्बन्ध बताने वाली शक्ति अभिधा से अतिरिक्त (लक्षणा) होती है।
क- संघात पक्ष
संघात पक्ष अभिहितान्वयवादियों का सर्वाधिक स्वीकृत पक्ष है। इसके अनुसार अर्थ के द्वारा परस्पर सम्बद्ध पदों का संघात अर्थात् समूह वाक्य है। समान प्रयोजन वाले पदों के खण्ड समवेत रूप से वाक्य कहलाते हैं। केवल क्रियापद अथवा आदि-पद को वाक्य स्वीकार करने पर भी अन्य पदों का अध्याहार अनिवार्य होता है। फलतः ये पक्ष भी अन्ततोगत्वा स४ातपक्ष में ही पर्यवसित होते हैं। जैमिनि, शबरस्वामी एवं कुमारिलभट्ट जैसे मीमांसकों के अतिरिक्त प्राच्य एवं नव्य नैयायिक भी पदसंघात-पक्ष का स्पष्ट समर्थन करते हैं। इस पक्ष के अनुसार वाक्य में संयुक्त होने से पहले पद का जो स्वतन्त्र अर्थ होता है, वाक्य का समूह होने पर भी उसका वही अर्थ रहता है। तीन पत्थर मिलकर जिस प्रकार बटलोई को धारण करते हैं अथवा चार कहार मिलकर जैसे पालकी उठाते हैं उसी प्रकार वाक्यगत पद मिलकर वाक्य या वाक्यार्थ को सम्भव बनाते हैं। फलतः वाक्य का स्वरूप पद से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है तथा वाचकता भी मात्र पद में निहित होती है। भर्तृहरि इसे स्पष्ट करते हैं- जिस प्रकार अकेला वर्ण नहीं अपितु वर्णों का समुदाय वाचक होता है, उसी प्रकार वाचकता पदों में नहीं बल्कि पदों के समुदाय अर्थात् वाक्य में होती है।(वा॰प॰ 2/54)
भर्तृहरि ने इस पक्ष की आलोचना वाक्यार्थमुख द्वारा की है। यह पक्ष संसर्ग को वाक्यार्थ मानता है। इसके अनुसार पहले पदों का सामान्य-अर्थ आता है तत्पश्चात् अन्य पदों के संसर्ग से उसमें विशिष्टार्थ (वाक्यार्थ) का आधान होता है। भर्तृहरि के अनुसार सामान्य-अर्थ के तिरोहित हो जाने पर शब्द विशेष-अर्थ का वाचन नहीं करा सकता। शब्दार्थ सम्बन्ध के नित्य होने के कारण पहले तो सामान्य-अर्थ का परित्याग नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो भी जाय तो परित्यक्त सामान्यार्थ कहाँ जायेगा, इसका उत्तर देना कठिन है। सामान्यार्थ एवं विशेषार्थ की विवक्षा भी एक साथ नहीं हो सकती।
इस प्रकार वाक्यार्थ-बोध को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाने के कारण, ‘संघात पक्ष’ वाला वाक्य लक्षण खण्डित हो जाता है।

ख- क्रम
क्रम पक्ष के अनुसार पदों का विशिष्ट क्रम वाक्य कहलाता है। जिस प्रकार वर्णों की विशिष्ट आनुपूर्वी को पद कहते हैं उसी प्रकार वाक्य भी पदों का एक क्रम है। क्रम एवं वाक्यार्थ में नियत सम्बन्ध होने से सिद्ध होता है कि क्रम ही वाचक होता है, वाक्य नहीं। क्रम को काल का धर्म कहा गया है, उसकी वाचकता सिद्ध होने पर ‘वाक्य’ जैसे किसी अर्थबोधक तत्त्व की विद्यमानता सिद्ध नहीं होती। क्रम को वाचक मानने से क्रम के भेद से वाक्यार्थ में भेद उपपन्न हो जायेगा, फलतः अनेक शक्तियाँ नहीं माननी पडें़गी। इस प्रकार इस पक्ष में लाघव होता है। क्रम अश्राव्य है तथा काल का धर्म है, जिसे पदों पर आरोपित कर दिया जाता है। इस पक्ष में भी संसर्ग को वाक्यार्थ माना गया है। इस प्रकार इस पक्ष में वाक्य को अवास्तविक तथा व्यवहार-मात्र माना गया है।
भर्तृहरि ने इस पक्ष का स्पष्ट खण्डन किया है। उनके अनुसार वाक्य एवं वाक्यार्थ का सम्बन्ध शब्द के धर्मों से है जिन्हें सदैव शब्द से प्राप्त होना चाहिए। अन्यथा शब्दार्थ-सम्बन्ध का नित्य होना – जो व्याकरण एवं मीमांसा दोनों में समान रूप से माना गया है, खण्डित हो जायेगा। कुमारिलभट्ट ने भी ‘गौः अस्ति’ एवं ‘अस्ति गौः’ आदि वाक्यों में क्रमभेद से अर्थभेद का सम्बन्ध नहीं होना’ सिद्ध करके इस पक्ष का खण्डन किया है।
इस प्रकार वाक्य की सत्ता एवं नित्य शब्दार्थ-सम्बन्ध को स्वीकार नहीं करने के कारण यह पक्ष भी वैयाकरणों को सम्मत नहीं है।
ग- अन्विताभिधानवाद से सम्बद्ध तीन मत एवं उनका खण्डन
अन्विताभिधानवादी शब्द के स्वतन्त्र तथा सामान्य अर्थ की वाचकता को स्वीकार नहीं करते। इनके अनुसार शब्दों (पदों) के अर्थ वाक्यगत अन्य पदार्थों से विशिष्ट एवं संसृष्ट होकर आते हैं तथा वे परस्पर जुड़कर वाक्यार्थ देते हैं। इस पक्ष को स्वीकार करने से एक ओर अभिहितान्वयवाद में प्रसक्त दोष नहीं आते हैं तो दूसरी ओर अन्वय हेतु किसी अन्य शक्ति का आश्रय न लेने से लाघव भी होता है। इस वाक्यार्थ सिद्धान्त से प्रेरित तीन वाक्य लक्षणों को भर्तृहरि ने उद्धृत किया है जिनका वर्णन अग्रिम-पंक्तियों में किया जा रहा है।
क- आख्यात शब्द
आख्यात शब्दवाद के अनुसार आख्यात-शब्द अर्थात् क्रियावाचक पद ही वाक्य है। भर्तृहरि ने इस मान्यता की विस्तृत चर्चा की है। आख्यात वाक्यवाद का यह अर्थ नहीं है कि केवल आख्यातघटित शब्द ही वाक्य है अथवा आख्यात से अतिरिक्त पदों की वाक्य संघटना में कोई महत्त्व नहीं है। अपितु इसका तात्पर्य यह है कि वाक्य के घटक पदों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य पद आख्यात होता है। यदि वाक्य एक क्रिया पद वाला हो और उतने ही से सम्पूर्ण अर्थ की निराकांक्ष समाप्ति हो जाय तो उसे भी वाक्य कहा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए ‘वर्षति’ कहने से ‘देवो जलं वर्षति’ का पूर्ण बोध होता है अतः यह भी एक सम्पूर्ण वाक्य है। अन्य कारक पदों के बिना प्रयुक्त आख्यात-पद भी आकाङ्क्षा द्वारा उन्हें अध्याहृत करके अपने को पूर्ण करता है – (वा॰प॰ 2/326)
क्रियापदों में अपने योग्य कारकों के चुनाव तथा परिसीमन की शक्ति होती है। वाक्य में अन्य पदों की अपेक्षा क्रिया पद की महत्ता का यही कारण है। जैसे ‘लिखता है’ कहने से कर्त्ता के रूप में चैतन्ययुक्त एवं पर्याप्त अधीती व्यक्ति का ही अध्याहार हो सकता है। कर्म एवं करण के बारे में भी यही सत्य है। वाक्य में क्रिया हो या न हो, क्रिया के बिना वाक्यबोध असम्भव है। अतएव क्रियात्मकता को ही वाक्य का लक्षण माना गया है। क्रियापदयुक्त वाक्य ही सभी वाग्-व्यवहारों का साधन है। इस प्रकार वाक्य की निराकांक्ष एवं परिपूर्ण प्रतीति कराने तथा ठीक ठीक एवं शीघ्र अर्थावबोध में कारण होने के नाते विद्वानों ने क्रिया को ही ‘वाक्य’ माना है। ‘कारक’ वाक्य में क्रिया के प्रति गौण होते हैं , क्योंकि उनका अपना अर्थ भी क्रिया के बिना प्रतीत नहीं होता – (वा॰प॰ 2/424)
भर्तृहरि ने यद्यपि आख्यातपक्ष का खण्डन नहीं किया है, तथापि वे इसको मानने के पक्ष में नहीं हैं।
ख- आद्य पद
इस मत के अनुसार पदसमूह में से पहले पहल प्रयुक्त पद को वाक्य कहते हैं- चाहे वह क्रिया का वाचक हो या साधन (कारक) का वाचक। अन्विताभिधानवाद के अनुसार सभी पद विशिष्ट अर्थों के ही वाचक होते हैं, अतः प्रथम पद भी अन्य अतिरिक्त (प्रयुज्यमान) शब्दों के अर्थों के साथ विशिष्ट अर्थ को ही देता है। इस प्रकार प्रथमतः प्रयुक्त पद से ही सम्पूर्ण वाक्य का अर्थ आ जाता है। अतः इसे ही वाक्य मानना समीचीन है। आद्य पद से सम्पूर्ण वाक्य का अस्पष्ट सा भान हो जाता है। श्रोता स्पष्टीकरण हेतु अन्य पदों की अपेक्षा करता है जो पहले वाले अर्थ में कुछ भी नवीनता नहीं लाते। वस्तुतः अर्थ की पूर्णता ही वाक्य की कसौटी है। यदि अर्थ एक (शुरुआती) पद से भी पूर्ण हो जाता है, तो वही वाक्य है। यदि अर्थ कई पदों से पूरा नहीं होता तो उन्हें भी पद ही माना जायेगा वाक्य नहीं। अर्थ प्रथम पद से ही पूर्ण हो जाता है । अन्य पद उस अर्थ के सहकारी अथवा द्योतक होते हैं। प्रथम शब्द का उच्चारण शब्दार्थ के लिए ही नहीं अपितु सम्पूर्ण संसृष्ट वाक्यार्थ के लिये किया जाता है। प्रथमतः उच्चरित शब्द या तो क्रिया होगा या कारक। दोनों, परस्पर अविनाभूत हैं अतः शुरुवाती शब्द दूसरे पदों के अर्थों की उपस्थिति करवाता है। इस प्रकार आदि पद से अतिरिक्त दूसरे पद, नियम अथवा अनुवाद हेतु प्रयुक्त किये जाते हैं। ऐसा नहीं है कि आद्यपदवादी केवल आद्यपद को ही वाक्य मानते हैं। ये बातें वाक्य में अर्थ की दृष्टि से आद्यपद को ध्यान में रखकर कही गई हैं।

ग- पृथक् सर्वपदसाकांक्षवाक्य-वाद
आदिपद की ही भाँति वाक्य में स्थित सभी पद अलग अलग भी सम्पूर्ण वाक्यार्थ का बोध कराने में समर्थ हैं। अतः सभी को वाक्य कहा जा सकता है। चूँकि (अन्विताभिधानवाद के अनुसार) सभी पद पृथक्-पृथक् भी वाक्यगत पदों के अन्य अर्थों से संसृष्ट अर्थ का ही बोध कराते हैं अतः सभी पदों को वाक्य कहना निरापद है। इस प्रकार वाक्यार्थ प्रतिपद अवबुद्ध होता है ।
संघातवाद में पद परतन्त्र रहते हैं जबकि यहाँ पदों की पूर्ण अर्थद्योतकता के नाते वे परिपूर्ण एवं स्वतंत्र होते हैं। यही इन दोनों मतों में मुख्य अन्तर है।
इस प्रकार सखण्डपक्षवादियों के मतों के स्पष्टतया प्रतिपादन के साथ-साथ भर्तृहरि ने उनसे असन्तुष्ट होते हुए उनकी मान्यताओं का खण्डन किया है।

3- अखण्ड पक्ष से सम्बद्ध तीन मत तथा इनमें उत्थापित एवं सम्भावित शंकाओं का निवारण
सखण्डपक्षवादी वाक्य की एकात्मकता एवं वाचकता दोनों का खण्डन करते हैं। भर्तृहरि ने उनके विरोध में अखण्डवाक्यवाद की स्थापना की है। यह सिद्धान्त मुख्यतः मीमांसकों के पद-पदार्थ नित्यत्ववाद के विरोध में स्थापित है। भर्तृहरि के अनुसार एकमात्र वाक्य ही अर्थ का वाचक है जो एक तथा अखण्ड है। उन्होंने ने वाक्य एवं वाक्यार्थ के अखण्डत्व का पक्ष-प्रतिपक्षपूर्वक विशद वर्णन एवं स्थापन किया है। इस प्रसंग में उन्होंने अखण्डवादियों के कुल तीन मत दिये हैं। इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है बाह्य तथा आन्तरिक। जब वाक्य को पूर्ण उच्चारण द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है, तब इसका स्वरूप बाह्य होता है। इसके पहले या बाद में जब यह वक्ता या श्रोता के मस्तिष्क में रहता है, तब इसका स्वरूप आन्तरिक है। दोनों स्थितियों में यह एक अविभाज्य इकाई है।

क- संघातवर्त्तिनी जाति
वैयाकरणों ने जातिस्फोटपक्ष में क्रियावाचक अथवा कारकवाची पदों में विद्यमान शब्दजाति को वाक्य मानकर उसकी वाचकता सिद्ध की है। ध्यातव्य है कि व्याकरण-आगम में ‘सत्ताजाति’ के अतिरिक्त ‘शब्दत्वजाति’ भी स्वीकार की गई है अर्थात् शब्द के द्वारा शब्द से वाच्य अर्थ के अतिरिक्त उसके पूर्व शब्दजाति भी भासित होती है (वा॰प॰ 3/16)।
यही कारण है कि ‘शब्द’ के स्वरूप अवधारण के बिना उसके वाच्य अर्थ का ज्ञान असम्भव होता है। स्वरूपावधारण से श्रोता शब्दजाति को ग्रहण करता है।
यहाँ पदसंघात को एक शब्द मानकर उसमें स्थित अमूर्त्त जाति को वाक्य एवं अर्थ का बोधक माना गया है। वाक्य को जातिस्वरूप मानने से उसका एकत्व एवं अखण्डत्व अनायास ही सिद्ध हो जाते हैं। एक ही वाक्य का विभिन्न पुरुषों द्वारा उच्चारण किये जाने पर भी अथवा एक ही व्यक्ति द्वारा विभिन्न क्षणों में उच्चरित होने पर भी, उस वाक्य की समान प्रतीति होती है, जिससे सिद्ध होता है कि वाक्य जात्यात्मक है। वाक्य व्यक्तियाँ भिन्न-भिन्न होते हुए भी यदि पृथक् अर्थ नहीं देती तो इसका कारण यह है कि उन व्यक्तियों में एकत्व की प्रतीति कराने वाली जाति विद्यमान है।
इस प्रकार भिन्न व्यक्तियों से व्यक्त निरवयव जाति ही वाचक तथा नियमतः वाक्य है। भर्तृहरि के अनुसार जाति का स्वरूप है –
वाक्य एवं वाक्यार्थ के सम्बन्ध में जातिवाद को स्वीकार करने पर वाक्य की एकता एवं अविभाज्यता के मत को बल मिलता है, साथ ही साथ महान् लाघव भी होता है। यही कारण है कि वैयाकरण वाक्य रूप जाति को ही वाचक मानते हैं।
ख- एक निरवयवशब्द
प्रस्तुत मत वाक्य-व्यक्ति-वादियों का है। इनके अनुसार वाक्य एक अवयवरहित तथा अखण्ड शब्द है। ध्यातव्य है कि बुद्ध्यनुसंहृति पक्ष में वाक्य की एकात्मकता उच्चारण के पूर्व एवं श्रवण के अनन्तर ही मानी जाती है, जबकि इस पक्ष में उच्चरित वाक्य को भी अखण्ड माना जाता है – शब्दस्य न विभागोऽस्ति। इस पक्ष में सर्वाधिक कठिनाई वाक्य के अन्तर्गत स्पष्टतः प्रतिभासमान भागों की है। इन भागों की असत्ता भर्तृहरि ने बड़ी ही तर्कपूर्ण पद्धति से सिद्ध की है। इनके अनुसार वाक्य में पदों अथवा पदार्थों का अर्थ निश्चित नहीं होता, उनका निर्धारण तो वाक्यगत प्रसंग से ही होता है। वे अन्य प्रसंग में नितान्त भिन्न अर्थ भी दे सकते हैं। फलतः वाक्य एवं वाक्यार्थ ही सत्य हैं, पद एवं पदार्थ नहीं। उनका विभाजन केवल शास्त्रीय है । सामान्य व्यवहार में हम सम्पूर्ण वाक्य का ही प्रयोग, श्रवण एवं अर्थावगम करते हैं। वाक्य का पदशः विभाजन भाषा-शिक्षण के लिए है। मनुष्य की ग्राह्यता शक्ति इतनी समर्थ नहीं होती कि वह वाक्य जैसी बड़ी इकाई का एक साथ ग्रहण तथा अवधारण कर सके। अतः उसे वाक्य का ग्रहण खण्डशः कराया जाता है। बुद्धि अवबोध के अनन्तर या समकाल उसका विश्लेषण करती है। इसे भर्तृहरि एवं उनके टीकाकार अनेक उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं। जिस प्रकार ज्ञान (सामान्य) एक ही है, परन्तु विषयों के अनुसार वह घटज्ञान, पटज्ञान आदि विभिन्न रूपों में भासित होता है, वाक्यार्थ बोध के समय पदज्ञान की भी वही स्थिति होती है। जिस प्रकार चित्र का दर्शन एवं अवगम एक इकाई में होता है, परन्तु बाद में उसमें नील, रक्त आदि वर्णों का अलग से अवधारण कर लिया जाता है। जैसे चित्रगत नील आदि वर्ण स्वयं चित्र नहीं हैं, उसी प्रकार वाक्यगत पद स्वयं वाक्य नहीं हैं अपितु केवल वाक्य-ज्ञान के उपाय हैं। वाक्य की एकात्मकता को नृसिंह एवं मयूराण्डरस के उदाहरण से सिद्ध किया हैं। जिस प्रकार समासगत पदों का अपना भिन्न-स्वतन्त्र अर्थ नहीं समझा जाता, उसी प्रकार वाक्यगत पद भी अपने आप में निरर्थक होते हैं। सम्पूर्ण समासपद की ही तरह सम्पूर्ण वाक्य भी एक अवयवरहित शब्द है जो पूर्णतया समुदित होने पर ही अर्थ का अभिधान करता है। ‘एकोऽनवयवः शब्दः’ इस लक्षण में ‘शब्द’ पद का प्रयोग वाक्य की एकात्मकता को दृढ करता है। पदों में वर्णभाग की तरह वाक्य में पदभाग भी वाक्य से अत्यन्त भिन्न नहीं, अपितु वाक्य के ग्रहण में उपाय मात्र हैं। इस मत की धर्मकीर्ति, जयन्त भट्ट एवं कुमारिल भट्ट ने समालोचना की है जिसका प्रत्युत्तर मण्डनमिश्र ने ‘स्फोटसिद्धि’ में सम्यक् प्रकार से दिया है।
ग- बुद्ध्यनुसंहृति
वक्ता अथवा श्रोता की बुद्धि में ग्रहण किये जाने वाले पद भागों का परिणाम ही वाक्य है। ‘‘वाक्यस्य बुद्धौ नित्यत्वम्’’ (वा॰प॰ 2/342) वाक्य की एकता या अखण्डता की बात बुद्धि के स्तर पर ही की जा सकती है, क्योंकि बाह्यरूप में उसकी क्रमिकता तो प्रत्यक्ष होने के कारण सर्वजनसंवेद्य होती है। वाक्य उच्चारण के पूर्व वक्ता एवं श्रवण के बाद श्रोता की बुद्धि में एकाकार होता है। वाक्याकार में आकारित बुद्धि ही वाक्य है, जिससे उसका अर्थ भी अवगत होता है। श्रूयमाण ध्वनियों से तो उस बुद्धिस्थ तत्त्व का अभिव्यञ्जन मात्र होता है ।
बाह्य तत्त्व की अभिव्यक्ति से पहले वक्ता एवं श्रोता दोनों में आन्तरिक बुद्धितत्त्व का रहना अत्यन्त अनिवार्य है, अन्यथा सम्प्रेषण सम्भव नहीं हो सकता। वस्तुतः वक्ता के मस्तिष्क में एक क्रम निश्चित होता है। बीज के पल्लवन की तरह वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति हेतु एक-एक ध्वनि क्रमशः निःसृत होती रहती है। ध्वनियाँ उसी क्रम से श्रोता के मस्तिष्क में पहले से विद्यमान बुद्धित्त्व में परिणत होती रहती है। इस प्रकार अर्थबोध की प्रक्रिया सम्भव हो पाती है (वा॰ प॰1/48)।
जिस प्रकार लिपियाँ शब्द नहीं अपितु शब्दों के संकेत अथवा प्रतीक मात्र हैं, उसी प्रकार बाह्य उच्चारण वाक्य का स्वरूप नहीं है। वाक्य स्फोटरूप एवं आन्तर (बुद्धिस्थ) है। इस आन्तर अवस्था में ही उसमें प्रकाशक-प्रकाश्यत्व एवं कारण-कार्यत्व सदैव स्थित रहते हैं। ऐसा क्रमशः वक्ता एवं श्रोता के पक्ष की भिन्नता से होता है (वा॰प॰ 2/32)।इसी बुद्धितत्त्व में शब्द एवं अर्थ दोनों सम्मिलित अवस्था में रहते हैं-‘‘एकस्यैवात्मनो भेदौ शब्दार्थावपृथक्स्थितौ।’’ (वा॰प॰ 2/31)
इस प्रकार तीनों अखण्डवादियों के मत का निष्कर्ष इस प्रकार है – 1- वाक्य एक खण्डरहित इकाई है तथा 2- अर्थ उसी से निकलता है 3- पद नहीं क्योंकि उनकी वस्तुतः सत्ता नहीं है।
भर्तृहरि व्यावहारिक-प्रयोजनों की पूर्त्ति के लिये वाक्य का विभाजन तो स्वीकारते ही हैं। चूँकि वाक्य का अवगम सामान्य मनुष्य अखण्डरूपेण नहीं कर सकता अतः वाक्यों के अपोद्धार से प्राप्त पदों के विश्लेषण के व्याकरणिक कार्य को मान्यता दे दी गयी है। परन्तु पदों की सत्ता वाक्य की भाँति वास्तविक नहीं है। सक्रम वाणी के बिना कोई भी विचार सम्प्रेषित नहीं हो सकता इसी विवशता के नाते सामान्य लोग वाक्य को सक्रम मान बैठते हैं। पद का स्वरूप एवं अर्थ प्रतिवाक्य बदलता रहता है, फलतः उसे विश्वस्त एवं वास्तविक नहीं मान सकते। इसके अलावा भिन्न-भिन्न व्याकरण सम्प्रदाय एक ही शब्द का अनेक तरह से विश्लेषण करते हैं, इससे भी उनकी वास्तविकता खण्डित होती है। विभाजित पद वाक्यबोध के उपायमात्र हैं जिन्हें वाक्यबोध के बाद त्याग दिया जाता है।


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