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Sales Manager - SV PUBLICATIONS - Lucknow, Uttar Pradesh

Sanskrit Jobs - Wed, 06/29/2016 - 18:35
SV Publications is a concern of SVGroup having its corporate office atSV House, Delhi, NCR.We have a vast experience in the fieldof education, which includes₹20,000 a month
From Indeed - 29 Jun 2016 13:05:11 GMT - View all Lucknow jobs
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ऐरोप्यदेशसमुदयः (European Union)

Learn Sanskrit - Wed, 06/29/2016 - 16:17

सुधर्मा इति वार्तापत्रे लेखकैः ऐरोप्यदेशसमुदयः इति शब्दः उपयुज्यते। गत सप्ताहे ऐरोप्यदेशसमुदयः शीर्षसामाचारे आसीत्। केश्चित् समाचाराः वर्णयन्ति निर्वाचनस्य परिणामं दृष्ट्वा आङ्ग्लदेशे नागरिकाः buyer’s remorse इति अनुभवन्ति इति।
http://sudharma.epapertoday.com/?yr=2016&mth=6&d=27&pg=1

२०१६-०६-२९ बुधवासरः (2016-06-29 Wednesday)


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urgently hiring for Tulsi herbal plant and wherehoue. - Pantsheel Enterprises - Bhopal, Madhya Pradesh

Sanskrit Jobs - Wed, 06/29/2016 - 15:09
The author of the Mahābhāṣya, an advanced treatise on Sanskrit grammar and linguistics framed as a commentary on Kātyāyana'svārttikas (short comments) on Pāṇini...
From Careesma - 29 Jun 2016 09:39:52 GMT - View all Bhopal jobs
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Require Sanskrit and drawing Teacher - NK Advance Solution - Delhi, Delhi

Sanskrit Jobs - Wed, 06/29/2016 - 09:41
Sanskrit & Drawing Teacher. Sanskrit Teacher/ Drawing Teacher Experience:. Dear Madam, We have urgently requirement for Female Teachers' ( Sanskrit Drawing...
From Shine.com - 29 Jun 2016 04:11:20 GMT - View all Delhi jobs
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SIHM PGIMS Rohtak, Clerk, Psychologist, Medical Superintendent - Pt. B.D. Sharma University of Health Sciences, Rohtak - Haryana

Sanskrit Jobs - Wed, 06/29/2016 - 02:24
SIHM PGIMS Rohtak, Clerk, Psychologist, Medical Superintendent Pt. B.D. Sharma University of Health Sciences, Rohtak invites applications to recruit on vacant₹9,300 - ₹34,800 a month
From Employment Samachar - 28 Jun 2016 20:54:18 GMT - View all jobs
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जयदेवकृत दशावतारं

जयदेवकृत दशावतारं
प्रलय पयोधि जले धृतवानसि वेदं, विहितवहित्रचरित्रमखेदम्।केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ।।१।।
क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे, धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ।।२।।
वसति दशनशिखरे धरणि तव लग्ना, शशिनि कलंककलेव निमग्ना ।केशव धृतशूकररूप जय जगदीश हरे ।।३।।
तव करकमलवरे नखमદ્ભુતश्रृंगं, दलितहिरण्यकशिपुतनुभृंगं । केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।।४।। 
छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन, पदनखनीरजनितजनपावन केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ।।५।।
क्षत्रियरूधिरमये जगदपगतपापं, स्नपयसि पयसि शमितभवतापं केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ।।६।।
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयं, दशमुखमौलीबलिं रमणीयं केशव धृतरघुपतिरूप जय जगदीश हरे ।।७।।
वहसि वपुषि विषदे वसनं जलदाभं, हलहतिभीतिमिलितयमुनाभं केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ।।८।।
निंदसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं, सदयह्रदय दर्शितपशुघातं ।केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।।९।।
म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालं, धूमकेतुमिव किमपि करालं ।केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ।।१०।।
श्री जयदेवकवेरिदमुदितमुदारं, श्रृणु शुभदं सुखदं भवसारं ।केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ।।११।।
वेदानुद्धरते जगन्निवहते भूगोलमुद्बिभ्रतेदैत्यंदारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वतेपौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वतेम्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ।यहाँ पढें विस्तार-वर्णन 
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Teachers ,3 - 8 years exp , Bengaluru / Bangalore

Samskrut Jobs - Wed, 06/29/2016 - 00:00
Job-Astro Consultants - Montessori , Kindergarten , Primary , Middle & Secondary ProgramsMaths , Physics , Chemistry , Biology , General Science , Social Science , Computer Science , Geography , History , English Literature , Hindi , <strong class="blkclor">Sanskrit</strong> & ...
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shrauta (vedic heritage) dictionary in stardict form

samskrita Google Group - Tue, 06/28/2016 - 21:40
Example output: From vedic-rituals-hi paakayaJNa पाकयज्ञ पु. पके हुए अथवा उबाले हुए (चावल के) दानों की आहुति देते हुए अनुष्ठित होने वाला यज्ञ, का.श्रौ.सू. 6.1०.26 (आस्रवहोमः, हुत्वा शेषप्राशनम्); मो.वि. कुछ आचार्यों के मतानुसार, एक पाकयुक्त (एवं कुछ के मतानुसार एक साधारण अथवा गृह्य) यज्ञ,
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shrauta (vedic heritage) dictionary in stardict form

sanskrit-programmers - Tue, 06/28/2016 - 21:40
Example output: From vedic-rituals-hi paakayaJNa पाकयज्ञ पु. पके हुए अथवा उबाले हुए (चावल के) दानों की आहुति देते हुए अनुष्ठित होने वाला यज्ञ, का.श्रौ.सू. 6.1०.26 (आस्रवहोमः, हुत्वा शेषप्राशनम्); मो.वि. कुछ आचार्यों के मतानुसार, एक पाकयुक्त (एवं कुछ के मतानुसार एक साधारण अथवा गृह्य) यज्ञ,
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Medical Record Clerk - Pt. B.D. Sharma University of Health Sciences - Rohtak, Haryana

Sanskrit Jobs - Tue, 06/28/2016 - 20:16
Applications are invited for the following temporary posts of group A, B & C posts but likely to be continued against vacant posts in State Institute of₹5,200 - ₹20,200 a month
From Freshers Home - 28 Jun 2016 14:46:29 GMT - View all Rohtak jobs
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Trained Graduate Teachers - Kendriya Vidyalaya - Delhi, Delhi

Sanskrit Jobs - Tue, 06/28/2016 - 15:40
F/11053/3(4)/2015/KVS/RPS, Dated : 14.06.2106 Trained Graduate Teachers job position in Kendriya Vidyalaya sangathan (KVs) in Delhi 1. TGTs (Sanskrit, P & HE
From Freshersworld.com - 28 Jun 2016 10:10:38 GMT - View all Delhi jobs
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Sanskrit Teacher - Gangothri International Public School - Bangalore, Karnataka

Sanskrit Jobs - Tue, 06/28/2016 - 13:19
Sanskrit Teacher - *01 Vacancy available**. _School is located on Magadi main road near to Nagarbhavi,_*....₹1,50,000 a year
From Indeed - 28 Jun 2016 07:49:13 GMT - View all Bangalore jobs
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उत्तर-दक्षिण-परिणयः (The marriage of north and south)

Learn Sanskrit - Tue, 06/28/2016 - 10:10

ह्यः सोमवासरे मैसूरुनगरे महाराजयदुवीरकृष्णदत्तचामराजवोडियारमाहाभागस्य डुङ्गरपुरराज्यस्य राजकन्यया तृषिकाकुमारीसिंहमहाभागया सह परिणयः अभवत्।

Picture from: http://www.loksatta.com/photos/news/1257309/mysore-royal-wedding-yaduveer-krishnadatta-chamaraja-wadiya-weds-trishika-at-amba-vilas-palace/8/

२०१६-०६-२८ मङ्गलवासरः (2016-06-28 Tuesday)


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Language Expert Hindi ,6 - 8 years exp , Delhi

Samskrut Jobs - Tue, 06/28/2016 - 00:00
Job-Astro Consultants - We are for-profit organization which believes in making a difference in education through personalized learning and ensuring that students learn with understanding through our interactive tools like Mindspark ( digital...
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Teachers ,2 - 5 years exp , Other City(s) in Andhra Pradesh

Samskrut Jobs - Tue, 06/28/2016 - 00:00
Job-Astro Consultants - Maths , Physics , Chemistry , Biology , General Science , Social Science , Computer Science , Geography , History , English Literature , Hindi , <strong class="blkclor">Sanskrit</strong> & TeluguBachelors / Masters in relevant subject with a Degree / Diploma / ...
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एति जीवन्तमानन्दः (आदिकाव्य का जीवन-दर्शन)

Balramshukla's Blog - Mon, 06/27/2016 - 22:42

 

                                            भास्वद्वंशवतंसकीर्तिरमणीरङ्गप्रसङ्गस्वनद्वादित्रप्रथमध्वनिर्विजयते वल्मीकजन्मा मुनिः।

                                          पीत्वा यद्वदनेन्दुमण्डलगलत्काव्यामृताब्धेः किमप्याकल्पं कविनूतनाम्बुदमयी काम्बिनी वर्षति[1]

भारतीय वाङ्मय को समेकित रूप में देखने से उसमें एक समान वैचारिक अन्तर्धारा प्रवाहित होती हुई दीखती है। माना जाता है कि भारतीय वाङ्मय के स्रोत वेदों में वर्णित सूत्रात्मक सिद्धान्तों का ही उपबृंहण बाद के लौकिक साहित्य में हुआ है। यही कारण है कि वेदों के रहस्यों को इतिहास तथा पुराणों के माध्यम से ही समझने की चेतावनी दी जाती है, अन्यथा अपनी सीमित बुद्धि के अनुसार अर्थ करने पर उनके साथ अन्याय हो सकता है[2]। वेद आस्तिक परम्परा के लिए परम प्रमाण समझे जाते हैं[3]। वेदों की प्रामाणिकता का लाभ अन्यान्य परवर्ती महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को भी देने के लिए भारतीय परम्परा एक विशेष उपाय करती है। वह है उन महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों पर वेदत्व का अतिदेश। इस अतिदेश को परम्परा सामान्यतः उन ग्रन्थों को पञ्चम वेद की संज्ञा देकर करती है। इससे उन परवर्ती ग्रन्थों का महत्त्व ख्यापित होने के साथ ही साथ वेदों के साथ उनकी वैचारिक सहमति भी द्योतित होती है। वेद के पश्चाद्वर्ती ग्रन्थों–रामायण, पुराण, महाभारत यहाँ तक कि नाट्यशास्त्र तक को पाँचवाँ वेद कह देना इस प्रवृत्ति के उदाहरण हैं[4]। रामायण के विषय में इस अतिदेश का प्रकार और भी रोचक है। कहा गया है कि वेद द्वारा प्रतिपाद्य परब्रह्म ने जब दशरथ के पुत्र राम के रूप में जन्म लिया तब उनका वर्णन करने वाले वेदों ने भी वाल्मीकि के माध्यम से रामायण के रूप में अवतार ग्रहण किया–

वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे।

वेदो प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना।

तस्माद् रामायणं देवि वेद एव न संशयः[5]

रामायण का वेदों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध एक दूसरे प्रकार से भी दर्शाया जाता है। गायत्री मन्त्र चारों वेदों के सार तथा उनकी माता[6] के रूप में सम्मत है। सम्पूर्ण रामायण को गायत्री मन्त्र की व्याख्या माना जाता है, क्योंकि उसके २४००० श्लोकों में से हर हज़ारवाँ श्लोक क्रमशः गायत्री के वर्णों से प्रारम्भ होता है। उपर्युक्त रूपकों का तात्पर्य यह है कि वेद में वर्णित धर्म के सनातन तत्त्वों को ही रामायण के माध्यम से नया स्वर तथा नया कलेवर मिला है। वेदों के सैद्धान्तिक तत्त्वों को व्यवहार में अनूदित करने के लिए मानो धर्म ने ही रामायण के चरित नायक राम के रूप में मूर्त विग्रह धारण कर लिया हो– रामो विग्रहवान् धर्मः[7] दया, दाक्षिण्य आदि उदार चारित्रिक गुणों के साथ राम में शौर्य तथा उत्साह का जो मर्यादित समन्वय दिखायी पड़ता है, वह वैदिक जीवन दृष्टि के आदर्श पुरुष की कल्पना के अनुकूल है।

जीवन को समन्वित रूप में जीने के लिए वेदों में अनेकानेक उपदेश मिलते हैं। उन्हीं उपदेशों के बीच हमें उनकी संहिताओं में ध्रुवपद जैसा एक विशेष स्वर सुनाई पड़ता है। और वह है जीवन को उसकी सम्पूर्ण विचित्रताओं के साथ स्वीकार करना तथा उसके विषय में नकारात्मक दृष्टि न रखना। मनुष्य का जीवन विविध प्रकार की विषमताओं से भरा हुआ है। इसका चित्रण भी हमें वेद में यत्र तत्र प्राप्त भी होता है। इनके विषय में वेदों के अनेक मन्त्र भी उद्धृत किये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए जीवन की विषताओं का चित्र उपस्थापित करता हुआ भिक्षुसूक्त का निम्नलिखित मन्त्र ध्यातव्य है–

समौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते

यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः[8]

जीवन इतना अनिश्चित है कि हाथ में आयी हुई चीज़ की भी अन्ततः प्राप्ति हो ही जाये ऐसा निश्चित नहीं है–

न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम्।

अन्यस्य चित्तमभि संचरेण्यमुताधीतं विनश्यति[9]

तथा–को हि मनुष्यस्य श्वो वेद[10]

इन उपर्युक्त वाक्यों के द्वारा जीवन की विषमताओं तथा अनिश्चितताओं अत्यन्त स्पष्ट वर्णन किया गया है । इन प्रतिकूलताओं के बावजूद वेदों ने जीवन को जीना कर्तव्य माना है। वेदों में जीवन जीने के लिए अनेकत्र आदेश भी हैं तथा प्रार्थना के प्रकार भी हैं। ईशावास्योपनिषद् में जीवन की इच्छा के प्रति निम्नवत् आदेश मिलता है–

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे[11]

असामयिक मृत्यु के प्रति अस्पृहणीयता का प्रदर्शन तथा पर्याप्त आयु के लिए प्रार्थनाएँ वैदिक संहिताओं में सभी तरफ़ बिखरी पड़ी हैं। उदाहरण के लिए–

मा पुरा जरसो मृथाः।, मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।,

किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव।

तेभिः कल्पस्व साधुया मा नः समरणे वधीः[12] आदि।

वैदिक ऋषियों द्वारा अभिमत पर्याप्त आयु की यही इच्छा अन्ततः अमृतत्व की स्पृहणीयता, खोज तथा स्पृहणीयता में भी पर्यवसित होती है, जिसके पर्याप्त संकेत भी वेदों में मिलते हैं, जैसे– अपाम सोमममृता अभूम। तथा तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय [13]आदि।

जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण वेदों में आत्महत्या का अनेकशः निरास किया गया है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में उर्वशी दुःखित पुरुरवा को पहाड़ की चोटी से गिरकर आत्महत्या करने से रोकती है–

पुरुरवो मा मृथा मा प्रपप्तो मा त्वा वृकासो अधिवास उक्षन्। (ऋग्वेद १०–९५–१५)।

किसी भी तरह से प्राणों की सुरक्षा को यहाँ तक समर्थित किया गया है कि क्षुधार्त ऋषि का जीवनधारण के लिए कुत्ते के आँतों का पकाना भी गर्हणीय नहीं माना गया है। इसी आधार पर तो धर्मशास्त्रों में अत्यन्त क्लिष्ट अवस्थाओं में भी जीवन को यथाकथंचित् धारण करके – समृद्धो धर्ममाचरेत् की व्यवस्था दी गयी है।

जीवन के प्रति वेद के उपर्युक्त सकारात्मक दृष्टिकोण को हम सम्पूर्ण वाल्मीकीय रामायण में भी अनुस्यूत देख पाते हैं। वाल्मीकीय रामायण में जीवन के विविध आयाम अत्यन्त समुज्ज्वल रीति से मुखरित हुए हैं । इस महान् कविता का मूल ही है राक्षसी प्रवृत्तियों द्वारा जीवन के स्वाभाविक प्रवाह को अवरुद्ध कर दिये जाने के कारण उपजा आक्रोश। क्रौञ्च पक्षी के जोड़े में से एक के मार दिये जाने पर दूसरे का करुण विलाप आदिकाव्य का उत्स है[14]। इसमें से एक का तो जीवन ही नष्ट हो चुका है जबकि दूसरा अपने जीवन की निरर्थकता का अनुभव कर रहा है। ऐसी स्थिति में कवि के उद्वेलित हृदय से यह वाणी स्फुटित होती है–

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्[15]

कवि की आक्रुष्ट भारती पर्याप्त शोध के बाद[16] एक ऐसे नायक को विषय बनाती है जिसमें जीवन का ऊर्जस्वल प्रवाह अपनी समस्त मर्यादाओं के साथ विद्यमान है तथा जिसमें उपर्युक्त जीवनरोधक नृशंस प्रवृत्तियों से प्राणिमात्र को अभय देने का सामर्थ्य है। श्रीराम की प्रतिज्ञा है–

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।

अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम [17]

वाल्मीकि के नायक में यह सामर्थ्य है कि वह निराशा के नाते मृत्यु की ओर प्रवण जीवन को पुनः स्वयं में विश्वास रखने का धैर्य देता है। रामायण में आदि से अन्त तक जीवन के प्रति यही आशापूर्ण भाव विभिन्न पात्रों तथा घटनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है।

रामायण के चरित नायक राम तथा इसके अन्य पात्रों के जीवन में विषमता से भरे ऐसे क्षण आते हैं जिनमें धैर्य का खो जाना अत्यन्त ही स्वाभाविक होता है। वाल्मीकि का मानना है –दुर्लभं हि सदा सुखम्[18] –मनुष्य के जीवन में सदा सुख ही हो ऐसा नहीं हो सकता। वनवास से लेकर सीता के भूमिसात् होने तक स्वयं राम का जीवन इतनी भावनात्मक क्लिष्टताओं से भरा हुआ है जिसके कारण अनेक बार तो वे जीवन को ही व्यर्थ समझने लगते हैं[19]। स्वयं राम युद्धकाण्ड में विलाप करते हुए अपने साथ घटित विपरीत परिस्थितियों को गिनाते हैं–

राज्यनाशं वने वासं दण्डके परिधावनम्।

वैदेह्याश्च परामर्शो रक्षोभिश्च समागमम्॥

प्राप्तं दुःखं महाघोरं क्लेशश्च निरयोपमः॥[20]

परन्तु प्रत्येक परिस्थिति में वाल्मीकि जीवन के उज्ज्वल पक्ष का चित्र प्रस्तुत करते हुए उपदेशों के द्वारा अपने पात्रों को अवसाद से मुक्त कराते हैं। राम जीवन के पथ पर प्रतिक्षण बिछे मृत्यु के कण्टक से अपने आपको बचाते हैं। यहाँ तक कि अन्त में मृत्यु (काल) स्वयं उनके पास उपस्थित होता है और पूछता है– अब आप के जाने का समय है, फिर भी अगर आप और जीना चाहते हैं तो आपका कल्याण हो, यह सन्देश स्वयं विधाता ने भिजवाया है–

यदि भूयो महाराज प्रजा इच्छस्युपासितुम्।

वस वा वीर भद्रं ते एवमाह पितामहः॥[21]

मृत्यु के इस कथन पर श्रीराम मृत्यु उसके निमन्त्रण को स्वीकार करते हैं तथा उसे हँसते हुए प्रत्युत्तर देते हैं[22] राघवः प्रहसन् वाक्यं सर्वसंहारमब्रवीत्[23] राम का चरित्र जीवन को उसकी सारी विषमताओं के बावजूद उत्साहपूर्वक जीने तथा मृत्यु आने पर बिना विकृत हुए अपितु सहर्ष प्रस्तुत होने की शिक्षा देता है। वस्तुतः, मृत्यु के आने पर वही व्यक्ति आतंकित नहीं होता है जिसने जीवन को उसकी समग्रता में जी लिया हो। इसके विपरीत वीर्यहीन अपरिपक्व व्यक्ति जीते जी मृत्यु के भय से पीले पड़ा रहता है। बक़ौल मिर्ज़ा ग़ालिब–था ज़ीस्त में भी मर्ग का खटका लगा हुआ। उड़ने से पेश्तर भी मेरा रंग ज़र्द था॥[24]

जीवन की विषमताओं में पड़ा हुआ सामान्य व्यक्ति प्रायः शोकग्रस्त होकर धैर्य छोड़ देता है। इस स्थिति में वाल्मीकि रामायण में अनेकशः विवेकपूर्वक क्षणिक शोक तथा अवसाद पर विजय प्राप्त करने तथा धैर्य धारण करने का उपदेश दिया गया है। इसके अनुसार मनुष्य को अवसाद और हताशा के चंगुल में नहीं आना चाहिए क्योंकि अवसाद व्यक्ति की जीवनी शक्ति को नष्ट कर डालता है और विषाद उसे वैसे ही मार डालता है जैसे छोटे बच्चे को क्रोधान्ध सर्प–

न विषादे मनः कार्यं विषादो दोषवत्तरः।

विषादो हन्ति पुरुषं बालं क्रुद्ध इवोरगः[25]

शोक की अधिकता से व्यक्ति का उत्साह जाता रहता है। इस कारण उसमें कार्य करने की क्षमता का ख़त्म हो जाती है। फिर व्यक्ति धीरे धीरे और अधिक विपत्तियों में फँसता चला जाता है। इस दुश्चक्र को निम्नलिखित श्लोक में बहुत उचित रीति से बताया गया है–

निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः

सर्वार्थाः व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति[26]

निरन्तर असफल होन के कारण व्यक्ति की हताशा बढ़ती चली जाती है और अन्ततः उसके जीवन पर ही बन आती है। इसलिए रामायण में बार बार अवसाद के बुरे परिणामों के प्रति सचेत किया गया है–

शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम्।

शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपुः[27]

आज कल के समय में जब गहरे शोक के क्षणिक आवेग में आत्महत्या के प्रसंग सुनने–देखने को मिल जाते हैं तब रामायण के ये उपदेश और भी सार्थक हो जाते हैं।

प्राणों को धारण करना सदैव ही करणीय है क्योंकि लौकिक तथा पारलौकिक सारी सम्भावनाओं की मूल शर्त जीवन ही है। उसके समाप्त होने पर तो सारी योग्यतायें ही समाप्त हो जाती है। बड़ी विपत्ति में पड़े हुए व्यक्ति के लिए भी भविष्य में आ सकने वाली कल्याणमय परिस्थितियों के देखने का अवकाश तभी है जब वह जीवित बना रहे। सुन्दरकाण्ड में सीता की अप्राप्ति से खिन्न हनुमान् के मन में आत्महत्या का विचार आता है परन्तु वे चिन्तनपूर्वक इस कल्मष से पार पा जाते हैं। उनका चिन्तन है–

विनाशे बहवो दोषाः जीवन्नाप्नोति भद्रकम्।

तस्मात् प्राणान् धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगमः॥[28]

जीवन्नरो भद्रशतानि पश्येत् वाली प्रसिद्ध सूक्ति का मूल रामायण का उपर्युक्त वाक्य ही है।

वाल्मीकि ने अपने काव्य में दो बार एक प्राचीन लौकिक गाथा को उद्धृत किया है जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य यदि जीवित रहे तो सौ वर्षों बाद भी उसके सुख प्राप्त करने की सम्भावना बनी रहती है–

कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मा(म्)।

एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि॥

जीवन की स्पृहणीयता को सिद्ध करने वाली इस गाथा को वाल्मीकि ने कल्याणकारिणी कहा है क्योंकि इस प्रकार का चिन्तन व्यक्ति के हृदय से मृत्यु के विचार तथा जीवन पर अविश्वास को दूर रखता है और उसे विषम परिस्थतियों में जीने का साहस देता है। उपर्युक्त गाथा पहली बार (५–३४–०६) रावण द्वारा अपहृत सीता के मुख से कहलायी गयी है। सीता की परिस्थिति ऐसी विषम है कि जिन्होंने जीवन पर विश्वास लगभग खो ही दिया है (राक्षसीवसशमापन्ना भर्त्स्यमाना च दारुणम्। चिन्तयन्ती सुदुःखार्ता नाहं जीवितुमुत्सहे[29]॥)। ऐसी विषम परिस्थिति में भी हनुमान् से मिलकर उन्हें जीवन की अपार संभावनाओं पर पर विश्वास हो जाता है। दूसरी बार (रा॰ ६–१२६–२) यह गाथा राम के लौटने की सूचना पहुँचाने गये हनुमान् से मिलकर भरत ने कही है। १४ वर्षों की निरन्तर प्रतीक्षा के बाद विषण्ण भरत राम के पुनरागमन की सूचना को इसी जीवनाशा की परिणति मानते हैं। वाल्मीकि ने उत्साह तथा अनिर्वेद का आश्रय लेते हुए जीवन से हताश न होने का बारम्बार उपदेश दिया है। किष्किन्धाकाण्ड में अवसादग्रस्त राम को समझाते हुए लक्ष्मण कहते हैं–

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्।

सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥

उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।

उत्साहमात्रमाश्रित्य प्रतिलप्स्याम जानकीम्[30]

कार्य में दक्षता के साथ मन को न हारने देना कार्यसिद्धि का रहस्य है। क्योंकि मन के हारे हार है मन के जीते जीत–

अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराजयम्।

कार्यसिद्धिकराण्याहुस्तस्मादेतद् ब्रवीमि ते[31]

रामायण में देखने को मिलता है कि जो भी पात्र अवसाद से ग्रस्त होता है, दूसरा पात्र उसकी सहायता करता है तथा सान्त्वना तथा उपदेश द्वारा उसे विषाद के चंगुल से बचाता है। अयोध्या काण्ड में राम विषादग्रस्त दशरथ को समझाते हैं तो दशरथ कौसल्या को धीरज बँधाते हैं। आगे के काण्डों में राम को कभी लक्ष्मण समझाते हैं तो कभी राम लक्ष्मण को। कभी सुग्रीव राम को धैर्य का उपदेश करते हैं[32] तो कभी सुषेण मरणोद्यत राम को लक्ष्मण के लिए शोक न करने की सलाह देते हैं[33]। यह पारस्परिक उद्धार की भावना वाल्मीकि में अत्यन्त उल्लेखनीय है जो सिद्ध करती है कि मनुष्य के जीवन की सम्भावना पारस्परिक सहयोग में ही है[34]

मृत्यु के प्रति भी वाल्मीकि का दृष्टिकोण बहुत ही स्वस्थ है। रामायण में घटित मृत्यु के गिने चुने प्रसंगों में दशरथ की कारुणिक मृत्यु प्रमुख है। पिता की मृत्यु से व्यथित भरत को समझाते हुए श्रीराम अयोध्याकाण्ड में जीवन की अनित्यता को अत्यन्त स्वाभाविक मानकर शोक न करने का उपदेश देते हैं–

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।

संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्[35]

रामायण के अनुसार मृत्यु एक कालविशेष में घटित घटना का नाम भर नहीं है वह तो हमारे अस्तित्व के साथ निरन्तर लगी रहती है । हमारे साथ उठती बैठती, आती जाती है। इस तथ्य को समझकर हमें शोक नहीं करना चाहिए–

सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति।

गत्वा सुदीर्घमध्वानं सहमृत्युर्निवर्तते[36]

रामायण में मृत्यु को लेकर एक बहुत सुन्दर उपमा आयी है। उसके अनुसार प्राणियों में सभी को वैसे ही एक दूसरे के आगे पीछे मरना है जैसे व्यापारियों का कारवाँ एक के पीछे एक चलता रहता है–

यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात् कश्चित् पथि स्थितः।

अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठतो भवतामिति[37]

मृत्यु को टालना असम्भव ही है। अतः इस प्रसंग में बुद्धिमान् व्यक्ति शोक नहीं करते–

एवं पूर्वैर्गतो मार्गः पैतृपैतामहैर्ध्रुवः।

तमापन्नः कथं शोचेद् यस्य नास्ति व्यतिक्रमः॥[38]

रामायण में केवल जीवन की प्रशंसा मात्र नहीं है,बल्कि विभिन्न प्रसंगों में आये उपदेशों द्वारा यह बात स्पष्ट कर दी गयी है कि वे कौन से तत्त्व हैं जिनके आचरण द्वारा जीवन अपने सुन्दरतम आयामों के साथ विकसित हो सकता है तथा इसके विपरीत कौन से कदाचार ऐसे हैं जिनसे जीवन की अन्तर्धारा व्याहत हो जाती है। बार बार धर्म को लोकजीवन का प्रतिष्ठापक बताया गया है– धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम् [39]। राम को भरत के प्रति उपदेश है कि मनुष्य को इस जीवन में करुणापूर्वक धर्म का पालन करते हुए परलोक को सँवारने का प्रयत्न करना चाहिए–

धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना।

भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता[40]

परम धर्मात्मा राम[41] प्रत्येक परिस्थिति में धर्म को वरीयता देते हैं तथा हमारे सामने आदर्श जीवन प्रस्तुत करते हैं।

धार्मिक कर्मों का पारलौकिक जीवन में विपाक को मानने के लिए आस्तिक्य बुद्धि का होना आवश्यक है। कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त को नहीं मानने वाला व्यक्ति धर्म की अधिकांश व्यवस्थाओं पर विश्वास नहीं कर सकता है। भरत के द्वारा राम को मनाने के प्रसङ्ग में कवि ने नास्तिकता तथा आस्तिकता से सम्बन्धित दो सर्गों (२–१०८,२–१०९) की अवतारणा की है। भरत के साथ आये हुए जाबालि नामक मुनि ने नास्तिक मत का अवलम्बन करके राम से अयोध्या लौट चलने की बात कही। जाबालि के अनुसार मृत दशरथ के वचनों का पालन मुग्धता ही है। परलोक जैसी कोई वस्तु नहीं है। व्यक्ति को प्रत्यक्ष को ही सर्वस्व मानना चाहिए–

न ते कश्चिद् दशरथस्त्वं च तस्य न कश्चन।

अन्यो राजा त्वमन्यत्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते॥

दानसंवनना ह्येते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः।

यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व संत्यज॥

स नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धिं महामते।

प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठतः कुरु [42]

राम अत्यन्त रोषपूर्वक परलोक का निरास करने वाले नास्तिक मत का खण्डन करते हैं क्योंकि आस्तिक्य बुद्धि धर्म का आधार है, अतः विद्वान् पुरुष नास्तिकता के मार्ग का अवलम्बन नहीं करता–

तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात्[43]

प्राणिमात्र को जीवन से अधिक कोई भी अन्य वस्तु प्रिय नहीं होती। रामायण वस्तुतः उसी चिरयौवन जीवन के उत्सव का काव्य है और रामायण की कविता का प्रत्येक काल में भारतीय समाज में लोकप्रिय तथा ग्राह्य रहने का कारण उसकी यही जीवनोन्मुखता है। स्वयं रामायण में भी रामायण के पढ़ने के अनकों लाभों में एक लाभ की ओर बार बार संकेत किया गया है। और वह यह है कि इसके पढ़ने से मनुष्य कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हताश नहीं होने पाता और दीर्घ जीवन पाता है–

शृणोति य इदं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम्।

श्रद्दधानो जितक्रोधो दुर्गाण्यतितरत्यसौ[44]

श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायुश्च विन्दति[45]

सर्वपापैः प्रमुच्येत दीर्घमायुरप्नुयात्[46]

इस प्रकार हम देखते हैं कि रामायण में जीवन के प्रति अत्यन्त आशापूर्ण दृष्टिकोण वर्णित किया गया है। अपनी इसी सकारात्मक दृष्टि के कारण रामायण ने भारतीय जनमानस को युगों युगों तक कठिन समयों में भी फिर उठ खड़े होने का आत्मविश्वास दिलाया है तथा उसे अवसाद के कल्मष से उठाकर अभ्युदय की ओर मार्गदर्शन भी किया है। अपने अनेक युगानुकूल संस्करणों के माध्यम से अनेकशः नवीन होकर रामायण ने अवसादग्रस्त भारतीय लोकमानस को बार बार उत्साहहीनता से बचाया है। मध्यकाल में विदेशी शासन के अत्यन्त विषम तथा कुण्ठाजनक काल में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा विरचित संस्करण रामचरितमानस रामायण की उपजीव्यता के सामर्थ्य का प्रत्यग्र उदाहरण है। रामायण की इसी विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मा ने उसे लोक में निरन्तर प्रासङ्गिक रहने का वरदान दिया था–

यावत् स्थास्यन्ति गिरयः समुद्राश्च महीतले। तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥ (रा॰ १–२–३६/३७)

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची–

श्रीमद्वाल्मीकीयं रामायणम् (मूलमात्रम्) – महर्षिवाल्मीकिप्रणीतम्–गीताप्रेस गोरखपुर, २०५० वैक्रमाब्द

नाट्यशास्त्रम् (मूलमात्रम्)–श्रीभरतमुनिप्रणीतम् (सं॰) केदारनाथ साहित्यभूषण.राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थान.(पुनः॰) २००२.

श्रीजयदेवकविविरचितम् प्रसन्नराघवम्. मेहरचन्द लछमनदास, नई दिल्ली. १९८२.

वाल्मीकि की जीवन दृष्टि–नरेन्द्र कोहली–भारतीय जीवन दृष्टि के अन्तर्गत सम्मिलित लेख।

A Vedic Concordance-Maurice Bloomfield. Low Price Publications,Delhi. (Re.)1990

India in the Ramayana Age –S. N. Vyas, Atma Ram and sons Delhi-1988

सन्दर्भाः–

[1] प्रसन्नराघवम् १–९ (सूर्यवंश के आभूषण-श्रीराम की कीर्ति रूपी कामिनी के नृत्य प्रसङ्ग में बजते हुए वाद्य की प्रथम ध्वनि–महाकवि वाल्मीकि की जय हो, जिनके मुखचन्द्र से झरते हुए काव्य रूपी अमृतवारिधि से कुछ बूँदें पी पी कर कवि रूपी बादलों की संहति युग पर्यन्त बरसती है।)

[2] इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्। बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति। (महाभारत १.१.२६७)

[3] धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।(मनुस्मृति २–१३)

[4] महाभारत पर वेदत्व का अतिदेश–१.इतिहासः पुराणं च पञ्चमो वेद उच्यते (भागवतम् १.४.२०)

२.भारतं पञ्चमो वेदः सुपुत्रः सप्तमो रसः। दाता पञ्चदशं रत्नं जामातो दशमो ग्रहः॥ (सुभाषित)

पुराणों पर वेदत्व का अतिदेश–१. भेदैरष्टादशैर्व्यासः पुराणं कृतवान् प्रभुः। योऽयमेकश्चतुष्पादो वेदः पूर्वं पुरातनात्॥ (कूर्मपुराण अध्याय–४९)

२. इतिहासः पुराणं च पञ्चमो वेद उच्यते (भागवतम् १.४.२०)

नाट्यशास्त्र पर वेदत्व का अतिदेश–योऽयं भगवता सम्यग्ग्रथितो वेदसम्मितः।नाट्यवेदः कथं ब्रह्मन्नुत्पन्नः कस्य वा कृते ॥ (नाट्यशास्त्र १–४)

आधुनिक युग में भी महात्मा गाँधी ने तिरुवल्लुवर के प्रसिद्ध नीति ग्रन्थ तिरुक्कुरळ को तमिळवेद कह कर सम्मानित किया था।(मराठी

विश्वकोश–तिरुक्कुरळ प्रविष्टि केअन्तर्गत)

[5] अगस्त्यसंहिता

[6] स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ती पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं पृथिव्यां द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्वा व्रजत

ब्रह्मलोकम्।(अथर्व०१९/७१/१)

[7] रा॰३–३७–१३

[8] ऋ॰१०–११७–९

[9] ऋ॰ १–१७०–१

[10] शतपथब्राह्मण २।१।३।९

[11] कठोपनिषद्–२

[12] क्रमशः–अथर्ववेद ५–३०–१७, ऋग्वेद १–८९–९, ऋग्वेद १–१७०–२।

[13] क्रमशः–ऋग्वेद–८–४८–३,श्वेताश्वतरोपनिषद् ६–१५

[14] काव्यस्यात्मा स एवार्थः तथा चादिकवेः पुरा। क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः॥ ध्वन्यालोक १–५

[15] रा॰ १–२–१५

[16] रा॰ प्रारम्भिक सर्ग– नारदं परिपप्रच्छ से लेकर।

[17] रा॰ ६–१८–३३

[18] रा॰ २–२०–१३

[19] इहैव मरणं श्रेयो न तु बन्धूविगर्हणम्॥ रा॰ ६–१०१–१९

[20] रा॰ ६–१००–४९/५०

[21] रा॰ ७–१०४–१४, ख़ुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तक़दीर से पहले। ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे–बता, तेरी रज़ा क्या है? (इक़बाल)

[22] मर्ग कीन् जुम्ले अज़् ऊ दर् वह्शतन्द। मी कुनद ईन् क़ौम बर वै रीशख़न्द॥ (मौलाना जलाजुद्दीन रूमी–मसनवी ए मानवी)

[23]रा॰ ७–१०४–१६

[24] मिर्ज़ा ग़ालिब

[25] रा॰ ४–४९–६

[26] रा॰ ६–२–६

[27] रा॰ २–६२–१५

[28] रा॰ ५–१३–४७

[29] रा॰ ५–२६–४

[30] रा॰ ४–१–१२२/१२३ अन्यत्र – ३–६३–१९

[31] रा॰ ४–४९–६ अन्यत्र–५–१२–१०/११/१२

[32] रा॰ ४–७

[33] रा॰ ६–१०१

[34] परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ। (श्रीमद्भगवद्गीता ३–११)

[35] रा॰ २–१०५–१६

[36]रा॰ २–१०५–२२

[37] रा॰ २–१०५–२९

[38] रा॰ २–१०५–३०

[39] रा॰ २–२१–४१

[40] रा॰ २–१०५–४४

[41] रा॰ ३–३९–३३

[42] रा॰ क्रमशः २–१०८–१०/१६/१७

[43] रा॰ २–१०९–३४

[44] तदेव ६–१०१–११२/११३

[45] तदेव ६–१०१–११

[46] तदेव ६–१०१–११७, अन्यत्र भी ७–११०–४/८ आदि


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मा माने (maa – to measure, to weight)

Learn Sanskrit - Mon, 06/27/2016 - 15:40

अहं प्रकोष्ठस्य मानम् मामि। (I measure the size of the room.)
मा माने अदादिगणीयः अकर्मकः सेट् परस्मैपदी धातुः अस्ति।
लट्
माति मातः मान्ति
मासि माथः माथ
मामि मावः मामः
लोट्
मातु माताम् मान्तु
माहि मातम् मात
मानि माव माम
लङ्
अमात् अमाताम् आमान्-अमुः
अमाः अमातम् अमात
अमाम् अमाव अमाम
विधिलिङ्
मायात् मायाताम् मायुः
मायाः मायातम् मायात
मायाम् मायाव मायाम

२०१६-०६-२७ सोमवासरः (2016-06-27 Monday)


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Kulamarva Mahalinga Bhat - ಕುಲಮರ್ವ ಮಹಾಲಿಂಗ ಭಟ್ ನಿಧನ

Sanskrit Net Loka - Mon, 06/27/2016 - 11:08
Kulamarva Mahalinga Bhat {96 } Sanskrit Scholar , expired at Bengaluru on  26-6-2016.He has donated his  Personal Sanskrit Library to Satyanarayana Highschool, Perla
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Dūtavākyam sección #4

Sección #4
eṣa yudhiṣṭhiraḥ kumārau upetya nivārayati pres. ind. act. 3ª sg. caus. ni √ vṛ –
ese Yudhiṣṭhira a príncipes habiéndose acercado contiene/detiene

एष युधिष्ठिरः कुमारावुपेत्य निवारयति –


He aquí a Yudhiṣṭhira que acercándose contiene a los príncipes.


[ vasantatilakā ]

nīcaḥ aham eva viparīta-matiḥ BV katham vā
bajo/inferior yo cierta' contrario/falso-idea/pensamiento ¿? o


roṣam parityajatam Impt. act. 2ª du. pari √ tyaj adya naya-a-naya-jñau|
ira/enojo abandonen ahora conocedores de correcto-incorrecto.


dyūta-adhikāram avamānam amṛṣyamāṇāḥ part. fut. med. nom. m. pl. a √ mṛṣ
apuesta/juego de dados-autoridad/regla deshonor/desprecio no-tienen la intención de tolerar


sattva-adhikeṣu vacanīya-parākramāḥ BV syuḥ Opt. act. 3ª pl. √ as ||11||
coraje/resolución-excesos censurado-heroismo/coraje serían/tendrían


iti|


“”


[ वसन्ततिलका ]

नीचोऽहमेव विपरीतमतिः कथं वारोषं परित्यजतमद्य नयानयज्ञौ।द्यूताधिकारमवमानममृष्यमाणाःसत्त्वाधिकेषु वचनीयपराक्रमाः स्युः॥११॥
“¿Soy vil o estoy equivocado?¡Conocedores de lo correcto y lo incorrecto, abandonad la ira!Aquellos no dispuestos a tolerar el deshonor producto de las apuestastendrán su heroismo cuestionado en los excesos de coraje.”

इति।


eṣa gāndhāra-rājaḥ,
ese Gāndhāras-rey
एष गान्धारराजः,
He aquí a el rey de los Gāndhāras, Śakuni,


[ vasantatilakā ]

akṣān kṣipan sa kitavam prahasan part. pres. act. nom. m. sg. pra √ has sa-garvam
dados arrojando él/ese jugador riendo de


saṅkocayan part. pres. act. nom. m. sg. caus. saṁ √ kuñc iva mudam dviṣatām sva-kīrtyā|
contrayendo/desvaneciendo como alegría de enemigos con propio renombre/fama


svaira-āsanaḥ drupada-rāja-sutām rudantīm
cómoda'-sentado Drupada-rey-hija llorando


kākṣeṇa paśyati likhati abhikhān part. pres. act. nom. m. sg. abhi √ khan naya-jñaḥ||12||
con vistazo ve dibuja escarbando la tierra correcto-conocedor


[ वसन्ततिलका ]

अक्षान् क्षिपन् स कितवं प्रहसन् सगर्वंसङ्कोचयन्निव मुदं द्विषतां स्वकीर्त्या।स्वैरासनो द्रुपदराजसुतां रुदन्तींकाक्षेण पश्यति लिखत्यभिखं नयज्ञः॥१२॥ Ese que arrojando los dados, se ríe del jugadorpareciendo hacer desvanecer la alegría de sus enemigos por medio de su propio renombre.Cómodamente sentado observa de un vistazo a Draupadī llorar, prudente escarbando la tierra dibuja.
etau ācārya-pitāmahau tām dṛṣṭvā lajjāyamānau part. pres. pasv. nom. m. du. del caus. lajj paṭānta-antar-hita-mukhau BV sthitau|


esos maestro-abuelo a esa habiendo visto avergonzándose vestido-dentro-puesto/colocado-rostro situados


एतावाचार्यपितामहौ तां दृष्ट्वा लज्जायमानौ पटान्तान्तर्हितमुखौ स्थितौ।


He aquí al Maestro Droṇa y al Abuelo Bhīṣma quienes, avergonzándose después de verla, permanecen con sus rostros tapados por sus vestidos.


[abstractos terminados en -tā]
aho asya varṇa-āḍhyatā|
¡Oh! de ese color-opulencia/riqueza


aho bhāva-upapannatā|
¡Oh! significado/intención-acabado/perfección


aho yukta-lekhatā|
¡Oh! conseguida/precisa-diseño/composición


suvyaktam ālikhitaḥ ayam citrapaṭaḥ|
brillante'/clara' dibujado esta pintura


prītaḥ asmi|
complacido estoy


अहो अस्य वर्णाढ्यता।


¡Qué riqueza de colores la suya!


अहो भावोपपन्नता।


¡Qué perfección en la intención!


अहो युक्तलेखता।


¡Qué composición precisa!


सुव्यक्तमालिखितोऽयं चित्रपटः।


Esta es una pintura brillantemente ejecutada.


प्रीतोऽस्मि।


Me complace.


kaḥ atra|
quién? ahí


कोऽत्र।


¿Quién está ahí?


kāñcukīyaḥ -- jayatu mahārājaḥ|
que venza rey


काञ्चुकीयः -- जयतु महाराजः।


Chambelán – ¡Victoria la rey!


duryodhanaḥ – bādarāyaṇa ānīyatām Impt. pasv. 3ª sg. ā √ nī sa vihaga-vāhana-mātra-vismitaḥ TP dūtaḥ|
Bādarāyaṇa por favor-sea traído ese pájaro-vehículo-tan sólo-arrogante/orgulloso mensajero/emisario


दुर्योधनः -- बादरायण आनीयतां स विहगवाहनमात्रविस्मितो दूतः।


Duryodhana – Bādarāyaṇa, trae por favor a ese orgulloso emisario, tan sólo porque monta un pájaro.


kāñcukīyaḥ – yat ājñāpayati mahārājaḥ|
lo que ordene rey


(niṣkrāntaḥ)
(salido)


काञ्चुकीयः -- यदाज्ञापयति महाराजः।


Chambelán – Lo que el rey ordene.


(निष्क्रान्तः)
(sale)


duryodhanaḥ – vayasya karṇa
amigo/camarada Karṇa


दुर्योधनः -- वयस्य कर्ण


Duryodhana – Amigo Karṇa.


[ vasantatilakā ]

prāptaḥ kila adya vacanāt iha pāṇḍavānām
llegado * hoy a causa exposición/discurso aquí de los Pāṇḍavas


dautyena bhṛtyaḥ iva kṛṣṇa-matiḥ BV sa kṛṣṇaḥ|
con mensaje servidor como artero/malvado-idea/pensamiento ese Kṛṣṇa




śrotum sakhe tvam api sajjaya karṇa karṇau
para oir amigo tú aun/tamb'/incluso predisponte/prepárate Karṇa ambas orejas


nārī-mṛdūni vacanāni yudhiṣṭhirasya||13||
mujer-suaves/delicadas palabras de Yudhiṣṭhira




[ वसन्ततिलका ]

प्राप्तः किलाद्य वचनादिह पाण्डवानांदौत्येन भृत्य इव कृष्णमतिः स कृष्णः।श्रोतुं सखे त्वमपि सज्जय कर्ण कर्णौनारीमृदूनि वचनानि युधिष्ठिरस्य॥१३॥
El artero Kṛṣṇa como servidor de los Pāṇḍavasha venido hasta aquí hoy con un mensaje para exponer.Amigo Karṇa, tú predispon las orejas a escucharlas palabras de Yudhiṣṭhira, delicadas como de mujer.
(tataḥ praviśati vāsudevaḥ kāñcukīyaḥ ca)
(luego entran Vāsudeva Chambelán y)


(ततः प्रविशति वासुदेवः काञ्चुकीयश्च)


(luego entran Kṛṣṇa y el Chambelán)


vāsudevaḥ – adya khalu dharma-rāja [=Yudhiṣṭhira]-vacanāt dhanañjayā [=arjuna]-akṛtrima-mitratayā ca āhava-darpam anukta-grāhiṇam suyodhanam [=Duryodhana] prati mayā api anucita-dautya-samayaḥ anuṣṭhitaḥ|


hoy * a causa de Yudhiṣṭhira-mandato/orden Arjuna-genuina-amistad y guerra-insolencia/presunción no dicho-que tiene Suyodhana hacia por mí aun/tamb'/incluso equivocado/inusual-mensaje/misión-acuerdo/arreglo hecho/conformado/seguido


atha ca,
entonces y


वासुदेवः – अद्य खलु धर्मराजवचनाद्धनञ्जयाकृत्रिममित्रतया
चाहवदर्पमनुक्तग्राहिणं सुयोधनं प्रति मयाप्यनुचितदौत्यसमयोऽनुष्ठितः।


Aunque acuerdo mantener el compromiso de esta misión equivocada ante Duryodhana presuntuoso en la batalla, avaro hasta de lo no dicho, por mandato de Yudhiṣṭhira y genuina amistad con Arjuna,


अथ च,
sin embargo,


[ vasantatilakā ]

kṛṣṇā[=draupadī]-parābhava-bhuvāḥ ripu-vāhinī-ibha-
Draupadī-humillación/mortificación-hecho/advenimiento enemigo-hueste-elefante-


kumbha-sthalī-dalana-tīkṣṇa-gadāt BV abl. temporal harasya [adj. taking from]
lóbulo-prominente-tronchadura/destrozo-agudo/filoso-mazo llevada/tomado de


bhīmasya kopa-śikhinā yudhi pārtha [=Arjuna]-pattri-
de Bhīma furia/ira-fuego en batalla/combate Arjuna-flecha-


caṇḍa-anilaiḥ ca kuru-vaṃśa-vanam vinaṣṭam||14||
violento/feroz-vientos y Kuru-linaje/familia-bosque completa' perdido/destruído


[ वसन्ततिलका ]

कृष्णापराभवभुवा रिपुवाहिनीभ-कुम्भस्थलीदलनतीक्ष्णगदाधरस्य।भीमस्य कोपशिखिना युधि पार्थपत्त्रि-चण्डानिलैश्च कुरुवंशवनं विनष्टम्॥१४॥
Producto de la humillación de Draupadī,el bosque del linaje Kuru será destruído en batallapor el fuego de la ira contenida de Bhīma aun despues de que su mazo tronche los prominentes lóbulos de los elefantes de las huestes enemigas,junto con los feroces vientos de la flechas de Arjuna.
idam suyodhana-śibiram|
este campamento


iha hi,
aquí *


इदं सुयोधनशिबिरम्।
He aquí el campamento real.


इह हि,
Aquí mismo,


[ suvadanā ]

āvāsāḥ pārthivānām surapura-sadṛśāḥ sva-chanda-vihitāḥ
moradas de principes paraíso/ciudad de los dioses-asemejan a su antojo-distribuidas/provistas




vistīrṇāḥ śastra-śālāḥ bahu-vidha-karaṇaiḥ śastraiḥ upacitāḥ|
extensos/numerosos armas-salas mucho-forma/tamaño-realizadas armas provistas


heṣante mandurā-sthāḥ turaga-vara-ghaṭāḥ bṛṃhanti kariṇaḥ
relinchan establo-permanecidos caballo-fino/selecto-multitudes barritan elefantes




aiśvaryam sphītam etat svajana-paribhavāt āsanna-vilayam||15||
supremacía/poder floreciente/abundante esta pariente-humillación/injuria próximo/cercano-destrucción


[ सुवदना ]

आवासाः पार्थिवानां सुरपुरसदृशाः स्वच्छन्दविहिताविस्तीर्णाः शस्त्रशाला बहुविधकरणैः शस्त्रैरुपचिताः।हेषन्ते मन्दुरास्थास्तुरगवरघटा बृंहन्ति करिणऐश्वर्यं स्फीतमेतत्स्वजनपरिभवादासन्नविलयम्॥१५॥
Los apartamentos reales distribuidos a su antojo asemejan a la ciudad de los dioses,hay extensas salas de armas con armas de todo tipo,reunidos en los establos, multitudes de selectos caballos relinchan y elefantes barritan,esta floreciente ostentación esta próxima a su destrucción a causa de una la humillación a los parientes.
bhoḥ
¡Alas!


भोः
¡Alas!


[ anuṣṭubh ]

duṣṭa-vādī guṇa-dveṣī śaṭhaḥ svajana-nirdayaḥ|
mal-hablado virtud-despreciador/enemigo malévolo/tramposo pariente-cruel/despiadado




suyodhanaḥ hi mām dṛṣṭvā na eva kāryam kariṣyati||16||
Duryodhana * a mi habiendo visto ni siquera deber hará


[ अनुष्टुभ् ]

दुष्टवादी गुणद्वेषी शठः स्वजननिर्दयः।सुयोधनो हि मां दृष्ट्वा नैव कार्यं करिष्यति॥१६॥
El malhablado, enemigo de la virtud, malévolo, cruel con sus parientes,Duryodhana, aun habiéndome visto, no hará lo que se debe hacer.
bho bādarāyaṇa kim praveṣṭavyam gerundiv. nom. n. sg. pra √ veṣṭ
¡Atención! Bādarāyaṇa ¿? uno puede ser ingresado/introducido


भो बादरायण किं प्रवेष्टव्यम्।


Oye Bādarāyaṇa, ¿ya puedo entrar?




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