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“Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण)

Balramshukla's Blog - Tue, 08/22/2017 - 17:51

The paper, which swallowed all my summer vacation days, is out. “Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण) published in the recent number of prestigious Hindi Journal of CSDS ( Centre for the studies of developing societies)प्रतिमान. The प्रतिमान aims at decolonizing the knowledge construction. The PDF file of the paper can be downloaded from the following link –

शब्द, प्रतीक, कहानियाँ एवम् विचार समय के प्रवाह में सर्वत्र भ्रमण करते हुए मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को समृद्ध करते हैं। निरन्तर भ्रमण के कारण उनके स्वरूप में देश तथा काल के अनुरूप स्वभावतः परिवर्तन हो जाते हैं । कभी कभी ये परिवर्तन इतने अधिक होते हैं कि कथाओं के मूल स्वरूप की पहचान ही कठिन हो जाती है। ये परिवर्तन वस्तुतः भिन्न समाज तथा संस्कृति में गृहीत कथाओं या प्रतीकों को अधिक स्वीकृत बनाने के लिये किये जाते हैं। इनका उद्देश्य मूल कथा को हानि पहुँचाना नहीं होता है। इसीलिये इन परिवर्तनों के बावजूद  कथाओं का मूल सन्देश प्रायः समान रहता है ।

ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी के लगभग संकलित पञ्चतन्त्र ग्रन्थ कथा साहित्य के चतुर्दिक् प्रव्रजन का अपूर्व उदाहरण है। यह सर्वाधिक साहित्यिक अनुवादों वाला भारतीय ग्रन्थ है जिसके ५० भाषाओं में लगभग २०० संस्करण उपलब्ध हैं । इनमें से तीन चौथाई संस्करण भारतीयेतर भाषाओं में प्राप्य हैं। केवल भारत में ही इस ग्रन्थ के २५ विभिन्न संस्करण मिलते हैं जिनमें तन्त्राख्यायिका से लेकर हितोपदेश तक सम्मिलित हैं । विद्वानों ने प्राचीन भारत में प्रसारित पञ्चतन्त्र की विभिन्न शाखाओं को चार प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया है। पञ्चतन्त्र का सबसे प्राचीन स्वरूप सम्भवतः तन्त्राख्यायिका है (Dasgupta 1947: 90)। यह वही पाठ है जिससे पहलवी (फ़ारसी भाषा का मध्यकालीन रूप) भाषा में अनुवाद किया गया होगा। सोमदेव के कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामञ्जरी में जिस पञ्चतन्त्र की कथाओं का उपयोग किया गया था वह उसका उत्तर–पश्चिम पाठ रहा होगा जो अब उपलब्ध नहीं होता। जैनों के कथा साहित्य में पञ्चतन्त्र की कहानियाँ मुख्यतः दो रूपों में उपस्थित दिखायी देती हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में पञ्चतन्त्र के पूरे संस्करण प्रस्तुत किये जिसमें सबसे प्रसिद्ध है ११९९ ई॰ में विद्यमान जैनाचार्य पूर्णभद्र का पञ्चाख्यान नामक परिवर्धित संस्करण। एस॰ एन॰ दासगुप्त के अनुसार यह पञ्चतन्त्र के दाक्षिणात्य संस्करण पर आधारित रहा होगा। पञ्चतन्त्र की कथायें जैन धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों की व्याख्याओं में भी बिखरी पड़ी हैं। ये कथायें प्राकृत भाषा में लिखी गयी हैं और इनका सम्भावित समय ६ठीं शताब्दी इस्वी है[1]। प्राकृत की ये कथायें जैन ग्रन्थों में प्रयुक्त होने के बावजूद अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रखती हैं। । पञ्चतन्त्र का सबसे नवीन तथा परिवर्तित–परिवर्धित संस्करण नारायण पण्डित का हितोपदेश है। नारायण पण्डित बंगाल के राजा धवलचन्द्र के आश्रित थे। धवलचन्द्र का समय १३७३ ई॰ है।

पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा उसके प्राचीन फ़ारसी अनुवाद के साथ शुरू होती है। फ़ारसी तथा अरबी जगत् में पञ्चतन्त्र कलीलः व दिम्नः(کلیله و دمنه)[2] के नाम से रूपान्तरित एवं प्रख्यात है । ५७० ईस्वी में सासानी सम्राट् अनूशीरवान् (انوشیروان)  के मन्त्री बुज़ुर्गमेह्र (بزرگمهر) ने बरज़वै तबीब के माध्यम से इस ग्रन्थ का अनुवाद पहलवी (मध्यकालीन फ़ारसी) भाषा में कराया। पहलवी में इसका नाम कलीलग व दिम्नग था। यही अनुवाद पञ्चतन्त्र के सीरियन तथा अन्य विश्वभाषाओं में हुए अनुवादों का आधार बना । ७५० ईस्वी वर्ष में फ़ारसी भाषा के विद्वान् अब्दुल्लाह इब्ने मुक़फ्फ़ा ने इसका अनुवाद अरबी भाषा में किया । १२ वीं सदी में ग़ज़नवी वंश के शासक बहराम शाह के यहाँ मुंशी पद पर कार्यरत नसरुल्लाह मुंशी ने इसका अनुवाद अर्वाचीन फ़ारसी में किया। इस अनुवाद का नाम भी कलीलः व दिम्नः ही है। यह अनुवाद मूल की अपेक्षा बहुत परिवर्धित है। फ़ारसी का यही अनुवाद अनवारे सुहैली आदि अनेक दूसरे फ़ारसी रूपान्तरणों का आधार बना[3]। अनवारे सुहैली ग्रन्थ १५वीं सदी में हिरात के तैमूरी सुल्तान हुसैन बैक़रा के दरबारी विद्वान् वाइज़ काशिफ़ी के द्वारा लिखा गया था। इसका प्रमुख आधार नसरुल्लाह मुंशी का फ़ारसी भाषा में लिखित कलीलः व दिम्नः ग्रन्थ था। इन फ़ारसी रूपान्तरणों के अतिरिक्त पञ्चतन्त्र की कथायें समस्त विश्व में रूपान्तरित तथा स्वीकृत हुईं, जो एक स्वतन्त्र अध्ययन का विषय है[4]

सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण करने उपरान्त भी पञ्चतन्त्र की कथाओं के मूल सन्देश में बहुत अधिक अन्तर नहीं देखा गया है। पञ्चतन्त्र की कथाओं का मूल उद्देश्य है–रुचिकर पशुकथाओं का उपयोग करके बालकों को नीतिशास्त्र की शिक्षा देना। स्वयं पञ्चतन्त्र के प्रारम्भ में इन कथाओं के संग्रह का उद्देश्य अमरशक्ति राजा के मन्दबुद्धि पुत्रों को नीतिशिक्षण रूपी आख्यान द्वारा बताया गया है। विष्णुशर्मा की प्रतिज्ञा उन राजकुमारों को नीतिशास्त्र में निष्णात बनाना ही था[5]। हितोपदेश में भी इन कथाओं का स्पष्ट उद्देश्य यही बताया गया है। इसके प्रस्तावनात्मक श्लोकों में कहा गया है[6]

कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते॥

(इस पुस्तक में कहानी के बहाने बच्चों को नीति शिक्षा दी जा रही है।)

यही कारण है कि पञ्चतन्त्र के आरम्भ में देवताओं को प्रणाम करने के बाद ग्रन्थकार ने प्राचीन काल के प्रमुख नीतिशास्त्र प्रणेताओं (नयशास्त्रकर्ता ) को नमस्कार समर्पित किये हैं–

मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।

चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः॥ (कथामुख २)

पञ्चतन्त्र में व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार की नैतिक शिक्षाएँ कथाओं में सुन्दर रीति से गूँथ दी गयी हैं। इनका उद्देश्य यह है कि इसका अध्ययन करने वाले बालकों के हृदय में ये नैतिक शिक्षायें इस प्रकार घर कर जायें कि वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में अव्यावहारिक आचरण न करें तथा कहीं भी असफलता प्राप्त न करें । पञ्चतन्त्र की फलश्रुति में भी इसका उद्देश्य यही बताया गया है–

अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च।

न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन॥ (पञ्चतन्त्र कथामुख १०)

(जो इस नीतिशास्त्र का नित्य अध्ययन करता है तथा इसे सुनता है वह इन्द्र से भी कभी पराजित नहीं हो सकता। )

इस पत्र का केन्द्रीय विषय मौलाना जलालुद्दीन रूमी (आगे रूमी अथवा मौलाना के नाम से अभिहित) द्वारा अपनी विश्वप्रसिद्ध  आध्यात्मिक कविता– मसनवी ए मानवी (आगे मसनवी की संज्ञा से कथित) में  इन कथाओं का किया गया उपयोग है। मसनवी में हमें पञ्चतन्त्र की कथाओं के स्वरूप एवं सन्देश दोनों में आश्चर्यजनक  परिवर्तन मिलता है। प्रस्तुत पत्र में यह देखने का प्रयत्न किया गया है कि किस प्रकार रूमी ने पञ्चतन्त्र की नैतिक कथाओं को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करके उनका उपयोग अपने कथ्य को पुष्ट करने में किया है।

[1] The Pañcatantra stories among Jains : versions, peculiarities and usages – Nalini BALBIR (Abstract of the paper)

[2] आधुनिक फ़ारसी में इसका उच्चारण – कलीले व दिम्ने , अरबी तथा उर्दू में कलीला व दिम्ना किया जाता है।

[3]….the Hebrew version 1100 A.D., the Latin about 1270 A.D., the German 1480 A.D., the Italian 1552A.D., the French 1678 A.D. The Greek in 1080 A.D. the Persian in 12th century A.D. (Vardachari 1960 : 124)

[4] विशेष चर्चा “पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा के मुख्य पड़ाव” नामक प्रकाश्यमान शोधपत्र में।

[5] “…पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।” पञ्चतन्त्र कथामुख पृ॰ ४

[6] हितोपदेश प्रस्तावना श्लोक सं॰ ८

इस शोधपत्र का शेष भाग अधोलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है–

13balram

अथवा इस लिंक से–

https://www.academia.edu/34301747/_Rumis_Philosophical_Rendering_of_Ethical_Stories_of_Panchatantra_रूमी_की_कीमियागरी_पंचतन_त_र_की_नैतिक_कहानियों_का_आध_यात_मिक_संस_करण_

प्रतिमान के इस अंक की सूची इस प्रकार है–

00_intro

 


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—–अलंकारों का वर्गीकरण—-

Balramshukla's Blog - Tue, 07/04/2017 - 22:46

 

नवीन अलंकारों की निरन्तर ऊहा के साथ-साथ भारतीय काव्यशास्त्रियों ने उन पर सूक्ष्म तथा लम्बी बहसें भी की हैं। साथ ही उनकी स्पष्टता के लिये अनेक तरह से विभाजनों के भी प्रयत्न किये जाते रहे हैं। वर्गीकरण के द्वारा हम किसी विषय को सूक्ष्मता से समझ पाते हैं। इस कारण से भारतीय काव्य शास्त्र में किये गये अलंकारों के वर्गीकरणों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। इस पाठ में अलंकारों के विभिन्न प्रकार के वर्गीकरणों पर विचार किया गया है–

https://www.youtube.com/watch?v=OOBVyI__G9M

इस पाठ की लिखित सामग्री निम्नोक्त लिंक से प्राप्त की जा सकती है-
http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18
P-08#M-20


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——-अलंकारों का स्वरूप विकास——

Balramshukla's Blog - Mon, 07/03/2017 - 19:31

भारत में अलंकारों की चर्चा २००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। epg पाठशाला के इस पाठ में भारतीय साहित्य शास्त्र के विकास के विभिन्न सोपानों में अलंकारों की संख्या तथा महत्त्व के प्रति बदलते दृष्टिकोणों पर संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत की गयी है।अलंकार सिद्धान्त काव्यशास्त्र के प्राचीनतम सिद्धान्तों में से एक है। अलंकार शब्द विद्वानों के अनुसार दो अर्थों में प्रयुक्त होता रहा है। काव्य में जो कुछ भी अच्छा लग रहा है उन सबके कारक तत्त्वों को अलंकार कहते हैं, यह अलंकार का पहला अर्थ है। इस अर्थ में ध्वनि, रस, रीति आदि सभी उपकरणों को अलंकार कहा जा सकता है। इसी कारण से साहित्यशास्त्र को अलंकारशास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। परन्तु दूसरा अर्थ सीमित है। शब्द तथा अर्थ के सौन्दर्योत्पादक अनित्य काव्यगत धर्मों को अलंकार कहा जाता है। अलंकारों के स्वरूप तथा महत्त्व को भारतीय काव्यशास्त्र की सहस्राब्दियों में अनेकशः विभिन्न प्रकार से समझा जाता रहा है। कुछ काव्यशास्त्रियों ने इसे काव्य का ऐसे ही अनिवार्य धर्म माना जैसे कि आग का धर्म गर्मी होता है, जबकि कुछ ने इसे अनित्य मान कर इसके अभाव में भी काव्य की क्षति की सम्भावना नहीं की। अलंकारों के महत्त्व, वर्गीकरण तथा संख्या, तीनों में ही वृद्धि तथा ह्रास की एक लम्बी परम्परा रही है। प्रस्तुत पाठ में सहस्राब्दियों में विकसित अलंकारों के स्वरूप का विहंगावलोकन प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे निम्नलिखित लिंक पर सुना जा सकता है –
https://www.youtube.com/watch?v=LXTeI4GeUWw

पाठ का लिखित रूप निम्नलिखित लिंक पर जाकर P-08 # M-19 के अन्तर्गत प्राप्त किया जा सकता है-

http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18


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—-ध्वनि के प्रमुख भेद—-

Balramshukla's Blog - Mon, 07/03/2017 - 01:16
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने ई पी जी पाठशाला उपक्रम के अन्तर्गत उच्चशिक्षा के पाठ्यक्रमों के पाठों को तैयार करके उनके लिखित रूप तथा उनकी रिकार्डिंग उपलब्ध करायी है। भाषाओं में संस्कृत तथा हिन्दी के पाठ भी उपलब्ध हो रहे हैं। हिन्दी परास्नातक के कुछ भारतीय काव्यशास्त्र के अन्तर्गत कुछ पाठों को मुझसे भी तैयार कराया गया था। इनकी लिखित तथा रिकार्डेड सामग्री उपलब्ध हो रही है। इन्हें epg की साइट के अतिरिक्त youtube पर भी डाला गया है। प्रस्तुत है इस शृङ्खला की पहली कड़ी।   https://www.youtube.com/watch?v=qc7ZLykn7B4   इस पाठ की लिखित सामग्री को- http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18 इस लिंक पर जाकर P-08, M-18 के अन्तर्गत देखा जा सकता है।
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Sanskrit Blog: Aarye

Simple Sanskrit - Sun, 06/25/2017 - 21:38
आर्ये
आर्ये छन्दोविज्ञाः निरूपयन्तितव लक्षणं सुभगे ।एवं यत्कविवर्याः सुकरमनुसरन्तिविश्रब्धाः ॥ १ ॥मात्राश्चत्वारोऽत्र गणे तादृक्सप्तसन्ति पूर्वार्धे ।अन्ते गुरुश्च विषमो न भवति जगणस्तुषष्ठो जः ॥ २ ॥अथवा सर्वलघुः प्रथमलघोःपश्चाद्यतिर्नियमितश्च । सप्तमगणो यदा सर्वलघुः यतिरेवषष्ठान्ते ॥३ ॥अपरार्धेऽपि हि सप्तगणाः षष्ठोभवति लघुरिति नियमश्च ।तुर्यान्ते हि यतिः पञ्चमे तु सकललघुकृते सति ॥ ४ ॥आर्ये नियमैरेतैर्बद्धाऽपि कविवरकौशलबलात्त्वम् ।कमनीया भासि सुमधुरपदैस्समुचित सरसभावैः॥ ५ ॥भासभवभूत्यमरुकालिदासगोवर्धनादिकविसृष्टैः ।नाहं कविर्नविपश्चिदपि चापल्येनप्रचोदितः ॥ ६ ॥त्वां शिथिलितनियमामेवं ममसौकर्यमेव समीक्ष्य ।निरूपयामि क्षमस्व तव सुषमाह्रासमविन्दत् किम् ॥ ७॥पूर्वार्धे सप्तगणाः सन्तिचतुर्मात्राः गुरुरन्ते ।उत्तरस्मिन् भवति षष्ठगणस्य स्थानेलघुरेकलः ॥ ८ ॥सर्वे पञ्चविकल्पाः सर्वत्रयथामतिप्रयोज्याश्च ।द्वादशमात्रान्ते यतिरवश्य उभयार्धयोरत्र॥ ९ ॥इत्थं शिथिलितनियमां त्वां रचयाम्यत्र कथय तव रूपम् ।विदुषां भोग्यं न भवति किं मयि रुष्टा भवसि वद माम् ॥ १० ॥----http://gssmurthy.blogspot.com http://murthygss.tripod.com/ http://sanskritcentral.com
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