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RUMI by a HINDI

Balramshukla's Blog - Thu, 11/30/2017 - 18:14

 

 

Two ghazals of Rumi with their Hindi translation were presented in the department of psychology in Gorakhpur University on 22.11.17. Video by- Abhijit Mishra.

नज़्दे कसी[1]

مولوی » دیوان شمس » غزلیات

دلا نزد کسی بنشین که او از دل خبر دارد
به زیر آن درختی رو که او گل‌های تر دارد
در این بازار عطاران مرو هر سو چو بی‌کاران
به دکان کسی بنشین که در دکان شکر دارد
ترازو گر نداری پس تو را زو رهزند هر کس
یکی قلبی بیاراید تو پنداری که زر دارد
تو را بر در نشاند او به طراری که می‌آید
تو منشین منتظر بر در که آن خانه دو در دارد
به هر دیگی که می‌جوشد میاور کاسه و منشین
که هر دیگی که می‌جوشد درون چیزی دگر دارد
نه هر کلکی شکر دارد نه هر زیری زبر دارد
نه هر چشمی نظر دارد نه هر بحری گهر دارد
بنال ای بلبل دستان ازیرا ناله مستان
میان صخره و خارا اثر دارد اثر دارد
بنه سر گر نمی‌گنجی که اندر چشمه سوزن
اگر رشته نمی‌گنجد از آن باشد که سر دارد
چراغست این دل بیدار به زیر دامنش می‌دار
از این باد و هوا بگذر هوایش شور و شر دارد
چو تو از باد بگذشتی مقیم چشمه‌ای گشتی
حریف همدمی گشتی که آبی بر جگر دارد
چو آبت بر جگر باشد درخت سبز را مانی
که میوه نو دهد دایم درون دل سفر دارد

१. दिला नज़्दे कसी बेन्शीन् कि ऊ अज़ दिल ख़बर दारद
बे नज़्दे आन् दरख़्ती रौ कि ऊ गुल–हा ए तर दारद
२. दर् ईन बाज़ारे अत्तारान् मरौ हर सू चु बीकारान्
बे दुक्काने कसी बेन्शीन् कि दर् दुक्कान् शकर दारद
३. तराज़ू गर न दारी पस तुरा ज़ू रह ज़नद हर कस
यकी क़ल्बी बे–आरायद तू पिन्दारी कि ज़र दारद
4. तुरा बर दर निशानद ऊ ब तर्रारी कि मी आयद
तु मन्शीन मुन्तज़िर बर दर कि आन् ख़ाने दो दर दारद
5. बे हर दीगी कि मी जूशद म–यावर कासे ओ म–न्शीन्
कि हर दीगी कि मी जूशद दरून् चीज़ी दिगर दारद
6. न हर किल्की शकर दारद न हर ज़ीरी ज़बर दारद
न हर चश्मी नज़र दारद न हर बह्री गुहर दारद
7. बेनाल ऐ बुलबुले दस्तान्! अज़ीरा नाले ए मस्तान्
मियाने सख़रे ओ ख़ारा असर दारद असर दारद
८..बेनेह सर गर न मी गुंजी कि अन्दर चश्मे ए सूज़न
अगर रिश्ते न मी गुंजद अज़् आन् बाशद कि सर दारद
९. चराग़–स्त ईन् दिले बीदार् बे ज़ीरे दामन–श मी दार
अज़् ईन् बाद् ओ–हवा बुग्ज़र हवाय–श शूर ओ शर दारद
१०.चु तू अज़ बाद बुग्ज़श्ती मुक़ीमे चश्मे ई गश्ती
हरीफ़े हमदमी गश्ती कि आबी बर जिगर दारद
१. चू आब–त बर जिगर बाशद दरख़्ते सब्ज़ रा मानी

कि मीवे नौ दहद दाइम दरूने दिल सफ़र दारद
२१– सत्संगतिः कथय किं न करोति
१. ऐ दिल, तू ऐसे किसी के पास बैठ जिसे दिलों की ख़बर हो।

तू किसी ऐसे पेड़ के पास जा, जिसमें तरो–ताज़ा फूल लगे हों।
२. इन पंसारियों की दुकानों के चारों ओर फ़िज़ूल लोगों की तरह मत भटक।

तू उसकी दुकान पर बैठ जिसकी दुकान में शक्कर हो, मधु हो।
३. अगर तुम्हारे पास (विवेक रूपी) तराज़ू नहीं हुआ तो इस बाज़ार में तुम्हें कोई भी, कभी भी ठग लेगा।

खोटा सिक्का सजा बजा कर, कोई भी तुम्हारे पास ले आयेगा, और तुम्हें लगेगा– कि ये सोना है।
४. तुमको वह चालाकी से दरवाज़े पर बैठा देगा कि “बैठो, मैं अभी आया”।

तुम दरवाज़े पर उसे निहारते मत रह जाना, क्योंकि उसके घर में दो दरवाज़े हैं।
५. हर उबलते हुए कड़ाहे के पास अपनी भीख की कटोरी लेकर न बैठ जाना

क्योंकि हर पकते हुए कड़ाहे में ज़रूरी नहीं कि तुम्हारी मनचाही चीज़ ही पक रही हो।
६. हर गन्ने में शक्कर नहीं होता, हर पस्तियों के साथ उठान नहीं लगी होती।

हर आँख के पास नज़र नहीं होती और हर समन्दर में मोती नहीं हुआ करते।
७. पुकार ‍ऐ सुरीली कोयल पुकार! क्योंकि प्रेम में डूबी हुई पुकार का असर-

पत्थरों पर भी हो जाता है।
८. अगर (प्रेम के राज्य में) तुम्हारा गुज़र नहीं हो पा रहा है तो अपना सर झुका कर प्रवेश करने की कोशिश करो।

क्योंकि अगर धागे के सिर पर गाँठ हुई तो वह सुई की आँख में नहीं घुस पाता।

९. यह जागृत हृदय दिये की तरह होता है। इसे अपने आँचल में छिपाकर रखो।

इच्छाओं की हवा से बच कर निकल जाओ। क्योंकि ये हवाएँ इस हृदय में उपद्रव और ख़राबी पैदा
कर देती हैं।
१० .अगर तुम इस हवा से बच कर निकल गये तो समझो कि जीवन स्रोत के पास तुमने घर बना लिया ।

और फिर उस प्रिय के साथ लग गये जो जिसके हृदय में रस ही रस है।
११.जब तुम्हारा हृदय भी सरस हो जायेगा तो तुम भी उस हरे भरे पेड़ की तरह हो जाओगे–
जो कि हमेशा फल देता है और अपने अन्दर ही अन्दर सफ़र करता रहता है।

[1] छन्द व्यवस्था – । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ

९३– हिकायती[1]

شنیدم کاشتری گم شد ز کردی در بیابانی بسی اشتر بجست از هر سوی کرد بیابانی
چو اشتر را ندید از غم بخفت اندر کنار ره دلش از حسرت اشتر میان صد پریشانی
در آخر چون درآمد شب بجست از خواب و دل پرغم برآمد گوی مه تابان ز روی چرخ چوگانی
به نور مه بدید اشتر میان راه استاده ز شادی آمدش گریه به سان ابر نیسانی
رخ اندر ماه روشن کرد و گفتا چون دهم شرحت که هم خوبی و نیکویی و هم زیبا و تابانی
خداوندا در این منزل برافروز از کرم نوری که تا گم کرده ی خود را بیابد عقل انسانی
شب قدر است در جانت چرا قدرش نمی‌دانی تو را می‌شورد او هر دم چرا او را نشورانی
تو را دیوانه کرده‌ست او قرار جانت برده‌ست او غم جان تو خورده‌ست او چرا در جانش ننشانی
چو او آب است و تو جویی چرا خود را نمی‌جویی چو او مشک است و تو بویی چرا خود را نیفشانی

१. शुनीदम क्,उश्तुरी गुम शुद ज़ कुर्दी दर बयाबानी
बसी उश्तुर बजुस्त् अज़ हर सुई कुर्दे बयाबानी
२. चू उश्तुर रा न दीद अज़् ग़म बेख़ुफ़्त् अन्दर किनारे रह
दिल–श अज़ हसरते–उश्तुर, मियाने सद परीशानी
३. दर् आख़िर, चून् दर् आमद शब, बेजस्त अज़ ख़ाब् ओ दिल पुर ग़म
बर् आमद गू ए मह् ताबान्, ज़ रू ए चर्ख़े चौगानी
४. बे नूरे मह बेदीद् उश्तुर, मियाने राह इस्तादे
ज़ शादी आमद–श गिरिये बेसाने अब्रे नैसानी
५. रुख़् अन्दर माहे रौशन कर्द् ओ गुफ़्ता–चून् देहम शर्ह–त
कि हम ख़ूबी ओ हम नीकी ओ हम ज़ीबा ओ ताबानी
६.ख़ुदावन्दा! दर् ईन् मंज़िल, बर् अफ़रूज़् अज़ करम नूरी
कि ता गुम कर्दे ए ख़ुद रा बियाबद अक़्ले–इन्सानी
७.शबे क़द्र–स्त दर जान–त चेरा क़द्र–श नमी दानी
तु–रा मी शूरद् ऊ हरदम, चेरा ऊ–रा न शूरानी
८. तु–रा दीवाने कर्दे–स्त् ऊ, क़रारे जान्–त बुर्दे–स्त् ऊ
ग़मे जाने तू ख़ुर्दे–स्त् ऊ, चेरा दर जान्–श न निशानी
९.चू ऊ आब–स्त तू जूई, चेरा ख़ुद रा न मी जूई
चू ऊ मुश्क–स्त् ओ तू बूई, चेरा ख़ुद रा न अफ़्शानी

९३– एक कहानी
१. मैंने सुना है कि एक चरवाहे का ऊँट रेगिस्तान में खो गया था
उस रेगिस्तानी चरवाहे ने अपने ऊँट को चारों ओर खूब खोजा
२. जब उसको ऊँट कहीं नहीं मिला तो बेचारा दुखी होकर रास्ते के किनारे सो गया
ऊँट की चिन्ता में उसका दिल सैकड़ों परेशानियों से घिर गया था
३. अन्ततः, जब रात आयी तो वह दुखी दिल लेकर नींद से उठा
तब तक चौगान के मैदान जैसे आसमान में गेंद की तरह चमकता चाँद निकल आया था
४. चाँद के प्रकाश में उसने देखा कि उसका ऊँट रास्ते के बीच में खड़ा है
ख़ुशी के मारे वह बरसाती बादलों की तरह रो पड़ा
५. उसने अपने चेहरे को चाँद की ओर उठाया और बोला–मैं तुम्हारी प्रशंसा कैसे करूँ
तुम अच्छे भी हो, भले भी हो, सुन्दर भी हो और चमकदार भी हो
६. हे परमेश्वर, हम लोगों पर भी अपनी कृपा की वह रौशनी फैला दो
ताकि, हम मनुष्यों की बुद्धि भी अपना खोया हुआ स्वरूप पा जाए
७. तुम्हारी आत्मा के अन्दर एक उजियारी रात है, तुम उसकी क़ीमत क्यों नहीं समझते?
वह तुम्हें निरन्तर उत्तेजित करती रहती है, तुम उसके संकेतों को क्यों नहीं जान पाते?
८.तुमको उसने दीवाना कर डाला है, तुम्हारे प्राणों का चैन उसने छीन लिया है
तुम्हारे प्राणों के दुखों की चिन्ता है उसको, तुम उसको अपने प्राणों में बिठा क्यों नहीं लेते?
९.अगर तू धारा है तो वह तुम्हारा जल है, तुम अपने आप की खोज क्यों नहीं करते?
अगर वह कस्तूरी तो तुम गन्ध हो, तो तुम अपने आप को फैला क्यों नहीं देते?

[1] छन्द व्यवस्था– । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ


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बालबोध Lesson 8 Study#2

संस्कृतभवनम् - Wed, 11/01/2017 - 06:26

भारतीय विद्याभवन – बालबोध

अष्टमः पाठः Eighth Lesson

There is no glossary in this lesson. There are 15 sentences in Sanskrit and their English translations. There is also a title at the beginning. =>

पाठशाला, विद्यालयः = A school

  1. एषा मम पाठशाला = This (is) my school.
  2. अहं पाठशालां गच्छामि = I go to the school.
  3. रमेशः अपि पाठशालां गच्छति = Ramesh also goes to the school.
  4. त्वं पाठशालां कदा गच्छसि ? = When do you go to the school ?
  5. प्रातःसमये अहं तत्र गच्छामि = I go there in the morning.
  6. तत्र त्वं किं पठसि ? = What do you learn there ?
  7. अहम् एकं पुस्तकं पठामि = I read a book.
  8. सः किं लिखति ? = What does he write ?
  9. सः एकं पत्रं लिखति = He writes a letter.
  10. अहम् अपि पत्रं लिखामि = I also write a letter.
  11. अतीव विशालः मम विद्यालयः = My school is very big.
  12. रविवासरे विद्यालयस्य अवकाशः भवति = The school is closed (has holiday) on Sunday.
  13. त्वं विद्यालयात् कदा आगच्छसि ? = When do you come from school ?
  14. सायङ्काले पञ्चवादनसमये = At five o’clock in the evening.
  15. पञ्चवादनात् परम् अवकाशः भवति = Leisure hours begin after 5 o’clock.

 

It should be noted that

  1. In the title and in sentence #1, there is word पाठशाला. In sentences 2, 3, 4 the same word has taken the form पाठशालां and in this form it means “to the school”.
  2. In the title and in sentence #11, there is the word विद्यालयः. In sentence #12, it has the form विद्यालयस्य In this form it actually has the meaning “of the school”. In sentence #13, it has yet another form विद्यालयात्. In this form it has the meaning “from school”.
  3. As can be noted, the forms पाठशालां (to the school) विद्यालयस्य (of the school) विद्यालयात् (from the school) are actually single-word forms, combining in them the meaning of the prepositions ‘to’, ‘of’, ‘from’. So what are prepositions in English become word-forms in Sanskrit.
  4. Major English prepositions are of eight ‘cases’. Sanskrit word for ‘case’ is विभक्ति. Among the eight cases
    1. First case प्रथमा विभक्ति is the subject case, for the subject word(s) in a sentence.
    2. Second case द्वितीया विभक्ति is the object case, for the object word(s) in a sentence.
    3. Third case तृतीया विभक्ति has the meaning of the preposition ‘with’ or ‘by’
    4. Fourth case चतुर्थी विभक्ति has the meaning of the preposition ‘for’
    5. Fifth case पञ्चमी विभक्ति has the meaning of the preposition ‘from’
    6. Sixth case षष्ठी विभक्ति has the meaning of the preposition ‘of’ Note the word मम meaning ‘my’ is also of षष्ठी विभक्ति.
    7. Seventh case सप्तमी विभक्ति has the meaning of the prepositions ‘at’, ‘in’, ‘on’, upon’
      1. Note in sentence #12, the word रविवासरे on Sunday and in sentence #14 सायङ्काले At five o’clock पञ्चवादनसमये In the evening are all of seventh case सप्तमी विभक्ति.
    8. Eighth case संबोधन विभक्ति is the address case, when the sentence is addressed to somebody.
  5. So, when translating from English to Sanskrit, one should focus on the preposition and use the form of the word in the appropriate case. OR
    1. one should focus on the role of the word in the sentence, whether subject-word or object-word or address case.

 

Above sentences are followed by exercises to frame new sentences using the following words / phrases, rather, a glossary.

  1. विद्यालयः A school
  2. विद्यालयात् From the school
  3. गृहम् To the house (home)
  4. गृहात् From home
  5. दशवादनसमये At ten o’clock
  6. एकादशवादनसमये At eleven o’clock
  7. ग्रामम् To the village
  8. नगरम् To the city
  9. ग्रामात् From the village
  10. नगरात् From the city
  11. सोमवासरे On Monday
  12. रविवासरे On Saturday
  13. एकवादनात् परम् After one o’clock
  14. द्विवादनात् परम् After two o’clock

Among the above, words/phrases at 5, 6, 13 and 14 speak of clock-timings in hours. By that it seems to have been suggested that one should get to know numbers from 1 to 12 => एक, द्वि, त्रि, चतुर्, पञ्च, षट्, सप्त, अष्ट, नव, दश, एकादश, द्वादश.

 

In sentence #14 we have सायङ्काले पञ्चवादनसमये. As such this can be extended also to सायङ्काले षट्-वादनसमये, सायङ्काले सप्तवादनसमये. When pronouncing षट्-वादनसमये the pronunciation would tend to become षड्वादनसमये. We should write according to the pronunciation only.

 

Words in 11 and 12 have names of two week days. Note, वासर means weekday. Names of the seven weekdays are => रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि. Since in 13 and 14, परम् means ‘after’ we can say, रविवासरात् परं सोमवासरः (Monday after Sunday) and so on. It would be good to complete them all.

 

Among above words/phrases, we have in 2, 4, 9, 10, 13 and 14 the words विद्यालयात्, गृहात्, ग्रामात्, नगरात्, एकवादनात् and द्विवादनात्. Also we would have रविवासरात्, सोमवासरात्, मंगलवासरात्, बुधवासरात्, गुरुवासरात्, शुक्रवासरात्, शनिवासरात्. They all are त्-ending. What is affixed at the ending of a word is called as a suffix प्रत्यय. Actually विद्यालयात् is from विद्यालय. So the प्रत्यय is आत्, which is the प्रत्यय of पञ्चमी विभक्ति.

 

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बालबोध Lesson 9 Study#2

संस्कृतभवनम् - Wed, 11/01/2017 - 06:19

भारतीय विद्याभवन – बालबोध

नवमः पाठः Ninth Lesson

There is no glossary in this lesson. There are 10 sentences in Sanskrit and their English translations. There is also a title at the beginning. =>

गृहम् = A house, home

  1. त्वं कुत्र गच्छसि ? = Where do you go ?
  2. अहं गृहं गच्छामि = I go home.
  3. मम गृहं समीपे एव अस्ति = My home is nearby.
  4. तस्य द्वारं विशालम् अस्ति = Its door is wide.
  5. द्वारस्य पुरस्तात् उद्यानम् अस्ति = There is a garden (park) in front of the house.
  6. मम गृहे मम माता, पिता, भ्राता च निवसन्ति = In my house my mother, father and brother reside.
  7. अहं मम गृहे निवसामि = I live in my house.
  8. तव गृहं कुत्र अस्ति ? = Where is your house ?
  9. मम गृहं नगरात् बहिः अस्ति = My house is outside the city.
  10. अतीव सुन्दरं मम गृहम् = Very beautiful (is) my house.

 

In this lesson there are following new words

द्वारम् = door माता = mother पिता = father भ्राता = brother

And there are indeclinables समीपे = nearby and बहिः = outside

 

Exercises at the end of the lesson ask framing sentences using the following words

  1. उद्यानात् बहिः 2. विद्यालयात् बहिः 3. पुरस्तात् 4. निवससि

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बालबोध Lesson 10 Study#2

संस्कृतभवनम् - Wed, 11/01/2017 - 06:10

भारतीय विद्याभवन – बालबोध

दशमः पाठः Tenth Lesson

There are 12 sentences in Sanskrit and their English translations. Title of the lesson is =>

उपवनम् = A garden

  1. तत्र एकम् उपवनम् अस्ति = There is a garden.
  2. अतीव सुन्दरं तत् उपवनम् = That garden (is) very beautiful.
  3. तत्र विविधाः वृक्षाः सन्ति = There are various trees.
  4. केचन पुष्पवृक्षाः सन्ति = Some are flower-trees.
  5. केचन फलवृक्षाः सन्ति = Some are fruit-trees.
  6. तेषु पुष्पाणि फलानि च भवन्ति = There are fruits and flowers on them.
  7. फलानि मधुराणि भवन्ति = The fruits are sweet.
  8. अहं वृक्षेषु जलं सिञ्चामि = I spray water on the trees.
  9. तत्र अनेके पक्षिणः आगच्छन्ति = Not just one (i.e. many) birds come there.
  10. प्रातः सायं च ते तत्र कूजन्ति = They coo there in the morning and in the evening.
  11. जनाः उपवनेषु भ्रमणार्थं गच्छन्ति = People go for a walk in the garden.
  12. बालकाः तत्र क्रीडितुं गच्छन्ति = Children go there to play.

In this lesson there are more sentences for translation from English to Sanskrit.

  1. The children go to the garden = बालकाः उद्यानं गच्छन्ति
  2. He plays there = सः तत्र क्रीडति
  3. Does he not play ? = किं सः न क्रीडति ?
  4. Ramesh plays in the garden = रमेशः उद्याने क्रीडति
  5. Where do you play ? = त्वं कुत्र क्रीडसि ?
  6. I do not play there = अहं तत्र न क्रीडामि
  7. Where do you go in the evening ? = सायंकाले त्वं कुत्र गच्छसि ?
  8. I go for a walk = अहं भ्रमणार्थं गच्छामि
  9. Where do you go for a walk ? = भ्रमणार्थं कुत्र गच्छसि ?
  10. I go for a walk in the garden = अहं भ्रमणार्थं उपवनं गच्छामि OR अहं उपवने भ्रमणार्थं गच्छामि

Notes

  1. Subject-words in sentences 3, 4, 5, 6, 7, 9, 10, 11, 12, 13 are plural (बहुवचन). Accordingly the verbs are also plural.
  2. In sentence #3 the word विविधाः is adjective of वृक्षाः. The rule is that if a noun is plural, its adjective shall also be plural. The noun वृक्षाः is of masculine gender (पुँल्लिङ्ग), the adjective विविधाः is also of masculine gender.
    1. In sentence #7 also, मधुराणि is adjective of फलानि. Hence both are plural. फलानि is of neuter gender (नपुंसकलिङ्ग). मधुराणि is also of neuter gender.
  3. The word केचन (= some) in sentences 4 and 5 has the suffix चन. There are special rules for use of चन. They are better explained in texts later than the present बालबोध-level.
  4. The words तेषु in sentence #6, वृक्षेषु in sentence #8 and उपवनेषु in sentence #11 are plural and are in seventh case (in, at, on, upon) सप्तमी विभक्ति. The word उद्याने (in the garden) in sentence #16 is also in seventh case, but is singular.
  5. In sentence #9 the subject-words अनेके पक्षिणः are plural.
    1. Of these, the form अनेके is similar to the form ते (= They) in sentence #10.
    2. The word पक्षिणः is plural of पक्षी. This form will be explained in texts later than the present बालबोध-level.

 

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“उपेन्द्रवज्रा” से “मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ असलम मुज़ाइफ़”

Balramshukla's Blog - Wed, 10/18/2017 - 19:29
संस्कृतश्रियः नवे‍ऽङ्के प्रकाशमासादितेयम् कविता। छन्दश्चात्र प्रयुक्तम् वस्तुतः पारसीकस्य परन्तु तदत्यन्तं साम्यम् उपेन्द्रवज्रया वहति। नीचैः तदीयं विवरणं प्रदत्तम्।     

 

अनेकजन्मस्वनेकनारीकठोरवक्षोजपीडनेन। न सम्प्रतीमेऽपि भङ्गुरत्वं गता अहो वासनानखाग्राः॥ रवीन्दुबिम्बोज्ज्वलाननानां सहस्रवर्षाणि चाङ्गनानाम्। निविष्टदृष्टेर्मुखे मुखे तेऽधुनापि मोहाक्षिणी क्षते नो! ॥ गरिष्ठभोगैर्विदूनकुक्षौ युगानि देहे सुदृष्टहानिः। तवात्र जिह्वाधुनापि लालारसार्द्रतां याति भोगदृष्टौ॥ प्रतारितो लक्षशः सहस्रप्रकारमाभर्त्सितोऽपि ताभिः। विहाय मानं प्रयासि पश्चात्पुनः पुनर्नीच कामिनीनाम्॥   रसाय कस्मै स्पृहावतस्तेऽधरामृतानां परीक्षणानि। कमीहसेऽवाप्तुमाप्तकामं प्रमत्तवद् हिण्डसे दिशासु॥ विशिष्टवर्णं कमाप्तुकामः कपोलपालीर्विलोकसेऽलम्। न वर्तते यस्तवान्तरङ्गे मयूरबर्हप्रभाप्रमोषे॥ सुगन्धमाघ्राय पद्मिनीनां विमुह्य बद्धो द्विरेफकल्पः। स्वकीयहृत्पद्मसौरभैश्चेदयेऽभविष्यस्तु संस्तुतस्त्वम्॥ प्रघूर्णनं केन सर्गमूले तवाहितं येन बंभ्रमीषि। निरन्तरं वर्धते गतिस्तेऽनुजन्म भोगाय सा दुरन्ता॥ असौ तृषा केन धुक्षिता ते प्रकृष्यसे तासु तृष्णिकासु। न तृप्तये नो रताय यासां नु जीवहारीणि चेष्टितानि॥ मनो मनाक् पश्य ते मनोजस्त्वदङ्गजातोऽपि बाधते त्वाम्। भवन्ति वाच्या ध्रुवं य एव स्वसन्ततीर्नैव शिक्षयन्ते॥

छन्द इस पद्य में प्रयुक्त छन्द मूलतः फारसी का है। इसकी गणव्यवस्था है– मफ़ाइलुन् फ़ाइलुन् फ़ऊलुन् ।
इसे अगर भारतीय छन्दःशास्त्र की दृष्टि से देखें तो गणव्यस्था हो सकती है– जभान ताराज राजभा गा (।ऽ। ऽऽ। ऽ।ऽ ऽ) इसका नाम फ़ारसी छन्दःशास्त्र के अनुसार – “मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ असलम मुज़ाइफ़” है
इस छन्द में छठे अक्षर के बाद एक लघु जोड़ देने से यह उपेन्द्रवज्रा में परिवर्तित हो जाता है। इसी प्रकार अगर हम उपेन्द्रवज्रा के छठें (लघु अक्षर) का लोप कर दें तो यह छन्द प्राप्त हो जाता है– उदाहरण के लिए– त्वमेव माता पिता त्वमेव (संस्कृत छन्द) –––––– त्वमेव माता पिता त्वमेव (फ़ारसी छन्द) भारतीय आधुनिक छन्दःशास्त्रियों ने इसे सम्मिलित करने का प्रयास किया है। पुत्तूलाल शुक्ल ने इसका नाम विहंग[2] रखा है तथा इसे संस्कृत वृत्त जलोद्धतगति[3] का मात्रिक संस्करण माना है । प्राचीन संस्कृत साहित्य में इस छन्द का प्रयोग नहीं मिलता। आधुनिक कवियों ने संस्कृत ग़ज़लों में इस छन्द का प्रयोग किया है। तथा इसका नाम नवीन लक्षण ग्रन्थों में यशोदा रखा है[1]। संस्कृत के प्रायः पहले ग़ज़लकार भट्ट मथुरानाथ शास्त्री से एक उदाहरण प्रस्तुत है– न याहि लावण्यगर्वितानाम् उपान्तदेशं सखे मनो मे । अयेऽवधानेन पालयेथा इमं निदेशं सखे मनो मे ॥ (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री)                             (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री) फ़ारसी तथा उर्दू में इस छन्द का सर्वदा वार्णिक रूप ही देखा गया है लेकिन संस्कृत कवियों ने इसके मात्रिक रूप का प्रयोग भी किया है। उदाहरण के लिए आधुनिक कवियों में से जगन्नाथ पाठक तथा रमाकान्त शुक्ल के ग़ज़लों के उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं–– स्थिरे प्रवाहे तरन्ति मन्ये समे किशोराः समे युवानः। सुपिच्छिले पथि पतन्ति मन्ये समे किशोराः समे युवानः॥ (समे किशोराः समे युवानः: जगन्नाथ पाठक)

                                       (स्वर्गीय जगन्नाथ पाठक) सरस्वतीपादपद्मसेवा यदीयमास्ते परं हि लक्ष्यम्। बुधाग्रगाणामतन्द्रितानां मदीयकविते कुरुष्व गानम्॥ (मदीयकविते कुरुष्व गानम् : रमाकान्त शुक्ल)

                     (श्री रमाकान्तशुक्ल काव्यपाठ करते हुए) ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्राचीन फ़ारसी कवियों के यहाँ इस छन्द का प्रयोग देखने को नहीं मिलता। ईरान के कवियों की अपेक्षा भारतीय फ़ारसी कवियों ने इस छन्द का अधिक प्रयोग किया है। बहुत अधिक सम्भावना है कि फ़ारसी कविता के भारतीय सम्प्रदाय (सब्के हिन्दी) से सम्बद्ध कवियों ने इसकी ईजाद उपेन्द्रवज्रा की धुन से की हो। उदाहरण के लिए भारतीय फ़ारसी कवि बेदिल देहलवी ने इस छन्द का प्रयोग निम्नोक्त कविता में किया है–                        (महाकवि बेदिल की समाधि, बाग़े बेदिल–दिल्ली में) ज़ही ब शोख़ी बहारे नाज़त शिकस्ता रंगे ग़ुरूरे इम्कान् दो नर्गिसत क़िब्लागाहे मस्ती दो अब्रुयत सज्दागाहे मस्तान् सुख़न ज़ लाले तो गौहर् आरा निगह ज चश्मे तो बादा पैमा सबा ज ज़ुल्फ़े तो रिश्ते बर पा चमन ज़ रूये तो गुल ब दामान् ब गम्ज़ा सहरी ब नाज़ जादू ब तुर्रा अफ़सून् ब क़द क़यामत ब ख़त बनफ़्शा ब ज़ुल्फ़ सुम्बुल ब चश्मे नर्गिस ब रुख़ गुलिस्तान् चमन ब अर्ज़े तो बहारे नाज़त दर् आतशे रंगे गुलफ़रोशी सहर ज़ गुल करदने अरक़हा ब आलमे आबे सुम्बुलिस्तान् मताब रूये वफ़ा ज़ बेदिल मशौ ज मजनूने ख़ीश ग़ाफिल ज दस्तगाहे शहान् चि नुक़सान् ज़ पुर्सिशे हाले बी नवायान्

 

इस ग़ज़ल का इसी छन्द में अनुवाद करने का प्रयत्न मैंने संस्कृत में किया है। यद्यपि बेदिल के भावों की परम गम्भीरता इसमें नहीं आ पायी है। आख़िर बेदिल तो अबुल् मआनी (अर्थ विच्छित्ति के पिता) ठहरे। अनुवाद इस तरह है–         निःस्वलोकवार्तम् अहो सलीलं त्वदीयहावो जहार सम्भावनाभिमानम्। दृशोर्युगं ते मदस्य भूमिर् भ्रुवोर्युगं तेऽसिलौहशालम्॥ रदच्छदाद् वाक् सुमौक्तिकश्रीर् दृशोः कटाक्षाश्च मत्तमत्ताः। तवालकैर् बद्धपात् समीरः सुमं च वाट्यां तवाननोत्थम्॥ दृशेन्द्रजालं तथैव भ्रूर्भ्यां च कार्मणं यातु केशपाशैः । मुखेन वाटी शशी कपोलैर् विभाति सा चक्षुषा सरोजम्॥ मुखेन ते दर्पणं सुवाटी निशा तव स्कन्ध एष केशैः । वचोऽमृतैस्ते गृहं द्युलोको विचित्रितं ब्रह्मणो विधानम्॥ दयादृशं मा विदूरयास्माद् उपेक्ष्यतां नो निजानुरागी। नृपस्य हानिर्न जायते यत् पिपृच्छिषेन् निःस्वलोकवार्तम्॥

 

 

 

[1]जगौ यशोदा (छन्दःप्रभाकर–पृष्ठ १२०) [2]आधुनिक हिन्दी में छन्दयोजना पृ॰ २६७ [3]जसौ जसयुतौ जलोद्धतगतिः – वाग्वल्लभ पृ॰१८७
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प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान २०१७

Balramshukla's Blog - Wed, 10/11/2017 - 22:21

हलचल

डॉ. बलराम शुक्ल प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित
  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली (अमर उजाला)

साहित्यकार डॉ. बलराम शुक्ल को प्रतिष्ठित भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने वर्ष 2017 के पंडित प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से नवाजा है। संस्कृत भाषा और साहित्य में मौलिक रचनात्मकता के लिए यह सम्मान विधानसभाध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ में सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया।

राप्तीनगर के रहने वाले डॉ. शुक्ल मूल रूप से महराजगंज के भिटौली बाजार कस्बे के समीप सोहरौना राजा गांव के रहने वाले हैं। इनकी प्राथमिक शिक्षा यहीं से हुई है। पिता रामचंद्र शुक्ल जूनियर हाई स्कूल महराजगंज के अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। सम्मानित होने की खबर को सुनकर उनके आवास पर गुरुजनों, शुभचिंतकों के बधाई देने का तांता लगा रहा।

बचपन से ही मेधावी डॉ. शुक्ल ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से संस्कृत और फारसी साहित्य में परास्नातक किया। दोनों विषयों में यूनिवर्सिटी टॉप करने पर डॉ. सीडी देशमुख पुरस्कार प्राप्त किया। डॉ. शुक्ल संस्कृत तथा फारसी दोनों भाषाओं के कवि हैं। इन्होंने ईरान के विश्व कविता समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। विविध सांस्कृतिक प्रसंगों में वे आठ बार ईरान की आमंत्रित किए गए हैं।

 


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“Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण)

Balramshukla's Blog - Tue, 08/22/2017 - 17:51

The paper, which swallowed all my summer vacation days, is out. “Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण) published in the recent number of prestigious Hindi Journal of CSDS ( Centre for the studies of developing societies)प्रतिमान. The प्रतिमान aims at decolonizing the knowledge construction. The PDF file of the paper can be downloaded from the following link –

शब्द, प्रतीक, कहानियाँ एवम् विचार समय के प्रवाह में सर्वत्र भ्रमण करते हुए मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को समृद्ध करते हैं। निरन्तर भ्रमण के कारण उनके स्वरूप में देश तथा काल के अनुरूप स्वभावतः परिवर्तन हो जाते हैं । कभी कभी ये परिवर्तन इतने अधिक होते हैं कि कथाओं के मूल स्वरूप की पहचान ही कठिन हो जाती है। ये परिवर्तन वस्तुतः भिन्न समाज तथा संस्कृति में गृहीत कथाओं या प्रतीकों को अधिक स्वीकृत बनाने के लिये किये जाते हैं। इनका उद्देश्य मूल कथा को हानि पहुँचाना नहीं होता है। इसीलिये इन परिवर्तनों के बावजूद  कथाओं का मूल सन्देश प्रायः समान रहता है ।

ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी के लगभग संकलित पञ्चतन्त्र ग्रन्थ कथा साहित्य के चतुर्दिक् प्रव्रजन का अपूर्व उदाहरण है। यह सर्वाधिक साहित्यिक अनुवादों वाला भारतीय ग्रन्थ है जिसके ५० भाषाओं में लगभग २०० संस्करण उपलब्ध हैं । इनमें से तीन चौथाई संस्करण भारतीयेतर भाषाओं में प्राप्य हैं। केवल भारत में ही इस ग्रन्थ के २५ विभिन्न संस्करण मिलते हैं जिनमें तन्त्राख्यायिका से लेकर हितोपदेश तक सम्मिलित हैं । विद्वानों ने प्राचीन भारत में प्रसारित पञ्चतन्त्र की विभिन्न शाखाओं को चार प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया है। पञ्चतन्त्र का सबसे प्राचीन स्वरूप सम्भवतः तन्त्राख्यायिका है (Dasgupta 1947: 90)। यह वही पाठ है जिससे पहलवी (फ़ारसी भाषा का मध्यकालीन रूप) भाषा में अनुवाद किया गया होगा। सोमदेव के कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामञ्जरी में जिस पञ्चतन्त्र की कथाओं का उपयोग किया गया था वह उसका उत्तर–पश्चिम पाठ रहा होगा जो अब उपलब्ध नहीं होता। जैनों के कथा साहित्य में पञ्चतन्त्र की कहानियाँ मुख्यतः दो रूपों में उपस्थित दिखायी देती हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में पञ्चतन्त्र के पूरे संस्करण प्रस्तुत किये जिसमें सबसे प्रसिद्ध है ११९९ ई॰ में विद्यमान जैनाचार्य पूर्णभद्र का पञ्चाख्यान नामक परिवर्धित संस्करण। एस॰ एन॰ दासगुप्त के अनुसार यह पञ्चतन्त्र के दाक्षिणात्य संस्करण पर आधारित रहा होगा। पञ्चतन्त्र की कथायें जैन धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों की व्याख्याओं में भी बिखरी पड़ी हैं। ये कथायें प्राकृत भाषा में लिखी गयी हैं और इनका सम्भावित समय ६ठीं शताब्दी इस्वी है[1]। प्राकृत की ये कथायें जैन ग्रन्थों में प्रयुक्त होने के बावजूद अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रखती हैं। । पञ्चतन्त्र का सबसे नवीन तथा परिवर्तित–परिवर्धित संस्करण नारायण पण्डित का हितोपदेश है। नारायण पण्डित बंगाल के राजा धवलचन्द्र के आश्रित थे। धवलचन्द्र का समय १३७३ ई॰ है।

पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा उसके प्राचीन फ़ारसी अनुवाद के साथ शुरू होती है। फ़ारसी तथा अरबी जगत् में पञ्चतन्त्र कलीलः व दिम्नः(کلیله و دمنه)[2] के नाम से रूपान्तरित एवं प्रख्यात है । ५७० ईस्वी में सासानी सम्राट् अनूशीरवान् (انوشیروان)  के मन्त्री बुज़ुर्गमेह्र (بزرگمهر) ने बरज़वै तबीब के माध्यम से इस ग्रन्थ का अनुवाद पहलवी (मध्यकालीन फ़ारसी) भाषा में कराया। पहलवी में इसका नाम कलीलग व दिम्नग था। यही अनुवाद पञ्चतन्त्र के सीरियन तथा अन्य विश्वभाषाओं में हुए अनुवादों का आधार बना । ७५० ईस्वी वर्ष में फ़ारसी भाषा के विद्वान् अब्दुल्लाह इब्ने मुक़फ्फ़ा ने इसका अनुवाद अरबी भाषा में किया । १२ वीं सदी में ग़ज़नवी वंश के शासक बहराम शाह के यहाँ मुंशी पद पर कार्यरत नसरुल्लाह मुंशी ने इसका अनुवाद अर्वाचीन फ़ारसी में किया। इस अनुवाद का नाम भी कलीलः व दिम्नः ही है। यह अनुवाद मूल की अपेक्षा बहुत परिवर्धित है। फ़ारसी का यही अनुवाद अनवारे सुहैली आदि अनेक दूसरे फ़ारसी रूपान्तरणों का आधार बना[3]। अनवारे सुहैली ग्रन्थ १५वीं सदी में हिरात के तैमूरी सुल्तान हुसैन बैक़रा के दरबारी विद्वान् वाइज़ काशिफ़ी के द्वारा लिखा गया था। इसका प्रमुख आधार नसरुल्लाह मुंशी का फ़ारसी भाषा में लिखित कलीलः व दिम्नः ग्रन्थ था। इन फ़ारसी रूपान्तरणों के अतिरिक्त पञ्चतन्त्र की कथायें समस्त विश्व में रूपान्तरित तथा स्वीकृत हुईं, जो एक स्वतन्त्र अध्ययन का विषय है[4]

सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण करने उपरान्त भी पञ्चतन्त्र की कथाओं के मूल सन्देश में बहुत अधिक अन्तर नहीं देखा गया है। पञ्चतन्त्र की कथाओं का मूल उद्देश्य है–रुचिकर पशुकथाओं का उपयोग करके बालकों को नीतिशास्त्र की शिक्षा देना। स्वयं पञ्चतन्त्र के प्रारम्भ में इन कथाओं के संग्रह का उद्देश्य अमरशक्ति राजा के मन्दबुद्धि पुत्रों को नीतिशिक्षण रूपी आख्यान द्वारा बताया गया है। विष्णुशर्मा की प्रतिज्ञा उन राजकुमारों को नीतिशास्त्र में निष्णात बनाना ही था[5]। हितोपदेश में भी इन कथाओं का स्पष्ट उद्देश्य यही बताया गया है। इसके प्रस्तावनात्मक श्लोकों में कहा गया है[6]

कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते॥

(इस पुस्तक में कहानी के बहाने बच्चों को नीति शिक्षा दी जा रही है।)

यही कारण है कि पञ्चतन्त्र के आरम्भ में देवताओं को प्रणाम करने के बाद ग्रन्थकार ने प्राचीन काल के प्रमुख नीतिशास्त्र प्रणेताओं (नयशास्त्रकर्ता ) को नमस्कार समर्पित किये हैं–

मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।

चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः॥ (कथामुख २)

पञ्चतन्त्र में व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार की नैतिक शिक्षाएँ कथाओं में सुन्दर रीति से गूँथ दी गयी हैं। इनका उद्देश्य यह है कि इसका अध्ययन करने वाले बालकों के हृदय में ये नैतिक शिक्षायें इस प्रकार घर कर जायें कि वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में अव्यावहारिक आचरण न करें तथा कहीं भी असफलता प्राप्त न करें । पञ्चतन्त्र की फलश्रुति में भी इसका उद्देश्य यही बताया गया है–

अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च।

न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन॥ (पञ्चतन्त्र कथामुख १०)

(जो इस नीतिशास्त्र का नित्य अध्ययन करता है तथा इसे सुनता है वह इन्द्र से भी कभी पराजित नहीं हो सकता। )

इस पत्र का केन्द्रीय विषय मौलाना जलालुद्दीन रूमी (आगे रूमी अथवा मौलाना के नाम से अभिहित) द्वारा अपनी विश्वप्रसिद्ध  आध्यात्मिक कविता– मसनवी ए मानवी (आगे मसनवी की संज्ञा से कथित) में  इन कथाओं का किया गया उपयोग है। मसनवी में हमें पञ्चतन्त्र की कथाओं के स्वरूप एवं सन्देश दोनों में आश्चर्यजनक  परिवर्तन मिलता है। प्रस्तुत पत्र में यह देखने का प्रयत्न किया गया है कि किस प्रकार रूमी ने पञ्चतन्त्र की नैतिक कथाओं को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करके उनका उपयोग अपने कथ्य को पुष्ट करने में किया है।

[1] The Pañcatantra stories among Jains : versions, peculiarities and usages – Nalini BALBIR (Abstract of the paper)

[2] आधुनिक फ़ारसी में इसका उच्चारण – कलीले व दिम्ने , अरबी तथा उर्दू में कलीला व दिम्ना किया जाता है।

[3]….the Hebrew version 1100 A.D., the Latin about 1270 A.D., the German 1480 A.D., the Italian 1552A.D., the French 1678 A.D. The Greek in 1080 A.D. the Persian in 12th century A.D. (Vardachari 1960 : 124)

[4] विशेष चर्चा “पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा के मुख्य पड़ाव” नामक प्रकाश्यमान शोधपत्र में।

[5] “…पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।” पञ्चतन्त्र कथामुख पृ॰ ४

[6] हितोपदेश प्रस्तावना श्लोक सं॰ ८

इस शोधपत्र का शेष भाग अधोलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है–

13balram

अथवा इस लिंक से–

https://www.academia.edu/34301747/_Rumis_Philosophical_Rendering_of_Ethical_Stories_of_Panchatantra_रूमी_की_कीमियागरी_पंचतन_त_र_की_नैतिक_कहानियों_का_आध_यात_मिक_संस_करण_

प्रतिमान के इस अंक की सूची इस प्रकार है–

00_intro

 


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