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बालबोध Lesson 10 Study#2

संस्कृतभवनम् - Wed, 11/01/2017 - 06:10

भारतीय विद्याभवन – बालबोध

दशमः पाठः Tenth Lesson

There are 12 sentences in Sanskrit and their English translations. Title of the lesson is =>

उपवनम् = A garden

  1. तत्र एकम् उपवनम् अस्ति = There is a garden.
  2. अतीव सुन्दरं तत् उपवनम् = That garden (is) very beautiful.
  3. तत्र विविधाः वृक्षाः सन्ति = There are various trees.
  4. केचन पुष्पवृक्षाः सन्ति = Some are flower-trees.
  5. केचन फलवृक्षाः सन्ति = Some are fruit-trees.
  6. तेषु पुष्पाणि फलानि च भवन्ति = There are fruits and flowers on them.
  7. फलानि मधुराणि भवन्ति = The fruits are sweet.
  8. अहं वृक्षेषु जलं सिञ्चामि = I spray water on the trees.
  9. तत्र अनेके पक्षिणः आगच्छन्ति = Not just one (i.e. many) birds come there.
  10. प्रातः सायं च ते तत्र कूजन्ति = They coo there in the morning and in the evening.
  11. जनाः उपवनेषु भ्रमणार्थं गच्छन्ति = People go for a walk in the garden.
  12. बालकाः तत्र क्रीडितुं गच्छन्ति = Children go there to play.

In this lesson there are more sentences for translation from English to Sanskrit.

  1. The children go to the garden = बालकाः उद्यानं गच्छन्ति
  2. He plays there = सः तत्र क्रीडति
  3. Does he not play ? = किं सः न क्रीडति ?
  4. Ramesh plays in the garden = रमेशः उद्याने क्रीडति
  5. Where do you play ? = त्वं कुत्र क्रीडसि ?
  6. I do not play there = अहं तत्र न क्रीडामि
  7. Where do you go in the evening ? = सायंकाले त्वं कुत्र गच्छसि ?
  8. I go for a walk = अहं भ्रमणार्थं गच्छामि
  9. Where do you go for a walk ? = भ्रमणार्थं कुत्र गच्छसि ?
  10. I go for a walk in the garden = अहं भ्रमणार्थं उपवनं गच्छामि OR अहं उपवने भ्रमणार्थं गच्छामि

Notes

  1. Subject-words in sentences 3, 4, 5, 6, 7, 9, 10, 11, 12, 13 are plural (बहुवचन). Accordingly the verbs are also plural.
  2. In sentence #3 the word विविधाः is adjective of वृक्षाः. The rule is that if a noun is plural, its adjective shall also be plural. The noun वृक्षाः is of masculine gender (पुँल्लिङ्ग), the adjective विविधाः is also of masculine gender.
    1. In sentence #7 also, मधुराणि is adjective of फलानि. Hence both are plural. फलानि is of neuter gender (नपुंसकलिङ्ग). मधुराणि is also of neuter gender.
  3. The word केचन (= some) in sentences 4 and 5 has the suffix चन. There are special rules for use of चन. They are better explained in texts later than the present बालबोध-level.
  4. The words तेषु in sentence #6, वृक्षेषु in sentence #8 and उपवनेषु in sentence #11 are plural and are in seventh case (in, at, on, upon) सप्तमी विभक्ति. The word उद्याने (in the garden) in sentence #16 is also in seventh case, but is singular.
  5. In sentence #9 the subject-words अनेके पक्षिणः are plural.
    1. Of these, the form अनेके is similar to the form ते (= They) in sentence #10.
    2. The word पक्षिणः is plural of पक्षी. This form will be explained in texts later than the present बालबोध-level.

 

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“उपेन्द्रवज्रा” से “मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ असलम मुज़ाइफ़”

Balramshukla's Blog - Wed, 10/18/2017 - 19:29
संस्कृतश्रियः नवे‍ऽङ्के प्रकाशमासादितेयम् कविता। छन्दश्चात्र प्रयुक्तम् वस्तुतः पारसीकस्य परन्तु तदत्यन्तं साम्यम् उपेन्द्रवज्रया वहति। नीचैः तदीयं विवरणं प्रदत्तम्।     

 

अनेकजन्मस्वनेकनारीकठोरवक्षोजपीडनेन। न सम्प्रतीमेऽपि भङ्गुरत्वं गता अहो वासनानखाग्राः॥ रवीन्दुबिम्बोज्ज्वलाननानां सहस्रवर्षाणि चाङ्गनानाम्। निविष्टदृष्टेर्मुखे मुखे तेऽधुनापि मोहाक्षिणी क्षते नो! ॥ गरिष्ठभोगैर्विदूनकुक्षौ युगानि देहे सुदृष्टहानिः। तवात्र जिह्वाधुनापि लालारसार्द्रतां याति भोगदृष्टौ॥ प्रतारितो लक्षशः सहस्रप्रकारमाभर्त्सितोऽपि ताभिः। विहाय मानं प्रयासि पश्चात्पुनः पुनर्नीच कामिनीनाम्॥   रसाय कस्मै स्पृहावतस्तेऽधरामृतानां परीक्षणानि। कमीहसेऽवाप्तुमाप्तकामं प्रमत्तवद् हिण्डसे दिशासु॥ विशिष्टवर्णं कमाप्तुकामः कपोलपालीर्विलोकसेऽलम्। न वर्तते यस्तवान्तरङ्गे मयूरबर्हप्रभाप्रमोषे॥ सुगन्धमाघ्राय पद्मिनीनां विमुह्य बद्धो द्विरेफकल्पः। स्वकीयहृत्पद्मसौरभैश्चेदयेऽभविष्यस्तु संस्तुतस्त्वम्॥ प्रघूर्णनं केन सर्गमूले तवाहितं येन बंभ्रमीषि। निरन्तरं वर्धते गतिस्तेऽनुजन्म भोगाय सा दुरन्ता॥ असौ तृषा केन धुक्षिता ते प्रकृष्यसे तासु तृष्णिकासु। न तृप्तये नो रताय यासां नु जीवहारीणि चेष्टितानि॥ मनो मनाक् पश्य ते मनोजस्त्वदङ्गजातोऽपि बाधते त्वाम्। भवन्ति वाच्या ध्रुवं य एव स्वसन्ततीर्नैव शिक्षयन्ते॥

छन्द इस पद्य में प्रयुक्त छन्द मूलतः फारसी का है। इसकी गणव्यवस्था है– मफ़ाइलुन् फ़ाइलुन् फ़ऊलुन् ।
इसे अगर भारतीय छन्दःशास्त्र की दृष्टि से देखें तो गणव्यस्था हो सकती है– जभान ताराज राजभा गा (।ऽ। ऽऽ। ऽ।ऽ ऽ) इसका नाम फ़ारसी छन्दःशास्त्र के अनुसार – “मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ असलम मुज़ाइफ़” है
इस छन्द में छठे अक्षर के बाद एक लघु जोड़ देने से यह उपेन्द्रवज्रा में परिवर्तित हो जाता है। इसी प्रकार अगर हम उपेन्द्रवज्रा के छठें (लघु अक्षर) का लोप कर दें तो यह छन्द प्राप्त हो जाता है– उदाहरण के लिए– त्वमेव माता पिता त्वमेव (संस्कृत छन्द) –––––– त्वमेव माता पिता त्वमेव (फ़ारसी छन्द) भारतीय आधुनिक छन्दःशास्त्रियों ने इसे सम्मिलित करने का प्रयास किया है। पुत्तूलाल शुक्ल ने इसका नाम विहंग[2] रखा है तथा इसे संस्कृत वृत्त जलोद्धतगति[3] का मात्रिक संस्करण माना है । प्राचीन संस्कृत साहित्य में इस छन्द का प्रयोग नहीं मिलता। आधुनिक कवियों ने संस्कृत ग़ज़लों में इस छन्द का प्रयोग किया है। तथा इसका नाम नवीन लक्षण ग्रन्थों में यशोदा रखा है[1]। संस्कृत के प्रायः पहले ग़ज़लकार भट्ट मथुरानाथ शास्त्री से एक उदाहरण प्रस्तुत है– न याहि लावण्यगर्वितानाम् उपान्तदेशं सखे मनो मे । अयेऽवधानेन पालयेथा इमं निदेशं सखे मनो मे ॥ (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री)                             (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री) फ़ारसी तथा उर्दू में इस छन्द का सर्वदा वार्णिक रूप ही देखा गया है लेकिन संस्कृत कवियों ने इसके मात्रिक रूप का प्रयोग भी किया है। उदाहरण के लिए आधुनिक कवियों में से जगन्नाथ पाठक तथा रमाकान्त शुक्ल के ग़ज़लों के उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं–– स्थिरे प्रवाहे तरन्ति मन्ये समे किशोराः समे युवानः। सुपिच्छिले पथि पतन्ति मन्ये समे किशोराः समे युवानः॥ (समे किशोराः समे युवानः: जगन्नाथ पाठक)

                                       (स्वर्गीय जगन्नाथ पाठक) सरस्वतीपादपद्मसेवा यदीयमास्ते परं हि लक्ष्यम्। बुधाग्रगाणामतन्द्रितानां मदीयकविते कुरुष्व गानम्॥ (मदीयकविते कुरुष्व गानम् : रमाकान्त शुक्ल)

                     (श्री रमाकान्तशुक्ल काव्यपाठ करते हुए) ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्राचीन फ़ारसी कवियों के यहाँ इस छन्द का प्रयोग देखने को नहीं मिलता। ईरान के कवियों की अपेक्षा भारतीय फ़ारसी कवियों ने इस छन्द का अधिक प्रयोग किया है। बहुत अधिक सम्भावना है कि फ़ारसी कविता के भारतीय सम्प्रदाय (सब्के हिन्दी) से सम्बद्ध कवियों ने इसकी ईजाद उपेन्द्रवज्रा की धुन से की हो। उदाहरण के लिए भारतीय फ़ारसी कवि बेदिल देहलवी ने इस छन्द का प्रयोग निम्नोक्त कविता में किया है–                        (महाकवि बेदिल की समाधि, बाग़े बेदिल–दिल्ली में) ज़ही ब शोख़ी बहारे नाज़त शिकस्ता रंगे ग़ुरूरे इम्कान् दो नर्गिसत क़िब्लागाहे मस्ती दो अब्रुयत सज्दागाहे मस्तान् सुख़न ज़ लाले तो गौहर् आरा निगह ज चश्मे तो बादा पैमा सबा ज ज़ुल्फ़े तो रिश्ते बर पा चमन ज़ रूये तो गुल ब दामान् ब गम्ज़ा सहरी ब नाज़ जादू ब तुर्रा अफ़सून् ब क़द क़यामत ब ख़त बनफ़्शा ब ज़ुल्फ़ सुम्बुल ब चश्मे नर्गिस ब रुख़ गुलिस्तान् चमन ब अर्ज़े तो बहारे नाज़त दर् आतशे रंगे गुलफ़रोशी सहर ज़ गुल करदने अरक़हा ब आलमे आबे सुम्बुलिस्तान् मताब रूये वफ़ा ज़ बेदिल मशौ ज मजनूने ख़ीश ग़ाफिल ज दस्तगाहे शहान् चि नुक़सान् ज़ पुर्सिशे हाले बी नवायान्

 

इस ग़ज़ल का इसी छन्द में अनुवाद करने का प्रयत्न मैंने संस्कृत में किया है। यद्यपि बेदिल के भावों की परम गम्भीरता इसमें नहीं आ पायी है। आख़िर बेदिल तो अबुल् मआनी (अर्थ विच्छित्ति के पिता) ठहरे। अनुवाद इस तरह है–         निःस्वलोकवार्तम् अहो सलीलं त्वदीयहावो जहार सम्भावनाभिमानम्। दृशोर्युगं ते मदस्य भूमिर् भ्रुवोर्युगं तेऽसिलौहशालम्॥ रदच्छदाद् वाक् सुमौक्तिकश्रीर् दृशोः कटाक्षाश्च मत्तमत्ताः। तवालकैर् बद्धपात् समीरः सुमं च वाट्यां तवाननोत्थम्॥ दृशेन्द्रजालं तथैव भ्रूर्भ्यां च कार्मणं यातु केशपाशैः । मुखेन वाटी शशी कपोलैर् विभाति सा चक्षुषा सरोजम्॥ मुखेन ते दर्पणं सुवाटी निशा तव स्कन्ध एष केशैः । वचोऽमृतैस्ते गृहं द्युलोको विचित्रितं ब्रह्मणो विधानम्॥ दयादृशं मा विदूरयास्माद् उपेक्ष्यतां नो निजानुरागी। नृपस्य हानिर्न जायते यत् पिपृच्छिषेन् निःस्वलोकवार्तम्॥

 

 

 

[1]जगौ यशोदा (छन्दःप्रभाकर–पृष्ठ १२०) [2]आधुनिक हिन्दी में छन्दयोजना पृ॰ २६७ [3]जसौ जसयुतौ जलोद्धतगतिः – वाग्वल्लभ पृ॰१८७
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प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान २०१७

Balramshukla's Blog - Wed, 10/11/2017 - 22:21

हलचल

डॉ. बलराम शुक्ल प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित
  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली (अमर उजाला)

साहित्यकार डॉ. बलराम शुक्ल को प्रतिष्ठित भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने वर्ष 2017 के पंडित प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से नवाजा है। संस्कृत भाषा और साहित्य में मौलिक रचनात्मकता के लिए यह सम्मान विधानसभाध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ में सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया।

राप्तीनगर के रहने वाले डॉ. शुक्ल मूल रूप से महराजगंज के भिटौली बाजार कस्बे के समीप सोहरौना राजा गांव के रहने वाले हैं। इनकी प्राथमिक शिक्षा यहीं से हुई है। पिता रामचंद्र शुक्ल जूनियर हाई स्कूल महराजगंज के अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। सम्मानित होने की खबर को सुनकर उनके आवास पर गुरुजनों, शुभचिंतकों के बधाई देने का तांता लगा रहा।

बचपन से ही मेधावी डॉ. शुक्ल ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से संस्कृत और फारसी साहित्य में परास्नातक किया। दोनों विषयों में यूनिवर्सिटी टॉप करने पर डॉ. सीडी देशमुख पुरस्कार प्राप्त किया। डॉ. शुक्ल संस्कृत तथा फारसी दोनों भाषाओं के कवि हैं। इन्होंने ईरान के विश्व कविता समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। विविध सांस्कृतिक प्रसंगों में वे आठ बार ईरान की आमंत्रित किए गए हैं।

 


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“Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण)

Balramshukla's Blog - Tue, 08/22/2017 - 17:51

The paper, which swallowed all my summer vacation days, is out. “Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण) published in the recent number of prestigious Hindi Journal of CSDS ( Centre for the studies of developing societies)प्रतिमान. The प्रतिमान aims at decolonizing the knowledge construction. The PDF file of the paper can be downloaded from the following link –

शब्द, प्रतीक, कहानियाँ एवम् विचार समय के प्रवाह में सर्वत्र भ्रमण करते हुए मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को समृद्ध करते हैं। निरन्तर भ्रमण के कारण उनके स्वरूप में देश तथा काल के अनुरूप स्वभावतः परिवर्तन हो जाते हैं । कभी कभी ये परिवर्तन इतने अधिक होते हैं कि कथाओं के मूल स्वरूप की पहचान ही कठिन हो जाती है। ये परिवर्तन वस्तुतः भिन्न समाज तथा संस्कृति में गृहीत कथाओं या प्रतीकों को अधिक स्वीकृत बनाने के लिये किये जाते हैं। इनका उद्देश्य मूल कथा को हानि पहुँचाना नहीं होता है। इसीलिये इन परिवर्तनों के बावजूद  कथाओं का मूल सन्देश प्रायः समान रहता है ।

ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी के लगभग संकलित पञ्चतन्त्र ग्रन्थ कथा साहित्य के चतुर्दिक् प्रव्रजन का अपूर्व उदाहरण है। यह सर्वाधिक साहित्यिक अनुवादों वाला भारतीय ग्रन्थ है जिसके ५० भाषाओं में लगभग २०० संस्करण उपलब्ध हैं । इनमें से तीन चौथाई संस्करण भारतीयेतर भाषाओं में प्राप्य हैं। केवल भारत में ही इस ग्रन्थ के २५ विभिन्न संस्करण मिलते हैं जिनमें तन्त्राख्यायिका से लेकर हितोपदेश तक सम्मिलित हैं । विद्वानों ने प्राचीन भारत में प्रसारित पञ्चतन्त्र की विभिन्न शाखाओं को चार प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया है। पञ्चतन्त्र का सबसे प्राचीन स्वरूप सम्भवतः तन्त्राख्यायिका है (Dasgupta 1947: 90)। यह वही पाठ है जिससे पहलवी (फ़ारसी भाषा का मध्यकालीन रूप) भाषा में अनुवाद किया गया होगा। सोमदेव के कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामञ्जरी में जिस पञ्चतन्त्र की कथाओं का उपयोग किया गया था वह उसका उत्तर–पश्चिम पाठ रहा होगा जो अब उपलब्ध नहीं होता। जैनों के कथा साहित्य में पञ्चतन्त्र की कहानियाँ मुख्यतः दो रूपों में उपस्थित दिखायी देती हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में पञ्चतन्त्र के पूरे संस्करण प्रस्तुत किये जिसमें सबसे प्रसिद्ध है ११९९ ई॰ में विद्यमान जैनाचार्य पूर्णभद्र का पञ्चाख्यान नामक परिवर्धित संस्करण। एस॰ एन॰ दासगुप्त के अनुसार यह पञ्चतन्त्र के दाक्षिणात्य संस्करण पर आधारित रहा होगा। पञ्चतन्त्र की कथायें जैन धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों की व्याख्याओं में भी बिखरी पड़ी हैं। ये कथायें प्राकृत भाषा में लिखी गयी हैं और इनका सम्भावित समय ६ठीं शताब्दी इस्वी है[1]। प्राकृत की ये कथायें जैन ग्रन्थों में प्रयुक्त होने के बावजूद अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रखती हैं। । पञ्चतन्त्र का सबसे नवीन तथा परिवर्तित–परिवर्धित संस्करण नारायण पण्डित का हितोपदेश है। नारायण पण्डित बंगाल के राजा धवलचन्द्र के आश्रित थे। धवलचन्द्र का समय १३७३ ई॰ है।

पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा उसके प्राचीन फ़ारसी अनुवाद के साथ शुरू होती है। फ़ारसी तथा अरबी जगत् में पञ्चतन्त्र कलीलः व दिम्नः(کلیله و دمنه)[2] के नाम से रूपान्तरित एवं प्रख्यात है । ५७० ईस्वी में सासानी सम्राट् अनूशीरवान् (انوشیروان)  के मन्त्री बुज़ुर्गमेह्र (بزرگمهر) ने बरज़वै तबीब के माध्यम से इस ग्रन्थ का अनुवाद पहलवी (मध्यकालीन फ़ारसी) भाषा में कराया। पहलवी में इसका नाम कलीलग व दिम्नग था। यही अनुवाद पञ्चतन्त्र के सीरियन तथा अन्य विश्वभाषाओं में हुए अनुवादों का आधार बना । ७५० ईस्वी वर्ष में फ़ारसी भाषा के विद्वान् अब्दुल्लाह इब्ने मुक़फ्फ़ा ने इसका अनुवाद अरबी भाषा में किया । १२ वीं सदी में ग़ज़नवी वंश के शासक बहराम शाह के यहाँ मुंशी पद पर कार्यरत नसरुल्लाह मुंशी ने इसका अनुवाद अर्वाचीन फ़ारसी में किया। इस अनुवाद का नाम भी कलीलः व दिम्नः ही है। यह अनुवाद मूल की अपेक्षा बहुत परिवर्धित है। फ़ारसी का यही अनुवाद अनवारे सुहैली आदि अनेक दूसरे फ़ारसी रूपान्तरणों का आधार बना[3]। अनवारे सुहैली ग्रन्थ १५वीं सदी में हिरात के तैमूरी सुल्तान हुसैन बैक़रा के दरबारी विद्वान् वाइज़ काशिफ़ी के द्वारा लिखा गया था। इसका प्रमुख आधार नसरुल्लाह मुंशी का फ़ारसी भाषा में लिखित कलीलः व दिम्नः ग्रन्थ था। इन फ़ारसी रूपान्तरणों के अतिरिक्त पञ्चतन्त्र की कथायें समस्त विश्व में रूपान्तरित तथा स्वीकृत हुईं, जो एक स्वतन्त्र अध्ययन का विषय है[4]

सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण करने उपरान्त भी पञ्चतन्त्र की कथाओं के मूल सन्देश में बहुत अधिक अन्तर नहीं देखा गया है। पञ्चतन्त्र की कथाओं का मूल उद्देश्य है–रुचिकर पशुकथाओं का उपयोग करके बालकों को नीतिशास्त्र की शिक्षा देना। स्वयं पञ्चतन्त्र के प्रारम्भ में इन कथाओं के संग्रह का उद्देश्य अमरशक्ति राजा के मन्दबुद्धि पुत्रों को नीतिशिक्षण रूपी आख्यान द्वारा बताया गया है। विष्णुशर्मा की प्रतिज्ञा उन राजकुमारों को नीतिशास्त्र में निष्णात बनाना ही था[5]। हितोपदेश में भी इन कथाओं का स्पष्ट उद्देश्य यही बताया गया है। इसके प्रस्तावनात्मक श्लोकों में कहा गया है[6]

कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते॥

(इस पुस्तक में कहानी के बहाने बच्चों को नीति शिक्षा दी जा रही है।)

यही कारण है कि पञ्चतन्त्र के आरम्भ में देवताओं को प्रणाम करने के बाद ग्रन्थकार ने प्राचीन काल के प्रमुख नीतिशास्त्र प्रणेताओं (नयशास्त्रकर्ता ) को नमस्कार समर्पित किये हैं–

मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।

चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः॥ (कथामुख २)

पञ्चतन्त्र में व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार की नैतिक शिक्षाएँ कथाओं में सुन्दर रीति से गूँथ दी गयी हैं। इनका उद्देश्य यह है कि इसका अध्ययन करने वाले बालकों के हृदय में ये नैतिक शिक्षायें इस प्रकार घर कर जायें कि वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में अव्यावहारिक आचरण न करें तथा कहीं भी असफलता प्राप्त न करें । पञ्चतन्त्र की फलश्रुति में भी इसका उद्देश्य यही बताया गया है–

अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च।

न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन॥ (पञ्चतन्त्र कथामुख १०)

(जो इस नीतिशास्त्र का नित्य अध्ययन करता है तथा इसे सुनता है वह इन्द्र से भी कभी पराजित नहीं हो सकता। )

इस पत्र का केन्द्रीय विषय मौलाना जलालुद्दीन रूमी (आगे रूमी अथवा मौलाना के नाम से अभिहित) द्वारा अपनी विश्वप्रसिद्ध  आध्यात्मिक कविता– मसनवी ए मानवी (आगे मसनवी की संज्ञा से कथित) में  इन कथाओं का किया गया उपयोग है। मसनवी में हमें पञ्चतन्त्र की कथाओं के स्वरूप एवं सन्देश दोनों में आश्चर्यजनक  परिवर्तन मिलता है। प्रस्तुत पत्र में यह देखने का प्रयत्न किया गया है कि किस प्रकार रूमी ने पञ्चतन्त्र की नैतिक कथाओं को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करके उनका उपयोग अपने कथ्य को पुष्ट करने में किया है।

[1] The Pañcatantra stories among Jains : versions, peculiarities and usages – Nalini BALBIR (Abstract of the paper)

[2] आधुनिक फ़ारसी में इसका उच्चारण – कलीले व दिम्ने , अरबी तथा उर्दू में कलीला व दिम्ना किया जाता है।

[3]….the Hebrew version 1100 A.D., the Latin about 1270 A.D., the German 1480 A.D., the Italian 1552A.D., the French 1678 A.D. The Greek in 1080 A.D. the Persian in 12th century A.D. (Vardachari 1960 : 124)

[4] विशेष चर्चा “पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा के मुख्य पड़ाव” नामक प्रकाश्यमान शोधपत्र में।

[5] “…पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।” पञ्चतन्त्र कथामुख पृ॰ ४

[6] हितोपदेश प्रस्तावना श्लोक सं॰ ८

इस शोधपत्र का शेष भाग अधोलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है–

13balram

अथवा इस लिंक से–

https://www.academia.edu/34301747/_Rumis_Philosophical_Rendering_of_Ethical_Stories_of_Panchatantra_रूमी_की_कीमियागरी_पंचतन_त_र_की_नैतिक_कहानियों_का_आध_यात_मिक_संस_करण_

प्रतिमान के इस अंक की सूची इस प्रकार है–

00_intro

 


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—–अलंकारों का वर्गीकरण—-

Balramshukla's Blog - Tue, 07/04/2017 - 22:46

 

नवीन अलंकारों की निरन्तर ऊहा के साथ-साथ भारतीय काव्यशास्त्रियों ने उन पर सूक्ष्म तथा लम्बी बहसें भी की हैं। साथ ही उनकी स्पष्टता के लिये अनेक तरह से विभाजनों के भी प्रयत्न किये जाते रहे हैं। वर्गीकरण के द्वारा हम किसी विषय को सूक्ष्मता से समझ पाते हैं। इस कारण से भारतीय काव्य शास्त्र में किये गये अलंकारों के वर्गीकरणों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। इस पाठ में अलंकारों के विभिन्न प्रकार के वर्गीकरणों पर विचार किया गया है–

https://www.youtube.com/watch?v=OOBVyI__G9M

इस पाठ की लिखित सामग्री निम्नोक्त लिंक से प्राप्त की जा सकती है-
http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18
P-08#M-20


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——-अलंकारों का स्वरूप विकास——

Balramshukla's Blog - Mon, 07/03/2017 - 19:31

भारत में अलंकारों की चर्चा २००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। epg पाठशाला के इस पाठ में भारतीय साहित्य शास्त्र के विकास के विभिन्न सोपानों में अलंकारों की संख्या तथा महत्त्व के प्रति बदलते दृष्टिकोणों पर संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत की गयी है।अलंकार सिद्धान्त काव्यशास्त्र के प्राचीनतम सिद्धान्तों में से एक है। अलंकार शब्द विद्वानों के अनुसार दो अर्थों में प्रयुक्त होता रहा है। काव्य में जो कुछ भी अच्छा लग रहा है उन सबके कारक तत्त्वों को अलंकार कहते हैं, यह अलंकार का पहला अर्थ है। इस अर्थ में ध्वनि, रस, रीति आदि सभी उपकरणों को अलंकार कहा जा सकता है। इसी कारण से साहित्यशास्त्र को अलंकारशास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। परन्तु दूसरा अर्थ सीमित है। शब्द तथा अर्थ के सौन्दर्योत्पादक अनित्य काव्यगत धर्मों को अलंकार कहा जाता है। अलंकारों के स्वरूप तथा महत्त्व को भारतीय काव्यशास्त्र की सहस्राब्दियों में अनेकशः विभिन्न प्रकार से समझा जाता रहा है। कुछ काव्यशास्त्रियों ने इसे काव्य का ऐसे ही अनिवार्य धर्म माना जैसे कि आग का धर्म गर्मी होता है, जबकि कुछ ने इसे अनित्य मान कर इसके अभाव में भी काव्य की क्षति की सम्भावना नहीं की। अलंकारों के महत्त्व, वर्गीकरण तथा संख्या, तीनों में ही वृद्धि तथा ह्रास की एक लम्बी परम्परा रही है। प्रस्तुत पाठ में सहस्राब्दियों में विकसित अलंकारों के स्वरूप का विहंगावलोकन प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे निम्नलिखित लिंक पर सुना जा सकता है –
https://www.youtube.com/watch?v=LXTeI4GeUWw

पाठ का लिखित रूप निम्नलिखित लिंक पर जाकर P-08 # M-19 के अन्तर्गत प्राप्त किया जा सकता है-

http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18


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