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सहृदय शास्त्र

Balramshukla's Blog - Mon, 01/16/2017 - 20:57
पण्डित विद्यानिवास मिश्र आधुनिक युग में भारतीय संस्कृति एवं साहित्य की अखण्डता के अनुपम दिग्दर्शक हैं। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका का नवीन अंक उनके कर्तृत्व के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित है। श्री दयानिधि मिश्र जी द्वारा सम्पादित इस अंक में अनेक महत्त्वपूर्ण लेख हैं।

पण्डित जी के ‘सहृदय’ तथा ‘रागबोध और रस’ कृतियों को आधार बनाकर मेरे द्वारा प्रस्तुत एक लेख ‘सहृदय शास्त्र’ भी इसमें सम्मिलित है–

पण्डित विद्यानिवास मिश्र के कर्तृत्व के सभी आयामों में समन्वय की निरन्तर तथा सघन अनुभूति होती है। उनमें परम्परा के साथ आधुनिकता, शास्त्र के साथ लोक, कला के साथ वैज्ञानिक दृष्टि की जो दुर्लभ उपस्थिति दिखायी पड़ती है, उसमें यौगपद्य ही नहीं सुसमन्वय भी है। उनके लेखन में प्राप्त इस प्रकार के समन्वय का कारण यह है कि वे परम्परा का अखण्डतया दर्शन कर पाते हैं। परम्परा में कहाँ कहाँ कितने मोड़ और विचलन हैं तथा उन विचलनों के बावजूद उसमें एक अन्तर्निहित अक्षुण्ण सातत्य है, इन सब सूक्ष्मताओं को वे निर्भ्रान्त रूप से जान पाते हैं। परम्परा की सन्धियों की सूक्ष्मता से पहचान कर पाने के कारण ही वे उसके विभिन्न सोपानों में अखण्डता का प्रत्यक्ष कर पाते हैं। आपाततः खण्ड खण्ड दीखने वाले भावों में अनुस्यूत एक तत्त्व का दर्शन कर पाना भगवद्गीता (१८.२०) के अनुसार सात्त्विक बुद्धि का लक्षण है। इस सात्त्विक बुद्धि को मिश्र जी ने सहृदयता के रूप में समझा है तथा उसे एक सामाजिक तैयारी कहा है (मिश्र १९९४:२९)। यह तैयारी वस्तुतः परम्परा को अविकल रूप में समझना है। विभिन्न कालों में प्राप्त परम्परा के विविध रूपों पर श्रद्धा रखते हुए उसके इदमित्थं अवगाहन करने से ही यह सिद्धि प्राप्त हो पाती है। संकुचित दृष्टि तथा पूर्वगृहीत मान्यताओं के चलते परम्परा की किसी भी एक कड़ी के प्रति अनादर अथवा अश्रद्धा वश उसका त्याग वस्तुतः सम्पूर्ण परम्परा से ही हाथ धोना है, क्योंकि सभी सम्भावित कड़ियों की समञ्जस उपस्थिति का नाम ही परम्परा है। एकत्वदृष्टि के विकसित होने के कारण सात्त्विक बुद्धि वाले व्यक्ति में भय अथवा विद्वेष नहीं रह जाता। वह जानता है कि एक ही तत्त्व है जो काल भेद से भिन्न भिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है। रूमी के शब्दों में कहें तो ‘वह यार एक ही है पर दूसरों के अलग अलग लिबासों में ज़ाहिर होता है[1]’। इस वास्तविकता को समझकर सात्त्विक बुद्धि किसी का निराकरण नहीं करती। छान्दोग्योपनिषद् के शान्तिमन्त्र में ऋषि ने इसी अनिराकरण के लिए प्रार्थना की हैमाऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद् अनिराकरणमस्तु अनिराकरणम् मेऽस्तु। यह प्रार्थना बहुत मूल्यवती है– मैं अस्तित्व का निराकरण न करूँ, अस्तित्व मेरा निराकरण न करे। दोनों पक्षों की ओर से अनिराकरण हो–मेरा भी निराकरण न हो। जो अस्तित्व का निराकरण कर देता है, उसका निराकरण स्वयं हो जाता है। परम्परा अथवा समष्टि वस्तुतः व्यष्टि का ही परिवर्धित रूप है अथवा यह कहे कि व्यष्टि उसके अङ्ग की तरह है, इसलिए निराकरण की क्रिया आत्मघात जैसा दुस्साहस है जो अल्पदृष्टि से प्रसूत होता है।

आज का युग अथवा यह कहें कि पण्डित विद्यानिवास मिश्र का युग दुर्योग से अनेक तरह की खण्डित दृष्टियों का युग रहा है। उपनिवेशवाद तथा अन्यान्य कारणों से हमारे समाज के हर वर्ग में अनेक वैचारिक दल उत्पन्न हो गये थे जो परम्परा के किसी न किसी अंश का निराकरण ही करते थे। पारम्परिक विद्वानों के दो दलों में से एक तो आधुनिक कालखण्ड की चिन्तन पद्धति को निराकृत करता था जबकि दूसरा सुधारवादी दल सभी प्रकार के प्रदूषणों का कारण किसी मध्यकाल विशेष को मानता था। नवीन वैदेशिक शिक्षा के उन्माद में कोई वर्ग पूरी भारतीय परम्परा को निरर्थक मानकर केवल वर्तमान को ही अपने त्राण का साधन मानता था, जबकि किसी के लिए भारत में सभ्यता की शुरुआत ही मध्यकाल से नज़र आती थी। ऐसा नहीं है कि ये वर्ग अब सक्रिय नहीं हैं। ये चिन्तनवर्ग अब भी हैं और अनेक बार तो लगता है कि वे और बद्धमूल हो रहे हैं।

पूर्वोक्त सबका समन्वय करने वाली, सब को मान देने वाली फिर भी इन सबसे अलग–विलक्षण एक और दृष्टि रही है। वह है भारत की सभी परम्पराओं को समग्रता में स्वीकार करने वाली दृष्टि। यही दृष्टि भारत की अपनी दृष्टि है। पण्डित विद्यानिवास मिश्र इसी अनिराकरणवादी विचारधारा के उज्ज्वल प्रवक्ता हैं। सम्पूर्ण परम्परा के गहन अध्ययन तथा मनन के फलस्वरूप उपजी अव्यवच्छिन्न स्मृति के कारण उनका सम्पूर्ण लेखन भारतीयता का प्रतिनिधि स्वर बन गया है। याज्ञिकी उपनिषद् के मन्त्र[2] में आये हुए अनिराकरण शब्द की व्याख्या करते हुए पुरुषोत्तमानन्द तीर्थ ने इस शब्द का अर्थ अविस्मृति बताया है। वस्तुतः निराकरण करने का मतलब भूलना ही तो है। इसी कारण से मिश्र जी ने सरस्वती को सहृदय व्यापार की देवता  मानते हुए उसे जातीय स्मृति से अभिन्न माना है (मिश्र१९९४:२९)। परम्परा की निरन्तर स्मृति से हमारा भावबोध सघन होता है तथा हमें सहृदयता की उपलब्धि होती है। यह स्मृति नित्य अभ्यास से सिद्ध होती है। अभ्यास के अभाव में रससामग्री के सामने रहने पर भी, सहृदयता का लाभ नहीं होने के कारण, रसानुभूति नहीं होती। सुन्दरकाण्ड में सीता की खोज के प्रसंग में वाल्मीकि ने इस उपमा का बहुत सुन्दर उपयोग किया है–

तस्य संदिदिहे बुद्धिर्मुहुः सीतां निरीक्ष्य तु।

आम्नायानामयोगेन विद्यां प्रशिथिलामिव॥ ५.१३.३७

(हनुमान् की बुद्धि सीता को सामने देखकर भी सन्देह ग्रस्त हो गयी। जैसे उचित अभ्यास के अभाव में अधीत विद्या भी बुद्धि पर नहीं चढ़ती।  )

इसी पारम्परिक जातीय स्मृति को साहित्यिकों ने वासना, संस्कार तथा वैयाकरणों ने आगम प्रमाण भी कहा है। आगम के अभाव में प्रमाता अपने ही तर्क का अनुसरण करता हुआ कोरा बुद्धिवादी बनकर रह जाता हैं–कियद्वा शक्यमुन्नेतुं स्वतर्कमनुधावता[3] हृदय तत्त्व के निर्माण में सम्पुञ्जित अनुभवों की महती भूमिका है। हृदय तत्त्व का परिचय पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने निम्नवत् कराया है–

वह मन नहीं है, वह बुद्धि भी नहीं है, वह मन और बुद्धि को समाविष्ट करने

वाला चैतस तत्त्व है,  अर्थात् उसमें राग द्वेष परिष्कृत रूप में अर्थात् सर्वमयीकृत

रूप में रहते हैं।  उसमें बुद्धि के विविध स्तर भी और संस्कार भी रहते हैं, पर वहाँ

तर्क के स्थान पर अन्तर्ज्ञान रहता है[4]। दूसरे शब्दों में प्रतिभा रहती है, जो सकल

अनुभवों की राशि को सम्पुञ्जित करके विशाल सर्वग्राह्य अनुभव का आकार ग्रहण

करती है (मिश्र १९९४:भूमिका)।

प्रतिभा के उपर्युक्त वर्णन में मिश्र जी के सामने भर्तृहरि के वाक्यकाण्ड में प्रतिपादित प्रतिभा का स्वरूप अवश्य प्रकट रहा होगा, जिसमें भर्तृहरि कहते हैं–

उपश्लेषमिवार्थानां सा करोत्यविचारिता।

सार्वरूप्यमिवापन्ना विषयत्वेन वर्तते ॥ २.१४५ ॥

अस्तु, रसानुभूति सहृदयों को ही हो पाती है[5] और सहृदयता की प्रमुख शर्त है–परम्परा की अविच्छिन्न स्मृति। यदि हम वाल्मीकि की रचनाओं में वेदों की ऋचाओं की अनुगूँज न सुन सकें अथवा कालिदास की कविता में पूर्वोक्त दोनों के दर्शन न कर पायें, या कामायनी में उसके पहले की सभी अनुस्यूत परम्पराओं को पहचान न पायें तो हमारा बोध रस्यता को प्राप्त नहीं हो सकेगा, और बक़ौल मिर्ज़ा ग़ालिब यह खण्ड–दर्शन, बच्चों के तमाशे में पर्यवसित हो रहेगा–

दज्ले में क़तरा दिखायी न दे और जुज़्व में कुल

                                    खेल लड़कों का हुआ दीदः–ए–बीना न हुआ॥

यह अखण्ड दर्शन, यह समन्वयात्मक अनिराकरणवादिता मिश्र जी के सभी लेखनों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती है। सहृदय, रागबोध  तथा रस आदि विषयों पर उनके लेखन की विवेचना करते हुए हम उनकी इसी दृष्टि को सर्वत्र व्याप्त देखते हैं।

सहृदय भारतीय रसशास्त्र का एक बहुत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है परन्तु परम्परा ने उसकी पर्याप्त चर्चा प्रस्तुत नहीं की है। पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने काव्यशास्त्र तथा अन्य स्रोतों से सहृदय तत्त्व से सम्बन्ध रखने वाले बिखरे सूत्रों को एकत्र करके जो दो व्याख्यान दिये हैं उनसे निश्चित रूप से भारतीय रस शास्त्र का महान् उपकार हुआ है। इस पुस्तक का महत्त्व स्वयं उनके शब्दों में इस प्रकार है–

इस छोटी सी पुस्तिका में सहृदय की अवधारणा की न केवल पीठिका

दी गयी है, न केवल वैचारिक और व्यावहारिक पीठिका दी गयी है अपितु

सहृदयता का स्वतन्त्र शास्त्र बिना शास्त्र के दावे के आकारित करने का

प्रयत्न भी हुआ है। (मिश्र १९९४:भूमिका)

सहृदय से सम्बन्धित विचारों को शास्त्रीयता की भूमि पर आधारित करते हुए भी उन्होंने अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा से उसमें कई जगह अनेक नयी छटायें जोड़ी हैं। उनके अनुसार यह चर्चा शास्त्र से एकदम हटकर नहीं है और शास्त्र से एकदम बँधकर भी नहीं है (वही १५)। इस प्रकार इन व्याख्यानों की प्रतिपादन शैली में भी एक तरह से समन्वय का निर्वाह किया गया है। प्रत्येक युग में शास्त्रों के प्रणयन की शैली यही रही है। शास्त्रकार अपनी पूर्ववर्ती परम्परा को आत्मसात् करके तथा उसे अपनी भावभूमि बनाकर ही कुछ नवीन प्रतिपादन के योग्य हो पाता है– तिष्ठत्येकेन पादेन गच्छत्येकेन बुद्धिमान्[6]। स्थिर तथा देर तक रहने वाला शास्त्रीय विकास इसी प्रकार से सम्भव है।

अपने पहले व्याख्यान में आचार्य मिश्र ने सहृदय तत्त्व की पीठिका के रूप में साहित्य शब्द की ६ व्युत्पत्तियाँ तथा उनके अनुसार साहित्य के विभिन्न अर्थ दिये हैं। साहत्यिक सम्प्रेषण एक अपूर्व कोटि का सम्प्रेषण होता है, जिसका तात्पर्य केवल कहना और समझना मात्र नहीं बल्कि हृदय से हृदय का योग, भावना–तादात्म्य अथवा स्वरूप विमर्श है। साहित्य का अर्थ शब्द तथा अर्थ आदि के सहभाव के साथ साथ कवि तथा सहृदय का समान भूमि पर स्थित रहना भी है। कविता के स्तर पर ये दोनों अपने हृदय की क्षुद्र ग्रन्थियों को बिसरा कर समान अर्थात् सदृश और संवादी हो जाते हैं। कवि तथा सहृदय के इस प्रकार के अपूर्व सम्बन्ध को समझाने तथा उसके समर्थन के लिए आचार्य जी ने ऋग्वेद के वाक् (१०.१२५) तथा ज्ञान (१०.७१) इन दो सूक्तों का भरपूर उपयोग किया है।

सबसे पहले उन्होंने बृहस्पतिसूक्त से सक्तुमिव तितउना पुनन्तः (ऋग्वेद १०.७१.२) मन्त्र को लिया है तथा इसकी प्रकृत प्रसंग के अनुकूल नवीन व्याख्या प्रस्तुत की है। परम्परा में इस मन्त्र के विविध व्याख्यान का लम्बा इतिहास है। यह मन्त्र समन्वय तथा सख्यभाव के प्रतिपादन की दृष्टि से इतना महत्त्वपूर्ण है कि निरुक्तकार यास्क से लेकर महाभाष्यकार पतञ्जलि तक ने इस मन्त्र की अपने अपने प्रसङ्गों के अनुकूल व्याख्या की है।  यास्क इस मन्त्र में स्थित अत्र पद का अर्थ वाणी का विषय मानते हुए एषाम् का अर्थ विद्वान् लेते हैं[7]। पतञ्जलि ने व्याकरण शास्त्र के १३ गौण प्रयोजनों की चर्चा करते हुए इसी मन्त्र को वैयाकरणों के पक्ष में व्याख्यात किया है। उनके अनुसार अत्र का तात्पर्य है व्याकरण शास्त्र तथा एषाम् का अर्थ है वैयाकरण जन[8]। वेद की इस प्रकार की सर्वमुखी व्याख्या परम्परा से लाभ लेते हुए तथा उसमें महत्त्वपूर्ण योगदान देते हुए पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने इसी मन्त्र की व्याख्या कवि तथा सहृदय के पक्ष में प्रस्तुत की है। सहृदय तत्त्व की व्याख्या के लिए वेदों से उपोद्बलन प्रस्तुत करके उन्होंने अपने सिद्धान्त के लिए अत्यन्त दृढ भूमि का आधार लिया है। यहाँ उनका शास्त्रकारत्व पक्ष अत्यन्त स्फुट होकर सामने आता है। इस मन्त्र के रस प्रक्रिया से सम्बन्धित अर्थ की भूमिका उन्होंने निम्नवत् प्रस्तुत की है–

इस मन्त्र में एक साथ भाषा और साहित्य के चरम प्रयोजन के रूप में

सख्य की पहचान की प्रतिष्ठापना की गयी है। सखा–सखी का अर्थ है

कहीं न कहीं मानसिक स्तर पर जुड़ने वाला। सख्य और कुछ नहीं,

आभ्यन्तर संवाद है। मनुष्य को वाणी मिली ही है इसलिए कि वह

आभ्यन्तर संवाद स्थापित कर सके। (मिश्र१९९४:२१)

उन्होंने सूक्तगत सखायः शब्द का अर्थ साफ़ साफ़ शब्दों में सहृदय लिया है (मिश्र१९९४:२१)। इसी बृहस्पति सूक्त के एक अन्य मन्त्र की प्रकृतोपयोगी व्याख्या करने के अनन्तर वे सम्पूर्ण वाक् सूक्त को सार्थ उद्धृत करते हैं। उन्होंने साहित्यशास्त्रियों द्वारा कृति–कृती–कृतिज्ञ इस त्रिपुटी के प्रतिपादन में इसी सूक्त को मूल माना है। वह वाक् अर्थात् सरस्वती का तत्त्व ही है जो एक साथ कवि भी है और सहृदय भी, स्रष्टा भी है और भावक भी (वही २४)। उपर्युक्त सूक्तों का विश्लेषण करके उन्होंने सहृदय की तीन विशेषताएँ बताई हैं (मिश्र१९९४:२७)–

  • पर्युत्सुक अर्थात् सबके साथ साझेदारी की उमंग से भरा हुआ। यह अर्थ उन्होंने सखा (ऋग्वेद १०.७१.२) शब्द से लिया है। सखा शब्द के मूल में सच् धातु है जिसका अर्थ होता है समवेत होना[9]
  • अपूर्वानुभव सम्पन्न अर्थात् परिचित शब्दों तथा अर्थों के होने के बावजूद उनसे व्यञ्जित होने वाले काव्यात्मक भावों को समझ लेने की क्षमता वाला। यह अर्थ उन्होंने वाक्सूक्त के दूसरे मन्त्र के आधार पर काव्य प्रक्रिया को मीमांसाशास्त्र सम्मत यज्ञीय अपूर्व के साथ मिलाकर प्राप्त किया। इसके बारे में आगे चर्चा की जायेगी।
  • अभ्यस्त अर्थात् काव्यार्थ की प्रक्रिया के सम्बन्ध में विशेष प्रशिक्षण से सम्पन्न। यह अर्थ उन्होंने बृहस्पति सूक्त के उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे (ऋग्वेद १०.७१.४) आदि मन्त्र के आधार पर ग्रहण किया है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने अथर्ववेद ६.६४ को उद्धृत करते हुए सामञ्जस्य को भी सहृदयता के लिए आवश्यक तत्त्व माना है। सहृदय के लिए आवश्यक है कि उसका हृदय कृति तथा कवि के साथ सामञ्जस्य पूर्ण तथा समान हो। समानता का अर्थ  सबका मिलकर सहभागी होना तथा तत्सुखसुखित्व है। इसका आधार है मन का मन से मिलना तथा हृदय का स्वेच्छा से विवश हो जाना (मिश्र१९९४:२८)।

द्वितीय व्याख्यान में आचार्य मिश्र ने हृदय संवाद और रसनिष्पत्ति में सहृदय के योगदान को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार सहृदय में काल, देश की सीमाओं को अतिक्रान्त करने की योग्यता होनी चाहिए। यह योग्यता पर्युत्सुकीभाव है। पर्युत्सुकीभाव एक ऐसी उत्सुकता है जो अन्य सभी भावों को परिप्लुत कर देती है। सहृदय काव्य के सतही अर्थ तक सिमट कर परितुष्ट नहीं होता। यह अपरितोष की निरन्तरता ही उसके सामने घण्टानुरणन की तरह आते हुए व्यंग्यार्थ की परत परत खोल कर रख देती है। अगर वह सतही अर्थों पर ही सीमित हो जाये तो उसे अन्यान्य अर्थ प्राप्त न हों।

कवि तथा सहृदय में परस्पर सामञ्जस्य की अपेक्षा होती है। कृति के माध्यम से कवि के हृदय तक पहुँचने की शर्त केवल सहृदय के लिए ही नहीं होती। जिस प्रकार एक सम्प्रेषणात्मक कृत्य की सफलता श्रोता की अनुकूलता की अपेक्षा करती है उसी प्रकार रचयिता की रचना की पूर्णता के लिए शर्त है कि वह सहृदय के हृदय के साथ संवाद करे। आचार्य मिश्र ने इस संवाद को बहुत बहुत विशद रीति से समझाया है। उनके अनुसार इसका तात्पर्य एकरूपता नहीं बल्कि इस तरह निकट दीखना है कि बार बार देखने और एकत्व के अनुसन्धान की आकांक्षा बनी रहे  (मिश्र१९९४:३८)। सहृदय वह प्रमाता है जिसके हृदय में कवि धड़कता है। कवि की रिक्तता जिसमें पूरी होती है। वह कवि का सातत्य होता है। दोनों के बीच संवाद का स्वरूप यह होता है कि–उसकी किसी रिक्तता की पूर्ति मुझमें हो रही है , मेरी अस्मिता की पूर्ति उससे हो रही है जो मेरे लिए धड़क रहा है (मिश्र२००३:३९)। इस तरह का संवाद कैसे संभव हो पाता है जो देश और काल सभी के खाइयों को पाट दे? मिश्र जी के अनुसार सहृदय और कवि के बीच रचना सेतु अथवा अन्तराल है। यह अन्तराल ही दोनों को एक दूसरे को समझने का, देखने का अवसर देता है।

सहृदय हृदय संवाद रचना के पूर्ण होने की शर्त है और यह पूर्णता एकाग्रता से प्राप्त होती है। एकाग्रता को समझाते हुए आचार्यश्री ने कहा है कि पूर्वानुभूत समस्त उपयोगी विषयों के साथ कवि की एकात्मता को एकाग्रता कहते हैं। इसी के फलस्वरूप कवि के सामने सभी काव्यक्षम शब्द हाथ बाँधे चले आते हैं तथा एक भाव के अनेकानेक आयाम प्रकट होते हैं, जैसा कि रुद्रट ने कहा है–मनसि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणमनेकधाऽभिधेयस्य[10] यह वस्तुतः वही सघन स्मृति है जिसकी शुरुआत में चर्चा की गयी है। सहज भाव से सुख और दुःख को पहचानने को  हृदय के साथ संवाद माना गया है। इस सहज भाव को प्राप्त करना कठिनतम सिद्धि है इसी कारण हृदय संवाद को दुःसाध्य वस्तु माना गया है (मिश्र१९९४:३६)। इसके लिए दोनों को तीव्र अभ्यास योग की आवश्यकता होती है, कारक (कवि) को भी और भावक (सहृदय) को भी।

सहृदय के सन्दर्भ को समाप्त कर आचार्य मिश्र उसे और स्पष्टता देने के लिए रस की प्रक्रिया पर चर्चा की है। परन्तु इस चर्चा में उन्होंने पुनरावर्तित शब्दों या तर्कों का आश्रय न लेते हुए रस सिद्धान्त के कई ऐसे अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है जिनका संकेत तो परम्परा ने किया था परन्तु विशदीकरण आज तक नहीं हो सका था। इस प्रकरण में जिन प्रसंगों का उपयोग किया गया है वे काव्यशास्त्र से बाहर के भी हैं। इस प्रकरण से भी आचार्य मिश्र का तीर्थकारित्व सिद्ध होता है। रस सिद्धान्त को समझाने के लिए मिश्र जी ने जिस अद्भुत सामग्री का प्रयोग किया है वह है यज्ञीय प्रक्रिया की व्याख्या में मीमांसकों द्वारा उपयुक्त अपूर्व का सिद्धान्त।

मीमांसको की दार्शनिक पद्धति में कर्म का इतना अधिक महत्त्व है कि वे ईश्वर को भी शुभाशुभफल प्रदाता के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार कर्म करने के बाद उससे अपूर्व नामक शक्ति उत्पन्न होती है। यह अपूर्व हमारी आत्मा के साथ संश्लिष्ट हो जाता है तथा शुभ और शुभ अशुभ फलों तक कर्म के सातत्य को सुनिश्चित करता है। यज्ञ पहले सम्पन्न हो जाता है और उसका फल विलम्ब से मिलता है, ‍ऐसी स्थिति में हम उसी कर्मविशेष का यह फलविशेष है यह कैसे कहा जा सकता है, इस समस्या के समाधान करने के लिए मीमांसकों को इसकी आवश्यकता पड़ी। अपूर्व वह तत्त्व है जो कर्म तथा फल दोनों बीच रहकर कर्मचक्र की अटूट सततता को नियत करता है–अपूर्वं क्रियाजन्यकालान्तरभाविफलाव्यवहितपूर्वस्थम्[11]  फल तो कर्म से ही मिलता है लेकिन अपूर्व उन दोनों के बीच द्वार (मीडयम) का कार्य करता है[12]। यह तो हुआ अपूर्व का स्वरूप। लेकिन पण्डित जी ने अपूर्व के जिस आयाम की समानता रस प्रक्रिया के साथ देखी है, वह है– पूर्व दृष्ट तथा पूर्व ज्ञात वस्तुओं से अपूर्व अर्थात् कुछ नवीन, प्रत्यग्र तथा अनदेखे की प्राप्ति।  उन्हीं के शब्दों को उद्धृत करें–

…प्रत्येक यज्ञानुष्ठान से कुछ अपूर्व मिलता है, यज्ञ में मन्त्र वही रहते हैं, वही होता अध्वर्यु उद्गाता

रहते हैं, पूर्वविहित वही क्रम रहता है, तब भी अपूर्व कैसे प्राप्त होता है…….कुछ वैसा यहाँ भी होता

है। वही वस्तु, वे ही अभिनेता, वे ही नाट्य मुद्रायें, वे ही आहार्य, वे ही वाद्य–गीत के प्रकार

…. तो भी बार बार नया बार बार अपूर्व अपूर्व कुछ क्यों मिलता है? गहराई से मीमांसा करें

तो लगेगा पूर्वज्ञात से अपूर्व की सिद्धि में ही तो रस है। (मिश्र१९९४:३९)

बार बार दुहराये जाने पर भी नयेपन की अनुभूति ही उच्चकोटि की रचना की सही कसौटी है। प्रिय वस्तु में पुनरुक्ति नहीं होती[13]। क्योंकि इसमें रस शामिल होता है। रस के अनुभव में परत्व की सीमाएँ टूट जाती हैं। तुच्छ ममत्व भी नहीं रहता। इस रस का अनुभव हम अपने स्वरूप के अनुभव की तरह अभिन्न प्रकार से करते हैं[14]। और उपनिषदों ने यह बहुत साफ़ साफ़ समझा दिया है कि व्यक्ति अपने से ही प्रेम करता है[15]। डर और द्वेष की सम्भावना तो किसी दूसरे के उपस्थित रहने पर ही हो सकती है[16]। यह अपूर्वता ही रस प्रक्रिया का सबसे बड़ा अभिलक्षण है। रस प्रक्रिया में साधारणीकरण व्यापार के द्वारा क्षुद्रता समाप्त होकर अखण्डता का अनुभव किया जाता है। अखण्डता में पुनरुक्ति का अनुभव भला कैसे हो सकता है? उस स्थिति में तो अन्य कोई भी विशेष अनुभव प्रमाता के पास नहीं आता। आचार्य मिश्र के मन्तव्य के अनुसार अपूर्व तथा रस के बीच उपर्युक्त उपमानोपमेय को हम निम्नवत् दिखा सकते हैं–

यज्ञसम्भार →           अपूर्व →         स्वर्ग

काव्यसामग्री →          रस →           काव्यास्वाद

आचार्य मिश्र ने दोनों प्रक्रियाओं में केवल सादृश्य मात्र नहीं दिखाया है बल्कि उन्होंने संकेत दिया है कि रस की की इस प्रक्रिया की व्याख्या पद्धति का मूल यह याज्ञिक अपूर्व ही है। उनके इस प्रतिपादन को भारतीय काव्यशास्त्र के विकास में एक नई कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। विचार करने पर इस प्रतिपादन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार प्रकट होती हैं–

  • कविता की व्याख्या में अपूर्व शब्द निश्चित रूप से उन्होंने अभिनव गुप्त से लिया है। अभिनव गुप्त का अपूर्वं यद् वस्तु प्रथयति विना कारणकलां [17]आदि श्लोक उनको बहुत प्रिय है, जिसमें अपूर्व शब्द आया हुआ है। लेकिन इस श्लोक अपूर्व का मतलब अलौकिक अथवा अद्भुत ही है। इस अपूर्व को मीमांसकों के पारिभाषिक अपूर्व शब्द से मिलाकर देखना आचार्य मिश्र का मौलिक अवदान है। एक बार जब अपूर्व को पारिभाषिक मान लिया गया तो उन्हें इस पारिभाषिक शब्द से सम्बन्धित तमाम अवधारणाओं का अपनी व्याख्या में उपयोग करने का लाभ मिल गया और उन्होंने किया भी।
  • अपूर्व शब्द को मीमांसीय अपूर्व के साथ जोड़ने में उनकी सहायता उस भारतीय दृष्टि ने की है जो सम्पूर्ण अस्तित्व को यज्ञ के रूप में देखती है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त से लेकर बृहदारण्यक आदि उपनिषदों में भोजन से लेकर मैथुन तक फैले कार्यमात्र को यज्ञीय शब्दावली में देखने का प्रयत्न किया गया है। भारतीय विचारकों को यज्ञ भावना इतनी प्रिय क्यों है? इसका उत्तर सम्भवतः हमें पाणिनि में मिल सके। पाणिनि ने पहचाना है कि यज्ञ के मूल में जो यज् धातु है उसके तीन अर्थ हैं–क) देवपूजा, ख) संगतिकरण तथा ग) दान[18]। सभी श्रेष्ठ कार्यों में संगतिकरण अर्थात् मिल जुल कर कार्य की निर्वृत्ति तथा दान अर्थात् स्व का उत्सर्ग, ये भावनायें अवश्य रहती हैं। इसीलिए कहा गया है – यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म[19]। श्रीकृष्ण ने यज्ञ के दायरे को पर्याप्त विस्तृत किया तथा उसके भौतिक स्वरूप की अपेक्षा आध्यात्मिक स्वरूप को श्रेष्ठ मानकर सभी कर्मों को यज्ञ की भावना से करने का उपदेश किया तथा ऐसा नहीं करने पर बन्धन के भय से आगाह किया–यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः[20]।  उनके अनुसार सृष्टिकर्ता ने सृष्टि के समय ही प्रजाओं को यज्ञ के साथ उत्पन्न किया ताकि उनका अस्तित्व सुचारु रूप से बना रहे[21]। ऐसे में रस तत्त्व को यज्ञीय प्रक्रिया के साथ जोड़कर उन्होंने परम्परा का निर्वाह तो किया ही साथ ही साथ रस तत्त्व के साथ श्रेष्ठता तथा समादर के भाव को और भी द्विर्बद्ध किया।
  • नाटक को यज्ञ के रूप में देखने की अवधारणा हमें कालिदास के विक्रमोर्वशीयम् में मिलती है। कालिदास ने इस धारणा को प्राचीन मुनियों से उद्धृत किया है– देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं क्रतुं चाक्षुषं[22], जिससे पता चलता है कि यह सादृश्य दर्शन अत्यन्त प्राचीन है। आचार्य मिश्र का इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने इस यज्ञीय रूपक को केवल नाट्य तक सीमित नहीं रहने दिया बल्कि उसकी व्याप्ति काव्यमात्र तक मानी। यह परिघटना ऐसी ही है जैसे बहुत पहले नाट्य के प्रसंग में सीमित रस तत्त्व को आलंकारिकों ने काव्य मात्र में प्रयोज्य माना था। परम्परा के छूटे अंशों का इस प्रकार का विस्तार आचार्य मिश्र जैसा परम्परा में अवगाढ व्यक्तित्व ही कर सकता था।

रस स्वरूप का विमर्श करते हुए आचार्य मिश्र ने इसे अपनी क्षुद्र सीमाओं का विस्तार कहा है। इसीलिए उन्होंने रस को सकल होने–अखण्ड होने का की प्रवणता कहा है। “रस विशेषीकृत राग–द्वेषादि विकारों का एक ऐसा संस्कार है जो दुःखप्रद या सुखप्रद नहीं होता, वह दुःख–सुख को सर्वमय बनाकर एक ऐसे संवेदन में रूपान्तरित कर देता है, जिसमें अपनी अस्मिता खो नहीं जाती विस्मृत हो जाती है, जातीय वासना बन जाती है। यह बनना ही रस है” (मिश्र१९९४:४२)।

सहृदय तथा रस के सम्बन्ध में आचार्य मिश्र के मौलिक विचारों पर विचार के बाद उनकी प्रतिपादन शैली के कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा रुचिकर होगी।

आचार्य मिश्र की स्थापनाएँ महत्त्वपूर्ण होते हुए भी किसी बड़ी मौलिकता के दावे से रहित तथा मृदु एवं गम्भीर हैं। इससे उनके व्यक्तित्व की गम्भीरता तथा विनम्रता द्योतित होती है। परम्परा की अपूर्ण समझ के कारण चिन्तन में आयी एकाङ्गिता और विद्रूपता को उन्होंने स्थान स्थान पर पहचाना है तथा उसका स्पष्ट शब्दों में कारण निर्देश पूर्वक खण्डन किया है। इस खण्डन में उन्होंने सर्वत्र समन्वय का पक्ष ही लिया है। उन्हें कल्याण का अतिशुद्धतावाद तथा आधुनिक चिन्तकों के द्वारा परम्परा का विकृत प्रस्तुतिकरण दोनों समान रूप से अनिष्ट हैं, क्योंकि ये दोनों पक्ष एकाङ्गी हैं और एकाङ्गी पक्ष से परम्परा का सौन्दर्य नष्ट होता है। स्थान–स्थान पर उन्होंने परम्परा का विरूपण करने वालों की ख़बर ली है। एक दो उदाहरण इस प्रसंग में पर्याप्त होंगे।

पाश्चात्त्य आलोचकों को भारतीय कलाकृतियों की समग्रता भीड़ लगने लगती हैं। आचार्य जी ने इसका कारण उनके असमग्र दर्शन को बताया है। उनके अनुसार वे लोग पदार्थों के खण्ड खण्ड करके गिनने लगते हैं, उनमें विद्यमान सम्बद्धता के सौन्दर्य को नहीं देख पाते। भारतीय रूप इतना निखार अपने परिवेश की सजग चिन्ता से प्राप्त कर पाता है (मिश्र१९९४:१५ तथा २००३:२९)। इसी तरह उन्होंने उन आलोचकों का खण्डन किया है जिन्होंने अधूरी जीवन दृष्टि और शुचिवादिता के कुसंस्कार के कारण प्राचीन संस्कृत साहित्य को अवज्ञा भाव से ऐन्द्रियक अथवा एरोटिक काव्य कहा है। इस प्रसंग में उन्होंने शृंगार की उदात्तता को इन शब्दों में कहा है– “बन्धुता की चरम अभिव्यक्ति है शृंगार..। शृंगार भावों का ईश्वर है, उसमें एक विशेष प्रकार का सुख है। अपने को अनुकूल लगने वाला सुख छोटा सुख है। बड़ा सुख वह है जिसको हम प्यार करते हैं, उसको जो अच्छा लगता है वह हमको भी अच्छा लगता है।….शृंगार जिन दो बातों पर टिका होता है, वे हैं प्रिय के सुख से सुखी होना और प्रिय के ऊपर अटूट विश्वास होना” (मिश्र१९९४:२४ तथा २००३:४२)। सहृदयता के विषय में उनका कथन है कि यह न तो न कविता के शौक़ से आता है, न ज़िन्दगी में तमाशबीन बनने से आता है और न ही नैतिकता के प्रति सजगता से आता है। यह तो भीतर से भीगने से आता है (मिश्र१९९४:२४)।

असहमति के प्रत्येक स्थल पर अपूर्ण चन्तनों के खण्डन के साथ उन्होंने समन्वित भारतीय दृष्टि को भी प्रतिस्थापित किया है। कला कला के लिए है अथवा कला समाज के लिए, आधुनिक चिन्तन धारा में यह विवाद गर्मागर्म बहस का विषय है। आचार्य मिश्र ने इस चिन्तन को जीवन के प्रति अपूर्ण दृष्टि का परिणाम बताया है–दुर्भाग्यवश आधुनिक समय में पूरी तरह से संपृक्त होने के बावजूद हमारे जैसे लोग परम्परा की धारा से जुड़े होने के कारण किनारे वालों की मानसिकता पर तरस ही खाते हैं (मिश्र२००३:४८) उनके मत में तो मानव शुभ की आकांक्षा में अकुलायी धार में कला और जीवन के अस्तित्व ऐसे ही हैं जैसे जल और तरंग के अस्तित्व होते हैं। कहीं कहीं आधुनिक आलोचकों पर वे तीखा व्यंग्य भी करते हैं– …हृदय सबके भीतर होता है, सहृदय बनने की तैयारी सब जगह नहीं होती। आज कल के ज़माने में तो और नहीं होती(मिश्र१९९४:४४)। अन्यत्र उन्होंने पश्चिमी आलोचकम्मन्यों पर टिप्पणी करते हुए कहा है– इन्हें आलोचक कहना ग़लत होगा, बहुत कम के पास लोचन हैं, उन्हें कहना चाहिए–साहित्य का इतिवृत्त लेखक (मिश्र१९९४:२५)।

“सम्पत्तियों के समान वितरण” जैसे आन्दोलनों से भरे इस युग में उन्होंने चेताया है कि हमारी संस्कृति में समानता का भाव “इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन” तक ही सीमित नहीं है– समानता का अर्थ बराबरी नहीं है, अलग–अलग हिस्से का बटवारा भी नहीं है, उसका अर्थ सब मिलकर सहभागी होना है, दूसरे के द्वारा उपभोग को और उसकी परितृप्ति को अपना उपभोग और अपनी परितृप्ति मानना है। इस समानता का आधार है मन से मन का मिलना(मिश्र१९९४:२८)।

आचार्य जी के लेखन अथवा भाषण के क्षण में सम्पूर्ण परम्परा उनकी गहन स्मृति में एकक्षणावच्छेदेन सन्निहित रहती है। विषयों के सम्बन्ध में उनके कथन शास्त्र तथा अनुभव दोनों से पुष्ट होते हैं। अनेक बार शास्त्रकारों की भाँति उनके वाक्य सूत्रात्मक हो जाते हैं, जिनकी व्याख्या कुछ सीमा तक वे स्वयं करते हैं। उनके सूत्रात्मक वाक्य स्वल्पाक्षर में विषय को पूर्णतः परिभाषित कर देते हैं। सूत्रात्मक सूक्तियों के कुछ उदाहरण निम्नवत् हैं– •सहज होना ही सबसे कठिन है, •रस कुछ और नहीं, सकल होने की, अखण्ड होने की प्रवणता है, •सहृदय होता है कवि का नैरन्तर्य , • यह विस्थापन यज्ञ की भाषा में आनुष्ठानिक मृत्यु है, • त्रिभङ्ग ही सौन्दर्य है, आदि आदि।

नवीन दृष्टियाँ विकसित करने के अतिरिक्त शास्त्रकारों का एक कार्य और होता है। और वह है परम्परा के बीज सम्प्रत्ययों पर समय के प्रवाह के कारण पड़ी धूल को झाड़ पोछ कर उनके वास्तविक स्वरूप को प्रकट करना। निरुक्तशास्त्र, व्याकरण आगम तथा आधुनिक भाषा विज्ञान के एक साथ पण्डित होने के कारण तथा परम्परा की गहरी अन्तर्दृष्टि रखने के कारण पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने संस्कृति की कई बीज शब्दों के धुँधले पड़ गये तत्त्वों को प्रकट किया है। उदाहरण के लिए, कला शब्द के कोशगत अर्थ– खण्ड को लेकर सौन्दर्यशास्त्रीय व्याख्यान (वही, पृ॰ १५), अथवा सरस्वती के सम्बन्ध में उनकी दृष्टि (वही पृ॰ २९ तथा २००३:३१)। समान को अस् धातु का वर्तमानकालिक आत्मनेपदी कृदन्तरूप स्वीकार करना उनको व्याकरण शास्त्र का अद्भुत प्रयोक्ता सिद्ध करता है[23]। इसी प्रकार उनका श्रद् तथा हृद् को एक ही शब्द के दो रूप मानते हुए (वही पृ॰ २९) वे निरुक्त शास्त्रियों की शैली का आश्रय लेते हैं। अंग्रेज़ी का लव़ शब्द संस्कृत के प्रेम के समकक्ष नहीं हो सकता, इसके लिए वे भाषावैज्ञानिक दृष्टि का आश्रय लेते हुए लव़ को संस्कृत के √लुभ् धातु से सम्बद्ध मानते हैं (वही पृ॰३१)।

परम्परा का इस प्रकार अखण्ड तथा अगाध अवगाहन करके पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने उसे सम्यक् रूप से समझने में, प्रस्तुत करने में तथा अनेकानेक समुज्ज्वल रत्नों को प्राप्त करने में जो सफलता प्राप्त की है वह निश्चित रूप से असामान्य है। नदी पर बने पुलों पर चढ़ कर गुज़रने वाले नदी की गम्भीरता का ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकते। उसके लिए तो नदी का तलस्पर्शी अवगाहन करना अनिवार्य होता है। संस्कृत के प्राचीन कवि मुरारि मिश्र ने इस सम्बन्ध में बहुत सुन्दर बात कही है– समुद्र तो वानरों ने भी पार किया लेकिन उसकी गम्भीरता का सही अनुमान तो केवल मन्दराचल पर्वत को है जो उसके तल तक जल में पैठ पाया[24]। अथवा एक अर्वाचीन कवि नरेश सक्सेना के शब्दों में इसी भाव को दुहरायें–

पुल पार करने से

पुल पार होता है

नदी पार नहीं होती

नदी पार नहीं होती नदी में धँसे बिना

नदी में धँसे बिना

पुल का अर्थ भी समझ में नहीं आता

नदी में धँसे बिना

पुल पार करने से

पुल पार नहीं होता

सिर्फ़ लोहा लंगड़ पार होता है

कुछ भी नहीं होता पार

नदी में धँसे बिना

न पुल पार होता है

न नदी पार होती

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         संक्षिप्त सन्दर्भ पण्डित विद्यानिवास मिश्र की रचनाएँ

मिश्र, विद्यानिवास.(१९९४). सहृदय. नई दिल्ली : साहित्य अकादमी.

मिश्र, विद्यानिवास.(२००३). रागबोध और रस. नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन.

(सं॰, व्या॰) मिश्र, विद्यानिवास.(२००५). श्रीगीतगोविन्दम् व्याख्यानटीकासमन्वितम्. वाराणसी : संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयः.

मिश्र, विद्यानिवास.(२०००). तुम चन्दन हम पानी. नयी दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस.

(सं॰) मिश्र, गिरीश्वर.(२०१६). विद्यानिवास मिश्र रचना संचयन. नयी दिल्ली : साहित्य अकादमी.

Misra, Vidyaniwas. (2001). The Descriptive Technique of Panini : An Introduction. Varanasi : Ratna Publication

                                  अन्य सामग्री

काव्यप्रकाश–आचार्य मम्मट (सोमेश्वर कृत काव्यादर्शसंकेत सहित.१९५९.) राजस्थान :राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान,

(सं॰)दुर्गा प्रसाद–पणशीकर, वासुदेव लक्ष्मण (१९८३) रुद्रटविरचितः काव्यालंकारः नमिसाधुटीकोपेतः. दिल्ली:मोतीलाल बनारसीदास.

साहित्यदर्पण–विश्वनाथ कविराज (विमला हिन्दीव्याख्या–शालिग्राम शास्त्री), (पुनर्॰–२०००)  दिल्ली मोतीलाल बनारसीदास

(सं॰) दैवकरणि, विरजानन्द. (२०००).यास्कप्रणीतम् निरुक्तम्.नवदिल्ली : आर्षसाहित्यसंस्थानम्, गौतमनगरम्.

(सं॰) पणशीकर, वासुदेव लक्ष्मण. (पुनः॰ २००३). ईशाद्यष्टोत्तरशतोपनिषदः. नई दिल्ली :  राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानम्.

भिक्षु, गौरीशंकर (पुनः॰ २००४). सर्वलक्षणसंग्रहः. वाराणसी : चौखम्बा संस्कृत सिरीज़.

(ex.) Pandurangi, K.T., (2004) Prakaranapanchika of Shalikanatha with an Exposition in English. New Delhi : Indian Council of Philosophical Research.

(सं॰) वासुदेवलक्ष्मण पणशीकर. (पुनः॰२००९) श्रीमद्भगवद्गीता अभिनवगुप्ताचार्यव्याख्योपेता.नवदेहली:  श्रीलालबहादुरशास्त्रीसंस्कृतविद्यापीठम्.

(सं॰) निकोल्सन ,आर॰ ए॰(चतुर्थ संस्करण) १३८६ हिजरी; मौलाना, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद मसनवी ए मानवी–पादानुक्रमसहित, मास्को संस्करण, इन्तिशाराते हिरमिस , ।

[1] हर दम ब लिबासे दिगरान् यार बरामद। (यद्यपि इस शे,र को कुछ लोग रूमी का न मानकर प्रक्षिप्त स्वीकार करते हैं)

[2]नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्त्वनिराकरणं धारयिता भूयासं

कर्णयोः श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ओम्॥ २.९। इस उपनिषद् को महानारायण अथवा नारायण उपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है।

[3] वाक्यपदीय वाक्यकाण्ड ४८९

[4]  तुलना करें जलालुद्दीन रूमी– ज़ीरकी बफ़रूशो हैरानी बख़र। ज़ीरकी ज़न अस्तो हैरानी नज़र॥ (बेच दो अपनी तर्क बुद्धि    

  को और ख़रीद लो हैरानी। क्योंकि तुम्हारी तर्क बुद्धि तुम्हारी तुम्हारा भ्रम है और हैरानी तुम्हारी नज़र है।)

[5] सवासनानां सभ्यानां रसस्यास्वादनं भवेत्। निर्वासनास्तु रङ्गान्तः काष्ठकुड्याश्मसन्निभाः॥ (साहित्यदर्पणः ३.८ पर धर्मदत्त के नाम से उद्धृत)

[6] बुद्धिमान् व्यक्ति एक पैर स्थिर रखता है तथा दूसरे से गति करता है।

[7] निरुक्तम् अध्याय४. पाद २. खण्ड १०

[8] महाभाष्यम् प्रथमाह्निकम्

[9] षच समवाये– पाणिनीय धातुपाठ, भ्वादि ९९७.

[10] काव्यालङ्कारः १.१५

[11] सर्वलक्षणसंग्रहः, पृ॰ १७

[12] “अपूर्वम् (यागेन फलप्राप्तौ द्वारम्) A Potency produced by Yāga that leads to its result. A link between Yāga and Svarga.” प्रकरणपञ्चिका– Glossary of Technical Words, P.463

[13] पिये जणे णत्थि पुणरुत्तं। (गाथासप्तशती)

[14] स्वाकारवदभिन्नत्वेनायामास्वाद्यते रसः। (साहित्यदर्पणः ३) पण्डितराज जगन्नाथ ने तो आवरणों से रहित प्रत्यक् चैतन्य को ही रस कह दिया है–…..भग्नावरणा चिदेव रसः।

[15] आत्मनस्तु कामाय सर्वः प्रियो भवति। बृहदारण्यकोपनिषद्

[16] द्वितीयाद्वै भयं भवति।

[17] ध्वन्यालोकलोचन प्रथम उद्योत १

[18] यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु। भ्वादि १००२

[19] शतपथ ब्राह्मण १.७.१.१५

[20] श्रीमद्भगवद्गीता ३.९

[21] श्रीमद्भगवद्गीता ३.१०–११

[22] विक्रमोर्वशीयम् १

[23] ध्यातव्य है कि समान शब्द को सामान्यतया सम्+आ+√नी धातु से अथवा सम्+√अन् धातु से निष्पन्न किया जाता है। (देखिए वाचस्पत्यम् पृ॰ ५२३२)

[24] अब्धिर्लङ्घित एव वानर भटैः किन्त्वस्य गम्भीरतामापातालनिग्नपीवरतनुर्जानाति मन्थाचलः। (अनर्घराघव–१)


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Sanskrit blog: Chandrika (A Fairy tale)-72

Simple Sanskrit - Sun, 01/15/2017 - 10:59
चन्द्रिका-७२ सप्रश्रयं स्वजननीं प्रणिपत्य पुत्र्यौबाष्पावरुद्धवचसागदतां विनम्रे ।अद्यप्रभृत्यपगतं तव कृच्छ्रजातम्अस्मद्गृहे गतभया सुखमास्व मातः ॥ २५६ ॥माता विहस्य जनसंसदि सानुतापंलज्जानुलिप्तवचसा न्यगदत्स्वपुत्र्यौ ।तुष्टास्मि भोः सपदि चन्द्रिकयोपदिष्टा   नास्तीह कार्यमधुना मम जागृताहम् ॥ २५७ ॥ वाराणसीं जिगमिषामि ममात्मशान्त्यैपायात् हरिः पुरजनान् सकलांश्च युष्मान् । यस्यांघ्रियुग्ममनिशं मनुजाः स्मरन्तः विन्दन्ति शाश्वतसुखं तमहं श्रयामि ॥ २५८ ॥- - - -
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Sanskrit blog: Chandrika ( A Fairy tale )-71

Simple Sanskrit - Sun, 01/08/2017 - 15:22
चन्द्रिका-७१
नात्राभवत् परिणतः न युवा न बालःयोऽन्नप्रदानमनुभूय न तृप्तिमाप | नैवाभवच्च युवतिः स्थविरा कुमारीयोपायनं न परिगृह्य विवेद तुष्टिम् ॥ २५३ ॥
राजस्नुषाभिमतमेतदिति ब्रुवाणैः तत्तत्पशूचितनवीनसुसिद्धखाद्यैः ।     सम्प्रीणिताः नगरगोव्रजपक्षिवृन्दाःमार्जालकुक्करगणाः धरणीशभृत्यैः ॥ २५४ ॥
बध्वौ स्वभर्तृसहितेऽमितभोगभाग्येपादार्चनाय जननीमभिजग्मतुस्ते ।दुःखं सुखं च युगपत् ह्यनुभूय माता         
वर्षातपाहतधरेव बभौ विमूढा ॥ २५५ ॥- - - - http://gssmurthy.blogspot.com http://murthygss.tripod.com/ http://sanskritcentral.com
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शाम्भव्याः कथ्यं शिल्पं च

Balramshukla's Blog - Mon, 01/02/2017 - 19:51

A long awaited and much needed volume titled “Contribution of Woman to Sanskrit, Pali and Prakrit Literature” got published from Gandhinagar Gujarat. The book being a Felicitation Volume of Prof. Hansaben Hindocha has been edited by Sh. Manibhai Prajapati. It contains many valuable essays and research papers on Women writers and scholars of ancient and modern India.

This volume also includes my paper on a great grammarian of our time Prof. Pushpa Dikshit Ji. She is a poet par excellence and this paper deals with her lyrical poetry “ShambhavI”. An abridged version of this paper had appeared in “Sanskrit Pratibha” Sahitya Akademi. Here is the complete version of the same-

 

                                  ॥शाम्भव्याः कथ्यं शिल्पं च॥

पर्यालोचनायै प्रकृतं शाम्भवीनाम काव्यं श्रीमत्या पुष्पादीक्षितया विरचितं प्रत्यग्रतमं गीतिकाव्यम्। पाणिनीयव्याकरणे सर्वतोमुखीं नवीनां वैज्ञानिकीं दृष्टिमेषा उद्भासितवतीति सर्वत्रापि पण्डितसमुदायेऽत्यन्तमादृतेति नास्ति संस्तावावश्यकता मनागप्यस्याः। मध्यप्रदेशस्य जाबालिपुरे (जबलपुरे) प्राणाचार्याणां पण्डितसुन्दरलालशुक्लानां गेहे १९४२ तमे ऐशवीये  लब्धजन्मान एता पितुरेव प्रारम्भिकं संस्कृतमध्यैषत।जाबालिपुरविश्वविद्यालयत एवैताभिः सस्वर्णपदकं प्रथमश्रेण्यां स्नातकोत्तरपरीक्षोत्तीर्णा। विद्यावारिध्युपाधिञ्च रानीदुर्गावतीविश्वविद्यालयादधिगत्य मध्यप्रदेशशासनस्य उच्चशिक्षाविभागे स्थित्वा शासकीयकन्यास्नातकोत्तरमहाविद्यालयादिषु ३९ वर्षाण्यध्यजीगपन्। एतर्हि च सेवानिवृताः सत्त्योऽहर्निशं विविधविधाभिः संस्कृतं सेवमाना विद्यन्ते।पाणिनीयव्याकरणं नवीनरीत्या व्याचक्षाण आसां ग्रन्थराशिः एतासां कीर्तिं चतुर्षु दिक्षु तनोतितराम्। चतुर्षु खण्डेषु अष्टाध्यायीसहजबोधेन पाणिनीयप्रक्रियां सम्यक्प्रदर्श्य शास्त्रीयशैल्या एतां नवीनां पद्धतिं स्थापयितुं दीक्षितमहाभागा नव्यसिद्धान्तकौमुद्याः कतिचन भागान् रचयितुं दीक्षिता दृश्यन्ते। येषु खलु पञ्च भागाः प्रकाशितचरा अपि। तत्र व्याकरणस्य गहनतमा अद्यावधि अव्याख्याता स्वरतद्धितप्रभृतयो विषया निश्चप्रचं ग्रन्थ्युद्ग्रन्थनपुरस्सरं अवगमिताः। काव्यक्षेत्रेऽपि समुज्ज्वलया सोर्ज्जया च कवितया एताः संस्कृतसामाजिकेषु भूयसा प्रशस्ता। अद्य यावदेतासां अग्निशिखा शाम्भवी इत्यभिधौ काव्यसंग्रहौ प्रकाशितौ। एताभिः शङ्करदेशिकसन्दृब्धायाः सौन्दर्यलहर्याः, पूर्णचन्द्रशास्त्रिरचितस्य अपराजितवधूनाम्नश्च महाकाव्यस्य हिन्दीभाषयानुवादो विहितः। दीक्षितमहाशया न केवलं स्वलेखन्या नैजविचारान् समाजे प्रसारयितुं यततेऽपितु कर्मयोगपूतैः स्वकर्मभिरप्यहर्निशं संस्कृतसंस्कृत्योः सेवने निरन्तरं निरताः सन्ति। छत्तीसगढ़प्रदेशे नैकेषां संस्कृतविद्यालयानां स्थापना आभिः कृता। निखिलेऽपि भारते वर्षे स्थाने स्थाने व्याकरणस्य शाला एताभिः समायोज्यन्ते। एतेषां गृहे विलासपुरस्थे तु आवर्षं संस्कृतजिज्ञासुच्छात्राणां वासो भवति। सम्प्रति पाणिनीयशोधसंस्थानस्यैता आध्यक्ष्यं वहन्ति। एतानि विशिष्टकार्याणि सम्भावयता २००४ तमे वर्षे एताभ्यः भारतीयगणतन्त्रस्य राष्ट्रपतिना विशिष्टसम्मानः प्रदत्तः। महामहोपाध्यायादिसम्मानना अन्याश्च भूयांसः उपाधयोऽपि समये समये आभिरलंकृताः।

अधुना एतासां काव्यगुणान् सामान्यतया पर्यालोच्य शाम्भवी–सङ्कलनं वयं चर्चिष्यामहे।

संस्कृतकविताया नैकसहस्राब्दव्यापकं साहित्यं कालकलनां तर्जयदिव नैरन्तर्यैण प्रवहति। यस्मिन् साहित्ये श्रुतिः कदाचिदाविरभूत् उपनिषद उपनिषत्कृता रामायणरामणीयकमुदभूत् भगवद्गीता गीता तस्मिन्नेवैतर्हि अपि कविगणा निरन्तरम् अविच्छिन्नतया कवयन्ति। सत्यपि अविच्छेदे साहित्यस्य भिद्यत एव प्रतियुगं प्रतिकवि च साहितीपरिदृश्यं– यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तत इति सिद्धान्तितत्वात्[1]।यथा स्वधुरि बम्भ्रम्यमाणापि पृथ्वी सूर्यमपि प्रकारान्तरेण परिक्राम्यति तथैव आत्मनोऽनुभवान् सस्वरां कुर्वन्नपि कविः लोकदशामपि सुनिपुणं वर्णयति। वस्तुतः कविः स्वानुभववर्णने तथा अवितथः मार्मिकश्च भवति यथा तस्य कथ्यानि लोके सर्वैरपि आत्मनीनतया स्वीक्रियन्ते। यद्यपि कविरेकः प्रजापतिः स्वतन्त्रः काव्यजगत् स्रष्टुं तथापि तत्रापि लोकः कस्मिंश्चिदंशे तं नियमयति एव। लोकातिवर्तने अप्रयुक्तत्वदोष[2]प्रसक्तेः। कान्तासम्मिततयोपदेशकः कविः लोकमेव कृतार्थयितुमीहते। एवम्प्रकारेण कविः लोकाद् अर्थान् गृहीत्वा लोकायैवार्पयति। केवलं स्वीयाया अलौकिकप्रतिभायाः संस्पर्शेन तान् नवनवान् रसप्रवणांश्चमधुमास इव द्रुमान् विधाय। प्रतियुगं समाजप्रवाहानुगुणमेव रचयति कविः। तदैव काव्यस्य सर्वजनसंवेद्यत्वसम्भवः। संवेद्यत्वसामान्ये एव लोकशिक्षणसामर्थ्यं काव्यस्य। एवमद्भुतं कविकर्म न नितान्तं लोकविभिन्नम् न च एकान्ततया लोकसम्भिन्नम्। आद्ये दुर्बोधत्वम् द्वितीये पुनः इतिहासादिप्रसङ्गः कथ्यस्य प्रसजतः।

सुदूरं परिवर्तिते वर्तमानयुगे नवीनस्य लोकस्य नवीनाः एव भूयस्यः समस्याः प्रादुर्भूताः। यासामपनोदनाय नवीनैव काचित् प्रखरा शैली अपेक्षिता भवति। सा च युगप्रवणा शैली आधुनिकसंस्कृतकविभिः सृष्टा सुनिपुणं ससाफल्यं च प्रयुक्ता अपि। सैव शैली अस्माभिः दीक्षितमहाशयासु दरीदृश्यते। यस्यां नवीना शब्दसंघटना, नवीनो भावबोधः, नवीनानि च्छन्दांसि प्रखरता च अपूर्वा सर्वत्र राराज्यते।

दीक्षितमहाशयाया वर्तते काव्यद्वयं– प्रथमा अग्निशिखा द्वितीया च शाम्भवी। वस्तुतः एते कवयित्र्याः वैयक्तिकसामाजिकभावबोधयोः क्रमेण प्रातिनिध्यं विधत्तः। विप्रलम्भशृङ्गाररसस्य या मर्मस्पृग् वर्णना अग्निशिखायामुपलभ्यते सा संस्कृतसाहित्येऽधुनावधि कयाचित् कवयित्र्या न घटिता प्रायेण। तव नामाक्षराणि, तव वीतदये हृदये, मम वामनवृत्तिरियं, कोणमेकं देहि मे इत्यादयः कविताः रचयित्र्याः प्रत्यक्षतः हृदयान्निःसरन्त्य इव प्रतीयन्ते।

अग्निशिखायां संस्थिता व्यष्टिमात्रविषयिणी वेदना शाम्भवी–संग्रहे समष्टितया परिणता । समाजे दुर्घट्यमानानि सर्वप्रकारकाणि पतनानि  लक्ष्यीकृत्य रचयित्र्याः स्वान्तःस्था घनीभूता वेदना काव्यतया निर्गलितेव दृश्यते। मनोवेदना मे विरामं न याति इति कविता एतस्याः प्रमुखं निदर्शनम्। अनेकशतवर्षैः सततं परिपोषितायाः भारतीयपरम्पराया विनाशाय धूमकेतुभूतायाः पश्चिमभूमीभवायाः संस्कृतेः उत्तराधरप्रभावा एतां क्षणमपि स्थातुं न ददति। तेषु दुष्प्रभावेषु विद्यन्ते सामाजिकविषमताः, यूनां स्वच्छन्दचारित्वं, अशनायापीडितानां चीत्कृतयः, प्रदूषिता शासनव्यवस्था, विदुषां च नैरन्तर्येण ह्रासः। देशं भुञ्जानानां दुष्टप्रशासकानां दुर्दृश्यमेकमत्र दरीदृश्यताम्–

त्रिलोकीं निगीर्यापि तुष्यन्ति नो ये तदीये करे लोकपोषस्य भारः।

अनाथाः प्रजाः यद् रुदन्तीति दृष्ट्वा मनोवेदना मे विरामं न याति[3]

शाम्भव्यामनेकशः प्राश्निकशैल्या स्वीया विचारा अनया प्रकटिताः। सर्वे एते प्रश्ना अस्मान् चिन्तनाय विवशयन्ति यदेतस्मिन् जगति अस्माकं जीवनस्य किमुद्देश्यं परिशिष्टम्। गोवधस्य सन्दर्भे कवयित्र्याः मानसं समर्यादामस्मत्संस्कृतिं  शस्त्रपराहतां दृष्ट्वा समाकुलं जायते। ब्रूहि कोऽस्मिन् युगे कालिदासायते इत्यभिधे काव्ये स्वीये अनुयुङ्क्ते सा–

क्षीणदुग्धा विवत्सा बुभुक्षाकुला साश्रुनेत्रा गवाशैर्विकृष्टा मुहुः।

गा नदन्तीः समुत्प्रेक्ष्य शृङ्गाटके बन्धनच्छेदनैः को नु गोपायते[4]

महतां पुण्यानां परीपाकभूतमिदं यद्भारते जन्म । परन्तु एतद् गर्वास्पदं वस्तु स्वीयया वाचा महता कण्ठेन केऽधुना वर्तन्ते ये ख्यापने वाचालाः सन्ति?

महापुण्येन जातं जन्म येषां भारते वर्षे।इमं दर्पं स्ववाचा तेषु विख्यातुं यतन्ते के[5]?॥

संवेदनाराहित्यस्य परां काष्ठा द्योतयन्ती सा ब्रूते–

यदा सीमासु रक्तै रञ्जिता वीरा विहन्यन्ते।तदा ये गीतवादित्रेषु रज्यन्ते जनास्ते के[6]

एतादृशा अनेके प्रश्ना विद्यन्ते ये गीतिकाव्यानां सार्थकतायै नवीनं कलेवरं विश्राणयन्ति।

इति शोचति भारतभूमिरिय[7]मिति कविता सुदीर्घा तोटकच्छन्दसि निबद्धा । अत्र अर्वाचीनसमाजस्य दुरवस्थानां चित्रणं निपुणं कृतम्। समस्तजनताहितावहं वर्णाश्रमं धर्मं विप्लावितं वीक्ष्य तस्या मनः दूयते कविताश्च एताः समुत्पद्यन्ते। विद्यार्थिनां प्रथमाश्रमवासिनां विसङ्गतावस्थायाश्चित्रणं दृश्यताम्–

समिदाहरणाय समाकुलिता असुभिर्गुरुभिर्बहुधा तुलिताः।

न मनोरथमत्तगजाकुलिता अनवाप्तिशुचापि न ये लुलिताः।

वटवः पटवो मम कुत्र गता इति शोचति भारतभूमिरियम्॥

स्त्री वेदेषु पुरन्ध्री शब्देन गीयतेतराम्। तयैव धार्यते कुटुम्बं समाजश्च। तस्याम् उत्पथप्रवृत्तायां समाजः राष्ट्रं च रसातलं यातः।स्त्रीणां दुरवस्थायाश्चित्रमेकं प्रस्तूयते तया गृहीतम्–

गृहिणीस्तनपानपरं शिशुमप्यपहाय धनार्जनकार्यरता।

ऋजुता समता न नतिर्न धृतिर्नहि सा रमणीषु मनोरमता॥

अवसादपरा गृहकार्यविधौ बहिरेत्य समाजकृते निरता।

वनिता क्व गता गृहधर्मपरा इति शोचति भारतभूमिरियम्॥

कलहायमानाभ्यां दम्पतीभ्यां वस्तुतः शिशवः पीड्यन्ते–

जननीजनकौ कलहे निपुणौ शिशवः क्व नु यान्तु दुराधिवृताः।

उच्छिन्ने वर्णधर्मे शास्त्राणि लुप्यन्ते येन मठमन्दिराणि धर्मध्वजिनां कुचक्राणां केन्द्राणि जायन्ते–

जना धर्मे रता पाखण्डकूपे दर्दुरायन्ते– समूलं सस्वरं वेदार्थमाख्यातुं यतन्ते के ।

अन्यत्रापि – प्रवृद्धा धर्मदेष्टारो यथा वर्षासु मण्डूकाः इत्यादि।

शास्त्राणि एव शक्नुवन्ति रक्षितुं परम्परामिति दीक्षितमहाशयायाः परमाशयः। तेषां सर्वदिक्कं विनाशं दृष्ट्वा तेषां विलापः काव्ये सर्वत्र दरीदृश्यते–

समारूढाश्चलच्चित्ता युवानः पानमत्ताश्चेत्।

रुदन्तः शास्त्रसम्भाराः कथं रक्षां प्रकुर्वीरन्[8]

जानीमश्च वयं यदेष न केवलमासीत् रोदनमात्रम्। हार्दिकदुःखादुत्थितया करुणया सहैव एताः शास्त्ररक्षणेऽपि यथा महतोत्साहेन रताः सन्तिसामाजिकजीवने तेन दृढीक्रियते सूक्तिरेषा– मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनामिति।

शासका एव धर्मप्रतिष्ठापका भवन्ति। तैः स्वकीयेन धर्ममयेनाचरितेन समाजः शिक्षयितव्यः येन लोकाः सच्चरित्रा भवेयुः। यथा महामतिश्चाणक्यस्य मतम्–राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः खले खलाः।राजधर्मानुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः[9]।परन्तु अद्यतने समाजे अधार्मिकैरेव दुःशासनैः शासकैः सर्वनाशस्थितिरुत्पादितास्ति–

क्व नृपाः प्रजया पितृतुल्यमताः इति शोचति भारतभूमिरियम्।

आधुनिकी तथाकथिता शिक्षापि नैतिकं पतनं रोद्धुं न प्रभवतीति कवयित्र्या वाग्बाणानां शरव्यभूता जातास्ति–ऋषिज्ञानं व्युदस्य व्यायता शिक्षापिशाचीयम्।

महति जनसम्मर्देऽपि य एकाकितादंशः वर्तते स आधुनिकयुगस्य विडम्बनास्ति। पारस्परिकसंवेदनाभाव एतस्य कुफलम्। एतस्याः काव्ये मर्मस्पृक् चित्रणमेतस्य प्राप्यते तत्र तत्र–किं करोमि मदीयगेहे कोऽपि मां नहि परिचिनोति।तथा च–न सूपे सम्प्लुता दर्वी रसं सूपस्य जानीते। वसन् लोके व्यथां लोकस्य नो जानाति लोकोऽयम्॥कुटुम्बानां विखण्डनं, तत्र ज्ञातीनां मध्ये अविश्वासोत्पन्नं महद् वैमनस्यं शाम्भव्याः गहनचिन्तास्वन्यतमा–इयं सन्दृश्यते दन्दह्यमानज्ञातिधूमा दिक्। स्वपक्षान् कर्तयित्वा व्योमगामी तेभिलाषोऽयम्। तत्र कारणं प्रेम्णः अवमानना–जने प्रेमप्लुते ताटस्थ्यमाबध्नाति लोकोऽयम्। अथ च

तिरस्कृत्य स्वबन्धूनां गणं वाक्यैः प्रतोदाभैः। प्रभूणां सारमेयं मोदकैः प्रीणाति लोकोऽयम्[10]

स्वतन्त्रता या हुतात्मभिः प्राणान् पणीकृत्य लब्धा तस्योपभोगं गृध्नवोअयोग्या यत् कुर्वन्ति तत् लेखिकायाः हृदयं व्यथयितुमलं अनेकशश्च अनेकैश्च बिम्बैस्तेषामनुवर्णनं प्राप्यते काव्ये–

मया खातं सरः क्लेशादिमे नक्रा विगाहन्ते। श्रमं स्वीयं वृथा जानन् जनः शून्यप्रभो जातः॥

यथाकालं मयोप्तं बीजमन्यो लोलवीत्येषः। क्षुधार्तां बन्धुतां पश्यन् जनः शून्यप्रभो जातः[11]॥(जनः शून्यप्रभो जातः)। किं करोमि इति सम्पूर्णापि कविता एतमेव वञ्चितत्वभावं नितरां प्रकटीकुरुते–

पालितो बहुलालितो विनियोजितो गृहरक्षणे यः। बहुतिथे काले गते स द्वारशुनकस्त्वंकरोति॥

अथवा– मदीयेनान्धसा पुष्टा मदीयप्राङ्गणे जुष्टा। बलिं ध्वाङ्क्षा मुषित्वा मामपाकर्तुं समीहन्ते॥

अपूज्यानां पूजा पूज्यानां च व्यतिक्रमः उभयमपि हृदयशल्यमिव अद्यत्वे प्रवर्तमानं तया भूयः चित्रितम्–

“अकारं नो इकारं नो उकारं नैव जानन्ति। तथाप्युच्चैः पुरस्कारैः प्रशस्यन्ते नरास्ते के”॥ (नरास्ते के)

विदुषां वंशधराणामविद्वत्त्वम् शास्त्रसंरक्षिकायास्तस्याः चिन्ताविषयः – “स्फुटन्ति यस्य कण्ठमाप्य सर्वशास्त्रफक्किकाः। अहो तदात्मजा जडा भवन्ति केन हेतुना[12]?”॥

आधुनिकतायाः दुष्परीणामाः यथा किंकर्तव्यविमूढता, असन्तोषः, भयं इत्यादीनि काव्येष्वेतेषां यत्र तत्र स्थितिमन्ति सन्ति।एताः सामाजिकविरूपताः कवयित्र्या क्वचिदभिधया क्वचिद् व्यञ्जनया  अन्योक्त्या काव्यक्षमैः प्रतीकैश्च प्रदर्शिताः।

न केवलं शुष्कदुःखप्रदर्शनं काव्येऽत्र अपितु काव्यमाध्यमेन जनजागरणं विधाय एतदुन्मूलनायापि दृढपरिकारा वर्तन्त एताः। अत एव काव्येषु एतस्याः न केवलं समस्यानां परिगणनमात्रं विहितं अपितु समाधाना अपि तत्र प्रदत्ताः। यतन्ते के इति काव्ये भूयसां ज्वलतां प्रश्नानामुत्थापनपुरस्सरं तया अन्ते प्रश्नोत्तरशैल्या उत्तरमपि प्रस्तुतम्- “ततं नाडीषु येषां राष्ट्रभक्तानामसृक् शुद्धम्। यतन्ते ते यतन्ते ते यतन्ते ते यतन्ते ते”॥

तया इष्टं यद् देशस्य युवानः पाश्चात्त्यसंस्कृतितिमिरान्तरायनाशाय सूर्यवद् भासन्तामिति– “निलीना भारतीया संस्कृतिर्यत् पश्चिमध्वान्ते। तदुद्धाराय खे मार्तण्डवत् भातुं यतन्ते के”?॥

ऋषिप्रणीतोऽध्यात्मिको मार्गस्तस्या मते सर्वासामपि समस्यानां समाधायकः वर्तते इति–“सर्वभूते यदा स्वाकृतिर्दृश्यते सर्वदुःखे यदा स्वव्यथा भुज्यते”।तथा च– “व्यापकं सर्वधीसाक्षितत्त्वं तदा चक्षुषोरग्रतो हन्त कृष्णायते”॥

कवयित्री जानीते यदेतेषां औत्तराधर्याणां सर्वेषां बीजं किम्। सा न केवलं बाह्यानि लक्षणानि दृष्ट्वा समाजरोगस्य स्वकल्पितानि निदानानि प्रस्तौति अपितु तत्तत्समस्यानां मूलमवगाह्य भाषते सा। स्वकीयकाव्यबीजं विवृण्वती सा शाम्भव्याः प्राक्कथने आन्तराभिधे वक्ति- “एतद्(–जीवरूपचिदानन्दकला–) विज्ञानमेवास्ति सूत्रं येन विकीर्णमिदं जगत् पिनद्धुं शक्यते। इदन्तु मानुष एव काये सम्भवति। किन्त्वनादिवासनाक्लिन्नचेता अयं नानायोनिषु बम्भ्रमितोऽप्यत्र बम्भ्रमीतीति दर्शं दर्शं चेखिद्यते मे चेतः। एतदेवास्ति कवित्वबीजं मम कवितायाः॥”[13] इति।  सर्वेषु अपि जीवेषु परमेश्वरस्य आत्मनः चित्कलाया दर्शनेन एकत्वदर्शनेन इति यावत् जगतः सर्वासामपि समस्यानां समाधानमिति ब्रुवन्त्या कवयित्र्या चिरन्तनं समाधानं प्रादायि यदासीत् पूर्वतनैः ऋषिभिर्निदर्शितम्–“तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः[14]”। सा प्रार्थयति–“जातिसम्प्रदायमप्युपेक्ष्यतां सखे आत्मवज्जनेषु किं न दृश्यतां सखे”। “विश्वमित्थमेकमेव दृश्यतां सखे भ्रान्तधारणाधुना विभिद्यतां सखे”[15]

इतिवत् तत्तत्तत्त्वानां कणेहत्य निन्दां कुर्वाणा वस्तुतः सा आधुनिकस्य सर्वविधस्य पतनस्य कारणानि प्रदर्शयितुमीहतेजनेषु च स्वकवितामाध्यमेन संवेदनशीलतां उद्भावयितुमिच्छति येन देशस्य प्रकृता दुरवस्था नश्येत् देशः स्वोचितामवस्थां च प्राप्नोतु।

 

शाम्भवीगतान् सन्देशान् विविच्याधुना तद्गगतं शिल्पं विचारयामः। शाम्भव्याः वैशिष्ट्यं सर्वप्रमुखमेतदस्ति यदत्र छन्दांसि तु प्रायेण नवायन्ते परन्तु भाषा चिरन्तनपण्डितानामिव सुश्लिष्टा वर्तते। एतया दृशा शाम्भवी युङ्क्ते प्राचमर्वाचा। अत्र काव्ये प्रायेण ग़ज़लशैल्याः प्रयोगो विहितोऽस्ति यः खलु अर्वाचीनसंस्कृतस्य लक्षणेषु अन्यतमः। एवं भावदृष्ट्या अथ च च्छन्दःप्रयोगदृष्ट्या उभयथापि कृतिरियं आधुनिकसंस्कृतसाहित्यस्य लक्ष्माणि बिभर्ति। एवं सत्यपि यानि स्खलनानि दृश्यन्ते सामान्यतया आधुनिकेषु कविषु भाषादृशा तानि सर्वथा अत्र नैव विद्यन्ते। न च्युतसंस्कृतित्वं नापि बन्धशैथिल्यं न चच्छन्दोभङ्गः क्वचिदपि । सर्वत्रापि विद्यते शास्त्रोपस्कृतशब्दसौन्दरी गिरि निरन्तरश्लिष्टत्वघनता च भाषायाम्।

आदौ तावद् भाषिकानि वैशिष्ट्यानि शाम्भव्याश्चर्चयामः। यथोक्तं पूर्वं दीक्षितपुष्पा न केवलं वैयाकरणी अपितु पदशास्त्रस्य पाणिनिसम्मतार्षप्रक्रियायाः पुनरुद्धारिका। सा अध्ययनाध्यापनग्रन्थसन्दर्भादिकर्मभिः अहोरात्रं पाणिनिशास्त्रे आकण्ठं प्रमग्ना तिष्ठति। अत एव तस्याः उद्भवन्त्यः कविताः पाणिनीयशास्त्रस्य माहात्म्यस्य निदर्शनानि भूत्वा बहिरायान्ति। व्याकरणशास्त्रस्य विशिष्टप्रयोगाः तथा सारल्येन स्वाभाव्येन च तस्याः काव्यं आगता यथा अप्रासङ्गिकत्वमादधतो न प्रतीयन्ते अपितु रसपोषणमेव विदधति। तत्रोदाहरणानि कानिचन वक्ष्यामः–“पितरः स्पृहयन्ति निवापकृते कृतघातिसुतेषु तरन्ति न ते”।

अत्र कृतघातिसुतेषु इति अत्र सप्तमी विशिष्टेन कात्यायनवार्तिकेन[16] अनुशिष्टा सती दुष्टवंश्यानां तेषामनर्हत्वं विशिष्य सूचयति। वैयाकरणसुलभप्रयोगाणां तत्र तत्र शृङ्खला दृश्यते येन ते ते विषमप्रयोगा बुद्धौ तिष्ठन्ति। तेषां च प्रयोगाणां कृत एते काव्यांशा उदाहरणत्वेनाप्यानेतुं शक्याः–“उदरम्भरिशास्तृजनाः क्षुधयार्तजनेषु न किं पितरन्त्यधुना”।“लघयन्ति गुरूनपि तत्त्वदृशः श्रुतिमार्गचरं दरयन्त्त्यधुना”॥

“शठवञ्चकलम्पटमित्रयुता अतिमन्दधियो गरयन्त्यधुना”[17]

कर्तुः क्यङ् सलोपश्च (अष्टाध्यायी ३–१–११) इति सूत्रस्य उदाहरणमिव प्रतीयमानं पद्यमिदं दृश्यताम्–

कलौ तार्क्ष्यायते काकः कलौ वीरायते क्लीबः । कलौ शश्वायमानस्त्वं सभायां कत्थसे धीमन्॥

गृहं वनायते इतिकाव्ये तु क्यङ्ङन्तैरेव शब्दैः अन्त्यानुप्रासयोजना कृतास्ति। तत्र शब्दाः सन्ति– वनायते, तृणायते, रणायते, कणायते, फणायते, क्षणायते, व्रणायते, गणायते, शणायते पणायते च। अत्र सर्वेऽपि शब्दाः णोपधा इत्यपि अवधेयम्।न जाने इतिकवितायामपि क्यङ्ङन्तभूयस्त्वम्॥

इच्छार्थकसन्प्रत्ययघटितशब्दैः कल्पितान्त्यानुप्रासप्रयोगरमणीयतरस्य पद्यस्योदाहरणमस्ति पिपृच्छिषा[18]नाम काव्यम्। तत्र भवन्ति एते सन्नन्ताः– लुलोभिषा, जिजीविषा, संजिगमिषा, यियतिषा, लिलङ्घिषा, पिपृच्छिषा, तितर्जिषा, जिगदिषा, शिशङ्किषा, दिदधिषा।पदे पदेशाम्भवीगताभिः कविताभिः दीक्षितमहाशयायाः वैयाकरण्यत्वख्यापनं जायते। दीक्षितपुष्पा गलज्जलिकादीनां अन्त्यानुप्रासयुक्तानां काव्यानां कृते पाणिनीयशास्त्रस्य ज्ञानं नान्तरीयकं मनुते। समानप्रत्ययनिष्पन्नानां शब्दानां समध्वनितया ते शब्दाः अन्त्यानुप्रासरूपेण सुन्दरतया व्यवस्थापयितुं शक्यन्ते। एतदेव मनसिकृत्य तया स्वकर्तृकस्य तिङ्कृत्कोशस्य अपरं नाम कविकर्मरसायन[19]मित्यपि कृतमस्ति। उदाहरणस्वरूपं ‘लोकोऽयम्’ इति काव्ये अन्त्यानुप्रासाय त एव तिङन्तशब्दाः चिताः येषु आकारान्तो धातुः स्यादङ्गं वा येषाम् आकारान्तं भवेत् यथा– आबध्नाति लोकोऽयम्– भाति लोकोऽयम्। संमृद्नाति लोकोऽयम्। माति लोकोऽयम्। याति लोकोऽयम्। स्नातिलोकोऽयम्। जानातिलोकोऽयम्। रातिलोकोऽयम्। निद्रातिलोकोऽयम्। मालातिलोकोऽयम्। विक्रीणातिलोकोऽयम्। प्रीणातिलोकोऽयम्। एवमेव तुमुन्नन्तानाम् आकारान्तधातूनाम् प्रयोगः अन्त्यानुप्रासरूपेण यतन्ते के इत्यस्मिन् काव्ये कृतमस्ति। विख्यातुं, समाधातुं, दातुं, पातुं इत्यादिशब्दाः यथा। जनः शून्यप्रभो जातः इत्यस्मिन् शत्रन्तशब्दाः गच्छन्, भुञ्जन्, संरक्षन् इत्यादयः अन्त्यानुप्रासतया उपात्ताः, के?इत्यस्मिन्नपि काव्ये तथैव। किं करोमीत्यस्यां कवितायां तु आद्योपान्तमुदाहरणं विद्यते च्विप्रत्ययान्तस्य ।समीहन्ते इत्यस्मिन् काव्ये ऋकारान्तधातुभिः सह तुमुनः प्रयोगं कृत्वा शब्दाः निदर्शिताः–सर्तुं, स्मर्तुं, उद्धर्तुम् इत्यादयः।रुदन्तः शास्त्रसम्भारा इतिकाव्ये श्नुविकरणानां धातूनां विधिलिङः प्रथमपुरुषबहुवचनपदैः अन्त्यानुप्रासयोजना विहितास्ति– कृण्वीरन्,विधुन्वीरन्, विचिन्वीरन् इत्यादिभिः  शब्दैः।निष्फलं करोति इति कविता तु मन्ये यङ्लुक्प्रयोगनिदर्शनायैव लिखिता स्यात्। १९ पद्येषु आहत्य ३४ उदाहरणानि प्रदत्तानि ईट्सहितानि[20] – चेक्षिपीति, दन्दशीति, दोदवीति, मम्मनीति, मोमुचीति इतिवत्।विडम्बनम्कविता उदाहरणभूतास्ति कर्मणि  भावे च प्रयोगाणाम्। विलीयते,विगीयते, विहीयते, विनीयते, दीयते, प्रतीयते,  पिधीयते आदयः शब्दाः अन्त्यानुप्रासाय सञ्चिताः। तत्स्थेषु चतुर्षु पद्येषु तु व्याकरणप्रक्रिया एव उपमानरूपेण उपस्थापिताः सन्ति। एते स्मारयन्ति कालिदासादीनां[21] केषांचित् प्रयोगान्–

पूर्ववत्सना समो जनोऽपि नैव दृश्यते। व्यत्ययो न येन कस्यचित्पदे विधीयते॥

पञ्चसङ्ख्यया यथा मुधैव षट्त्वमाप्यते। अग्रगण्यता तथाद्य दुर्जने निधीयते॥

नावैयाकरणः इत्थं निदर्शनानि सञ्चेतुमर्हति।

कानिचित् स्थलानि तथापि सन्ति यत्र व्याकरणस्य अतिसन्निवेशः कष्टायते। प्रसभनिवेशवशात् अप्रासङ्गिकतया केवलमुदाहरणप्रदर्शनमात्रफलानि क्वचित्क्वचित्प्रतीयन्ते पद्यानि यथा नरास्ते क इति कवितायां सुरुचिपूर्णानां पद्यानां मध्ये इदम्– “समायान्ति स्वकं गेहं यदा विप्रास्तपोनिष्ठाः। समुत्थाय प्रहर्षैर्नाभिवन्दन्ते नरास्ते के” ॥

अन्त्यानुप्रासाग्रहाधिक्यात् क्वचित् अप्रयुक्तपदानामपि प्रयोगेणाप्रयुक्तत्वमागतं काव्ये, यथा–“कथं ते वाङ्मधूकैर्ब्रह्मणा जीवं विषिन्वीरन्। बध्नीयुरित्यर्थे अस्य पदस्य प्रयोगः लौकिकसंस्कृतेऽल्पीयः। तथैव “समालिङ्ग्य प्रकामं कण्ठमुच्छेत्तुं यसन्तः के”, इत्यत्र अनुपसृष्टयसतेः प्रयोगोऽपि।

छन्दःप्रयोगेषु यन्नावीन्यं तदत्र पारसीकच्छन्दःशास्त्रमनुरुध्य पश्यामःयथावसरम्।इति शोचति भारतभूमिरियमिति काव्ये प्राचीनं तोटकच्छन्दः नवावतारे सम्प्रस्तुतोऽस्ति[22]। आधुनिकसंस्कृतगीतिकारैर्न केवलं पारसीकच्छन्दसां प्रयोगः कृतः अपितु संस्कृतपरम्परायां पूर्वत एव विद्यमानानां संगीतानुगुणानां छन्दसामपि अन्ते अन्त्यानुप्रास (रदीफ़) संघटनापुरस्सरं तानि ग़ज़लोपयुक्तानि कृतानि गीत्यनुकूलानि वा। यथा भट्टमथुरानाथेन शास्त्रिणा स्वीये न गता न गता इत्यभिधायां कवितायाम्[23] तोटकच्छन्दः गलज्जलिकायै प्रयुक्तम्। दीक्षितपुष्पया पुनः तदेव प्राचीनं सगणचतुष्टयेन निर्वृत्तं तोटकच्छन्दः[24] सध्रुवपदगीतये प्रयुक्तम्–

अतिघस्मरकालगतिः सकलं कवलीकुरुते जगतः कुहरम्।

परिनृत्यति तीक्ष्णकृपाणधरा तृणके गगने समदृष्टिरियम्॥

हृदये पिहिता विषयस्य रतिर्जरयत्यनिशं वयसो निचयम्।

अरुचिर्विषयेषु मनागपि नो इति शोचति भारतभूमिरियम्[25]

अत्र प्रतिद्वितीयपादान्तं अन्त्यानुप्रासः द्रष्टुं शक्यः– कुहरम्–दृष्टिरियम्–निचयम्–भूमिरियम् इतिवत्। वस्तुतः गीतीकृतमेतच्छन्दः। अस्मादेव कारणात् अधःप्रदत्ते पद्ये यतिभङ्गदोषस्योद्भावनं दुःशकम्–

स्वकुटुम्बिजने निरपत्रपदारकुलं प्रतिकूलकटूक्तिपरम्।

अवहेलनमेव धवस्य समत्वविधिं कलयन्त्यभिमानधरम्[26]

यथा आर्याच्छन्दसः पूर्वरूपां गाथां वयं द्वादशाष्टादशमात्रासु अवश्येन यतियुक्तास्यादिति नियममुपकल्प्य सदोषां न प्रख्यापयामः तद्वत्– “ओदंसअन्ति दअमाणा पमदाओ सिरीसकुसुमाइं”[27]।तत्र कारणं गीतत्वमेतस्य। शाम्भव्यां कतिधा न विचिन्त्य मनो व्यथते[28] इतिकवितापि अस्मिन्नेव छन्दसि संघटनायां चास्ति।

पारसीकच्छन्दसां प्रयोगविषयेअधुना यत्किञ्चिदुच्यते।  संस्कृतकविभिः अन्यभारतीयकविभिरिव सर्वेषामपि पारसीकच्छन्दसां प्रयोगो न कृतः। तैः सामान्यतया तान्येव च्छन्दांसि प्रयुक्तानि  यानि सरलानि, तालसंगीतानुगुणानि च सन्ति। तानि च तादृशानि येषु समानगणा आवर्तन्ते । जटिलसंरचनावतां छन्दसां प्रयोगः अल्पीय एव दृश्यते[29]। तथैव दृश्यते शाम्भव्यां धृतासु गलज्जलिकासु अपि छन्दसां प्रयोगविषयः।शाम्भव्यां संकलितेषु ३३ कवितासु प्रायेण १४ छन्दांसि प्रयुक्तानि। तेषु दर्शितं नावीन्यमत्र प्रचीयते।

भूयिष्ठप्रयोगविषयाणि च्छन्दांसि तु पञ्चषाण्येव सन्ति पारसीकानि आधुनिकसंस्कृतकवितासु। तेष्वपि प्राथम्यं भजति–हज़ज मुसम्मन सालिम नामच्छन्दः यस्य पारसीकच्छन्दोविद्भिः गणव्यवस्था एवं प्रदत्तास्ति– मफ़ाईलुन्   मफ़ाईलुन्   मफ़ाईलुन्   मफ़ाईलुन् । भारतीयगणव्यस्थानुसारेण एतदेव एवं कथयितुं शक्यतेयमाता   राजभा  ताराज  मातारा यमाता गा  (अथवा, यमाता राजभा गा गा x ४=। ऽ ऽ ऽ      । ऽ ऽ ऽ    । ऽ ऽ ऽ     । ऽ ऽ ऽ)। एतस्य च्छन्दसः नाम भारतीयपिङ्गलज्ञैः विधाता[30] इति कृतम्। जयकीर्तिः (छन्दोऽनुशासने २–१७) हेमचन्द्रश्च (छन्दोऽनुशासने २–२०) अस्य नाम क्रमशः वृद्धिः व्रीडा इति च कुरुतः। शाम्भव्यां धृताषु ३३ कवितासु चतुर्दश किल अस्मिन्नेव च्छन्दसि विद्यन्ते। अनेनैव द्योत्यतेऽस्य लोकप्रियता छन्दसः। तानि प्रयुक्तानि पद्यानि सन्ति–

१–अवैरे सज्जने निष्कारणं वैरायते मूढः।

जने दुर्दान्तदौरात्म्ये कुलीनो भाति लोकोऽयम्॥ (लोकोऽयम्)

२–इयं सन्दृश्यते दन्दह्यमानज्ञातिधूमा दिक्।

पताकां मन्यमानस्त्वं सभायां कत्थसे धीमन्॥ (सभायां कत्थसे धीमन्)

३–स्वकीयैः शोणितैः प्रेम्णा मया या भूरि संसिक्ता।

अये सा वाटिका घूकैः समाक्रान्ता कथं वर्ते ॥ (कथं वर्ते)

४–महापुण्येन जातं जन्म येषां भारते वर्षे।

इमं दर्पं स्ववाचा तषू विखयातुं यतन्ते के॥ (यतन्ते के)

५–न कान्तिस्तादृशी वक्त्रे न शान्तिस्तादृशी स्वान्ते।

अशिष्टेनाध्वना गच्छन् जनः शून्यप्रभो जातः ॥ (जनः शून्यप्रभो जातः)

६–जगत्यस्मिन् विशाले नृत्यतीयं शाम्भवी शक्तिः।

तदीयं ताण्डवं दृष्ट्वा न कम्पन्ते नरास्ते के ॥ (नरास्ते के)

७– यशांस्युच्चैरुलूकानां यतो गर्वेण गीयन्ते।

अरे तेनैव रज्जौ पन्नगाः सत्यं प्रतीयन्ते॥ (कीदृशः कालः)

८– जना अश्मप्लवैरात्मानमुद्धर्तुं समीहन्ते।

शिचस्तन्त्यां निबद्धा पक्षिणः सर्तुं समीहन्ते॥ (समीहन्ते)

९–पिशाचानां समाक्रन्दो दिगन्ते श्रूयते भीमः।

कदाचाराः समन्तात् सभ्यतां वेगेन कृण्वीरन्॥ (रुदन्तः शास्त्रसम्भाराः)

१०–क्षणं पार्श्वे वसन्तस्तत्क्षणं दूरे सरन्तः के?

समालिङ्ग्य प्रगाढं कण्ठमुच्छेत्तुं यसन्तः के ? (के?)

भारतीयच्छन्दःशास्त्रदृष्ट्या पश्यामश्चेत् इदं वृत्तं अनुष्टुभ एव केषुचित् नष्टभेदेषु अन्यतमं भवितुमर्हति प्रतिपादं अष्टाक्षरघटितत्वात्।

पञ्चचामरच्छन्दः प्राचीनं स्तवादिषु प्रयुज्यमानं वृत्तं। गलज्जलिकास्वस्य प्रयोगो नवीनः। पारसीकच्छन्दःशास्त्रिभिरस्य बह्रे हज़ज मुसम्मन मक़बूज़ इतिनाम कृतमस्ति मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् इति गणव्यवस्था चास्य निर्दिष्टा। शाम्भव्याम् निर्भयाभ्रमाम्यहम्, कालिका करालिकेति इतिकवितयोः इदं प्रयुक्तम्–

न चञ्चुरीति चेतनासु चण्डचित्तमर्कटो न दन्दशीति मर्मजालकेषु कामकर्कटः।

न दन्दहीति मां भयेन कालदण्डचर्पटो जगज्जटालजङ्गलेषु निर्भया भ्रमाम्यहम्॥

प्रमाणिकाच्छन्दोऽपि केन हेतुना[31] इत्यत्र प्रयुक्तमेव सान्त्यानुप्रासा।

प्रमाणिकाच्छन्दसः प्रथमं लघ्वक्षरं यदि हीयते तदा यच्छन्दः प्राप्यते तच्चामरमिति कथ्यते छन्दोविद्भिः। प्राचि संस्कृतेऽल्पप्रयुक्तमपि एतद् अपभ्रशंकालिकं छन्दः आधुनिकैरपि प्रयुज्यते। पारसीकसाहित्येऽस्य नामास्ति–बह्रे हजज़ मुसम्मन महज़ूफ़ अश्तर मक़बूज़, गणव्यवस्था चास्यास्ति–फ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन्इतिवत्। शाम्भव्याम् एतत् प्रयुक्तमस्ति– गृहं वनायते[32] इति गलज्जलिकायाम्–

वीतरागता यदा तदा गृहं वनायते। त्वं प्रतीयसे यदा तदा जगत् तृणायते॥

चातकेन किं कृतम्[33], विडम्बनम्[34] इत्यपि  एतस्मिन्नेव च्छन्दसि।

प्रमाणिकाया एव प्रथमं लघ्वक्षरं ह्रसयित्वा प्रतिपादान्तं एकलघ्वक्षरस्य योजनेन नवीनं कञ्चित् छन्द उद्भाव्य अनया कवयित्र्या रचितम् निष्फलं करोति[35] इति काव्यम्राजभा जभान राजभा जभान राजभा ल इतिवद् व्यवस्थया। जगन्नाथप्रसादभानुना एतद्वृत्तंचञ्चला नाम्ना समाम्नातम्[36]

एष भोगसागरे निमज्जितोऽपि जर्गृधीति। हन्त नास्ति कोऽपि यो तृषाग्निना न दन्दहीति॥

प्रमाणिका द्विगुणिता सती पञ्चचामरत्वं गच्छति। तदीयमपि प्रथमलघ्वक्षरं हृत्वा चामरं द्विगुणितं कृत्वेति यावत् कवयः प्रयुञ्जते। भानुः तस्य अपरे नाम्नी निर्दिशति तूणम् सोमवल्लरी चेति[37]अहर्निशम्[38]इत्यभिधकाव्यमपि अस्मिन्नेव च्छन्दसि सन्दृब्धमस्ति–

नो अरातियोगतो न मित्रविप्रयोगतः कूटकारिलोकतो मनःप्रमाथिशोकतः।

न त्रितापतो न देहपाततो बिभेम्यहं किं तथापि मे मनः समाकुलत्यहर्निशम्॥

एतदेव च्छन्दः अन्त्यमेकं लघुं एकं गुरुं च हृत्वा लघूकृत्य (राजभा जभान राजभा जभान गा इति व्यवस्थया) अपि  शाम्भव्यां गलज्जलिका रचिता। छन्दःप्रभाकरे एतदीयं नाम राग इत्यस्ति[39]। नवीन एष प्रयोगः संस्कृते–“विश्वबन्धुता गता गवेष्यतां सखे राष्ट्रभावना जने निवेश्यतां सखे”! (विश्वबन्धुता गता[40])

चतूरेफिका स्रग्विणी पिङ्गलेनोक्तत्वात् प्राचीनं छन्दः परन्तु आधुनिकसंस्कृतसाहित्ये तस्य नवैव कश्चिदवतारः दृश्यते। स च गीतिगलज्जलिकाद्यनुकूलं विधाय तस्याः प्रस्तुतिः। पारसीकभाषाछन्दःसु अपि एतच्छन्दोऽनेनैव रूपेण विद्यते। तत्र तदीयं नाम बह्रे मुतदारिक मुसम्मन सालिम इति वर्तते गणव्यवस्था च तस्यास्ति फ़ाइलुन् फ़ाइलुन् फ़ाइलुन् फ़ाइलुन् इति। शाम्भव्यां ग्रामवधूटी इतिकविता अस्मिन्नेव च्छन्दसि–

यत्क्षणेऽहं दुकूलैर्वृता ज्ञातिभिस्तत्क्षणं लौकिकज्ञानमाच्छादितम्।

अन्यपादानुगामिन्यहं कारिता यन्त्रितं दामभिश्चित्तमेकं सखे॥

मनोवेदनमिति[41]ब्रूहि कोऽस्मिन् युगे कालिदासायते[42]कवितापि अस्मिन्नेव च्छन्दसि।

न्यस्तशस्त्रं जनं वीक्ष्य शूरायते याचमानं जनं वीक्ष्य दूरायते ।

बान्धवर्द्धौ सदा दन्तकूरायते जायते तावता मे मनोवेदनम्॥

चतुर्भिर्यकारैघटितं भुजङ्गप्रयातं पारसीकच्छन्दःशास्त्रे बह्रे मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम इति नाम्ना प्रसिद्धम्। तत्रास्य गणव्यवस्थाफ़ऊलुन् फ़ऊलुन् फ़ऊलुन् फ़ऊलुन् इतिवन्निर्दिष्टा वर्तते। शाम्भव्यामेकत्र मनोवेदना मे विरामं न याति इत्यत्र तच्छन्दः प्रयुक्तम्।

अन्यत् प्रयुक्तं छन्दः गीता, गीतिका, हरिगीतिका वा वर्तते। एतस्य च्छन्दसः इदम्प्रथमतया प्राप्तिः प्राकृतपैङ्गले भवति। तत्रैतस्य नाम गीता[43] इति प्रथितमस्ति। हिन्दीशैल्याः पारसीककविभिः एतद् भूयिष्ठं प्रयुक्तं दृश्यते। पारसीककवितायां एतस्य नाम बह्रे कामिल मुसम्मन सालिमइत्यस्ति यत्र गणव्यवस्था तद्विदां मते वर्तते–मुतफ़ाइलुन् मुतफ़ाइलुन् मुतफ़ाइलुन् मुतफ़ाइलुन्इति। गतशताब्द्याश्छन्दोविदा दुःखभञ्जनशुक्लेन अस्य संस्कृतीकरणं विधाय मात्रिकवृत्तेषु अस्मै स्थानं प्रादायि[44]। वार्णिकभेदः अपि अस्य च्छन्दसः तेन गीतिका नाम्नानुमतः– ससजं भरौ सलगा यदा कथिता तदा खलु गीतिका[45]। शाम्भव्यामप्यस्य मात्रिकरूपमेवादृतमस्ति–

नो कर्मफलसमवाप्तये लब्धा जनिर्धरणौ मया।

असकृन्नुनोद भवाय मां तव हृदवसतिलुलोभिषा ॥ (पिपृच्छिषा)

पारसीके मुफ़्तइलुन् मफ़ाइलुन् इतिगणव्यवस्थया प्रसिद्धश्छन्दः विद्यते यस्य नाम जगन्नाथप्रसादभानुना नित[46] इति कथितम् यस्य भानस राजभा लगा इति व्यस्था सम्मतास्ति। छन्दःप्रभाकरे भानुना नराचिकेति नाम्ना स्मृतमिदम्[47]।  शाम्भव्यां अस्य च्छन्दसः द्वितीयलघुवर्णं गुरूकृत्य ताराज राजभा लगा इति रीत्या काव्यं रचितं न जाने इतिशीर्षकेण–

जाने न किं मदागतं दुःखायते सदा सुखम्। स्नेहोऽपि दूष्यते छलैः कारायते निजं गृहम्॥

किं करोमीति[48] कवितायां कवयित्र्या नवीनमेव च्छन्दः गृहीत्वा तस्य गलज्जलिकार्थं प्रयोगं कृतवत्यस्ति। एष प्रयोगः पुराणरीतिव्यतिक्रमणेन नूनं श्लाघ्यतमः–”गर्दभं गान्धारवाजी प्रश्रयेण नमस्करोति। मृगयुभीतेयं मृगी सिंहं शरणमङ्गीकरोति”॥

पारम्परिकच्छन्दसां पारम्परिकरूपेणापि प्रयोगः शाम्भव्यां प्राप्यते। यथा प्रीयते नो मनो मे इति कवितायांमन्दाक्रान्ताच्छन्दसः प्रयोगः, मन्येऽहम्, गङ्गे इतिकाव्ययोःच आर्याच्छन्दसः प्रयोगः दर्शनीयः। नो तथा दृश्यते जनः इतिकवितायां अनुष्टुभः अपूर्वः प्रयोगः अन्त्यानुप्राससंसयुक्तः कृतः अस्ति[49]

काव्यस्य गीतेश्च एकत्रावस्थापनं गलज्जलिकाकाव्यस्य वैशिष्ट्येष्वन्यतमम्। एतद्द्वयमपि वयं शाम्भव्यां लभामहे। तस्य कारणमस्ति च्छन्दसां शुद्धतमः प्रयोगः। सामान्यतः आधुनिककवयः पारसीकवार्णिकवृत्तानि मात्रिकीकृत्य प्रयुञ्जते येन संगीततत्त्वं तत्रत्यं विहन्यते[50]। अत्र सुविहितप्रयोगतया सफलगीतिकाव्यत्वमेतस्य संग्रहस्योद्भूतं दृश्यते॥

गलज्जलिकाप्रयोगे दोषाभासाः अपि केचनात्र प्रदर्श्यन्ते। सामान्यतया गलज्जलिकानां प्रथमपद्यस्य उभयपङ्क्तौ अन्त्यानुप्रासः भवति यत् पारसीकसाहित्यवद्भिः मत्ल,अ इत्युच्यते। परन्तु नवाचारः एष आधुनिकानां यत्ते एतं नैव प्रयुञ्जते। शाम्भव्यामप्यनेकत्र एवं कृतं यथा– सभायां कत्थसे धीमन्, कथं वर्ते, यतन्ते केइत्यादि गलज्जलिकासु।

गलज्जलिकायां न केवलमन्त्यशब्दानाम् अपितु उपान्त्यवर्णानामपि  समतुल्यस्वराणां समावृत्तिरावश्यकी। अशक्तिवशात् अज्ञानवशाद् अन्यथा वा संस्कृतकवयः एतन्न प्रयुञ्जते। एतादृशस्खलनं शाम्भव्यामपि विद्यते क्वचित् यथा सभायां कत्थसे धीमन् इत्यस्यां गलज्जलिकायाम्।

सामान्यतः गलज्जलिकायां एकस्यैव शब्दस्य वारं वारं अन्त्यानुप्रासतया योजनं स्पृहणीयं न मन्यते कविभिः यतस्तेन कवेः शब्दसामर्थ्यस्य अल्पत्वं द्योत्यते। शाम्भव्यां भूरिशः दृश्यते एतद् यथाजनः शून्यप्रभो जातः इत्यस्मिन् त्रिः पश्यन्निति, यतन्ते के इत्यस्मिन् दातुमिति द्विरावृत्तम्, एवं बहुत्र।

अलङ्काराणां मनोहारिणी विच्छित्तिः शाम्भव्यां सर्वत्रास्ते। अलङ्कारेषु परम्परितरूपकं यथा– “सहते न मनोभवचन्द्रपरिप्लुतयौवनवारिधितीव्ररयम्”[51]।वृत्त्यनुप्रासः–“ननु मुष्टिमितैरपि तुष्टिपराः। नरमांसबुभुक्षुतरक्षुसमाः”। “अहन्ता ते दुरन्ता नारिहन्ता शास्त्रमन्ता नो। इदन्ता तेऽनुगन्तेयं सभायां कत्थसे धीमन्”॥“बन्धुतापि किं धुता। एते प्रत्यग्रप्रयोगाः नितान्तरमणीयाः। अप्रस्तुतप्रशंसायाः सुन्दरं साम्राज्यं शाम्भव्यां सर्वत्र दृश्यते। तयैव स्त्रीणां विडम्बनात्मिकावस्था निपुणं प्रस्तुता अवलोक्यताम्–“नामरूपतोऽपि या पयोनिधौ विलीयते। हन्त तेन सागरेण सापगा विगीयते”॥ (विडम्बनम्) । स्त्रीपुंसयोर्मध्ये प्रेमव्यवहारे यदन्तरं तदन्यत्रापि सङ्कलने अग्निशिखाभिधे वर्णितं स्मृतिपथमवतरति–

 

मम निश्छलशुभ्रजले हृदये तवरूपमिदं प्रतिबिम्बयुतम्।

मलिने मुकुरे भवतो हृदये मम रूपमिदं न हि संक्रमितम्॥

उपदेशकाव्यस्य भूषणमस्ति अभिधाप्रधानता तथापि व्यञ्जनोत्थापिता उत्कृष्टकाव्यगुणा अपि तत्र तत्र काव्ये विलसन्तितराम्। “स्वपक्षान् कर्तयित्वा व्योमगामी तेऽभिलाषोऽयम्”– अत्र शब्दशक्त्युत्थः ध्वनिः पक्षशब्दपक्षे द्रष्टव्यतां वहति। तथैव–“घुणो भुङ्क्ते स्ववंशं रीतिरेवैतादृशी लोके” इत्यत्रापि। पाश्चात्त्यसंस्कृतिनिरसनप्रसङ्गे प्रतीचीशब्दः किमपि सौन्दर्यातिशयं पुष्णाति–“सदा प्राच्येव सूते भास्करं दीप्तं प्रभातार्थम्। प्रतीच्यां वर्धितास्ते स्नेहबन्धा नावसीयन्ते”॥ (कीदृशः कालः)

गलज्जिकायां विविधविषयत्वं भवति। प्रत्येकं च पद्यं तत्स्थं विषयदृशा स्वातन्त्र्यं भजते। अतः अनेकशः उपदेशपराणां पद्यानां मध्ये हार्दा रागात्मका अपि भावा व्यक्ताः सन्ति। तेषु पुनः काव्यत्वम् अतितरां वर्तते–

मया ते नामधेयं श्वाससन्तानेषु संयुक्तम्।सखेमैत्री त्वदीया पश्य वज्रान्ता कथं वर्ते॥

ग्रामवधूटी कविता सकलापि अनुरागवती विप्रलम्भशृङ्गाररसाढ्या–

चन्दनैश्चर्चितं ते वपुर्दृश्यते व्योममध्यस्थिते शीतरश्मेस्तनौ।

हन्त हस्तौ प्रसार्योपतिष्ठे यदा मेघमालाभिराच्छाद्यते तत् सखे॥

उपरितनं पद्यं कालिदासीयं – त्वामालिख्येत्यादि[52] मेघदूतस्थं काव्यं प्रसभं स्मारयति।गङ्गे इति काव्यं सर्वथा भिन्नरसं भक्तिभावाख्यं धत्ते।

शाम्भवी वस्तुतः गीतिकाव्यम्। सर्वत्र रागानुगुणा शब्दशय्या विराजते–

निर्वृतिं लभे यथा दुकूलतूलविष्टरे पांसुधूसरे रमे तथैवतार्णसंस्तरे।

अद्य नो कदाशया सदाशये कृतं पदं किं तथापि मे मनः समाकुलत्यहर्निशम्॥

काव्ये भावप्रवाहसौन्दर्यं दर्शयितुमिदं उदाहर्तुं शक्यते–

विभाति या सृतिः प्रफुल्लकेतकीव दन्तुरा प्रवातनीतमेघमालिकेव सास्ति भङ्गुरा।

अतोऽखिलं विहाय केशवाङ्घ्रिसङ्गभासुरा जगज्जटालजङ्गलेषु निर्भया भ्रमाम्यहम्॥ (निर्भया भ्रमाम्यहम्)

स्वभावानुगुणं कवयित्र्याः शैली महौजस्का वीर्यवती चास्ति। अनाचारिषु तस्याः वाणी कदापि मृदुः नास्ति। तस्याः सखरा वाणी एवं द्रष्टुं शक्यते –

प्रवृत्तं नाटकं कीदृङ् नटाः सर्वे खरा यत्र। अवार्ये प्रेक्षणे नृत्यन् जनः शून्यप्रभो जातः॥

खरीवात्सल्यवत् पित्रोर्वृथा स्नेहातिरेकोऽयम्। कुमार्गे प्रस्थिता याभ्यां न सन्ताना विनीयन्ते॥

कालिका करालिका कविता तथा ऊर्जिता यथा एतं पठित्वा अक्ष्णोरग्रे स्वयं कालिकावतीर्णेव विभाव्यते–

सहस्रदीर्घबाहुदण्डजालपूरिताम्बरा पिशाचकैर्नरीनृतीत्यनन्तसक्थिडम्बरा।

सदा निशुम्भशुम्भयोर्वधाय जातसङ्गरा कटत्कटत्स्वरेण चाकटीतु मुण्डमालिका[53]

काव्यानि रसानुगुणवस्तुव्याख्यानपराणि वस्तूनि कानिचन। अलङ्कारसन्निवेशरसिकता पाण्डित्यादिप्रदर्शनम् सामान्यतः कविताप्रवाहं तदीयं लक्ष्यं चावरुन्ध एव। संस्कृते शास्त्रकाव्यानां अलङ्कारप्रधानानां च काव्यानां परम्परा भूयस्तरास्ति। संस्कृतस्य प्रकृतिरपि तादृशी समृद्धिशालिनी अस्ति यत् कवयः शास्त्रेणालङ्कारप्रदर्शनेन वा प्रलुभ्यन्ते। काव्यकर्तव्याच्च च्यवन्ते। शाम्भव्यामपि यत्र यत्र व्याकरणप्रयोगाणां प्राधान्यमिष्टं तत्र तत्रकाव्यरसप्रवाहः स्तिमितः दृश्यते। कविता तु स्वामपहाय कस्यचिदप्यन्यस्य मुख्यत्वं न सहते। तथापि सन्देश एतासां कवितानां स्पष्टः ऊर्जितः चास्ति। व्याकरणस्य सायासनियोजनेनापि अत्र द्व्याश्रयता, द्विसन्धानता शास्त्रकाव्यता वा संक्रान्तास्ति। तथापि भूयस्यस्तादृश्यः कविता विद्यन्ते यासु काव्यप्रवाहः  उपसर्जनीकृतशास्त्रालङ्कारः रसाधिक्यं परिपुष्णाति यथा अहर्निशम् आदिषु कवितासु।

चर्चयानया निश्चप्रचमेतद् यद् ओजस्विना अदुष्टेन चकाव्यशिल्पबलेन शाम्भवी स्वीयोदात्तसन्देशसम्प्रेषणे नितरामवाप्तसाफल्या गीतिकृतिरिति।

 

 

 

 

 

 

संकलिताः सन्दर्भाः–

संस्कृतम् –

शर्मा, शिवदत्त तथा शर्मा, काशिनाथ (सम्पा॰).१८९४. ‘प्राकृतपिङ्गलसूत्राणि’ – लक्ष्मीनाथभट्ट विरचितया व्याख्ययानुगतानि , निर्णयसागर प्रैस मुम्बई ।

श्रीदुःखभञ्जनकविः. १९३३.वाग्वल्लभः (तदात्मजश्रीदेवीप्रसादकविचक्रवर्तिना कृतया वरवर्णिनी–टीकया समलङ्कृतः).चौखम्बा संस्कृत सिरिज़ आफिस, बनारस सिटी।

झळकीकरः, वामनाचार्यः (बालबोधिनीकारः).१९५०. माम्मटः काव्यप्रकाशः. भाण्डारकरप्राच्यविद्यासंशोधनमन्दिरम्, पुण्यपत्तनम्।

रामकृष्णकवि, एम्॰ (सम्पा॰).१९५०.जानाश्रयी छन्दोविचितिः.श्रीवैंकटेश्वर ओरिएण्टल इंस्टीट्यूट, तिरुपति।

पाठक, जगन्नाथ (प्रकाशाभिधहिन्दीव्याख्याकारः).१९६५. सलोचनः ध्वन्यालोकः.१९६५. चौखम्बाविद्याभवन वाराणसी।

व्यास, डा̆॰ भोलाशंकर (सम्पा॰).१९५९. प्राकृतपैङ्गलम्. प्राकृतग्रन्थपरिषद् , वाराणसी–५।

देवनाथ, रामानुज (२०१३) .छन्दोमाला. संस्कृतप्रतिभा (संयुक्ताङ्कः जनवरी २०१३–दिसम्बर२०१३ संयुक्ताङ्कः) –पत्रिकायां प्रकाशितं नवीनं शास्त्रम्, साहित्य अकादमी, दिल्ली।

दीक्षित, पुष्पा. २०१२.शाम्भवी. राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानम्, नवदेहली।

हिन्दी –

‘भानु’, जगन्नाथ प्रसाद.१९३६.छन्द प्रभाकर. जगन्नाथ प्रेस, बिलासपुर ।

प्रसाद,डा̆ शिवनन्दन.१९६४. मात्रिक छन्दों का विकास, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना ।

डा̆॰नरेश.१९९१. ग़ज़ल : शिल्प एवं संरचना. हरियाणा साहित्य अकादमी, १५६३,सैक्टर १८–डी, चण्डीगढ़

फ़ारसी–

शमीसा, डा̆॰ सीरूस. १३९३ हिजरी. आशनाई बा उरूज़ो क़ाफ़िये. नश्रे मीत्रा, तेहरान, ईरान ।

[1]आनन्दवर्धनेन ध्वन्यालोक ३–४२ कारिकाया वृत्तावुद्धृतः।

[2]काव्यप्रकाशः उल्लास७–सूत्र७१

[3]शाम्भवी ६३ (सर्वत्रापि इयं संख्या पृष्ठाङ्कं द्योतयति)

[4]शाम्भवी ५३

[5]शाम्भवी १७

[6]शाम्भवी २५

[7]शाम्भवी २

[8]शाम्भवी ६२

[9]चाणक्यनीतिः १३–८

[10]शाम्भवी ९

[11]शाम्भवी २०

[12]शाम्भवी ७३

[13]शाम्भवी– आन्तरम् vii-viii

[14]ईशावास्योपनिषत्–७

[15]विश्वबन्धुता गता, शाम्भवी ४९

[16]अर्हाणां कर्तृत्वेऽनर्हाणामकर्तृत्वे तद्वैपरीत्ये च (वा॰ १४८७–१४८८) सिद्धान्तकौमुदी, कारकादिविभक्तिप्रकरणम्।

[17]शाम्भवी ५ तत्करोति तदाचष्ट इति णिच्।

[18]शाम्भवी १२

[19]प्रतिभाप्रकाशन, दिल्लीतः प्रकाशमायातः।

[20]यङो वा– अष्टाध्यायी ७.३.९४

[21]स हत्वा वालिनं वीरस्तत्पदे चिरकाङ्क्षिते।
धातोः स्थान इवादेशं सुग्रीवं संन्यवेशयत्॥ रघुवंशम् १२.५८, तत्रैव १५.७,१५.९

[22]शाम्भवी २–४

[23]फ़ारसी छन्द तथा उनका संस्कृत काव्य में अनुप्रयोग

[24]ननु तोटकमब्धिसकारयुतम्। वृत्तरत्नाकरः–

[25]शाम्भवी २–४

[26]शाम्भवी २–४

[27]अभिज्ञानशाकुन्तलम् १–

[28]शाम्भवी ४६

[29]फ़ारसी छन्द तथा उनका संस्कृत काव्य में अनुप्रयोग (अप्रकाशितनिबन्ध)–बलरामशुक्ल

[30]लहौ विद्या लहौ रत्नै लखौ रचना विधाता की (छन्दप्रभाकर पृ॰–७०)

[31]शाम्भवी ७३

[32]शाम्भवी १४

[33]शाम्भवी ४५

[34]शाम्भवी ५६

[35]शाम्भवी ७२

[36]छन्दःप्रभाकर १७७

[37]छन्दःप्रभाकर १७१

[38]शाम्भवी ४२

[39]छन्दःप्रभाकर १६१

[40]शाम्भवी ४९

[41]शाम्भवी ३९

[42]शाम्भवी ५३

[43]जहि आइ हत्थ णरेंद विण्ण वि पाअ पंचम जोहलो – जहि ठाइ छट्ठहि हत्थ दीसइ सद्द अन्तहि णेउरो।

सइ छन्द गीअउ मुद्धि पीअउ सव्वलोअहि जाणिओ – कइसिट्ठि सिट्ठउ दिट्ठउ पिंगलेण बखाणिओ ॥ (प्राकृतपैङ्गलम् –२–१९६)

[44]अष्टाधिका किल विंशतिश्च कला भवेयुरथो पदे। इषुषट्शराशुगपञ्चमात्रिकनिर्मितायतयतिपदे॥

चरमोपगेन तथा भवेद् गुरुणैककेन नियोजिते। हरिगीतवृत्तमिदं फणीश इति प्रवक्ति विशेषिते ॥

[45]वाग्वल्लभ पृ॰ २४२

[46]छन्दप्रभाकर पृ॰ २४४

[47]छन्दःप्रभाकर पृ॰ १२६

[48]शाम्भवी २२–२४

[49]शाम्भवी ६०, राधावल्लभत्रिपाठिनापि समष्टिसंग्रहे धृतायां स्वीय–शनैः शनैः इतिकवितायां एष प्रयोगः कृतः।

[50]फ़ारसी छन्द तथा उनका संस्कृत काव्य में अनुप्रयोग (अप्रकाशितनिबन्ध)–बलरामशुक्ल

 

[51]शाम्भवी ४

[52]मेघदूतम् २–३८

[53]शाम्भवी ७१

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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Sanskrit blog : Chandrika (A Fairy tale)-70

Simple Sanskrit - Sat, 12/31/2016 - 16:23
चन्द्रिका-७०
राज्ञ्यासह स्वप्रकृतीः स्वयमेव राजा सप्रश्रयं ह्यससभाजत राजसौधे ।चन्द्रः नभस्युडुगणान् दयितान् ससन्ध्यः सुस्वागतं न किमसौ वदति प्रदोषे ॥ २५० ॥
कन्याद्वयी परिणये धनिकैश्च दीनैःऔद्वाहिकैर्बहुविधैरभिवर्षिताभूत् ।आशीर्भिरीप्सितफलप्रदवेदवाक्यैःनोपायनं खलु सुखाय यथा सदाशीः ॥ २५१ ॥
सन्तर्पयन्ति सकलान् स्म नरेशसूदाःचोष्यैश्च लेह्यलवणैः वरभक्ष्यभोज्यैः ।              पेयद्रवैः मधुरचर्वणयोग्यपूगैः   सत्कृत्य सादरममूल्यनवोपदाभिः ॥ २५२ ॥
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भो मन: विचित्रं ते स्वभाव:

वदतु संस्कृतम - Fri, 12/30/2016 - 08:24
यदा व्यस्थ: सन् चिन्तयामि .. तदा मनसि अनियन्त्रिता: चिन्ता: भवन्ति |   यदा किञ्चित् लिखामि इति विरामेण चिन्तयामि .. तदा मनसि शून्यता भाव: !!  भो मन: विचित्रं ते स्वभाव: !

जानन् अपि काल-हरण दुष्परिणामान् ... तेषु एव प्रेरयति मन: |
क्लिष्टः एव मनो-नियन्त्रणम्  |

वदतु संस्कृतं |

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Sanskrit blog: Chandrika ( A Fairy tale )-69

Simple Sanskrit - Sat, 12/24/2016 - 15:59
चन्द्रिका-६९उद्वाहसंभ्रमविधिं पथि घुष्यमाणां श्रुत्वा भटैः निजसुखाय यदृच्छयैव । कर्माणि वृत्तिसहजानि विहाय पौराःरथ्यास्वलङ्करणकर्मणि संप्रवृत्ताः ॥ २४६ ॥
कैश्चित्स्वसौधशिखरेषु च चत्वरेषुसंस्थापिताः गगनचुम्बिलसत्पताकाः ।कुड्यानि सद्मनिकरस्य सुधावलेपैःनूत्नश्रियंह्युदवहन् पुरि राजमार्गे ॥ २४७ ॥
रथ्याः सुगन्धिहिमशीतलवारिसेकैः अम्लानपुष्पनिचयग्रथितार्द्रहारैः ।कन्दर्पचित्रफलकैः निशि दीपवृक्षैःकामप्यपूर्वसुषमामतुलामवापुः ॥ २४८ ॥- - - -http://gssmurthy.blogspot.com http://murthygss.tripod.com/ http://sanskritcentral.com
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Sanskrit blog : Chandrika ( A Fairy tale)-68

Simple Sanskrit - Sat, 12/17/2016 - 15:38
चन्द्रिका-६८
विकसितकुसुमे पपात भृङ्गः नवमकरन्दपिपासितो हि दिष्ट्या।रुचिकरमभवत्भिषक्प्रदत्तंशिवदयया हितमातुरस्य पथ्यम् ॥ २४३ ॥
न किमपि ललना शशाक वक्तुंविलसदपाङ्गदृशः भृशं किलोचुः । स्मितसहितपरस्परेक्षणैस्तत्-तरुणयुगं निजसम्मतिं बभाषे ॥ २४४ ॥  x x xपौरान्न्यमज्जयतलौकिकहर्षसिन्धौपृथ्वीशपुत्रसुखदामलचन्द्रिकाभा ।संश्रुत्य ते नृपपथेषु विवाहयुग्म-वार्तां मिथो शुभकरीं बहुधा शशंसुः ॥ २४५ ॥- - - -http://gssmurthy.blogspot.com http://murthygss.tripod.com/ http://sanskritcentral.com
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Sanskrit blog: Chandrika ( A Fairy tale)-67

Simple Sanskrit - Sat, 12/10/2016 - 15:35
चन्द्रिका-६७ 
स्वसुतपरिणये निविष्टचित्तःचतुरमतिस्सचिवस्तदा बभाषे ।निरवधिकगुणो युवा सुरूपीमम सुत एव भवेदुमोपयन्ता ॥ २४० ॥
अभजत हृदयं सुखं कलायाः निजतनुजोपयमप्रकल्पनोत्थम् । विकचसुमरुचिं बभाज तन्व्याःमुखमनिरीक्षितमङ्गलादुमायाः ॥ २४१ ॥
तदनु सपदि मन्दहासमूर्तिः सचिवसुतः गिरिशाभिधः बभाषे । प्रियतमपदवीं दधीत रम्या यदि मयि मत्सुखमेत्यपूर्वकाष्ठाम् ॥ २४२ ॥ 
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Dr. Bannanje Govindacharya - Udupi of Lord Krishna

Sanskrit Net Loka - Wed, 12/07/2016 - 19:14



Bannanje Govindacharya -Udupi of Lord KrishnaOriginal in Kannada by Bannanje GovindacharyaEnglish Translation by Dr. U. P. UpadhyaRevised and edited by N. Bharatheesha Ballal , C. A
Ishavasya Prathishthana ,Ambalapady , Udupi - 576103
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