Stotra - Pooja

वे बूढ़े

ब्राह्मण उवाच - Mon, 04/09/2018 - 20:43
वे बूढ़े..
तब से करते हैं...लड़ाई,
अपने आप से..जब वे पैदा करते हैं
अपने बच्चे..
करते हैं जीवन संघर्ष..
काम...कड़ी मेहनत,
झेलते हैं..सहते है..तमाम क्लेश, क्लांति..
कभी करते क्रोध,
तो कभी समझाते शांति..
पर...
आदर्शों के साथ जीना..
और देना अच्छे संस्कार...
रहता है सदा उनका लक्ष्य।
और फिर बीतता है समय...
जब वे दोनों,
अपने दोनों की बगिया को सींचते हैं,
लगाते हैं अपना समय..
अपना सारा मन..सारा धन
अपने बच्चों पर..
उनका ये निवेश...
उनका कर्तव्य ही तो है..
जी तोड़ मेहनत से-
अपने सभी तंतुओं को बटोरकर
एक-एक पाई जोड़कर
वे खड़ा करते हैं,
उनके लिए आधार..
जो जीवन की आँधी में हिले नहीं,
देते है घनी छाया-
बचाए जो धूप के थपेड़ों से से..
पर ये निवेश भी डूब जाता है,
सट्टा बाजार की तरह..
जब..उनके दोनों.. इन दोनों को
जमा कर देते हैं किसी वृद्ध घर में
और सिखाते हैं औकात,
बताते हैं गलतियाँ उनके जीवन की।
और तब... लगता है उन्हें..
जैसे यह पिछले जनम का
कुछ चक्कर तो जरूर है..
पर..
यही तो शाश्वत सत्य है,
औलाद तो हमेशा से ऐसी ही रही है भाई,
जिसने मरने के बाद भी नहीं छोड़ा..
उनकी मिट्टी में भी आग लगाई।

©mukesh_nagar
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श्रीमद्भागवत प्रथम स्कन्ध तीसरा अध्याय

ब्राह्मण उवाच - Thu, 04/05/2018 - 17:48
श्रीमद्भागवत प्रथम स्कन्ध
तीसरा अध्याय
यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितः लोकविस्तरः।
तद्वै भगवतो रूपं विशुुद्धं सत्वमूर्जितम् ।।1/3/3
भगवान के उस विराट रूप के अंग प्रत्यंग में ही समस्त लोकों की रचना की गई है। वह प्रभु का विशुद्ध सत्वमय श्रेष्ठ रूप है।

पश्यंत्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा सहस्त्रपादोरुभुजाननाद्भुतं।।
सहस्त्रमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं सहस्त्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत। 1/3/4
योगीजन दिव्य दृष्टि से भगवान के उस रूप का दर्शन करते हैं। भगवान का वह रूप सहस्त्र पैरों, चक्षुओं और सहस्त्र नासिकाओं वाला है।हजारों मुकुट, वस्त्र और कुंडल आदि आभूषणों से वह उल्लासित रहता है।

एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्।यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यंङ्गरादयः।।1/3/5
भगवान का यही पुरुषरूप जिसे  नारायण कहते हैं, अनेक अवतारों का अक्षय कोष है।इसी से सारे अवतार प्रकट होते हैं। और इनके ही सूक्ष्म अंश से पशुपक्षियों और मनुष्यादि योनियों की सृष्टि होती है।

अवतार वर्णन
***********
स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः।
चचार दुश्वरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम्।।1/3/6

प्रभु ने पहले कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार- इन चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण करके अत्यंत कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया।

द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम्।
उद्धरिष्यन्नुपादत्त यज्ञेशः सौकरं वपुः।।1/3/7
दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिए समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान ने ही रसातल में गई हुई पृथ्वी को निकाल लाने के विचार से सूकर रूप ग्रहण किया।

तृतीयमृषिसर्गम् च देवर्षित्वमुपेत्यसः।
तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्य कर्मणां यतः।1/3/8

ऋषियों की सृष्टि में उन्होंने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तंत्र (नारद पाश्चरात्र) का उपदेश दिया और कर्मों के द्वारा कर्मबन्धन से मुक्ति का मार्ग बतलाया।

तुर्ये धर्मकला सर्गे नरनारायणा वृषी।
भूत्वात्मोपश्मोपेतमकरोहुश्वरं तपः।।1/3/9

श्री नारायण ने धर्मपत्नी मूर्ति के गर्भ से चौथा अवतार नर तथा नारायण के रूप में लिया और ऋषियों के रूप में मन और इंद्रियों का सर्वथा संयम करते हुए कठिन तपस्या की।

पंचमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम्।
प्रोवाचासुरये सांख्यं तत्वग्राम विनिर्णयम्।।1/3/10
पंचम अवतार में वे सिद्ध कपिल स्वामी के रूप में प्रकट हुए और तत्व निर्णय करने वाले समय के साथ लुप्त हो चुके सांख्य शास्त्र को पुनर्जीवित किया और आसुरि नाम ब्राह्मण को इसका उपदेश दिया।

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श्रीमद्भागवत प्रथम स्कन्ध द्वितीय अध्याय से चुने हुए कुछ मोती

ब्राह्मण उवाच - Thu, 04/05/2018 - 17:47
यो लीलालास्यसंलग्नो गतोsलोलोsपि लोलताम्।
तं लीलावपुषं बालं वन्दे लीलार्थ सिद्धये।।
स्वपुरुषमपि वीक्ष्य पाशहस्तं वदति यम किल तस्य कर्णमूले।
परिहर भगवत्कथासु मत्तान प्रभुरहमन्यनृणा न वैष्णवानाम्।।
अपने दूत को पाश हाथ मे लिए देखकर यमराज उसके कान में कहते हैं-
'देखो! जो भगवान की कथावार्ता में मत्त हो रहे हों, उनसे दूर रहना; मैं औरों को दण्ड देने की शक्ति रखता हूँ, वैष्णवों को नहीं '।।

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरघोक्षसे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाssत्मा संप्रसीदति।1/2/6
मनुष्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है जिससे भगवान श्री हरि में भक्ति हो।भक्ति भी ऐसी जिसमें किसी प्रकार की कामना न हो और जो नित्य निरन्तर बनी रहे। ऐसी भक्ति से हृदयः आनंदस्वरूप परमात्मा की उपलब्धि कर कृतकृत्य हो जाता है।

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्।।1/2/8
धर्म का ठीक-ठीक अनुष्ठान करने पर भी यदि मनुष्य के हृदय में भगवान की लीला और कथाओं के प्रति अनुराग का उदय न हो तो वह निरा श्रम ही श्रम है।

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः।
जन्यत्याषु वैराग्यं ज्ञानं यत्तदहैतुकम् ।।1/2/7
भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति होते ही अनन्य प्रेम से उनमें चित्त जोड़ते ही निष्काम ज्ञान और वैराग्य का आविर्भाव हो जाता है।

धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोंsर्थायोपकल्पते।
नार्थस्य धर्मेकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः।1/2/9
धर्म का फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थ- प्राप्ति में नहीं है। अर्थ केवल धर्म के लिए है। भोग-विलास उसका फल नहीं है।

कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।
जीवस्य तत्व जिज्ञासा नार्थो यश्व्वेह कर्मभिः।1/2/10
भोग का फल इंद्रियों को तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन है केवल जीवन निर्वाह। जीवन का फल भी तत्व जिज्ञासा अर्थात प्रभु को खोजने-पाने की जिज्ञासा है, बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल कदापि नहीं।

वदन्ति तत्तवविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते।1/2/11
तत्वज्ञानी लोग अखंड सच्चिदानंद ज्ञान को ही तत्व कहते हैं। उसी को कोई ब्रह्म कोई परमात्मा और कोई भगवान कह के पुकारता है।

स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषितम्।1/2/13
मनुष्य के धर्म की सिद्धि इसी में है कि भगवान प्रसन्न हों।
तस्मादेकेन मनसा भगवान्सात्वतां पतिः।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूजयश्च नित्यदा।1/2/14
इसलिए एकाग्र मन से भक्तवत्सल भगवान का ही नित्य निरंतर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिए।

यदनुध्यसिना युक्ताः कर्म ग्रंथि निबंधनम्।
छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात्कथारतिम्।1/2/15
कर्मों की गाँठ बहुत कड़ी है, विचारवान पुरुष भगवदचिन्तन की तलवार से उसे काट सकते हैं, तो भला कौन ऐसा मनुष्य होगा जो भगवान की लीला कथा में प्रेम न करे।

श्रवणतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।1/2/17
भगवान श्रीकृष्ण के यश जा श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करने वाले हैं।

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनिश्वरे।।1/2/21
हृदय में आत्मस्वरूप भगवान का साक्षात्कार होते ही हृदय की ग्रंथि टूट जाती है, सारे संदेह मिट जाते हैं और कर्मबन्धन क्षीण हो जाता है।

वसुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।
वासुदेवपरा योगा वसुदेवपराः क्रियाः।।1/2/28
वेदों का तात्पर्य श्रीकृष्ण ही है। यज्ञों का उद्देश्य श्रीकृष्ण ही है। योग श्रीकृष्ण के लिए किए जाते हैं और समस्त कर्मों की परिसमाप्ति भी श्रीकृष्ण में ही है।
वासुदेवपरं ज्ञानं वसुदेवपरं तपः।
वसुदेवपरो धर्मो वसुदेवपरा गतिः।।1/2/29
ज्ञान से ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण की प्राप्ति होती है।तपस्या श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही की जाती है। श्रीकृष्ण के लिए ही धर्मों का अनुष्ठान होता है और सब गतियाँ श्रीकृष्ण में ही समा जाती हैं।


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श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् 3/73

ब्राह्मण उवाच - Thu, 04/05/2018 - 17:44
अस्ति स्वस्तरुणी कराग्र विगलत
यस्तु प्रस्तुत वेणुनाद लहरी निर्वाण

सकलभुवनमध्ये निर्धनास्तेsपि धन्या
नियसति हृदि येषा श्रीहरेर्भक्तिरेका
हरिरपि निजलोकं सर्वथातो विहाय प्रविशति हृदि तेषा भक्तिसूत्रोपनद्ध।
जिनके हृदय में एकमात्र श्रीहरि की भक्ति निवास करती है, वे त्रिलोक में अत्यंत निर्धन होने पर भी परम धन्य हैं, क्योकि इस भक्ति की डोरी में बँधकर तो साक्षात भगवान भी अपना परमधाम छोड़कर उनके हृदय में आकर बस जाते हैं।

सकलभुवनमध्ये निर्धनास्तेऽपि धन्याः

निवसति हृदि येषां श्रीहरेर्भक्तिरेका ।

हरिरपि निजलोकं सर्वथातो विहाय

प्रविशति हृदि तेषां भक्तिसूत्रोपनद्धः ।।


संसारसागरे मग्नः दीनं मा करुणानिधे।
कर्ममोह गृहीतांङ्ग मामुद्दर भवार्णवात।
हे करुणानिधान प्रभो! मैं संसार सागर में डूबा हुआ दीन व्यक्ति हूँ। कर्मों के मोह रूपी ग्राह ने मुझे पकड़ रखा है।अब आप ही इस संसार सागर से मेरा उद्धार कर सकते हैं।

श्रीमद्भागवताख्याsय प्रत्यक्ष कृष्ण एव हि।
स्वीकृतोsसि मया नाथ मुक्त्यर्थे भवसागरे।
श्रीमद्भागवत रूप में आप साक्षात श्रीकृष्ण ही विराजमान हैं, हे नाथ! मैंने भवसागर से छुटकारा पाने के लिए आपकी शरण ले ली है।

मनोरथो मदीयोsय सफल सर्वथा त्वया।
निर्विघ्ने नैव कर्तव्यो दासोsहं तव केशव।
मेरा मनोरथ आप बिना विघ्न बाधा के साङ्गोपाङ्ग पूरा करें। हे केशव! में तो आपका दास हूँ।

लोकवित्तधनागार पुत्र चिंता व्युदस्य च।
कथाचित्तं शुद्धमति स लभेत फलमुत्तमम्।।
जो पुरुष लोक, संपत्ति, धन, घर और पुत्रादि की चिंता छोड़कर शुद्धचित्त से केवल भगवत्कथा में ही ध्यान रखता है, उसे इस श्रवण का उत्तम फल मिलता है।

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श्री हनुमान जन्मोत्सव विशेष

ब्राह्मण उवाच - Sat, 03/31/2018 - 13:08
श्री हनुमान जन्मोत्सव विशेष
********************
        प्रभु श्रीरामजी ने रावण का वध कर पृथ्वी को भार मुक्त कर दिया।
         विभीषण और सुग्रीव अपना राज सँभालने में लग गए थे।
          वानर अब भी अपने प्रभु राम को छोड़कर जाना चाहते नहीं थे, परन्तु प्रभु की आज्ञा से वे भी बुझे मन वापस लौटने लगे।
           सौमित्र अपने हाथों से सभी को फल-फूलों के साथ विदा दे रहे थे।
           विभीषण और सुग्रीव भी पुष्पक से अयोध्या तक श्री राम को पहुँचाने की अनुमति तो प्राप्त कर चुके थे, पर उन्हें फिर लौटना ही है।
        इधर श्रीराम एक विशाल शिला पर बैठे समुद्र की उठती गिरती लहरों को निर्विकार निहार रहे हैं।
और...
           हनुमानजी प्रभु के चरणों में बैठे हैं और अपने दोनों हाथों से बारी-बारी से चरणों को धोकर दुपट्टे से पोंछते और दबाने लगते हैं।
उनके नेत्र बन्द हैं...
मुख से मन्द स्वर में नामजप...
सीताराम! सीताराम! की ध्वनि निकल रही है...
जो किसी अन्य के कर्णो तक नही जाती।
बस हृदय में विराजमान प्रभु ही उसे सुन पा रहे हैं।
इस प्रकार हनुमंतलालजी देह और जीव दोनों से ही प्रभु सेवा का सुख पा रहे हैं...
ऐसा सुख जो जन्म-जन्मांतर की कड़ी तपस्या के पश्चात भी मुनियों को भी प्राप्त नहीं होता।
"जनम जनम मुनि जतन कराहीं।
अंत राम कहीं आवत नाहीं।"
बजरंगी के दोनों बन्द नेत्रों से भक्ति और प्रेम की अधिकता आँसू बह रहे हैं, अश्रुओं ने बह कर ज्यों ही श्री राम के चरणों को भिगोया..
प्रभु चौंके...
अपने चरण उन्होंने अपनी तरफ खींच लिए, हनुमान पर मानो वज्रपात हुआ...
उन्हें लगा जैसे जीव अब देह से अलग होने को ही है।
प्रभु के चरण उनसे विलग कैसे हो सकते हैं?
राम के मुख पर सदा की भाँति जगन्मोहिनी मुस्कान है...
पर एक प्रश्न भी-
'सुनो वत्स! तुम कौन हो?'
'कौन होs तुम?'
ये क्या? प्रभु ने मुझे विस्मृत ही कर दिया लगता है।
अब सम्भले हनुमत बीरा।
ब्रह्मसत्य, जगतमिथ्या ।
'अष्टसिद्धि नवनिधि' के स्वामी हनुमान जी संसार के समस्त जीवों की बुद्धि का प्रतीक हैं, सो तुरंत समझ गए कि प्रभु पूछ क्या रहे हैं।
बोले-
देह दृष्ट्या तु दासोsहं, जीव दृष्ट्या त्वदंशकः।
वस्तुतस्तु त्वमेवाहं, इति मेsनिश्चिता मतिः।।

प्रभु! इस शरीर के रूप में मैं आपका दास हूँ
तथा जीव के रूप में मैं आपका ही अंश हूँ।
परंतु प्रभु! मेरी मति कहती है कि आत्मा के रूप में वस्तुतः मैं वही हूँ जो स्वयं आप ही हैं।

प्रभु हँसे..उन्होंने प्रसन्न होकर हनुमानजी को सदा अपने साथ रहने का वरदान दिया और अपने कंठ से लगा लिया।





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सामवेद से...

ब्राह्मण उवाच - Fri, 03/30/2018 - 15:01
नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः। अमैरमित्रमर्दय।।2/1samved
हे अग्नि देव! आप सामर्थ्यवान एवं अतुलनीय पराक्रम वाले हैं, इसलिए समस्त साधकजन आपको नमस्कार करते हैं। आप अहितकरियों के विनाशक हैं, उनका संहार करें।

उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्।3/11samved
संसार को सूर्य का दर्शन बोध करने के लिए, उसकी किरणों जातवेद(सूर्य) से जिसकी उत्पत्ति समझी जाती है-वे ऐसे ही अग्निदेव को धारण किए रहतीं हैं।

शं नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः। 3/13 samved
हमें सुख शांति प्रदान करने वाला जल प्रवाह प्रकट हो। वह जल पीने योग्य, कल्याणकारी एवं सूखकर हो।
(ध्यान दें कि सामवेद का अग्नि को समर्पित यह मंत्र जल के लिए है। संशय नहीं होना चाहिए । हमारे ऋषियों ने पहले ही यह खोज कर ली थी की जल का स्रोत भी अग्नि ही है और बाद में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने हमारे वेदों को डिकोड कर अग्नि ईंधन हाइड्रोजन और वायु अर्थात आक्सीजन के संयोग से H2O बनता है बताया।)

सोमं राजानं वरुणमग्निमन्वारभामहे।
आदित्यं विष्णु सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्।10/1सामवेद
हम श्रेष्ठ श्रुति के माध्यम से राजा सोम, वरुण, अग्नि, आदित्य, विष्णु, सूर्य, ब्रह्मा और बृहस्पति का आवाहन करते हैं।

प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तरति वाजकर्मभिः। यस्य त्वं सख्यमाविथ ।12/2
हे अग्निदेव! आप जिसके मित्र बनकर सहयोग करते हैं, वे स्तोतागण आप से श्रेष्ठ सन्तान, अन्न, बल आदि समृद्धि प्राप्त करते हैं।

भद्रो नो अग्नि राहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः। भद्रा उत प्रशस्तयः।12/5
हवियों से संतुष्ट हुए हे अग्निदेव! आप हमारे लिए मंगलकारी हों। है ऐश्वर्यशाली! हमें कल्याणकारी धन प्राप्त हो और स्तुतियाँ हमारे लिए मंगलमयी हों।


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महादेव की होली

ब्राह्मण उवाच - Thu, 03/01/2018 - 12:04
महादेव की होली
**************
फागुन आयो जब कासी में
होरी खेलै तब मात चलीं।
वै औघड़दानी ध्यान रहै,
औ माता के करतब सूझी
तब महादेव के भसम रची।
सब अंग भर दई चंदन ते,
कर्पूरी तन भस्माङ्ग राग
त्रिपुरारी के कछु भान नहीं।
जे भसम उरी,पड़ी अखियन में
तब सरपराज फुफकार भरी।
बिष की फुरकी छुई चंदा पै
दुइ बूँद सुधा तब टपक परी।
ज्यों अमिय ने चूमि मृगछाला
बस सुन्दर जीवित हरिन बनी।
वै हरिन छलावा बन बन में
धावत सरपट लै जनम नई।
तब भए दिगम्बर अड़भंगी
औ लाज लगी सब भक्तन के
तब जय जय जय जयकार भई।
सब देव पुष्प बरसात करी
सिवसंभू तब खोले लोचन
सब लोकन पर उपकार करी।
अईसे रस बरसे फगुआ के
जब सिव-संकर खेलें होरी।
********
यह कथानक है तब का जब महादेव ने श्रीहरि के समझाने पर तपस्यारत हिमालय पुत्री से विवाह किया और गौना करके माता पार्वती को स्वनगरी काशी ले आए थे।
बैरागी अघोरी प्रभु ध्यान में, समाधि में मग्न हैं।
जगतजननी माता पार्वती और महादेव के गण अपने प्रभु से होली खेलने को उत्सुक हैं पर शिवशम्भू का ध्यान है कि टूटता ही नहीं।
माता को ठिठोली सूझती है..
नंदी आदि गणों को साथ लेकर वे समाधिस्थ शंकर भगवान को भस्म-चंदन से नहला देती हैं। त्रिलोचन प्रभु भस्माङ्गराग होते है पर समाधि अब भी नही हटती।
तभी एक विशेष घटनाक्रम इस पूरी स्थिति को होलीमय कर देता है।
माता के राख-भस्म विभूषित करने पर महेश्वर के गले का हार बने भुजंगराज की आंखों में उड़कर भस्म चली जाती है। नागराज क्रोधित होकर फुफकारते हैं तो विष की फुहार नीलकंठ के मस्तक पर विराजित चंद्रदेव पर पड़ जाती है।
चंद्रदेव विष का प्रभाव समाप्त करने हेतु पीयूष की बूँदे टपकाते हैं ।
उनमें से दो बूँदें त्रिपुरारी के मृगचर्म पहनी छाल पर गिर जाती हैं।
अब क्या था- अमृत से मृग की वह चर्म छाल जीवित हो सुंदर मृग में बदल जाती है और मृग वन में भाग जाता है और महादेव पूर्ण दिगम्बर हो जाते हैं।
माता सहित सब लज्जित होते हैं और
'हर-हर महादेव' की जय जयकार करते हैं, सभी देवता इस लीला को देख आकाश से पुष्पवर्षा करते हैं।
अब महादेव की समाधि कोलाहल करतल ध्वनि श्रवण कर टूट जाती है।
वे अपने चक्षु खोलते हैं। चहुँ ओर प्रकाश फैल जाता है।
तीनो लोकों को प्रभु दर्शन देते हैं ...
ऐसे होती है प्रभु शिवशम्भो की होली।
...और इस काव्य का तभी जन्म होता है।
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इलेक्शन ड्यूटी

ब्राह्मण उवाच - Sat, 01/27/2018 - 19:42
पढ़े...तनाव कम करें और आनंद लें।
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सरकारी कर्मचारी..
पीड़ा की पराकाष्ठा है ये अनायास ही आ गया उपचुनाव।
दो हफ्ते पहले तक जब ड्यूटी की लिस्ट रेलवे में पहुँची नहीं तो कुछ बुद्धिमान कर्मचारियों के रिमार्क्स कुछ ऐसे थे।
"अरे! अब नहीं आएगी, ये स्टेट वालों ने टीए कमाने के लिए अपने-अपनी लगा ली है यार। वैसे भी ये उपचुनाव है, ज्यादा कर्मचारियों की जरूरत तो है नहीं।"
"अभी आ सकती है, पिछली बार तीन-चार दिन पहले तक आई थी"
फिर एक दिन....
किसी बाबू ने जैसे बम पटक दिया...
सत्तर लोगों की लिस्ट आ गई।
सबने नोट किया, जो बचे... खुश हुए।
तीन दिन बाद एक और लिस्ट।
बड़े-बड़े तुर्रम खां इस बार लिस्ट में थे...
कुछ ने प्रशासन को गालियाँ बक कर अपना गुबार निकाला, भारी मन से प्रशिक्षण की तारीख नोट कर ली।
अब तो चार दिन ही बचे थे। जिनका नाम नहीं आया वे अपने आपको वी.आई.पी. समझ रहे थे।
फिर अचानक...
उन वी.आई.पी.की भी आ ही गई..
अरे...मौत नहीं..., इलेक्शन ड्यूटी..
शाश्वत सत्य है यह तो...
कोई नहीं बचा है, जाना तो सबको है।
मृत्यु और चुनाव ड्यूटी ने कभी किसी को छोड़ा है क्या?
लोग लग गए ड्यूटी कटवाने में...
अपने पूरे जीवन के कर्मों का लेखा जोखा लेकर कलेक्टरी के चक्कर काटे।
सारी तिकड़म, पहुँच... का प्रयोग कर...
कुछ ने तो बीमारी का सर्टिफिकेट ही बना लिया।
फिर कुछ सफल भी हो गए..
हाँ-हाँ...
कटवाने में अपनी-अपनी....
ड्यूटी।
जिनकी कट गई वो आश्चर्यजनक रूप से शांत हैं...
कि कोई और उनको अपनी कटाने के लिए न कह दे।
पर मन ही मन प्रसन्न...
बिल्कुल ऐसे ही जैसे अचानक फाँसी की सजा कैंसिल हो गई हो।
और...
जिनकी नहीं कटी...
"अरे..कुछ नहीं है, बहुत करा दी ऐसी तो.."
पिकनिक है...,मजे करेंगे...।"
पर काया जानती है सब...
झेंप मिटा रहे और मन ही मन अपने आप को आने वाली विपदा से निपटने के लिए तैयार करते हुए..
जैसे पार्थिव पटेल दक्षिण अफ्रीका में फिलेंडर को खेलने के लिए अपने आप को तैयार कर रहा हो।
हम भी तैयार हो रहे हैं...
यह शोधपत्र है ड्यूटी के पहले का...
अगला भाग...
परसों ड्यूटी के बाद....।
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छुट्टी का एक दिन

ब्राह्मण उवाच - Sun, 01/14/2018 - 20:38
छुट्टी का एक दिन
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बड़ा ही खुशनुमा दिन था आज..
सर्दी भी कम हो चली थी,
मानो सूर्यनारायण के उत्तरायण का आवाहन कर रही हो।
मकरसंक्रांति का दिन और रविवार,
सो छुट्टी का कन्फर्म दिन।
आज भी हमारे कुछ साथी ऑफिस में कुछ अर्जेंट काम निपटाने के लिए बुला लिए गए थे पर मैं इस बार खुशकिस्मत था।
श्रीमती जी तो कई दिनों से उत्साहित थीं कि इस बार मकर संक्रांति पर पुष्कर चलना है।
पुष्कर ने मुझे सदा से लुभाया...
पता नहीं क्यों?
पर यहाँ की गलियाँ, मस्ती और माहौल बनारस से बहुत कुछ मिलता जुलता है।
शायद इसीलिए..
सुबह ही हम निकल पड़े।
रास्ते में कई मंदिरों के दर्शन करते हुए हम पुष्कर पहुँचे।
काफी भीड़ थी आज,
न जाने सन्डे और संक्रांति का असर था शायद।
तय यह हुआ कि लौटते में ब्रह्मा मंदिर, घाट और वराह मंदिर के दर्शन करेंगे।
सो...
हम सीधे सावित्री मंदिर के परिसर में पहुँच गए,
रोप-वे से आवागमन शुरू होने के बाद भी यहाँ इक्के-दुक्के ही लोग दिखाई दे रहे थे।
रोप-वे टिकट विंडो के गेट के पास की जगह बैठ गए हम।
वहीं पर बैठा बड़ी ही मीठी फ़िल्मी धुन बजा रहा था वो..
उसके पास ही उसकी छोटी सी बच्ची उस धुन पर मटक रही थी,
उसकी जीविका सम्भवतया ऐसे ही चलती थी।
हम उसके पास पहुँच गए।
उसे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ,
शायद उसके पास यूँ कोई जाकर बात नहीं करता...
कुछ लोग उसके डब्बे में पैसे जरूर डाल देते हैं। मैने पास की ही एक दुकान से दो पैकेट बिस्कुट खरीदा और उस बच्ची को दिया।
...और उस युवक के समीप ही उकड़ूँ बैठ गया। उसका बजाना फिर भी चल रहा था।
मैने उसे रोका,
..कुछ बात करने के लिए।
'ये क्या है जो बजा रहे हो?
कुछ वायलिन जैसा ही लगता है।' मैंने पूछा।
ये 'रामनाट्ठा' है।
क्या? मुझे कुछ समझ न आया था।
रमणठा...मैंने दुहराया..।
हल्के से सिर हिला कर मना करने वाले अंदाज में उसने फिर कहा- रावणहत्था ।
अच्छा..हाँ ss।
मैंने कहीं तो सुन या पढ़ रखा था राजस्थान के इस तत् वाद्य यंत्र का नाम।
मैंने बात बढ़ाई..
नाम क्या है तुम्हारा?
रघु..
रघुss
मैंने दुहराया।
उमर कितनी है तम्हारी ?
बीस.. बड़ा संक्षिप्त उत्तर देकर वह चुप हो गया।
कदाचित ज्यादा बोलना आदत न थी उसकी।
जीवन की रगड़ से वह तीस से अधिक का दिख रहा था।
सीखा है इसे बजाना?
नहीं, बस परिवार में सभी बजाते थे..
बस सीख गया।
ये बच्ची तुम्हारी है?
हाँ, शर्माते हुए हल्की सी मुस्कान पहली बार उनके चेहरे पर आई थी।
'मुझे बजाना है', मैने कहा।
उसने उस रावण हत्थे को मेरे हाथों में थमा दिया।
मैने इसे पकड़ने और बजाने की सारी थ्योरी उससे क्षण भर में ही सीख ली।
वह भी बसी तन्मयता से सारी बारीकियाँ समझाए जा रहा था..
उसने हाथ रखकर बताया भी,
पर...मैं...
बजाने में पूर्ण असफल रहा।
यही तो अंतर है थ्योरी और प्रैक्टिकल में।
बातें करने और काम करने में...।
"बचपन मे सीखना बड़ा आसान रहता है।"
उसने मुझे समझाया...
हम छोटे छोटे रावनहत्थे बनाकर बेचते है।
कितने का पड़ता है ये? मैंने उत्सुकता दिखाई।
आठ नौ सौ का।
अभी चहिए तो मिल जाएगा।
उसे लगा शायद मुझे लेना हो..।
और ये वाला?
मैंने उसके हाथ की तरफ इशारा किया।
"ये तो चार पाँच हजार तक का बनता है, घोड़े के बालों से इस गज को बनाते हैं।"
धनुष को दिखाकर उसने बताया।
इससे निर्वाह हो जाता है? मैंने पूछा।
हो जाता है जी।
हमे चाहिए क्या, दो बखत की रोटली।
तीज-त्योहारों में लुगाई भी आ जाती है..
मैं बजाता हूँ, वह गाती है और बच्ची नाचती है।
फिर हम तो बंजारे हैं जी..
जहाँ जाते है, वहीं रुक जाते हैं,
इस बार बहुत दिन टिक गए यहाँ,
काफी दिन से हैं यहीं।
आगे वो तो है ही।
उसने ऊपर आसमान की तरफ दोनों हाथ उठा दिए।
बस ईस के भरोसे के बाद किसी भी कहानी में क्या दुःख बचता है?
दी..एन्ड ही तो...।
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गिल्ली गिलहरी

ब्राह्मण उवाच - Sat, 01/13/2018 - 19:15
गिल्ली गिलहरी
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उस छोटे से बगीचे में वह रहती थी...
अपने दोनों बच्चों के साथ।
नाम था गिल्ली।
बिना कोलाहल, बड़े सुकून और शांति से...
कोई दुःख, कोई तकलीफ न थी उसे।
बड़े ही मजे में...
यह दुरूह जीवन कटा जा रहा था।
....तो वह भी ईश्वर को दोनों हाथ जोड़कर धन्यवाद देती,
पूरा दिन फुदकती रहती थी।
हाँ... वह एक छोटी सी गिलहरी थी।
बगीचे के कोने में...
एक बड़े नीम के छोटे से कोटर में रहती,
वहीं के अमरूदों-आम और बेर-जामुनों को कुतरती और निश्चिन्त होकर भगवान का भजन करती।
उसके अच्छे दिन ही थे ये।
सुबह होते ही ढेर सारे पंछी...
और शाम होते ही खेलते बच्चे...
उसके जीवन में रंग भर देते थे, इसलिए सदैव प्रसन्न रहना उसकी आदत बन चुकी थी।
सुबह पंछियों से बतियाती...।
सतरंगे पक्षियों की तारीफ करती तो वे भी उसकी पीठ की सुंदर धारियों की तारीफ करते। वह गर्व से भर जाती.. ।
बताती...
...कि यह तो श्री रामजी ने उसकी पीठ पर प्रेम से उंगलियाँ फिराई, उसकी निशानी है।
फिर एक दिन....
उसके जीवन में जैसे भूचाल आ गया।
नगर निगम के कर्मचारी आज उस बगीचे में पहुँचे थे।
नई सरकार ने विकास के लिए उस बगीचे में सामुदायिक भवन बनाने को मंजूरी दे दी थी।
बगीचे के बहुत सारे पेड़ अब कट जाएँगे,
उसमें उसका आशियाना भी होगा क्या?
जीवन में प्रथम बार चिन्तित हुई थी वो।
गुस्सा भी संभवतः पहली बार ही आया था उसे।
यह कैसा विकास है?
प्रकृति को नष्ट करके...
किसी का घर उजाड़ कर विकास?
अभी कल ही तो 'मन की बात' में उसने सुना था।
अपने प्यारे प्रधानमंत्री जी को...
पक्षियों के लिए परिंडों में दाना और पानी रखने के लिए उन्होंने कहा था।
...और उसने सोचा था कि..
कितने करुणामय प्रधानमंत्री हैं अपने..
पर उनके नीचे के ये नौकरशाह...
कितने क्रूर, निष्ठुर...
न जाने कितनी बददुआएँ उसके मुँह से निकली।
आज ही शाम को में इसका इलाज करके रहूँगी।
आने दो शाम को बच्चों को।
उनके लैपी से मैं ट्विटर पर भेजूँगी अपनी शिकायत।
प्रधानमंत्री जी को और उनके कार्यालय को भी।
और यहाँ के अधिकारियों....
सबको भी...सssब को...।
मुझे पता है...
सुना है मैंने,
शिकायतों को बड़े ध्यान से सुनकर...
पढ़कर...
उसपर जरूर कार्यवाही की जाती है।
मेरा घर...मेरे पेड़...
...और मेरे सपने को मैं ऐसे ही टूटने नहीं दे सकती।
दॄढ विश्वास के साथ उसने सिर हिलाया और अपने कोटर में प्रवेश कर गई।
निकृष्ट और निर्दयी मनुष्य अपनी सदाशयता तो छोड़ ही चुका है।
न वह स्वयं चैन से रहता है और न किसी को रहने देता है।




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यह नया अंदाज

ब्राह्मण उवाच - Thu, 01/04/2018 - 19:35
यह रेलवे स्टाफ लाईन के एक बड़े से बँगले का बेहद विशाल वृक्ष था।
प्रतिदिन की भाँति वह जोड़ा आज फिर वहीं था...
पेड़ की सबसे ऊपर वाली डाल पर...।
आज सुग्गी चकित थी,
सुग्गा इस शाख से उस शाख पर फुदकता फिर रहा था।
ढेर सारी पकी हुई फलियाँ शाखों पर चोंच मार-मारकर गिरा चुका था वो..।
बहुत ध्यान से अपने सुग्गे को देखते हुए जब उससे रहा नहीं गया तो बोल उठी मादा सुग्गी--
बात क्या है ?
आज तो कुछ ज्यादा ही निश्चिन्त दिखाई दे रहे हो?
मैने तुम्हे पहले कभी इतना उन्मुक्त नहीं देखा।
"जीवन को नए अंदाज में जीना शुरू कर दिया है मैंने। "
इस बार बड़े दार्शनिक अंदाज में गंभीरता से जवाब दिया था सुग्गे ने।
सुनना चाहती हो मेरी इस अवस्था का राज क्या है?
सुग्गे ने अपने चारों ओर देखते हुए बड़ी रहस्यमयी आवाज में सुग्गी के अत्यधिक पास आकर फुसफुसाते हुए पूछा।
सुग्गी अब तनिक गंभीर हो गई थी, ऐसी स्थिति में तो उसने अपने पूरे गृहस्थ जीवन में पहले कभी सुग्गे को न देखा था।
हमेशा धीर-गंभीर रहने वाला, कम बोलने वाला सुग्गा आज अचानक...।
तुम्हारी तबियत तो ठीक है ना?
सुग्गी के स्वर में इस बार थोड़ी घबराहट थी।
अरे पगली! मैं उल्लास में मस्त हूँ क्योंकि स्वतंत्र अनुभव कर रहा हूँ।
कल तक रोज का वही राग था,
घोसला बनाना...
बच्चों के लिए दाने-पानी का इंतजाम।
हर पल उनकी चिंता...
कैसे उड़ना सीखेंगे वो,
जीवन के खतरों से लड़ भी सकेंगे...
या कोई उन्हें...। आह...।
आज पता चला कि वे बड़े हो गए...
अपनी दुनिया,
अपने रस्ते उन्होंने खुद ही बना लिए..
उड़ चले वो...
पूरा आसमान आज उनका है,
अपने घोंसले..नहीं-नहीं घर...
वे खुद ही बनाएँगे।
अब उन्हें हमारी क्या चिंता?
...........और हमें भी उनकी चिंता क्यों करनी। वे सक्षम हैं,
हमारे भी तो पंख काम कर रहे हैं।
हमें मनुष्यों की तरह न तो बुढ़ापे में पेंशन की जरूरत है और न ही तिजोरियाँ भरनी है।
जिन फलियों को मैं कभी चोंच भर बच्चों के लिए घोसले में ले जाया करता था,
उसे ही अब लुटा रहा हूँ,
जानती हो क्यों?
ये हमारी फिक्सड डिपाजिट हैं,
प्रकृति के बैंक में रखी,
जो न तो कभी कम होंगी और न खत्म।
हर मौसम में ये हमारे लिए काफी हैं।
अफसोस इतना ही कि,
"बस जब राहें मिलीं तब...
लौटने का समय हो चला था।"
सुग्गी की आँखों में अब संतुष्टि के भाव थे,
पूरे इत्मीनान से अपनी गर्दन सुग्गे के कंधे पर रखकर उसने पलकें झपका लीं।
संध्या का सूरज अब भी अपनी प्राकृतिक गति से अपने रास्ते पर चला जा रहा था।





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वो विंडोसीट

ब्राह्मण उवाच - Sat, 12/30/2017 - 21:13
वो विंडोसीट
*********
सोचकर हँसता हूँ मैं..
कई बार...
चिन्ता भी तो करता हूँ,
कुछ ज्यादा पुरानी नहीं...
बस कल की ही तो है ये बात...
हम लड़ते थे, बैठने को,
बस और रेल की खिड़कियों के पास।
और अपनी बारी आने पर
जैसे पा जाते थे त्रिभुवन का ऐश्वर्य।
जब देखते थे-
बाहर की जमीन घूमती थी,
वृत्ताकार....
जैसे चल रहे हों हम वृत्त की परिधि पर।
पेड़, मकान...
खेत-खलिहान...
और खम्भे बिजलियों के
छूटते जाते थे, पीछे...बहुत पीछे।
आँखों की पुतलियाँ घूमती थी बड़ी तेजी से
कई बार हम गिनते थे इनको...
इन पेड़ों और खंभों को..
....और बताते बड़े गर्व से उन सबको,
जिनको उस विंडो सीट से हटा राजसिंहासन पाते थे हम.....।
अब ....हाँ अब,
हमारे बच्चे भी तो ढूँढते हैं..
एसी की उन खिड़कियों पर
मोबाइल के चार्जर पॉइंट्स।
अब सारी प्रकृति
पेड़ और खेत..
खेल, आसमान और कविताएँ
और पूरा का पूरा जीवन
लाइक और नाइस
उनके हाथ ही हैं
पर आभासी....वर्चुअल..
खिड़की के बाहर उनके लिए
नया, अलबेला
कुछ भी नहीं है,
कुछ भी तो नहीं।

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सिताबी: मेरी नई कहानी, बिल्कुल सच्ची

ब्राह्मण उवाच - Thu, 12/28/2017 - 19:29
सिताबी: मेरी नई कहानी, बिल्कुल सच्ची
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यूँ तो कहानियाँ सच्ची नहीं होती, वह सिर्फ होती है कल्पना..
पर ये बिल्कुल सच्ची कहानी है...
निन्यानबे प्रतिशत तक सच्ची...
सिताबी...
हाँ यही नाम बताया था उसने..
अवस्था यही कोई पचहत्तर साल रही होगी।
बड़े ही अलग से इस नाम ने ही मुझे वहाँ रोक दिया था,
मेरी बड़ी पुरानी पारिवारिक कहानी में भी एक किरदार का यह नाम मैंने लगभग चालीस वर्षों बाद फिर से सुना था।
खैर...
एक बड़े से पेड़ के नीचे पर बैठी थी वो..
यह बात है माउंट आबू की।
इधर साल दो हजार सत्रह खत्म होने को था और हम दो मित्र परिवार सहित क्रिसमस वीक में अपनी छुट्टियाँ खत्म कर रहे थे।
बहुत ही सर्द दिन था वो..
माउंट आबू...
राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन..
इन छुट्टियों में गुजरातियों की भारी भीड़ से खचाखच भरा था।
अपनी टवेरा से साइट सीन घूमते-घूमते हम दोपहर में दिलवाड़ा के जैन मंदिर पहुंच चुके थे। सभी मंदिर के अंदर नक्काशी देखने में व्यस्त थे और मैं...
मुझे तो अपनी नई कहानी मिल चुकी थी।
दिलवाड़ा के जैन मंदिर के बाहर टैक्सी स्टैंड के पास एक बड़ा सा पेड़.. घना...
पहाड़ी पेड़..
न जाने किसका..
उसे घेर कर एक चबूतरा सा बना दिया था उसने।
उसके नीचे मैरून धोती पहने वह वृद्धा एक बड़ी सी हांडी में कुछ तो गुनगुनाते-बुदबुदाते छाछ बिलो रही थी।
एक अजीब सी मुस्कान उसके चेहरे पर थी...
मुस्कान से अधिक उसे सुकून कहना ज्यादा उचित है।
असल में प्रथम दृष्ट्या तो उसकी बिलोई छाछ के ऊपर तक भर आए फेन ने मेरा ध्यान उस ओर दिलाया था।
मैं सबको मंदिर की तरफ जाते छोड़ उसके पास पहुँचा,
मुझे देख उसने बिलोना बन्द कर दिया।
उससे बात होने लगी।
'आपकी फ़ोटो लेनी है' मैने कहा।
वह बुरी तरह शरमा गई।
अरे नहीं बेटा... फोटो नहीं-नहीं...
अम्मा आप बिलोओ.. एक बड़ी अच्छी फ़ोटो बन रही है।
वह मान गई, हल्के से सिर हिलाते, मुस्काते उसने फिर बिलोना शुरू किया।
झाग फिर हांडी के ऊपर तक आने लगे थे और मेरा कैमरा अपना काम कर रहा था।
मैंने एक गिलास छाछ ली और बात आरम्भ कर दी।
अम्मा, छाछ बहुत अच्छी है।
मैं घर मे ही दही बनाती हूँ , आवाज में दम्भ था और आत्मविश्वास भी।
कब से छाछ बना रही हो अम्मा?
अब मैंने जानबूझकर बात बढ़ाई।
अब उसकी झिझक थोड़ी कम हो चुकी थी। बताने लगी-
पैसठ बरस से बिटवा..
"इत्ती सी थी तब मेरी माँ ने छाछ बनाने इसी पेड़ के नीचे बैठा दिया था।"
अपने सामने बैठी एक पांच-सात बरस की लड़की की ओर इशारा करती हुई वह बोली।
अरे? पैसठ बरस?
मैंने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा- पेड़ का वह मोटा तना जैसे उसकी बात की गवाही दे रहा था।
हाँ sss।
फिर वह खुद ही कहने लगी-
मैने अपनी दोनों बहुओं को भी यह काम सिखा दिया है, घर मे फालतू झगड़ती रहती थीं, अब पैसा आ रहा है तो झगड़ा भी बंद है।
उसने सामने की तरफ इशारा किया।
मैने पलट कर देखा।
सामने की तरफ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दो जगहों पर औरतें इसी तरह छाछ का स्टाल लगाए हुए थीं।
गुजर-बसर अच्छी हो जाती होगी? मैने पूछा।
"हाँ बेटा!
पूरे सौ रुपल्ली का दही बनाती हूँ रोज..."
सौ-डेढ़ सौ गिलास बिक जाते हैं।
साथ में ये आँवला भी।
उसने पास से उठा कर दिखाया--
लो! चखो तुम भी।
यह क्या है?
"ये आँवले का अचार है, सौंफ-अजवान सब डाला है"
खाकर पानी पियो, बड़ा मीठा लगेगा।
उसकी आँखों में चमक और चेहरे पर गर्व की मुस्कुराहट नजर आई।
खुशी जीवन का पूरा फलसफा था उसके पास..
मैने चखा...
आँवला सचमुच स्वादिष्ट था।
और..उसके चेहरे की शांति थी,
अनुपम...असीम।





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महाभारत 6

ब्राह्मण उवाच - Sat, 11/11/2017 - 20:55
....से आगे-
देवराज ने वज्र द्वारा उसे ऊपर से दबा लिया। इस प्रकार हे ब्रह्मपुरुष शौनकजी ! मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन आरंभ किया गया। नागराज के मुख की ओर असुर और पुच्छ की ओर देवतागण खड़े हो गए।
उग्रश्रवा जी ने कहा-
फिर समुद्र का भयानक मंथन आरंभ हो गया। इस प्रकार मथे जाने से सहस्त्रों समुद्री प्राणियों और जलचरों का संहार हो गया ।
मंदराचल के ऊपर पत्थरों पर वृक्षों की रगड़ से आग निकलने लगी जिसे इंद्र ने जल वर्षा करके शांत किया ।
बहुत दिनों तक मंथन चलता रहा, इतना कि मंदराचल के ऊपर लगे वृक्षों और औषधि औषधियों से रस निकलकर समुद्र में गिरने लगा समुद्र का जल स्वयं दूध बन गया दूध से घी बनने लगा, पर अभी तक समुद्र से अमृत नहीं निकला था।
देवता और असुर निराश हो चले थे तब भगवान श्रीविष्णु ने सभी को बल प्रदान किया ।
देव-दानवों ने पुनः समुद्र को पूरी गति से मथना आरंभ कर दिया ।
हे शौनक देव! फिर महासागर से सूर्य समान तेजस्वी श्वेतवर्ण प्रसन्नात्मा चंद्रदेव प्रकट हुए जो कालांतर में अपने किशोरारूप में शिवजी के मस्तक पर सुशोभित हुए।
तत्पश्चात श्वेत वस्त्रधारिणी सिंधुकन्या महालक्ष्मी जी का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने श्रीविष्णु को वरण किया।
इसके बाद सुरा-सोमरस निकला। जो लक्ष्मी जी के भगवान विष्णु को वरण करने से क्रुद्ध दानवों को दिया गया।
अब उच्चैश्रवा अश्व प्रकट हुआ, और फिर अनंत किरणों से सुशोभित दिव्य कौस्तुभ मणि निकली जो श्रीनारायण के हृदय पर विराजमान हुई ।
इसके बाद कल्पवृक्ष और कामधेनु सुरभि गौ माता की उत्पत्ति हुई।
अब दिव्य देहधारी श्री धन्वंतरी अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
एरावत हस्त उत्पन्न हुआ जो देवराज का वाहन बना।
. .और फिर निकला कालकूट महाविष जो देव और असुरों की प्रार्थना पर महाशिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया।
अंत में निकला अमृत।
असुरों ने देवी लक्ष्मी और अमृत पाने के लिए देवताओं से वैर बाँध लिया ।
तब भगवान विष्णु ने अपनी लीला रची। मोहिनी रूप धरकर असुरों को मोहित कर दिया तथा हाथ में अमृत कलश लेकर पंगत में बैठे देवताओं को परोसना आरंभ कर दिया ।
असुर पंगत में बैठे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे।
उग्रश्रवा जी कहते हैं-
"हे ब्राह्मण देवता शौनकजी महाराज! जिस समय देवता अमृत पान कर रहे थे उसी समय राहु नामक दानव देवताओं के रूप में उनके साथ बैठ गया और अमृत पान करना आरंभ कर दिया"।
सूर्य व चंद्रदेव ने उसे देख लिया और उसका भेद खोल दिया तब श्री हरि ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा उसका मस्तक विच्छिन्न कर दिया ।
तभी से कंठ में अमृत पहुंच चुके राहु के सिर रूप व धड़ रूप केतू ने चंद्र और सूर्य से स्थाई वैर अपना लिया।
फिर उसी क्षीरसागर के समीप देवासुर संग्राम होने लगा ।
अमृत पान कर चुके देवताओं की विजय हुई मंदराचल को अभिनंदन करके पूर्व स्थान पर पहुंचा दिया गया।
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महाभारत 5

ब्राह्मण उवाच - Thu, 11/09/2017 - 19:19

सूतपुत्र उग्रश्रवा जी की कथा में अब महर्षि शौनक और उनके शिष्यों को आनंद आ रहा था।
उनकी आँखों मे जिज्ञासा के साथ-साथ आश्चर्य का भाव भी स्पष्ट जाग्रत हो रहा था।
सूतकुमार के इतना कहते ही महर्षि शौनक ने उत्सुकता से पूछा - 'हे सूतनंदन ! कृपया मुझे बताइए कि जन्मेजय कौन थे ? उन्होंने सर्पों को मारने का संकल्प क्यों किया था ?
मुझे तथा यहाँ बैठे हुए मेरे सभी ब्राह्मणों को भी यह बताइए कि आस्तिक मुनि कौन थे और उन्होंने सर्पों की रक्षा क्यों और कैसे करें की?' उग्रश्रवा जी ने कहा - हे प्रभुश्रेष्ठ !
यह उपाख्यान बहुत विशाल है और अत्यंत प्राचीन भी।
इसे मेरे पिता लोमहर्षण जी ने मुझे सुनाया था तथा उन्हें श्रवण कराया था स्वयं श्री कृष्णद्वैपायन व्यास जी ने, जो मेरे पिता के गुरुवर थे। सर्वप्रथम इस कथा का वर्णन उन्होंने ही किया था।
हे महानआत्मा शौनक जी महाराज!
'मैं सब पापों का नाश करने वाले इस कथानक का विस्तार से वर्णन करना चाहता हूँ अतः कृपया ध्यान से सभी महानुभाव श्रवण करें।' मुनिवर आस्तिक के पिता एक महान यायावर अर्थात सदा विचरण करने वाले मुनि जरत्कारु थे वह केवल वायु पीकर जीवित रहते थे तथा सभी प्रकार की इंद्रियों तथा निंद्रा आदि जीवन की महती आवश्यकता के ऊपर उन्होंने विजय प्राप्त कर ली थी ।
अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए उन्होंने उपाय पूछा जो सिर नीचे और पैर ऊपर करके विशाल धरती रुपी गड्ढे में लटक रहे थे तब पितरों ने उन्हें मुक्ति प्राप्त कराने के लिए वंश परंपरा बढ़ाने का आदेश दिया तथा जरत्कारु को विवाह करने के लिए कहा।
कालांतर में जरत्कारु ने भिक्षा के रूप में नागराज वासुकि की भगिनी जिसका नाम भी जरत्कारु था, विवाह किया तथा उनके पुत्र थे महान आस्तिक, जिन्होंने जन्मेजय के सर्पसत्र यज्ञ में सर्पों की रक्षा की थी।
उग्रश्रवा जी बोले इसकी एक अन्य भी कथा है कि एक बार नाग माता कद्रू ने सर्पों को नष्ट हो जाने का श्राप दिया था जिसकी शांति के लिए वासुकी ने अपनी बहन का सदाचारी तपस्वी जरत्कारु के संग विवाह किया था। इसी महात्मा जरत्कारु और नागकन्या से मुनि आस्तिक का जन्म हुआ इन्हीं तपस्वी आस्तिक ने पांडववंशी जनमेजय के सर्पसत्र नामक यज्ञ में सर्पों को सर्वसंहार से बचाया।
हे सूत कुमार ! आप इतनी सुंदर कथा कहते हैं कि मन नहीं भरता है।
कृपया महात्मा आस्तिक तथा नाग माता कद्रू के शाप की कथा भी विस्तार से कहिए। हम सभी प्रसन्न और धन्य हो जाएँगे ।
उग्रश्रवा जी ने कहा हे आयुष्मान मुनिवर!
मैंने अक्षरशः जो कथा पिताश्री लोमहर्षण जी से सुनी है उसे विस्तार से कहता हूं।
सतयुग की बात है दक्ष प्रजापति की दो सुंदरी कन्याएँ थी कद्रू और विनता ।
वे दोनों परम सुंदर बहनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था ।
एक बार मुनिवर नें दोनों को प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा।
कद्रू ने सहस्त्र नागपुत्रों को पुत्र के रुप में पाने का वरदान माँगा, जिसे सुनकर विनता ने माँगा कि मेरे दो पुत्र हो जो कद्रू के पुत्रों से श्रेष्ठ हो। कद्रू और विनता दोनों ही अपने-अपने वरदान पाकर संतुष्ट हो गई और महर्षि कश्यप
"तुम दोनों अपने अपने गर्भ की धैर्य पूर्वक रक्षा करना"
कहकर तपस्या करने वन में चले गए।
उसके बाद कद्रू ने 1000 और विनता ने दो अंडों को जन्म दिया।
कद्रू के 1000 पुत्र अंडों को फोड़ कर बाहर निकल आए।
विनता के अंडे से बच्चे नहीं निकले तो कद्रू प्रतिदिन उसे लज्जित करती । विनता से जब और धैर्य न रखा गया और उसने एक अंडा फोड़ दिया। उसके ऊपरी भाग पूर्ण विकसित थे पर नीचे के आधे अधूरे अंगों के साथ उसे अपना पुत्र दिखाई दिया।
उस पुत्र को अत्यंत क्रोध आया और उसने माँ से कहा- तुमने मुझे अधीर होकर तथा लोभ में आकर अधूरा बना दिया है अब दूसरा पुत्र ही तेरा उद्धार करेगा तब तक तुझे अपनी बहन और सौत की दासी बन कर रहना पड़ेगा। कालांतर में यही अधूरे शरीर का पुत्र अरुण नाम से विख्यात हुआ और सूर्यदेव के रथ का सारथी बन गया।
उग्रश्रवा ने कहा विनता कद्रू की दासी कैसे बनी इसका दृष्टांत अगर मैं आपको बताता हूं।
समयांतर में विनता को दूसरे पुत्र के रुप में गरुड़ प्राप्त हुए।
एक बार कद्रू और विनता घूमने के लिए निकली।
वहां उन्होंने उच्चैश्रवा नामक एक उत्तम ऐश्वर्यशाली घोड़े को देखा जो देवताओं के द्वारा अमृत के लिए किए जा रहे  समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ था।
शौनक जी ने उग्रश्रवा से पूछा हे सूतनंदन!  पहले मुझे वह कथा सुनाइए कि यह समुद्र मंथन देवताओं ने किस प्रकार और किस स्थान पर किया जिससे परम तेजस्वी अश्वरत्न उत्पन्न हुआ?
उग्रश्रवा जी बोले- हे ब्राह्मण श्रेष्ठ !
मेरु नामसे प्रसिद्ध गिरि प्रदेश है जिस पर एक तरफ भयंकर सर्पों का वास है तो दूसरी तरफ परमदिव्य औषधियाँ भी सुशोभित है। मनुष्यों के लिए तो वहां मन से भी पहुँचना असंभव है। उस पर अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं।
इसी महातेजस्वी गिरि पर्वत के शिखर पर एक बार सभी देवताओं ने बैठकर विचार किया कि अमृत प्राप्त करने के लिए क्या उपाय किया जाए?
तब अच्युतानंदन श्री भगवान नारायण ने बताया कि यदि समस्त देव-दानव मिलकर महासागर का मंथन करें तो अमृत की प्राप्ति संभव है। देवताओं ने असुरों से इस बारे में चर्चा की तो अमृत के नाम से ही असुरों ने हामी भर दी। संपूर्ण देव मिलकर मथानी बनाने के लिए मंदराचल पर्वत को उखाड़ने के लिए पहुँचे जो भूमि के ऊपर और नीचे ग्यारह-ग्यारह सहस्त्र योजन तक फैला हुआ था।
समस्त देवता मिलकर उसे उखाड़ ना सके तब श्री श्री नारायण ने शेषनाग से मंदराचल पर्वत को उखाड़कर समुद्र तट पर ले चलने को कहा। शेषनाग ने मन्दराचल को वन, वनवासी और जटाओं, जीव-जंतुओं सहित उखाड़ लिया तथा देवताओं सहित समुद्र पर्वत पर समुद्र तट पर उपस्थित हो गए।
आज का दिन मानों परम सौभाग्य लेकर आया था। सुर-असुरों का साथ-साथ क्रीड़ा-विलास इसके पूर्व कभी अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान नारायण ने भी देखा न था। यह कदाचित एक स्वप्न ही था। सत्य ही तो है,
"आवश्यकता परम शत्रुओं को भी साथ ले आती है।"
देवता अत्यंत प्रसन्न थे और दानव तो अमृत के नाम से ही बस आनंदातिरेक विक्षिप्त हो रहे थे।
देवताओं ने समुद्र से कहा- 'हम सब अमृत प्राप्त करने के लिए आपका मंथन करेंगे।'
समुद्र ने विनती की-  फिर तो उस अमृत में मेरा भी हिस्सा होना चाहिए इससे मंदराचल पर्वत को घुमाने से मुझे जो पीड़ा होगी उसे मैं सह लूँगा, भारी मंदराचल को समुद्र में टिके रहने के लिए भगवान विष्णु ने स्वयं कच्छप अवतार धारण किया और मंदराचल पर्वत के नीचे अपनी पीठ लगा ली ।
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महाभारत 4

ब्राह्मण उवाच - Tue, 11/07/2017 - 20:01
महाभारत 4
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सूतकुमार ने पुनःअपनी कथा प्रारंभ की। बोले-
"हे विप्रवर ! भार्गव ने अपनी पत्नी सुकन्या से एक पुत्र को जन्म दिया था जिसका नाम था प्रमति। वह बहुत बड़े विद्वान और तपस्वी थे उन्होंने घृताची अप्सरा से रुरू नामक पुत्र को जन्म दिया तथा रुरू और प्रमद्धरा से शुनक का जन्म हुआ जिनके आप पुत्र हैं ।
मैं ब्रह्मपुरुष रुरू के चरित्र का वर्णन करता हूँ जो श्रवण योग्य है कृपया सुनिए।"
बहुत पुरातन बात है । गंधर्व राज विश्वावसु और मेनका के गर्भ से एक संतान उत्पन्न हुई।
मेनका अप्सरा अपने आप को किसी बंधन में बाँधना नहीं चाहती थी सो उसने उस बालिका को महर्षि स्थूलकेश के आश्रम में रख दिया। ऋषि ने इस बालिका को देखा और उसे अपने आश्रम में ही पालन-पोषण करने लगे और उसका नाम प्रमद्दरा रखा।
एक दिन रुरू ने प्रमद्दरा को देखा और विवाह करने की इच्छा प्रकट की।
विवाह तय हो गया पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। प्रमद्दरा की सर्प के काटने से मृत्यु हो गई ।
राजा रूरू अत्यंत दुखी हुए और प्रियतमा प्रमद्दरा के वियोग में वन में जाकर विलाप करने लगे।
तभी आकाशवाणी हुई कि आप बहुत धर्मात्मा हैं, यदि आप अपनी आधी आयु दे दें तो प्रमद्दरा जीवित हो सकती है । रुरू ने अपनी आधी आयु देकर प्रमद्दरा को जीवनदान दिया और विवाह किया।
विवाह के पश्चात रुरू ने ठान लिया कि समस्त सर्प उसके शत्रु हैं ।
एक दिन की बात है रुरू ने एक बूढ़े सर्प को देखा और वह दंड का प्रहार कर उसे मारने वाला ही था कि वह सर्प मनुष्य की आवाज में बोलने लगा ।
रुकिए हे श्रेष्ठ ! मैं तो अपने ब्राम्हण मित्र ऋषि खगम को सताने के कारण उससे मिले श्राप से सर्प योनि में हूं मेरा नाम सहस्त्रपाद है और मैं भी ऋषि हूँ।
परंतु द्विज श्रेष्ठ होकर आप का दंड धारण करना और उग्रता शोभा नहीं देती।
यह सब तो क्षत्रियों के कर्म है, जब राजा जनमेजय के यज्ञ में सर्पों का वध होने लगा तब भी आस्तिक ब्राम्हण के कारण सर्पों की रक्षा हुई थी, और आज भी आपके कारण मेरा सर्प योनि से उद्धार हो पाया है यह कहकर सहस्त्रपाद मुनि अंतर्ध्यान हो गए।
क्रमशः--
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महाभारत 3

ब्राह्मण उवाच - Mon, 11/06/2017 - 20:44
महाभारत 3
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उग्रश्रवा जी ने ऋषिवर की तीव्र उत्कंठा भाँप ली और कहा -
'हे महात्मन! भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा था, जो अत्यंत शीलवान और धर्मपरायणा पतिव्रता नारी थी।'
वह अपने पति को अत्यंत प्रिय थी तथा उसके गर्भ में महर्षि भृगु का पुत्र पल रहा था।
एक बार महर्षि भृगु ऋषि स्नान हेतु जैसे ही आश्रम से बाहर निकले, एक पुलोमा नाम का ही राक्षस उनके आश्रम में घुस गया।
इस राक्षस की भी एक कथा है-
बाल्यकाल में भृगु पत्नी पुलोमा रो रही थी तब उसके पिता ने उसे डराने के लिए उसका नाम उसी के घर में छुपे पुलोमा नाम के राक्षस के नाम पर रख दिया और कहा कि वह रोना बंद नहीं करेगी तो उसका विवाह राक्षस के साथ कर देंगे ।
यह वही राक्षस था जो मौका देखकर भृगु के आश्रम में घुस गया था और उसने बाल्यावस्था में ही बालिका पुलोमा को मन ही मन में अपनी पत्नी के रूप में वरण कर लिया था ।
आश्रम में प्रवेश करते ही उस राक्षस की कुदृष्टि भृगु पत्नी पुलोमा पर पड़ी और वह कामदेव के वशीभूत होकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
वह राक्षस भृगुपत्नी को अपनी पत्नी मानता था सो उसे हरण करके ले जाना चाहता था ।
इसके लिए उसके मन में एक कुटिल योजना ने जन्म ले लिया।
"वैसे भी जब कोई गलत कार्य करने लगता है तो उसे सत्य ठहराने के लिए और औचित्य की खोज भी कर ही लेता है।"
राक्षस पुलोमा ने भृगु के आश्रम में ही अग्निहोत्र में अग्निदेव को प्रज्वलित होते हुए देखा और भृगुपत्नी के समक्ष ही अग्निदेव से प्रश्न किया-
"हे अग्नि देवता ! सत्य की शपथ लेकर बताएँ, कि यह पहले से मेरी पत्नी है या नहीं ?
क्या इसके पिता ने भृगु के साथ विवाह के पूर्व ही मुझे विवाह हेतु नहीं सौंप दिया था?
मैंने तो इसे वर्षों पूर्व ही वरण कर लिया था। आप तो परम ज्ञानी और सत्य का साथ देने वाले देवता हैं कृपया सत्य का साथ दीजिए। अग्निदेव बहुत दुखी हुए। क्योंकि सत्य कहना अत्यंत कठिन था और असत्य का साथ वह दे नहीं सकते थे ।
अतः धीरे से उन्होंने कहा - "हे दानवराज ! यह सत्य है कि पुलोमा का वरण तुम्हीं ने पहले किया परंतु इसके पिता ने विधिपूर्वक मंत्रोच्चार करते हुए इसका विवाह भृगु के साथ ही किया है।"
पुलोमा अग्निदेव का वचन सुनकर बहुत दुखी हो गई कि इस दानव ने पहले ही उसका वरण किया था ।
राक्षस ने इतना सुनकर भृगुपत्नी का अपहरण कर लिया ।
उग्रश्रवा जी तनिक रुक कर बोले- 'हे महात्मन! 'हे ऋषिवर! तब भृगु पत्नी के गर्भ में पल रहा वह बालक राक्षस के इस कुकृत्य से क्रोध में भर गया और माता के गर्भ से च्युत होकर बाहर निकल आया और उसने अपने अपूर्व तेज से राक्षस को भस्म कर दिया।
च्युत होकर बाहर निकले बालक का नाम इसीलिए च्यवन हुआ।
माता पुलोमा तब अपने पुत्र च्यवन को लेकर ब्रह्मा जी के पास पहुंची और उसके आँसुओं की बाढ़ से नदी बन गई, जो वसुधरा कहलाई।
जैसे ही महर्षि भृगु को सब बातें पता चली तो अग्निदेव की कही बातों को सुनकर भृगु ने अग्निदेव को सर्वभक्षी होने का श्राप दे दिया। बाद में ब्रह्मा जी ने अग्निदेव को श्राप से मुक्ति दी और कहा कि तुम्हारा सारा शरीर सर्वभक्षी नहीं होगा और केवल तुम्हारी ज्वालाएँ और चिताग्नि ही सर्वक्षण करेगी तथा यज्ञ कार्यों में आहुति के रूप में सभी देवताओं के भाग के रूप में तुम्हें हविष्य अवश्य प्राप्त होगा और तुम्हारे स्पर्श से सभी वस्तुएं शुद्ध हो जाएँगी।
हे महर्षि शौनक देव जी! यही भार्गव च्यवन ऋषि के जन्म का वृतांत है, उग्रश्रवा ने हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए कहा।
शौनक जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले- हे सूत कुमार ! मुझे महर्षि भार्गव की कथा भी विस्तार से सुनाइए मैं उत्सुक हो रहा हूं।
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महाभारत 2

ब्राह्मण उवाच - Sun, 11/05/2017 - 17:17
महाभारत 2
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महर्षि शौनक का बारह वर्षीय सत्र वाला गुरुकुल उस नैमिषारण्य में चल रहा था।
चारों ओर मेला से लगा था, बड़ी चहलपहल दिखाई देती थी।
ब्राह्मणों, बटुकों सहित अत्यंत कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ऋषिगण वहां शिक्षा और तपस्या में लीन रहते थे।
एक दिवस भ्रमण करते हुए लोमहर्षण के पुत्र सूतकुमार उग्रश्रवा का वहां पर आगमन हुआ। वह पुराणों के ज्ञाता थे तथा पुराणों की कथा कहने में कुशल भी ।
ऋषिगण उन्हें जानते थे उन सब ने उग्रश्रवा जी को घेर लिया तथा कथा सुनाने का आग्रह करने लगे।
उग्रश्रवा जी ने ऋषियों का अभिवादन किया और हाथ जोड़कर बोले-
'हे परम पूज्य ऋषिगण आप ही बताएँ कि आप सभी कौन सा प्रसंग सुनना चाहते हैं'।
ऋषियों ने कहा-
'हे कमलनयन सूतनंदन हम सब आपको देखकर आपसे बहुत सारे कथा पसंद सुनने के लिए अति उत्साहित हैं परंतु हमारे पूज्य कुलपति महर्षि शौनक जी अभी अग्नि की उपासना में तथा यज्ञादि कार्य में व्यस्त हैं, जैसे ही वे उपस्थित होते हैं आप उनके कहने के अनुसार कथा सुनाइएगा।'

तत्पश्चात द्विजश्रेष्ठ विप्रशिरोमणि शौनक जी वैदिक स्तुतियों के कार्य का संपादन करके वहाँ पधारे और सुख पूर्वक विराजमान हो गए।
शौनक जी ने कहा-
'हे लोमहर्षण कुमार ! मुझे मालूम है कि आप के प्रतापी पिता ने सब पुराणों आदि का भली प्रकार अध्ययन किया था, क्या आप भी उन सभी दिव्य कथाओं और राजर्षियों और ब्रह्मर्षियों के वंशो की कथावलियों के बारे में जानते हैं?
यदि हाँ तो कृपया सर्वप्रथम भृगुवंश का वर्णन करने वाली कथा कहिए।
हम सभी बहुत आतुरता के साथ आप के वचनों को सुनने के लिए उद्यत हैं।'
सौतिपुत्र उग्रश्रवा ने कहा -
"मान्यवर मुझे मेरे पिता महर्षि वैशंपायन और महान श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कथा के रूप में जो कुछ भी सुनने को मिला है और जो कुछ भी मुझे ज्ञात है वह सब मैं आपको वर्णन करता हूँ"
हे भृगुनंदन ! मैं आपको सबसे पहले भृगुवंश का बखान करता हूं तथा आपके परम प्रतापी भार्गव वंश का भी परिचय देता हूं इस अद्भुत वृतांत को ध्यानपूर्वक सुनिए।
स्वयंभू ब्रह्मा जी ने वरुण के यज्ञ में महर्षि भृगु को अग्नि से उत्पन्न किया था ।
इनके अत्यंत गुणवान व प्रतापी पुत्र ऋषि च्यवन थे जिन्हें भार्गव ऋषि भी कहते हैं उनके पुत्र थे धर्मात्मा प्रमति ।
प्रमति और अप्सरा घृताची के गर्भ से रुरू का जन्म हुआ था और रुरु के पुत्र शनक थे जो प्रमद्दरा  के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।
वह वेदों के पारंगत विद्वान और बड़े धर्मात्मा थे और आपके पिता भी।
शौनक जी बोले -
परंतु हे सूतपुत्र ! मुझे पूरी कथा विस्तार से सुनने की उत्कंठा हो रही है मुझे बताइए कि महात्मा भार्गव का नाम च्यवन कैसे हुआ?

क्रमशः

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महाभारत MAHABHARATA

ब्राह्मण उवाच - Sat, 11/04/2017 - 20:31
महाभारत : 1

एक महाकाव्य, एक कथा जिसमें सार है-
सबके जीवन का..

                   -विनम्र निवेदन-

भारतीय सनातन संस्कृति का महान ग्रन्थ जय, विजय, भारत और महाभारत इन सब नामों से प्रचलित है। इसमें अमूल्य रत्नों के अपार भंडार छुपे हैं। इस महान महाकाव्य की तुलना विश्व की किसी भी रचना से करना सूर्य के प्रकाश में दीप जलाने के तुल्य है।
भगवान वेदव्यास ने इसमें वेदों के गूढ़ रहस्य, उपनिषदों के सार, पुराण, इतिहास, संस्कृति, दर्शन, भूगोल, नक्षत्रज्ञान, तीर्थों की महिमा, धर्म, भक्ति, प्रेम, अध्यात्म, कर्मयोग और ज्ञान-विज्ञान-व्यवहार इन सब के गूढ़ अर्थ भर दिए हैं। एक लाख से अधिक श्लोकों वाला ऐसा महाकाव्य न कभी पहले लिखा गया और न भविष्य में लिखा जा सकता है।

कई स्थानों पर ऐसी भ्रांति है कि महाभारत को घर में रखना या पढ़ना अशुभकारी होता है पर यह सही नहीं है। इस ग्रंथ में ही विस्तार से इसे पढ़ने के लाभ दिए गए है। कुछ विद्वतजनों ने इस विद्या परअपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सम्भवतः ऐसा किया होगा।

दो पीढ़ियों पहले तक इसकी कहानियाँ घर-घर में सुनाई जाती थीं, लोग इसके बारे में बातें करते थे पर आज कुछ लोग ही इनके पात्रों के नाम भर जानते हैं। सनातन परंपराओं के लगातार क्षरण के साथ ही अगली पीढ़ी सम्भवतः इससे पूर्णतया अनभिज्ञ ही रहेगी। वैसे भी समयाभाव से इस पूरे ग्रँथ के छह-सात सहस्त्र पृष्ठों का अध्ययन इतना भी सरल नहीं है और इससे भी बड़ी बात यह कि बिना भगवत कृपा के कदापि सम्भव नहीं है।

वैसे तो इसकी सैकड़ों टीकाएँ और हजारों अनुदित संस्करण विभिन्न भाषाओं  में पहले से ही उपलब्ध हैं पर इसकी कहानियाँ अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का एक तरीका यह भी था कि इसे बोलचाल की सरल भाषा में लिखा जाए और सोशल मीडिया के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए, इसके लिए इस ग्रंथ को पढ़ना आवश्यक था।

अतः इसके अध्ययन का प्रयास आरंभ किया श्री रामजानकी विवाह दिवस, मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी सम्वत 2068, आंग्लदिनांक 29 नवंबर 2011 को, पर तय है कि जब तक भगवान की कृपा न हो तब तक आप एक इंच भी आगे बढ़ नहीं सकतें। आज लगभग 6 वर्षों के पश्चात भी यह अध्ययन अपनी आरंभिक स्थिति में ही है।
इसे पुस्तक के रूप में अभी तक प्रकाशित करने की स्थिति नहीं है पर इसे छोटे कथानक अंश रूप में अपने ब्लॉग आदि पर लेखन का आरंभ कर दिया जाना चाहिए ऐसा मानस बनाया है, आज वर्ष 2017 के 4 नवंबर के दिन कार्तिक पूर्णिमा देव-दिवाली से अच्छा दिवस इसके इस कार्य के आरम्भ के लिए क्या हो सकता था।
इस ईश्वरीय रचना को न तो कहीं से कॉपी किया गया है और न ही इसमें अपनी ओर से कथानक को बदलने जा प्रयास किया गया है।
ईश्वरेच्छा से एकाध स्थानों पर कुछ अलग तथ्य आए हैं जो हमारी सनातन संस्कृति के सर्वथा अनुकूल ही हैं।
मौलिकता तो मात्र भगवान व्यासजी का अधिकार रहा है पर उनके असीम विस्तृत महाकाव्य से कुछ घटनाओं को अपनी आज की भाषा मे संकलन का या प्रयास वैसा ही है जैसे समुद्र से कोई अपने कार्य के लायक कुछ लोटे भर ले।
यह पूर्ण रूप से स्वलिखित है, टंकण आदि भी स्वयं ही किया गया है अतः भाषाई त्रुटियों हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ। कोई भी त्रुटियाँ पाठकों को मिले तो अवश्य ध्यान दिलाएँ जिसे सुधार कर प्रसन्नता होगी।
प्रत्येक अंश इतना बड़ा ही होगा जिससे पढ़ने वाले को दो से तीन मिनट से ज्यादा न लगे और उत्कंठा भी बनी रहे, आगे हरि इच्छा..।

कथा प्रवेश
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ॐ श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

--पौलोम पर्व--

वर्षों से समाधिस्थ भगवान शिव ने आज जैसे ही अपने नेत्र खोले, चहुँ ओर का वातावरण ही जैसे जीवंत हो उठा।
वृक्ष पुष्पदलोंसे लद गए, उनपर भौरें गुंजन करने लगे और मानो वसंत छा गया।
कुमार कार्तिकेय और श्रीगणेश ने नंदी महाराज और गणों समेत शिव के सम्मुख साष्टांग दंडवत हो गए। माता पहले ही अपने देव को नमन कर सुरम्य वातावरण का अवलोकन कर रहीं थीं।
इतनी लंबी समाधि से चकित कुमार कार्तिकेय ने कौतूहलवश अपनी असीम जिज्ञासा  से देवाधिदेव शिव से प्रश्न किया-
"आप जिस भगवान श्रीरामजी की पूजा करते हैं, वह सच्चिदानंद कहाँ पर निवास करते हैं।"
शिव मुस्कुराए और उत्तर दिया -
"सुनो वत्स ! तीनों लोगों का पालन करने वाले मेंरे प्रभु भगवान श्रीराम के नारायण स्वरूप का निवास स्थान बद्रीकाश्रम में था जहाँ नर तथा नारायण त्रेतायुग के पूर्व अर्थात सतयुग में सभी के दर्शन हेतु उपलब्ध थे।
वहाँ जाने और भगवान के दर्शन मात्र से सभी को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती थी।
सतयुग के पश्चात त्रेतायुग में नारायण के दर्शन मात्र देवताओं और ऋषियों को ही हो पाते थे। इसके बाद जब अनाचार बढ़ने लगा देवताओं और ऋषियों में भी अहंकार जागृत हो गया, पाखंड बढ़ने लगा तो नारायण बद्रिकाश्रम को छोड़कर क्षीरसागर में चले गए।
देवताओं और प्राणीमात्र ने जब बद्रिकाश्रम में विष्णु को नहीं पाया तो अत्यंत व्याकुल हो गए। ऐसे में सभी देवता और ऋषिगण ब्रह्मा जी के पास गए और भगवान नारायण के बारे में पूछा। ब्रह्मा जी भी निरुत्तर हो गए और नारायण को खोजते हुए क्षीरसागर पहुंच गए वहां भी नारायण के दर्शन ब्रह्माजी के अतिरिक्त और किसी को नहीं हुए और विष्णु भगवान ने पुनः बद्रिकाश्रम जाने से मना कर दिया।"
इतना कहकर शिव ने कार्तिकेय की तरफ देखा-
कार्तिकेय बड़े ध्यान से पिता की बातें सुन रहे थे।
फिर क्या हुआ पिताश्री?
क्या स्वयं नारायण अभी भी क्षीरसागर में ही विराजमान हैं?
हां पुत्र !
द्वापर के बाद क्षीरसागर ही विष्णु का स्थाई निवास है जहां वे माता लक्ष्मी के साथ निवास कर रहे हैं।
आज भी नारदतीर्थ से बद्रिकाश्रम तक की यात्रा तथा वहाँ का प्रसाद ग्रहण करने वाला प्राणी परम मोक्ष को प्राप्त करता है तथा विष्णुलोक बैकुंठ में उसे स्थान मिल जाता है।
कार्तिकेय के मुख पर अब परम सन्तुष्टि के भाव थे ।
उन्होंने शिव को साष्टांग दंडवत किया और अपने मार्ग को प्रस्थान किया।

क्रमशः-







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श्री महापञ्चमुखहनुमत्कवच

ब्राह्मण उवाच - Fri, 10/20/2017 - 16:06

ऊँ अस्य श्री महा पञ्चमुख हनुमत्कवचमंत्रस्य
ब्रह्मा रूषि:, गायत्री छंद्:,
पञ्चमुख विराट हनुमान देवता।
ह्रीं बीजम्।
श्रीं शक्ति:।
क्रौ कीलकम्।
क्रूं कवचम्।
क्रै अस्त्राय फ़ट्।
इति दिग्बंध्:।
श्री गरूड उवाच्-

अथध्यानं
*******
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।
श्रुणु सर्वांगसुंदर, यत्कृतं देवदेवेन
ध्यानं हनुमत्: प्रियम्||१||

पंचकक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम्| बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिध्दिदम्||२||

पूर्वतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्|
दंष्ट्राकरालवदनं भ्रुकुटीकुटिलेक्षणम्||३||

अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्| अत्युग्रतेजोवपुष्पंभीषणम भयनाशनम्||४||

पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम्| सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम्||५||

उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दिप्तं नभोपमम्| पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम्|
ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम्|
येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यमं महासुरम्||७||

जघानशरणं तस्यात्सर्वशत्रुहरं परम्| ध्या
त्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम्||८||

खड्गं त्रिशुलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम्|
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुं||९||

भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रा दशभिर्मुनिपुंगवम्| एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम्||१०||

प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरण्भुषितम्| दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानु लेपनम
सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम्||११||

पंचास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं शशांकशिखरं कपिराजवर्यम्| पीताम्बरादिमुकुटै रूप शोभितांगं पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि||१२||

मर्कतेशं महोत्राहं सर्वशत्रुहरं परम्|
शत्रुं संहर मां रक्ष श्री मन्नपदमुध्दर||१३||

ओम हरिमर्कट मर्केत मंत्रमिदं परिलिख्यति लिख्यति वामतले| यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं यदि मुंच्यति मुंच्यति वामलता||१४||

ओम हरिमर्कटाय स्वाहा ओम नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाया|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गरूडाननाय सकलविषहराय स्वाहा|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरमुखाय आदिवराहाय सकलसंपत्कराय स्वाहा|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशकराय स्वाहा|

||ओम श्रीपञ्चमुखहनुमंताय आंजनेयाय नमो नम:||
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