Stotra - Pooja

महाभारत 6

ब्राह्मण उवाच - Sat, 11/11/2017 - 20:55
....से आगे-
देवराज ने वज्र द्वारा उसे ऊपर से दबा लिया। इस प्रकार हे ब्रह्मपुरुष शौनकजी ! मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन आरंभ किया गया। नागराज के मुख की ओर असुर और पुच्छ की ओर देवतागण खड़े हो गए।
उग्रश्रवा जी ने कहा-
फिर समुद्र का भयानक मंथन आरंभ हो गया। इस प्रकार मथे जाने से सहस्त्रों समुद्री प्राणियों और जलचरों का संहार हो गया ।
मंदराचल के ऊपर पत्थरों पर वृक्षों की रगड़ से आग निकलने लगी जिसे इंद्र ने जल वर्षा करके शांत किया ।
बहुत दिनों तक मंथन चलता रहा, इतना कि मंदराचल के ऊपर लगे वृक्षों और औषधि औषधियों से रस निकलकर समुद्र में गिरने लगा समुद्र का जल स्वयं दूध बन गया दूध से घी बनने लगा, पर अभी तक समुद्र से अमृत नहीं निकला था।
देवता और असुर निराश हो चले थे तब भगवान श्रीविष्णु ने सभी को बल प्रदान किया ।
देव-दानवों ने पुनः समुद्र को पूरी गति से मथना आरंभ कर दिया ।
हे शौनक देव! फिर महासागर से सूर्य समान तेजस्वी श्वेतवर्ण प्रसन्नात्मा चंद्रदेव प्रकट हुए जो कालांतर में अपने किशोरारूप में शिवजी के मस्तक पर सुशोभित हुए।
तत्पश्चात श्वेत वस्त्रधारिणी सिंधुकन्या महालक्ष्मी जी का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने श्रीविष्णु को वरण किया।
इसके बाद सुरा-सोमरस निकला। जो लक्ष्मी जी के भगवान विष्णु को वरण करने से क्रुद्ध दानवों को दिया गया।
अब उच्चैश्रवा अश्व प्रकट हुआ, और फिर अनंत किरणों से सुशोभित दिव्य कौस्तुभ मणि निकली जो श्रीनारायण के हृदय पर विराजमान हुई ।
इसके बाद कल्पवृक्ष और कामधेनु सुरभि गौ माता की उत्पत्ति हुई।
अब दिव्य देहधारी श्री धन्वंतरी अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
एरावत हस्त उत्पन्न हुआ जो देवराज का वाहन बना।
. .और फिर निकला कालकूट महाविष जो देव और असुरों की प्रार्थना पर महाशिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया।
अंत में निकला अमृत।
असुरों ने देवी लक्ष्मी और अमृत पाने के लिए देवताओं से वैर बाँध लिया ।
तब भगवान विष्णु ने अपनी लीला रची। मोहिनी रूप धरकर असुरों को मोहित कर दिया तथा हाथ में अमृत कलश लेकर पंगत में बैठे देवताओं को परोसना आरंभ कर दिया ।
असुर पंगत में बैठे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे।
उग्रश्रवा जी कहते हैं-
"हे ब्राह्मण देवता शौनकजी महाराज! जिस समय देवता अमृत पान कर रहे थे उसी समय राहु नामक दानव देवताओं के रूप में उनके साथ बैठ गया और अमृत पान करना आरंभ कर दिया"।
सूर्य व चंद्रदेव ने उसे देख लिया और उसका भेद खोल दिया तब श्री हरि ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा उसका मस्तक विच्छिन्न कर दिया ।
तभी से कंठ में अमृत पहुंच चुके राहु के सिर रूप व धड़ रूप केतू ने चंद्र और सूर्य से स्थाई वैर अपना लिया।
फिर उसी क्षीरसागर के समीप देवासुर संग्राम होने लगा ।
अमृत पान कर चुके देवताओं की विजय हुई मंदराचल को अभिनंदन करके पूर्व स्थान पर पहुंचा दिया गया।
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महाभारत 5

ब्राह्मण उवाच - Thu, 11/09/2017 - 19:19

सूतपुत्र उग्रश्रवा जी की कथा में अब महर्षि शौनक और उनके शिष्यों को आनंद आ रहा था।
उनकी आँखों मे जिज्ञासा के साथ-साथ आश्चर्य का भाव भी स्पष्ट जाग्रत हो रहा था।
सूतकुमार के इतना कहते ही महर्षि शौनक ने उत्सुकता से पूछा - 'हे सूतनंदन ! कृपया मुझे बताइए कि जन्मेजय कौन थे ? उन्होंने सर्पों को मारने का संकल्प क्यों किया था ?
मुझे तथा यहाँ बैठे हुए मेरे सभी ब्राह्मणों को भी यह बताइए कि आस्तिक मुनि कौन थे और उन्होंने सर्पों की रक्षा क्यों और कैसे करें की?' उग्रश्रवा जी ने कहा - हे प्रभुश्रेष्ठ !
यह उपाख्यान बहुत विशाल है और अत्यंत प्राचीन भी।
इसे मेरे पिता लोमहर्षण जी ने मुझे सुनाया था तथा उन्हें श्रवण कराया था स्वयं श्री कृष्णद्वैपायन व्यास जी ने, जो मेरे पिता के गुरुवर थे। सर्वप्रथम इस कथा का वर्णन उन्होंने ही किया था।
हे महानआत्मा शौनक जी महाराज!
'मैं सब पापों का नाश करने वाले इस कथानक का विस्तार से वर्णन करना चाहता हूँ अतः कृपया ध्यान से सभी महानुभाव श्रवण करें।' मुनिवर आस्तिक के पिता एक महान यायावर अर्थात सदा विचरण करने वाले मुनि जरत्कारु थे वह केवल वायु पीकर जीवित रहते थे तथा सभी प्रकार की इंद्रियों तथा निंद्रा आदि जीवन की महती आवश्यकता के ऊपर उन्होंने विजय प्राप्त कर ली थी ।
अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए उन्होंने उपाय पूछा जो सिर नीचे और पैर ऊपर करके विशाल धरती रुपी गड्ढे में लटक रहे थे तब पितरों ने उन्हें मुक्ति प्राप्त कराने के लिए वंश परंपरा बढ़ाने का आदेश दिया तथा जरत्कारु को विवाह करने के लिए कहा।
कालांतर में जरत्कारु ने भिक्षा के रूप में नागराज वासुकि की भगिनी जिसका नाम भी जरत्कारु था, विवाह किया तथा उनके पुत्र थे महान आस्तिक, जिन्होंने जन्मेजय के सर्पसत्र यज्ञ में सर्पों की रक्षा की थी।
उग्रश्रवा जी बोले इसकी एक अन्य भी कथा है कि एक बार नाग माता कद्रू ने सर्पों को नष्ट हो जाने का श्राप दिया था जिसकी शांति के लिए वासुकी ने अपनी बहन का सदाचारी तपस्वी जरत्कारु के संग विवाह किया था। इसी महात्मा जरत्कारु और नागकन्या से मुनि आस्तिक का जन्म हुआ इन्हीं तपस्वी आस्तिक ने पांडववंशी जनमेजय के सर्पसत्र नामक यज्ञ में सर्पों को सर्वसंहार से बचाया।
हे सूत कुमार ! आप इतनी सुंदर कथा कहते हैं कि मन नहीं भरता है।
कृपया महात्मा आस्तिक तथा नाग माता कद्रू के शाप की कथा भी विस्तार से कहिए। हम सभी प्रसन्न और धन्य हो जाएँगे ।
उग्रश्रवा जी ने कहा हे आयुष्मान मुनिवर!
मैंने अक्षरशः जो कथा पिताश्री लोमहर्षण जी से सुनी है उसे विस्तार से कहता हूं।
सतयुग की बात है दक्ष प्रजापति की दो सुंदरी कन्याएँ थी कद्रू और विनता ।
वे दोनों परम सुंदर बहनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था ।
एक बार मुनिवर नें दोनों को प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा।
कद्रू ने सहस्त्र नागपुत्रों को पुत्र के रुप में पाने का वरदान माँगा, जिसे सुनकर विनता ने माँगा कि मेरे दो पुत्र हो जो कद्रू के पुत्रों से श्रेष्ठ हो। कद्रू और विनता दोनों ही अपने-अपने वरदान पाकर संतुष्ट हो गई और महर्षि कश्यप
"तुम दोनों अपने अपने गर्भ की धैर्य पूर्वक रक्षा करना"
कहकर तपस्या करने वन में चले गए।
उसके बाद कद्रू ने 1000 और विनता ने दो अंडों को जन्म दिया।
कद्रू के 1000 पुत्र अंडों को फोड़ कर बाहर निकल आए।
विनता के अंडे से बच्चे नहीं निकले तो कद्रू प्रतिदिन उसे लज्जित करती । विनता से जब और धैर्य न रखा गया और उसने एक अंडा फोड़ दिया। उसके ऊपरी भाग पूर्ण विकसित थे पर नीचे के आधे अधूरे अंगों के साथ उसे अपना पुत्र दिखाई दिया।
उस पुत्र को अत्यंत क्रोध आया और उसने माँ से कहा- तुमने मुझे अधीर होकर तथा लोभ में आकर अधूरा बना दिया है अब दूसरा पुत्र ही तेरा उद्धार करेगा तब तक तुझे अपनी बहन और सौत की दासी बन कर रहना पड़ेगा। कालांतर में यही अधूरे शरीर का पुत्र अरुण नाम से विख्यात हुआ और सूर्यदेव के रथ का सारथी बन गया।
उग्रश्रवा ने कहा विनता कद्रू की दासी कैसे बनी इसका दृष्टांत अगर मैं आपको बताता हूं।
समयांतर में विनता को दूसरे पुत्र के रुप में गरुड़ प्राप्त हुए।
एक बार कद्रू और विनता घूमने के लिए निकली।
वहां उन्होंने उच्चैश्रवा नामक एक उत्तम ऐश्वर्यशाली घोड़े को देखा जो देवताओं के द्वारा अमृत के लिए किए जा रहे  समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ था।
शौनक जी ने उग्रश्रवा से पूछा हे सूतनंदन!  पहले मुझे वह कथा सुनाइए कि यह समुद्र मंथन देवताओं ने किस प्रकार और किस स्थान पर किया जिससे परम तेजस्वी अश्वरत्न उत्पन्न हुआ?
उग्रश्रवा जी बोले- हे ब्राह्मण श्रेष्ठ !
मेरु नामसे प्रसिद्ध गिरि प्रदेश है जिस पर एक तरफ भयंकर सर्पों का वास है तो दूसरी तरफ परमदिव्य औषधियाँ भी सुशोभित है। मनुष्यों के लिए तो वहां मन से भी पहुँचना असंभव है। उस पर अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं।
इसी महातेजस्वी गिरि पर्वत के शिखर पर एक बार सभी देवताओं ने बैठकर विचार किया कि अमृत प्राप्त करने के लिए क्या उपाय किया जाए?
तब अच्युतानंदन श्री भगवान नारायण ने बताया कि यदि समस्त देव-दानव मिलकर महासागर का मंथन करें तो अमृत की प्राप्ति संभव है। देवताओं ने असुरों से इस बारे में चर्चा की तो अमृत के नाम से ही असुरों ने हामी भर दी। संपूर्ण देव मिलकर मथानी बनाने के लिए मंदराचल पर्वत को उखाड़ने के लिए पहुँचे जो भूमि के ऊपर और नीचे ग्यारह-ग्यारह सहस्त्र योजन तक फैला हुआ था।
समस्त देवता मिलकर उसे उखाड़ ना सके तब श्री श्री नारायण ने शेषनाग से मंदराचल पर्वत को उखाड़कर समुद्र तट पर ले चलने को कहा। शेषनाग ने मन्दराचल को वन, वनवासी और जटाओं, जीव-जंतुओं सहित उखाड़ लिया तथा देवताओं सहित समुद्र पर्वत पर समुद्र तट पर उपस्थित हो गए।
आज का दिन मानों परम सौभाग्य लेकर आया था। सुर-असुरों का साथ-साथ क्रीड़ा-विलास इसके पूर्व कभी अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान नारायण ने भी देखा न था। यह कदाचित एक स्वप्न ही था। सत्य ही तो है,
"आवश्यकता परम शत्रुओं को भी साथ ले आती है।"
देवता अत्यंत प्रसन्न थे और दानव तो अमृत के नाम से ही बस आनंदातिरेक विक्षिप्त हो रहे थे।
देवताओं ने समुद्र से कहा- 'हम सब अमृत प्राप्त करने के लिए आपका मंथन करेंगे।'
समुद्र ने विनती की-  फिर तो उस अमृत में मेरा भी हिस्सा होना चाहिए इससे मंदराचल पर्वत को घुमाने से मुझे जो पीड़ा होगी उसे मैं सह लूँगा, भारी मंदराचल को समुद्र में टिके रहने के लिए भगवान विष्णु ने स्वयं कच्छप अवतार धारण किया और मंदराचल पर्वत के नीचे अपनी पीठ लगा ली ।
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महाभारत 4

ब्राह्मण उवाच - Tue, 11/07/2017 - 20:01
महाभारत 4
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सूतकुमार ने पुनःअपनी कथा प्रारंभ की। बोले-
"हे विप्रवर ! भार्गव ने अपनी पत्नी सुकन्या से एक पुत्र को जन्म दिया था जिसका नाम था प्रमति। वह बहुत बड़े विद्वान और तपस्वी थे उन्होंने घृताची अप्सरा से रुरू नामक पुत्र को जन्म दिया तथा रुरू और प्रमद्धरा से शुनक का जन्म हुआ जिनके आप पुत्र हैं ।
मैं ब्रह्मपुरुष रुरू के चरित्र का वर्णन करता हूँ जो श्रवण योग्य है कृपया सुनिए।"
बहुत पुरातन बात है । गंधर्व राज विश्वावसु और मेनका के गर्भ से एक संतान उत्पन्न हुई।
मेनका अप्सरा अपने आप को किसी बंधन में बाँधना नहीं चाहती थी सो उसने उस बालिका को महर्षि स्थूलकेश के आश्रम में रख दिया। ऋषि ने इस बालिका को देखा और उसे अपने आश्रम में ही पालन-पोषण करने लगे और उसका नाम प्रमद्दरा रखा।
एक दिन रुरू ने प्रमद्दरा को देखा और विवाह करने की इच्छा प्रकट की।
विवाह तय हो गया पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। प्रमद्दरा की सर्प के काटने से मृत्यु हो गई ।
राजा रूरू अत्यंत दुखी हुए और प्रियतमा प्रमद्दरा के वियोग में वन में जाकर विलाप करने लगे।
तभी आकाशवाणी हुई कि आप बहुत धर्मात्मा हैं, यदि आप अपनी आधी आयु दे दें तो प्रमद्दरा जीवित हो सकती है । रुरू ने अपनी आधी आयु देकर प्रमद्दरा को जीवनदान दिया और विवाह किया।
विवाह के पश्चात रुरू ने ठान लिया कि समस्त सर्प उसके शत्रु हैं ।
एक दिन की बात है रुरू ने एक बूढ़े सर्प को देखा और वह दंड का प्रहार कर उसे मारने वाला ही था कि वह सर्प मनुष्य की आवाज में बोलने लगा ।
रुकिए हे श्रेष्ठ ! मैं तो अपने ब्राम्हण मित्र ऋषि खगम को सताने के कारण उससे मिले श्राप से सर्प योनि में हूं मेरा नाम सहस्त्रपाद है और मैं भी ऋषि हूँ।
परंतु द्विज श्रेष्ठ होकर आप का दंड धारण करना और उग्रता शोभा नहीं देती।
यह सब तो क्षत्रियों के कर्म है, जब राजा जनमेजय के यज्ञ में सर्पों का वध होने लगा तब भी आस्तिक ब्राम्हण के कारण सर्पों की रक्षा हुई थी, और आज भी आपके कारण मेरा सर्प योनि से उद्धार हो पाया है यह कहकर सहस्त्रपाद मुनि अंतर्ध्यान हो गए।
क्रमशः--
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महाभारत 3

ब्राह्मण उवाच - Mon, 11/06/2017 - 20:44
महाभारत 3
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उग्रश्रवा जी ने ऋषिवर की तीव्र उत्कंठा भाँप ली और कहा -
'हे महात्मन! भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा था, जो अत्यंत शीलवान और धर्मपरायणा पतिव्रता नारी थी।'
वह अपने पति को अत्यंत प्रिय थी तथा उसके गर्भ में महर्षि भृगु का पुत्र पल रहा था।
एक बार महर्षि भृगु ऋषि स्नान हेतु जैसे ही आश्रम से बाहर निकले, एक पुलोमा नाम का ही राक्षस उनके आश्रम में घुस गया।
इस राक्षस की भी एक कथा है-
बाल्यकाल में भृगु पत्नी पुलोमा रो रही थी तब उसके पिता ने उसे डराने के लिए उसका नाम उसी के घर में छुपे पुलोमा नाम के राक्षस के नाम पर रख दिया और कहा कि वह रोना बंद नहीं करेगी तो उसका विवाह राक्षस के साथ कर देंगे ।
यह वही राक्षस था जो मौका देखकर भृगु के आश्रम में घुस गया था और उसने बाल्यावस्था में ही बालिका पुलोमा को मन ही मन में अपनी पत्नी के रूप में वरण कर लिया था ।
आश्रम में प्रवेश करते ही उस राक्षस की कुदृष्टि भृगु पत्नी पुलोमा पर पड़ी और वह कामदेव के वशीभूत होकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
वह राक्षस भृगुपत्नी को अपनी पत्नी मानता था सो उसे हरण करके ले जाना चाहता था ।
इसके लिए उसके मन में एक कुटिल योजना ने जन्म ले लिया।
"वैसे भी जब कोई गलत कार्य करने लगता है तो उसे सत्य ठहराने के लिए और औचित्य की खोज भी कर ही लेता है।"
राक्षस पुलोमा ने भृगु के आश्रम में ही अग्निहोत्र में अग्निदेव को प्रज्वलित होते हुए देखा और भृगुपत्नी के समक्ष ही अग्निदेव से प्रश्न किया-
"हे अग्नि देवता ! सत्य की शपथ लेकर बताएँ, कि यह पहले से मेरी पत्नी है या नहीं ?
क्या इसके पिता ने भृगु के साथ विवाह के पूर्व ही मुझे विवाह हेतु नहीं सौंप दिया था?
मैंने तो इसे वर्षों पूर्व ही वरण कर लिया था। आप तो परम ज्ञानी और सत्य का साथ देने वाले देवता हैं कृपया सत्य का साथ दीजिए। अग्निदेव बहुत दुखी हुए। क्योंकि सत्य कहना अत्यंत कठिन था और असत्य का साथ वह दे नहीं सकते थे ।
अतः धीरे से उन्होंने कहा - "हे दानवराज ! यह सत्य है कि पुलोमा का वरण तुम्हीं ने पहले किया परंतु इसके पिता ने विधिपूर्वक मंत्रोच्चार करते हुए इसका विवाह भृगु के साथ ही किया है।"
पुलोमा अग्निदेव का वचन सुनकर बहुत दुखी हो गई कि इस दानव ने पहले ही उसका वरण किया था ।
राक्षस ने इतना सुनकर भृगुपत्नी का अपहरण कर लिया ।
उग्रश्रवा जी तनिक रुक कर बोले- 'हे महात्मन! 'हे ऋषिवर! तब भृगु पत्नी के गर्भ में पल रहा वह बालक राक्षस के इस कुकृत्य से क्रोध में भर गया और माता के गर्भ से च्युत होकर बाहर निकल आया और उसने अपने अपूर्व तेज से राक्षस को भस्म कर दिया।
च्युत होकर बाहर निकले बालक का नाम इसीलिए च्यवन हुआ।
माता पुलोमा तब अपने पुत्र च्यवन को लेकर ब्रह्मा जी के पास पहुंची और उसके आँसुओं की बाढ़ से नदी बन गई, जो वसुधरा कहलाई।
जैसे ही महर्षि भृगु को सब बातें पता चली तो अग्निदेव की कही बातों को सुनकर भृगु ने अग्निदेव को सर्वभक्षी होने का श्राप दे दिया। बाद में ब्रह्मा जी ने अग्निदेव को श्राप से मुक्ति दी और कहा कि तुम्हारा सारा शरीर सर्वभक्षी नहीं होगा और केवल तुम्हारी ज्वालाएँ और चिताग्नि ही सर्वक्षण करेगी तथा यज्ञ कार्यों में आहुति के रूप में सभी देवताओं के भाग के रूप में तुम्हें हविष्य अवश्य प्राप्त होगा और तुम्हारे स्पर्श से सभी वस्तुएं शुद्ध हो जाएँगी।
हे महर्षि शौनक देव जी! यही भार्गव च्यवन ऋषि के जन्म का वृतांत है, उग्रश्रवा ने हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए कहा।
शौनक जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले- हे सूत कुमार ! मुझे महर्षि भार्गव की कथा भी विस्तार से सुनाइए मैं उत्सुक हो रहा हूं।
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महाभारत 2

ब्राह्मण उवाच - Sun, 11/05/2017 - 17:17
महाभारत 2
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महर्षि शौनक का बारह वर्षीय सत्र वाला गुरुकुल उस नैमिषारण्य में चल रहा था।
चारों ओर मेला से लगा था, बड़ी चहलपहल दिखाई देती थी।
ब्राह्मणों, बटुकों सहित अत्यंत कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ऋषिगण वहां शिक्षा और तपस्या में लीन रहते थे।
एक दिवस भ्रमण करते हुए लोमहर्षण के पुत्र सूतकुमार उग्रश्रवा का वहां पर आगमन हुआ। वह पुराणों के ज्ञाता थे तथा पुराणों की कथा कहने में कुशल भी ।
ऋषिगण उन्हें जानते थे उन सब ने उग्रश्रवा जी को घेर लिया तथा कथा सुनाने का आग्रह करने लगे।
उग्रश्रवा जी ने ऋषियों का अभिवादन किया और हाथ जोड़कर बोले-
'हे परम पूज्य ऋषिगण आप ही बताएँ कि आप सभी कौन सा प्रसंग सुनना चाहते हैं'।
ऋषियों ने कहा-
'हे कमलनयन सूतनंदन हम सब आपको देखकर आपसे बहुत सारे कथा पसंद सुनने के लिए अति उत्साहित हैं परंतु हमारे पूज्य कुलपति महर्षि शौनक जी अभी अग्नि की उपासना में तथा यज्ञादि कार्य में व्यस्त हैं, जैसे ही वे उपस्थित होते हैं आप उनके कहने के अनुसार कथा सुनाइएगा।'

तत्पश्चात द्विजश्रेष्ठ विप्रशिरोमणि शौनक जी वैदिक स्तुतियों के कार्य का संपादन करके वहाँ पधारे और सुख पूर्वक विराजमान हो गए।
शौनक जी ने कहा-
'हे लोमहर्षण कुमार ! मुझे मालूम है कि आप के प्रतापी पिता ने सब पुराणों आदि का भली प्रकार अध्ययन किया था, क्या आप भी उन सभी दिव्य कथाओं और राजर्षियों और ब्रह्मर्षियों के वंशो की कथावलियों के बारे में जानते हैं?
यदि हाँ तो कृपया सर्वप्रथम भृगुवंश का वर्णन करने वाली कथा कहिए।
हम सभी बहुत आतुरता के साथ आप के वचनों को सुनने के लिए उद्यत हैं।'
सौतिपुत्र उग्रश्रवा ने कहा -
"मान्यवर मुझे मेरे पिता महर्षि वैशंपायन और महान श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कथा के रूप में जो कुछ भी सुनने को मिला है और जो कुछ भी मुझे ज्ञात है वह सब मैं आपको वर्णन करता हूँ"
हे भृगुनंदन ! मैं आपको सबसे पहले भृगुवंश का बखान करता हूं तथा आपके परम प्रतापी भार्गव वंश का भी परिचय देता हूं इस अद्भुत वृतांत को ध्यानपूर्वक सुनिए।
स्वयंभू ब्रह्मा जी ने वरुण के यज्ञ में महर्षि भृगु को अग्नि से उत्पन्न किया था ।
इनके अत्यंत गुणवान व प्रतापी पुत्र ऋषि च्यवन थे जिन्हें भार्गव ऋषि भी कहते हैं उनके पुत्र थे धर्मात्मा प्रमति ।
प्रमति और अप्सरा घृताची के गर्भ से रुरू का जन्म हुआ था और रुरु के पुत्र शनक थे जो प्रमद्दरा  के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।
वह वेदों के पारंगत विद्वान और बड़े धर्मात्मा थे और आपके पिता भी।
शौनक जी बोले -
परंतु हे सूतपुत्र ! मुझे पूरी कथा विस्तार से सुनने की उत्कंठा हो रही है मुझे बताइए कि महात्मा भार्गव का नाम च्यवन कैसे हुआ?

क्रमशः

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महाभारत MAHABHARATA

ब्राह्मण उवाच - Sat, 11/04/2017 - 20:31
महाभारत : 1

एक महाकाव्य, एक कथा जिसमें सार है-
सबके जीवन का..

                   -विनम्र निवेदन-

भारतीय सनातन संस्कृति का महान ग्रन्थ जय, विजय, भारत और महाभारत इन सब नामों से प्रचलित है। इसमें अमूल्य रत्नों के अपार भंडार छुपे हैं। इस महान महाकाव्य की तुलना विश्व की किसी भी रचना से करना सूर्य के प्रकाश में दीप जलाने के तुल्य है।
भगवान वेदव्यास ने इसमें वेदों के गूढ़ रहस्य, उपनिषदों के सार, पुराण, इतिहास, संस्कृति, दर्शन, भूगोल, नक्षत्रज्ञान, तीर्थों की महिमा, धर्म, भक्ति, प्रेम, अध्यात्म, कर्मयोग और ज्ञान-विज्ञान-व्यवहार इन सब के गूढ़ अर्थ भर दिए हैं। एक लाख से अधिक श्लोकों वाला ऐसा महाकाव्य न कभी पहले लिखा गया और न भविष्य में लिखा जा सकता है।

कई स्थानों पर ऐसी भ्रांति है कि महाभारत को घर में रखना या पढ़ना अशुभकारी होता है पर यह सही नहीं है। इस ग्रंथ में ही विस्तार से इसे पढ़ने के लाभ दिए गए है। कुछ विद्वतजनों ने इस विद्या परअपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सम्भवतः ऐसा किया होगा।

दो पीढ़ियों पहले तक इसकी कहानियाँ घर-घर में सुनाई जाती थीं, लोग इसके बारे में बातें करते थे पर आज कुछ लोग ही इनके पात्रों के नाम भर जानते हैं। सनातन परंपराओं के लगातार क्षरण के साथ ही अगली पीढ़ी सम्भवतः इससे पूर्णतया अनभिज्ञ ही रहेगी। वैसे भी समयाभाव से इस पूरे ग्रँथ के छह-सात सहस्त्र पृष्ठों का अध्ययन इतना भी सरल नहीं है और इससे भी बड़ी बात यह कि बिना भगवत कृपा के कदापि सम्भव नहीं है।

वैसे तो इसकी सैकड़ों टीकाएँ और हजारों अनुदित संस्करण विभिन्न भाषाओं  में पहले से ही उपलब्ध हैं पर इसकी कहानियाँ अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का एक तरीका यह भी था कि इसे बोलचाल की सरल भाषा में लिखा जाए और सोशल मीडिया के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए, इसके लिए इस ग्रंथ को पढ़ना आवश्यक था।

अतः इसके अध्ययन का प्रयास आरंभ किया श्री रामजानकी विवाह दिवस, मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी सम्वत 2068, आंग्लदिनांक 29 नवंबर 2011 को, पर तय है कि जब तक भगवान की कृपा न हो तब तक आप एक इंच भी आगे बढ़ नहीं सकतें। आज लगभग 6 वर्षों के पश्चात भी यह अध्ययन अपनी आरंभिक स्थिति में ही है।
इसे पुस्तक के रूप में अभी तक प्रकाशित करने की स्थिति नहीं है पर इसे छोटे कथानक अंश रूप में अपने ब्लॉग आदि पर लेखन का आरंभ कर दिया जाना चाहिए ऐसा मानस बनाया है, आज वर्ष 2017 के 4 नवंबर के दिन कार्तिक पूर्णिमा देव-दिवाली से अच्छा दिवस इसके इस कार्य के आरम्भ के लिए क्या हो सकता था।
इस ईश्वरीय रचना को न तो कहीं से कॉपी किया गया है और न ही इसमें अपनी ओर से कथानक को बदलने जा प्रयास किया गया है।
ईश्वरेच्छा से एकाध स्थानों पर कुछ अलग तथ्य आए हैं जो हमारी सनातन संस्कृति के सर्वथा अनुकूल ही हैं।
मौलिकता तो मात्र भगवान व्यासजी का अधिकार रहा है पर उनके असीम विस्तृत महाकाव्य से कुछ घटनाओं को अपनी आज की भाषा मे संकलन का या प्रयास वैसा ही है जैसे समुद्र से कोई अपने कार्य के लायक कुछ लोटे भर ले।
यह पूर्ण रूप से स्वलिखित है, टंकण आदि भी स्वयं ही किया गया है अतः भाषाई त्रुटियों हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ। कोई भी त्रुटियाँ पाठकों को मिले तो अवश्य ध्यान दिलाएँ जिसे सुधार कर प्रसन्नता होगी।
प्रत्येक अंश इतना बड़ा ही होगा जिससे पढ़ने वाले को दो से तीन मिनट से ज्यादा न लगे और उत्कंठा भी बनी रहे, आगे हरि इच्छा..।

कथा प्रवेश
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ॐ श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

--पौलोम पर्व--

वर्षों से समाधिस्थ भगवान शिव ने आज जैसे ही अपने नेत्र खोले, चहुँ ओर का वातावरण ही जैसे जीवंत हो उठा।
वृक्ष पुष्पदलोंसे लद गए, उनपर भौरें गुंजन करने लगे और मानो वसंत छा गया।
कुमार कार्तिकेय और श्रीगणेश ने नंदी महाराज और गणों समेत शिव के सम्मुख साष्टांग दंडवत हो गए। माता पहले ही अपने देव को नमन कर सुरम्य वातावरण का अवलोकन कर रहीं थीं।
इतनी लंबी समाधि से चकित कुमार कार्तिकेय ने कौतूहलवश अपनी असीम जिज्ञासा  से देवाधिदेव शिव से प्रश्न किया-
"आप जिस भगवान श्रीरामजी की पूजा करते हैं, वह सच्चिदानंद कहाँ पर निवास करते हैं।"
शिव मुस्कुराए और उत्तर दिया -
"सुनो वत्स ! तीनों लोगों का पालन करने वाले मेंरे प्रभु भगवान श्रीराम के नारायण स्वरूप का निवास स्थान बद्रीकाश्रम में था जहाँ नर तथा नारायण त्रेतायुग के पूर्व अर्थात सतयुग में सभी के दर्शन हेतु उपलब्ध थे।
वहाँ जाने और भगवान के दर्शन मात्र से सभी को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती थी।
सतयुग के पश्चात त्रेतायुग में नारायण के दर्शन मात्र देवताओं और ऋषियों को ही हो पाते थे। इसके बाद जब अनाचार बढ़ने लगा देवताओं और ऋषियों में भी अहंकार जागृत हो गया, पाखंड बढ़ने लगा तो नारायण बद्रिकाश्रम को छोड़कर क्षीरसागर में चले गए।
देवताओं और प्राणीमात्र ने जब बद्रिकाश्रम में विष्णु को नहीं पाया तो अत्यंत व्याकुल हो गए। ऐसे में सभी देवता और ऋषिगण ब्रह्मा जी के पास गए और भगवान नारायण के बारे में पूछा। ब्रह्मा जी भी निरुत्तर हो गए और नारायण को खोजते हुए क्षीरसागर पहुंच गए वहां भी नारायण के दर्शन ब्रह्माजी के अतिरिक्त और किसी को नहीं हुए और विष्णु भगवान ने पुनः बद्रिकाश्रम जाने से मना कर दिया।"
इतना कहकर शिव ने कार्तिकेय की तरफ देखा-
कार्तिकेय बड़े ध्यान से पिता की बातें सुन रहे थे।
फिर क्या हुआ पिताश्री?
क्या स्वयं नारायण अभी भी क्षीरसागर में ही विराजमान हैं?
हां पुत्र !
द्वापर के बाद क्षीरसागर ही विष्णु का स्थाई निवास है जहां वे माता लक्ष्मी के साथ निवास कर रहे हैं।
आज भी नारदतीर्थ से बद्रिकाश्रम तक की यात्रा तथा वहाँ का प्रसाद ग्रहण करने वाला प्राणी परम मोक्ष को प्राप्त करता है तथा विष्णुलोक बैकुंठ में उसे स्थान मिल जाता है।
कार्तिकेय के मुख पर अब परम सन्तुष्टि के भाव थे ।
उन्होंने शिव को साष्टांग दंडवत किया और अपने मार्ग को प्रस्थान किया।

क्रमशः-







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श्री महापञ्चमुखहनुमत्कवच

ब्राह्मण उवाच - Fri, 10/20/2017 - 16:06

ऊँ अस्य श्री महा पञ्चमुख हनुमत्कवचमंत्रस्य
ब्रह्मा रूषि:, गायत्री छंद्:,
पञ्चमुख विराट हनुमान देवता।
ह्रीं बीजम्।
श्रीं शक्ति:।
क्रौ कीलकम्।
क्रूं कवचम्।
क्रै अस्त्राय फ़ट्।
इति दिग्बंध्:।
श्री गरूड उवाच्-

अथध्यानं
*******
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।
श्रुणु सर्वांगसुंदर, यत्कृतं देवदेवेन
ध्यानं हनुमत्: प्रियम्||१||

पंचकक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम्| बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिध्दिदम्||२||

पूर्वतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्|
दंष्ट्राकरालवदनं भ्रुकुटीकुटिलेक्षणम्||३||

अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्| अत्युग्रतेजोवपुष्पंभीषणम भयनाशनम्||४||

पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम्| सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम्||५||

उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दिप्तं नभोपमम्| पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम्|
ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम्|
येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यमं महासुरम्||७||

जघानशरणं तस्यात्सर्वशत्रुहरं परम्| ध्या
त्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम्||८||

खड्गं त्रिशुलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम्|
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुं||९||

भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रा दशभिर्मुनिपुंगवम्| एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम्||१०||

प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरण्भुषितम्| दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानु लेपनम
सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम्||११||

पंचास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं शशांकशिखरं कपिराजवर्यम्| पीताम्बरादिमुकुटै रूप शोभितांगं पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि||१२||

मर्कतेशं महोत्राहं सर्वशत्रुहरं परम्|
शत्रुं संहर मां रक्ष श्री मन्नपदमुध्दर||१३||

ओम हरिमर्कट मर्केत मंत्रमिदं परिलिख्यति लिख्यति वामतले| यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं यदि मुंच्यति मुंच्यति वामलता||१४||

ओम हरिमर्कटाय स्वाहा ओम नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाया|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गरूडाननाय सकलविषहराय स्वाहा|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरमुखाय आदिवराहाय सकलसंपत्कराय स्वाहा|

ओम नमो भगवते पंचवदनाय उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशकराय स्वाहा|

||ओम श्रीपञ्चमुखहनुमंताय आंजनेयाय नमो नम:||
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तीन गुण

ब्राह्मण उवाच - Thu, 10/05/2017 - 20:13
तीन गुण
*******
जीवन के तीन गुण
सफलता
सम्पन्नता
और अवस्था
अपनी तरफ खींचती है।
मित्रों को..
विरोधियों को भी...
सदा से ।
सभी बन जाते हैं मित्र।
छलकने लगता है प्रेम।
पर...
यह 'पर' बड़ा
गहरा सूचक है।
जैसे ही यह तीनों
ढलान पर
क्षीण होते है,
साफ दिखने लगता है सबका..
... प्रेम।
क्योंकि...
उनमें से कुछ
प्रेम करते हैं...
हृदय से,
कुछ देह से,
और कुछ...
बुद्धि से।
एक निष्काम, रहेगा सर्वदा।
दूसरा सकाम...
चला जाएगा,
और...
तीसरा,
जो प्रेम की आड़ में है,
पूर्ण विलोम।
रे...बचना इसी से है...
रहना है..
सा व धा न।
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Sri Shashti Devi Stotram – శ్రీ షష్టీ దేవి స్తోత్రం

Sri Shashti Devi Stotram – శ్రీ షష్టీ దేవి స్తోత్రం

ధ్యానం |

శ్రీమన్మాతరం అంబికాం విధి మనోజాతాం సదాభీష్టదాం
స్కందేష్టాం చ జగత్ప్రసూం విజయాదాం సత్పుత్ర సౌభాగ్యదాం |
సద్రత్నాభరణాన్వితాం సకరుణాం శుభ్రాం శుభాం సుప్రభాం
షష్టాంశాం ప్రకృతేః పరం భగవతీం శ్రీ దేవసేనాం భజే ||

షష్టాంశాం ప్రకృతేః శుద్ధాం సుప్రతిష్టాం చ సువ్రతాం
సుపుత్రదాం చ శుభదాం దయారూపాం జగత్ప్రసూం|
శ్వేత చంపక వర్ణాభాం రక్తభూషణ భూషితాం
పవిత్రరూపాం పరమం దేవసేనా పరాం భజే ||

స్తోత్రం |

నమో దేవ్యై మహాదేవ్యై సిద్ధ్యై శాంత్యై నమో నమః |
శుభాయై దేవసేనాయై షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౧ ||

వరదాయై పుత్రదాయై ధనదాయై నమో నమః |
సుఖదాయై మోక్షదాయై షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౨ ||

సృష్ట్యై షష్టాంశరూపాయై సిద్ధాయై చ నమో నమః |
మాయాయై సిద్ధయోగిన్యై షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౩ ||

సారాయై శారదాయై చ పరాదేవ్యై నమో నమః |
బాలాదిష్టాతృ దేవ్యై చ షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౪ ||

కళ్యాణదాయై కళ్యాణ్యై ఫలదాయై చ కర్మణాం |
ప్రత్యక్షాయై సర్వభక్తానాం షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౫ ||

పూజ్యాయై స్కందకాంతాయై సర్వేషాం సర్వకర్మసు |
దేవ రక్షణకారిణ్యై షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౬ ||

శుద్ధ సత్త్వ స్వరూపాయై వందితాయై నృణాం సదా |
హింసాక్రోధవర్జితాయై షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౭ ||

ధనం దేహి ప్రియాం దేహి పుత్రం దేహి సురేశ్వరి |
మానం దేహి జయం దేహి ద్విషోజహి మహేశ్వరి || ౮ ||

ధర్మం దేహి యశో దేహి షష్టీ దేవీ నమో నమః |
దేహి భూమిం ప్రజాం దేహి విద్యాం దేహి సుపూజితే |
కళ్యాణం చ జయం దేహి షష్టీ దేవ్యై నమో నమః || ౯ ||

ఫలశృతి |

ఇతి దేవీం చ సంస్తుత్య లభే పుత్రం ప్రియవ్రతం |
యశశ్వినం చ రాజేంద్రం షష్టీ దేవి ప్రసాదత ||

షష్టీ స్తోత్రమిదం బ్రహ్మాన్ యః శృణోతి తు వత్సరం |
అపుత్రో లభతే పుత్రం వరం సుచిర జీవనం ||

వర్షమేకం చ యా భక్త్యా సంస్తుత్యేదం శృణోతి చ |
సర్వపాపత్వినిర్ముక్తా మహావంధ్యా ప్రసూయతే ||

వీరం పుత్రం చ గుణినం విద్యావన్తం యశస్వినం |
సుచిరాయుష్యవన్తం చ సూతే దేవి ప్రసాదతః ||

కాక వంధ్యా చ యా నారీ మృతపత్యా చ యా భవేత్ |
వర్షం శృత్వా లభేత్పుత్రం షష్టీ దేవీ ప్రసాదతః ||

రోగ యుక్తే చ బాలే చ పితామాతా శృణోతి చేత్ |
మాసేన ముచ్యతే రోగాన్ షష్టీ దేవీ ప్రసాదతః ||

జయ దేవి జగన్మాతః జగదానందకారిణి |
ప్రసీద మమ కళ్యాణి నమస్తే షష్టీ దేవతే ||

శ్రీ షష్టీ దేవి స్తోత్రం సంపూర్ణం ||

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Shiva varnamala stotram శివ వర్ణమాలా స్తోత్రం

శివ అక్షరమాలా స్తోత్రం

తెలుగు అక్షరమాల లోని ప్రతి అక్షరం తో పరమేశ్వరుని స్తుతించే

శివ  అక్షరమాలా స్తోత్రం..

సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ
సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ

అద్భుత విగ్రహ అమరాధీశ్వర అగణిత గుణగణ అమృత శివ       

ఆనందామృత ఆశ్రిత రక్షక ఆత్మానంద మహేశ శివ                 
ఇందు కళాధర ఇంద్రాదిప్రియ సుందరరూప సురేశ శివ           
ఈశ సురేశ మహేశ జనప్రియ కేశవ సేవిత కీర్తి శివ                 
ఉరగాదిప్రియ ఉరగవిభూషణ నరకవినాశ నటేశ శివ                 
ఊర్జిత దానవనాశ పరాత్పర ఆర్జిత పాపవినాశ శివ                  
ఋగ్వేదశ్రుతి మౌళి విభూషణ రవి చంద్రాగ్ని త్రినేత్ర శివ           
ౠపనామాది ప్రపంచ విలక్షణ తాపనివారణ తత్వ శివ           
ళుల్లిస్వరూప సహస్ర కరోత్తమ వాగీశ్వర వరదేశ శివ               

ళూతాధీశ్వర రూపప్రియహర వేదాంతప్రియ వేద్య శివ 

సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ
సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ
        
ఏకానేక స్వరూప సదాశివ భోగాదిప్రియ పూర్ణ శివ                 
ఐశ్వర్యాశ్రయ చిన్మయ చిద్ఘన సచ్చిదానంద సురేశ శివ             
ఓంకారప్రియ ఉరగవిభూషణ హ్రీంకారప్రియ ఈశ శివ                
ఔరసలాలిత అంతకనాశన గౌరిసమేత గిరీశ శివ                     
అంబరవాస చిదంబర నాయక తుంబురు నారద సేవ్య శివ        
ఆహారప్రియ అష్ట దిగీశ్వర యోగి హృదిప్రియవాస శివ               
కమలాపూజిత కైలాసప్రియ కరుణాసాగర కాశి శివ                  
ఖడ్గశూల మృడ టంక ధనుర్ధర విక్రమరూప విశ్వేశ శివ             
గంగా గిరిసుత వల్లభ శంకర గణహిత సర్వజనేశ శివ               
ఘాతక భంజన పాతకనాశన దీనజనప్రియ దీప్తి శివ               
జ్ఞాన్త స్వరూపానంద జనాశ్రయ వేదస్వరూప వేద్య శివ              
చండవినాశన సకలజనప్రియ మండలాధీశ మహేశ శివ             
ఛత్రకిరీట సుకుండల శోభిత పుత్రప్రియ భువనేశ శివ                
జన్మజరా మృత్యాది వినాశన కల్మషరహిత కాశి శివ                

సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ
సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ

ఝంకారప్రియ భృంగిరిటప్రియ ఒంకారేశ్వర విశ్వేశ శివ              
జ్ఞానాజ్ఞాన వినాశన నిర్మల దీనజనప్రియ దీప్తి శివ                
టంకస్వరూప సహస్ర కరోత్తమ వాగీశ్వర వరదేశ శివ                
ఠక్కాద్యాయుధ సేవిత సురగణ లావణ్యామృత లసిత శివ          
డంభవినాశన డిండిమభూషణ అంబరవాస చిదేశ శివ               
ఢంఢండమరుక ధరణీనిశ్చల ఢుంఢివినాయక సేవ్య శివ           
నానామణిగణ భూషణనిర్గుణ నతజనపూత సనాథ శివ             
తత్వమస్యాది వాక్యార్థ స్వరూప నిత్యస్వరూప నిజేశ శివ            
స్థావరజంగమ భువనవిలక్షణ తాపనివారణ తత్వ శివ             
దంతివినాశన దళితమనోభవ చందన లేపిత చరణ శివ             
ధరణీధరశుభ ధవళవిభాసిత ధనదాదిప్రియ దాన శివ              
నళినవిలోచన నటనమనోహర అళికులభూషణ అమృత శివ       
పన్నగభూషణ పార్వతినాయక పరమానంద పరేశ శివ             
ఫాలవిలోచన భానుకోటిప్రభ హాలాహలధర అమృత శివ            

సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ
సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ

బంధవిమోచన బృహతీపావన స్కందాదిప్రియ కనక శివ            
భస్మవిలేపన భవభయమోచన విస్మయరూప విశ్వేశ శివ          
మన్మథనాశన మధురానాయక మందరపర్వతవాస శివ            
యతిజన హృదయాధినివాస విధివిష్ణ్వాది సురేశ శివ                
రామేశ్వరప్రియ రమణముఖాంబుజ సోమేశ్వర సుకృతేశ శివ     
లంకాధీశ్వర సురగణ సేవిత లావణ్యామృత లసిత శివ             
వరదాభయకర వాసుకిభూషణ వనమాలాది విభూష శివ           
శాంతిస్వరూప అతిప్రియసుందర వాగీశ్వర వరదేశ శివ             
షణ్ముఖజనక సురేంద్ర మునిప్రియ షాడ్గుణ్యాది సమేత శివ         
సంసారార్ణవ నాశన శాశ్వత సాధుజన ప్రియవాస శివ               
హరపురుషోత్తమ అద్వైతామృత మురరిపు సేవ్య మృదేశ శివ      
లాళిత భక్తజనేశ నిజేశ్వర కాళినటేశ్వర కామ శివ                   
క్షరరూపాభి ప్రియాన్విత సుందర సాక్షాత్ స్వామిన్నంబా సమేత శివ

సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ
సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ సదాశివ సాంబ శివ

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रावण

ब्राह्मण उवाच - Sat, 09/30/2017 - 19:21
रावण
*****
आज फिर याद करके उसकी गलतियों को
पुतला जलाएँगे हम।
पर अपने अंदर...
फिर भी सम्भाल कर रखेंगे।
जिससे हम डरते है....
उसका पुतला जला
तसल्ली कर लेते हैं।
बरसों से..युगों से..
बचा के रखा तो है हमने उसे।
और अब तो कलयुग है प्रभु!
वह तो त्रेता में भी बलशाली था।
वह सचिदानंद न सही,
सर्वव्यापी तो है ही..
आज भी..
क्या नहीं है?
हर बार...
हर साल जलाने पर भी मरता नहीं है वो।
सुरसा की तरह बढ़ता ही जा रहा है..
पर हनुमान भी तो आते नहीं..।
अनेक कुबेरों पर
एक छत्र अधिकार उसका ही तो है।
स्वर्णजटित जल, पहाड़, प्रकृति को
खोद-उलीच कर दोहन कर रहा है।
वह फिर-फिर जी उठता है.. हर बार..
रक्तबीज के जैसे।
पर महाकाली भी तो आती नहीं...
बढ़ता जाता है...
जलकुम्भी की तरह ... जल में।
बबूल की तरह ...स्थल में
धूल और धुँए की तरह...
आकाश में।
और....
पाप की तरह ...मन में।
बल्कि....
वह कभी मरा ही नहीं ।
क्योंकि....
नाभि का अमृत
उसका हटा नहीं है।
पर राम ...
आते नहीं।
हाँ..जिस राम का रूप
बनाने की हिम्मत उसने कभी
की न थी।
उस राम के भेष में
बहुरूपिये चारो तरफ हैं।
वह तो एक ही था
तब..
अब तो सब जगह है, सर्वव्यापी, सर्वत्र...।
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क्यों नहीं आते ईश्वर पृथ्वी पर

ब्राह्मण उवाच - Fri, 09/15/2017 - 21:03
क्यों नहीं आते ईश्वर पृथ्वी पर
**********************
एक पुरानी कहानी है।
उन दिनों....
ईश्वर ने नई-नई दुनिया बनाई ही थी।
अपनी रचना, अपनी कोई भी कृति सबको सुंदर लगती ही है।
वह भी देखता रहता था ऊपर से कि कहाँ पर क्या हो रहा है।
अब तो थक गया,
ऊब गया। सब जगह शांति...
कोई हलचल नहीं...
...और फिर उसने
बेमन से...
थोड़ी -थोड़ी कमियों के साथ मनुष्य को बनाना आरम्भ कर दिया।
एक-एक अंधा लँगड़ा भी बना दिया।
उनके पूर्व जन्म के कर्मों के हिसाब से...
....और उस अँधे और लँगड़े को भी देखने लगा...
कब तक देखता रहे।
बड़े परेशान होते थे वे...
अपनी ही सृष्टि को देख दया आने लगी उसे ...
बड़ी दया आयी।
उसने सोचा...
.. कि इन दोनों को ठीक कर दूं जाकर।
आया।
दोनों नाराज होकर एक दूसरे से, अलग-अलग वृक्षों के नीचे बैठे थे।
हाँ-हाँ उन दिनों पृथ्वी पर काफी वृक्ष हुआ करते थे।
वे दोनों...
विचार कर रहे थे कि किस तरह..
अंधा सोच रहा था कि इस लँगड़े की आंखें किस तरह फोड़ दूं।
बड़ी अकड़ बनाए हुए है आंखों की।
  ...और लंगड़ा सोच रहा था कि इस अंधे की टाँग कैसे तोड़ दूं।
तभी ईश्वर पधारे।
उसने पूछा पहले अंधे से...
उसने सोचा कि जब मैं अंधे से पूछंगा कि तू कोई एक वरदान मांग ले...
...तो वह मांगेगा वरदान कि मेरी आंखें ठीक कर दो।
या कि मेरे लँगड़े मित्र की टाँगें अच्छी हो जाय।
जब उसने अंधे से कहा कि तू एक वरदान मांग ले।
...तो अंधे ने कहा कि 'हे प्रभु! जब दे ही रहे हों—इतना दिल दिखा रहे ही हो, तो एक काम करो कि इस लंगड़े की आंखें फोड़ दो'
...और यही लंगड़े ने भी किया।
ईश्वर तो बहुत चौंका।
तभी से तो नीचे...
पृथ्वी पर आता नहीं कि ये बड़े खतरनाक है।
ये दुनिया...सबलोग...
सचमें..हैं...
"ख त र ना क"
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हरि अनंत हरि कथा अनंता। A Gateway to the God

ब्राह्मण उवाच - Fri, 09/01/2017 - 21:19
हरि अनंत हरि कथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए।
कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥

श्री हरि विष्णु अनंत हैं उनका कोई पार नहीं पा सकता और इसी प्रकार उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से सुनते और सुनाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते।

यह प्रसंग मैं कहा भवानी।
हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।
सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥

शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती! मैंने यह बताने के लिए इस प्रसंग को कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवान की माया से मोहित हो जाते हैं। प्रभु कौतुकी व लीलामय हैं और शरणागत का हित करने वाले हैं। वे सेवा करने में बहुत सुलभ और सब दुःखों के हरने वाले हैं।

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥

देवता, मनुष्य और मुनियों में ऐसा कोई नहीं है, जिसे भगवान की महान बलवती माया मोहित न कर दे। मन में ऐसा विचारकर उस महामाया के स्वामी श्री रामजी का भजन करते रहना चाहिए।
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समानता कबीर और बुद्ध की।

ब्राह्मण उवाच - Fri, 09/01/2017 - 21:15
कबीर और बुद्ध
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मन रे जागत रहिये भाई।
गाफिल होइ बसत मति खोवै।
चोर मुसै घर जाई।
षटचक्र की कनक कोठरी।
बस्त भाव है सोई।
ताला कुंजी कुलक के लागै।
उघड़त बार न होई।
पंच पहिरवा सोई गये हैं,
बसतैं जागण लागी,
जरा मरण व्यापै कछु नाही।
गगन मंडल लै लागी।
करत विचार मन ही मन उपजी।
ना कहीं गया न आया,
कहै कबीर संसा सब छूटा।
राम रतन धन पाया।

बुद्ध एक गांव के पास से गुज़रे।
लोगों ने गालियाँ दी,अपमान किया।
बुद्ध ने कहा,क्या मैं जाऊँ,अगर बात पूरी हो गई हो?क्योंकि दूसरे गांव मुझे जल्दी पहुँचना है। लोगो ने कहा,
हमने भद्दे से भद्दे शब्दों का प्रयोग किया है,
क्या तुम बहरे हो गए?
क्या तुमने सुना नहीं?
बुद्ध ने कहा कि सुन रहा हूँ।पूरे गौर से सुन रहा हूँ।
इस तरह सुन रहा हूँ,जैसा पहले मैने कभी सुना ही न था, लेकिन तुम ज़रा देर करकेआए।
दस साल पहले आना था।
अब मैं जाग गया हूँ।
अब चोरों को भीतर घुसने का मौका न रहा।
तुम गाली देते हो।
मैं देखता हूँ।
गाली मेरे तक आती है और लौट जाती है।
 ग्राहक मौजूद नहीं है ।
तुम दुकानदार हो।
तुम्हें जो बेचना है, तुम ले आए हो।
लेकिन ग्राहक मौजूद नहीं है।
ग्राहक दस साल हुए मर गया।
पीछे के गांव में कुछ लोग मिठाइयां लाए थे।
मेरा पेट भरा था,तो मैने उससे कहा,वापिस ले जाओ।
मैं तुमसे पूछता हूं, वे क्या करेगें?
किसी ने भीड़ में से कहा, जाकर गांव में बांंट देंगे,खा लेंगे। बुद्ध ने कहा,तुम क्या करोगे?
तुम गालियों के थाल सजाकर लाए।
मेरा पेट भरा है। दस साल से भर गया।
तुम ज़रा देर करके आए।अब तुम क्या करोगे?
इन गालियों को वापिस ले जाओगे, बांटोगे,
या खुद खाओगे?
मैं नहीं लेता।
तुम गलत आदमी के पासआ गये।
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श्रीरामजानकी जी रूपध्यान

ब्राह्मण उवाच - Fri, 09/01/2017 - 21:12
श्रीरामजानकी जी रूपध्यान
**********************
पद राजीव बरनि नहिं जाहीं।
मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥
बाम भाग सोभति अनुकूला।
आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥

 भगवान के उन ऐसे चरणकमलों का वर्णन कैसे किया जा सकता है जिनमें भक्त मुनियों के मन बसते हैं। भगवान के बाएँ भाग में सदा अनुकूल रहने वाली, शोभा की राशि जगत की मूलकारण रूपा आदिशक्ति श्री जानकीजी सुशोभित हैं॥

जासु अंस उपजहिं गुनखानी।
अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई।
राम बाम दिसि सीता सोई॥

जिनके अंश से गुणों की खान अगणित लक्ष्मी, पार्वती और ब्रह्माणी त्रिदेवों की शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंह के इशारे मात्र से ही जगत की रचना हो जाती है, वही भगवान की स्वरूपा शक्ति श्री सीताजी श्री रामचन्द्रजी की बाईं ओर स्थित हैं॥
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क्या माँगे भगवान से

ब्राह्मण उवाच - Fri, 09/01/2017 - 21:12
जे निज भगत नाथ तव अहहीं।
जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥

सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति
सोइ निज चरन सनेहु।
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु
हमहि कृपा करि देहु॥

हे नाथ! आपके जो भी परम् भक्त जन हैं, व आपके सानिध्य से जो अलौकिक,अखंड और दिव्य सुख पाते हैं और जिस परम गति को प्राप्त होते हैं,
हे प्रभो! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही अपने चरणों में प्रेम, वही ज्ञान और वही रहन-सहन कृपा करके हमें दीजिए॥
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आस्था..श्रद्धा और विश्वास।

ब्राह्मण उवाच - Sun, 08/20/2017 - 21:29
एक गाँव था...
छोटा सा।
गाँव मे एक वृद्ध साधुबाबा भी रहते थे।
गाँव से थोड़ी सी दूरी पर एक मंदिर था,
बड़ा दिव्य।
वह बाबाजी उसमें कन्हैया की पूजा-अर्चना करते। प्रतिदिन का उनका एक नियम था कि अपनी झोपड़ी से निकल के कर मंदिर जाते और सायंकाल भगवान के सम्मुख दीपक जलाते।
उसी गांव में एक नास्तिक व्यक्ति भी रहता था।
जैसे ही वह साधु दीपक जलाते और घर के लिए वापस निकलते, यह व्यक्ति भी प्रतिदिन मंदिर में जाकर दीपक को बुझा देता था।
साधु ने कई बार उसे समझाने का प्रयत्न किया पर वह व्यक्ति कहता- भगवान हैं तो स्वयं ही आकर मुझे दीपक बुझाने से क्यों नहीं रोक देते।
यह क्रम महीनों, वर्षों से चल रहा था ।
एक दिन की बात,
मौसम कुछ ज्यादा ही खराब था,
आँधी और तूफान के साथ मूसलाधार वर्षा ज्यों थमने का नाम ही न ले रही थी।
साधू ने बहुत देर तक मौसम साफ होने की प्रतीक्षा की, और सोचा
"इतने तूफान में यदि मैं भीगते, परेशान हुए मंदिर गया भी और दीपक जला भी दिया तो वह शैतान नास्तिक आकर बुझा ही देगा,
रोज ही बुझा देता है" अब आज नहीं जाता हूँ।
कल प्रभु से क्षमा माँग लूँगा।
वैसे भी भगवान कौन सा दर्शन ही दे देंगें।
यह सब सोच वह घर में दुबका रहा।
उधर....
नास्तिक को पता था कि साधु मंदिर जरूर आएगा...
और दीपक जलाएगा, वह अपने नियत समय पर मंदिर पहुँचा, घंटों प्रतीक्षा करता रहा और जब साधु नही आया तो गुस्से में भरकर निर्णय लिया कि मैं तो दिया बुझाऊँगा ही भले ही जलाके बुझाऊँ,
यह सोच उसने वहां रखे दीपक में घी भरा और
उसे जला दिया।
बस फिर क्या था।
भगवान उसी समय प्रकट हो गए।
बोले- उस साधु से भी अधिक श्रद्धा और विश्वास तुम्हारे अंदर है,
इतने तूफान में भीग कर भी तुम यहाँ आ गए,
आज ही तो मुझे आना था,
जो आया,
उसने पाया।
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कथा 2

ब्राह्मण उवाच - Sat, 08/19/2017 - 19:00
सारद दारुनारि सम स्वामी।
रामु सूत्रधर अंतरजामी॥
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी।
कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥

शारदा-सरस्वती अर्थात बुद्धि-वाणी-विद्वत्ता आदि तो कठपुतली के समान हैं और अंतर्यामी स्वामी राम (सूत पकड़कर कठपुतली को नचानेवाले) सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कवि पर वे कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगन में सरस्वती को वे नचाया करते हैं।
उनकी *कृपा बिन* कुछ भी सम्भव नहीं है।
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कथा 1

ब्राह्मण उवाच - Sat, 08/19/2017 - 18:59
सती के रूप में दक्षयज्ञ में अपने प्राण त्यागने के पश्चात शक्ति ने पार्वती के रूप में हिमाचल के घर जन्म लिया। घनघोर तप कर पुनः शिव को प्राप्त किया।
पूर्व जन्म के संदेह को याद कर पुनः शिव से पूछा-

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती।
सादर जपहु अनँग आराती॥
रामु सो अवध नृपति सुत सोई।
की अज अगुन अलखगति कोई॥

है प्रभु! हे कामदेव के शत्रु! आप दिन-रात राम-राम जपा करते हैं- ये राम वही अयोध्या के राजा के पुत्र हैं? या अजन्मे, निर्गुण और अगोचर कोई और राम हैं?॥

तब शिव ने प्रवति जी को राम कथा सुनाई। बोले-

बंदउँ बालरूप सोइ रामू।
सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरने वाले और श्री दशरथजी के आँगन में खेलने वाले बालरूप श्री रामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें॥
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आक्रोश

ब्राह्मण उवाच - Tue, 08/15/2017 - 14:56
ये कहना ही बहुत नहीं
कि बातों में गहराई है।
व्यंग्य बहुत पैना है
सीने पे चोट खाई है।
बहुतों से बहुत आगे
सोचने का माद्दा है।
यादों में अतीत है औ..
भविष्य की सच्चाई है।
ये वर्तमान समय साथी
शीर्ष पर ले जा रहा
इसका प्रयोग तो अर्थ है
रह गया तो फिर व्यर्थ है।
चिंगारी जब सुलग जाए
तब लौ को लपट बनने दो।
व्यथित मन उदगार सारे
लावा बन के बहने दो।


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