Stotra - Pooja

श्री अनिल जी मेहता अजमेर के मधुर गीत

ब्राह्मण उवाच - Thu, 04/28/2016 - 19:54
हाटकेश्वर चतुर्दशी का पर्व नागर ब्राह्मणों के द्वारा बड़ी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। आज-कल की इस भागम-भाग और अतिव्यस्त जीवन शैली के बाद भी जहाँ कहीं भी नागर ब्राह्मणों के कुछ परिवार साथ होते हैं, इस दिन समय निकाल ही लेते है। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी के इस दिन नागर ब्राह्मण अपने इष्टदेव भगवान हाटकेश्वर महादेव की पूजा अर्चना करते हैं और भगवान के नैवेद्य के पश्चात भोजन आदि की भी व्यवस्था होती है। अजमेर में भी ऐसी परंपरा चली आ रही है। यहाँ पर नागरों  के ४०-५० परिवार थे जो लगातार कम होते जा रहे हैं पर नागर समाज के संरक्षक श्री गिरधारी लाल जी नागर जी, श्री रमणीक भाई मेहता जी और कुलदीप भाई दवे जी के अथक परिश्रम से यह परंपरा ७५ से भी अधिक वर्षों से अनवरत चली आ रही है। समाज द्वारा शिवरात्रि तथा नवरात्री बे सभी ९ दिनों में भी विधिवत पूजा बड़े विधि-विधान से होती है और अधिकाश परिवार इस दिन एकत्रित होकर भजन व गरबे आदि का आयोजन भी करते है। २० अप्रैल २०१६ को हाटकेश्वर चतुर्दशी के दिन समाज के तथा अजमेर शहर में प्रतिष्ठित और मेरे आदरणीय भाई श्री अनिल मेहता जी भी उपस्थित थे और उन्होंने हमारे आग्रह पर अपने बेहद मधुर कंठ से एक-दो गीत प्रस्तुत किये और मेरे अनुरोध पर उन्होंने मुझे ये गीत लिख कर भी दिए। इनमे से एक उनका स्वरचित है और दूसरा बेहद पुराना संकलन। इन्हें मैं ब्लॉग पर पोस्ट करने का लोभ संवरण न कर सका। प्रस्तुत है ये उनके द्वारा संकलित पहला गीत-  मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....जो सोते हैं उनको जगाए चला जा ॥ मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....निराकार प्रभु है सभी में समाया.....यहाँ सब है अपने न कोई पराया......घृणा, बैर दिल से निकाले चला जा...मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....चुराना नहीं लोभवश धन किसी का....दुखाना नहीं तुम कभी मन किसी का....यह सन्देश घर-घर सुनाये चला जा....मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....गुरु पीर मुर्शीद न तू देवता बन...किसी दीन के दर्द की तू दवा बन...यह सन्देश घर-घर सुनाये चला जा....मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....अविद्या अँधेरे में जो फँस रहे हैं....कुकर्मों के कीचड़ में जो धँस रहे हैं....प्रकाश आर्य नेकी बताये चला जा....मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....संकलनश्री अनिल भाई मेहता जीडी-मधुबन कालोनीनाका मदारअजमेर राजस्थान  09252197733दूसरा गीत अगले ब्लॉग में........






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Shivaparadha kshamapana stotram

శివాష్టకం - శివాపరాధ క్షమాపణ స్తోత్రమ్(స్వామీ వృధ నృసింహ భారతీ విరచితం)

ఆశా వశా దష్ట దిగన్తరాలే దేశాన్తర భ్రాన్తమశాన్త బుద్ధిం |
ఆకార మాత్రాదవనీసురం మాం
 అకృత్య కృత్యం, శివ పాహి శంభో || 1 ||

మాంసాస్థి మజ్జామలమూత్ర పాత్ర-
గాత్రాభిమానోజ్ఝిత కృత్య జాలం|
మద్ భావనం మన్మథ పీడితాంగం
 మాయా మయం మాం శివ పాహి శంభో || 2 ||

సంసార మాయా జలధి ప్రవాహ-
 సమ్మగ్న మద్ భ్రాన్తమశాన్త చిత్తం|
త్వత్పాద సేవా విముఖం సకామం
 సుదుర్జనం, మాం శివ పాహి శంభో ||3||

ఇష్టానృతం భ్రష్ట మనిష్ట ధర్మం 
నష్టాత్మ బొధం, నయ లేష హీనం|
కష్టారి షడ్వర్గ నిపీడితాంగం
 దుష్టోత్తమం మాం, శివ పాహి శంభో || 4 ||

వేదాగమభ్యాస రసానభిజ్ఞం
 పాదారవిన్దం తవ నార్చయన్తమ్।
వేదోక్త కర్మాణి విలోపయన్తం
 వేదాకృతే మాం శివ పాహి శంభో || 5 ॥

అన్యాయ విత్తార్జనసక్త చిత్తం
 అన్యాసు నారీశ్వనురాగవన్తం।
ఆన్యాన్న భోక్తారమశుద్ధ దేహం
 ఆచారహీనం, శివ పాహి శంభో || 6 ॥

పురాత్త తాపత్రయ తప్త దేహం
 పరాంగతిం గన్తుముపాయ వర్జం।
పరావమనైక పరాత్మ భావం
 నరాధమం, మాం శివ పాహి శంభో || 7 ॥

పితా యథా రక్షతి పుత్రమీశ
 జగత్ పితా త్వం జగతస్సహాయ।
కృతాపరారధం తవ సర్వ కార్యే
 కృపానిధే! మాం శివ పాహి శంభో || 8 ॥
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namayugastakam

स्तुतिमण्डल - Tue, 01/12/2016 - 09:16
Namayugastakam (Eight names of Radha Krishna) by Rupa Goswami at Stutimandal

(Click on the above link for the full poem)

Sample: Here I speak of the eight names of Rādhā and Mādhava. In the beginning Rādhā Dāmodara and then Rādhikā Mādhava.[1]
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ksipraphalapradadhanalaksmistotram

स्तुतिमण्डल - Sat, 01/09/2016 - 14:38
Kshipra phala prada Dhanalakshmi Stotram

(Click on the above link for the full poem)

Sample: (O Dhanadā) Who is everything in form! Salutations. (O Dhanadā) Who is a giver of all auspicious! Salutations. (O Dhanadā), Who is noble, and Who is the giver of great wealth of all types! May salutations be for You, Dhanadā.[1]
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durgaprakatya

स्तुतिमण्डल - Mon, 01/04/2016 - 08:26
Durga Prakatya from Durga Saptashati at Stutimandal

(Click on the above link for the full poem)

rsi spoke:[2.1 In older times a battle between deva and asura happened for entire hundred years. In that battle the leader of asura was Mahisāsura and the leader of deva was Purandara Indra.[2.2] There, by the immensely strong asura, the army of deva was defeated. Having won all the deva, Mahisāsura became the (new) Indra.[2.3]
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सुप्रसिद्ध आरती ॐ जय जगदीश हरे का हिंदी अनुवाद

ब्राह्मण उवाच - Mon, 12/21/2015 - 15:01

सुप्रसिद्ध आरती ॐ जय जगदीश हरे  का हिंदी अनुवाद(प्रत्येक हिंदू मात्र नें इस सुप्रसिद्ध आरती को एक न एक बार अवश्य ही गाया होगा, पढ़ा होगा आइये एक प्रयास करते हैं कि इस आरती का, ध्यान का शाब्दिक अर्थ है क्या?)

प्रणवस्वरुप मैं समस्त जगत के स्वामी की जय-जयकार करता हूँ, जो कि शरण में आये अपने सभी भक्त और दास के संकट को क्षण में ही दूर कर देते हैं। आप का ध्यान करने से न केवल मन के समस्त दुःख दूर हो जाते हैं, बल्कि तन के कष्टों से मुक्ति मिलती है और सुख-संपत्ति भी प्राप्त होती है। आप ही मेरी माता है और आप ही मेरे पिता, और किसके पास मैं शरण लूँ। आप के सिवा मेरा कोई भी नहीं है जिससे मैं आशा कर सकता हूँ। आप पूर्ण परमात्मा हैं। आप अंतर्यामी है। आप ही परब्रह्म परमेश्वर और समस्त लोकों के स्वामी हैं। आप श्रीराम के रूप में करुणा के सागर हैं तो श्रीनारायण के रूप में पालनकर्ता भी। मैं मूर्ख, अज्ञानी, दुष्ट तथा कामी हूँ, प्रभु ! आप  मेरे स्वामी हैं, मुझपर कृपा करें। आप अगोचर है, निराकार हैं और इस रूप में समस्त चराचर के ह्रदय में निवास करने वाले प्राणों के स्वामी भी। हे दयामय ! मैं दुर्बुद्धि आपसे कैसे मिलूँ? हे मेरे प्रभु कृपा करके आप मुझे अपनी शरण में ले लेवें। आप दीनबंधु और दीनों के नाथ हैं। आप दुखों का हरण करने वाले हैं। आप ही स्वामी हैं, आप ही ठाकुर, आप ही भर्तार हैं और आप ही रक्षक। मैं तो आपके द्वार पर पड़ा हूँ, मेरे प्रभु ! आपने हाथ बढाकर मुझे अपनी शरण में ले लेवें, जिससे मेरे सभी विषय विकार मिट जाएँ, पाप विनष्ट हो जाएँ मैं संतों की मैं सेवा करूँ और आपमें मेरी श्रद्धा और भक्ति निरंतर बदती रहे। ॐकारस्वरुप ऐसे समस्त जगत के स्वामी की जय हो, जय हो । 
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श्रीकृष्ण प्रात:स्मरणम्

ब्राह्मण उवाच - Sat, 06/20/2015 - 20:57
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेव 
प्रद्युम्न दामोदर विश्वनाथ 
मुकुंद विष्णो: भगवन् नमस्ते ॥
करारविन्देन पदारविन्दम्  मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥

कृष्णाय वासुदेवाय हरयेपरमात्मने
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:
नमोस्त्वनन्ताय सहस्त्रमूर्तये
सहस्त्रपादाक्षिशिरोरूबाहवे।

सहस्त्रनाम्ने पुरूषाय शाश्वते
सहस्त्रकोटी युग धारिणे नम:॥
भवे भवे यथा भक्ति: पादयोस्तव जायते
तथा कुरूष्व देवेश नाथस्त्वं नो यत: प्रभो
नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपाप प्रणाशनम्
 प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्
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छान्दोग्योपनिषद तृतीय प्रपाठक सप्तदश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित

ब्राह्मण उवाच - Sat, 06/20/2015 - 20:16
छान्दोग्योपनिषद तृतीय प्रपाठक सप्तदश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित 


स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य
दीक्षाः ॥ ३. १७. १ ॥


यज्ञ रुपी पुरुष की दीक्षाएँ भी यही हैं कि वह खाने(भोजन) और पीने की इच्छा रखता है और रमण करने अर्थात रति कर्म की इच्छा नहीं रखता है ।
अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ॥ ३. १७. २ ॥
जो खाने, पीने के साथ रमण भी करता है वह उपसद अर्थात कार्यकर्त्ता या ऋत्विक के समान है । 
अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव
तदेति ॥ ३. १७. ३ ॥

और जो पुरुष हँसता है, खाता है (सात्विक भक्षण) और रमण करता है (धर्मपत्नी के साथ ऋतु काल में रत) वह सभी प्रकार के स्तोत्र और शस्त्र( सामगान में गाए जाने वाली ऋचाएँ स्तुत व नहीं गाए जाने वाली ऋचाएँ शस्त्र कहलाती हैं)  को प्राप्त करता है। (गीता के सत्रहवें अध्याय में परब्रह्म श्रीकृष्ण ने बताया है कि आयु, ज्ञान, आरोग्य और प्रीति बढ़ाने वाले रसदार, चिकने, स्थाई और चित्त को भाने वाले आहार सात्विक पुरुषों को प्रिय होते है ।  कड़वे, खट्टे, नमकीन, गर्म, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले जो रोग और दुःख उत्पन्न करते हैं वह राजस् पुरुष को तथा बासी, रसहीन, दुर्गन्धयुक्त, जूठा आहार तामसी प्रकृति के पुरुष को प्रिय होता है। ) 
अथ यत्तपो दानमार्जवमहिँसा सत्यवचनमिति
ता अस्य दक्षिणाः ॥ ३. १७. ४ ॥

और तप, दान, अहिंसा तथा सत्य बोलना आदि इस यज्ञ पुरुष की दक्षिणा है । ( वेदों के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने के सोद्देश्य उपवास आदि कर्मो के द्वारा शरीर को सुखाने को तप, न्याय से उपार्जित धन को सत्पात्र या वेदज्ञ पुरुषों को श्रद्धा से दिए जाने को दान कहते है । दान से द्वेष करने वाले भी मित्र हो जाते है अतः इसे सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। गीता के सत्रहवें अध्याय के अनुसार कर्त्तव्य समझकर देश, काल, सत्पात्र को दिया गया दान सात्विक, पुनः फल की अभिलाषा से दिया गया दान राजस तथा बिना सत्कार के और अपात्रों को देना तामस दान कहलाता है । रामानुज भाष्य तथा जाबालद उपनिषद में इसी प्रकार मन, वाणी और कर्म के द्वारा किसी को भी कष्ट देना हिंसा कहा गया है ।देखि , सुनी और समझी गई बात को जैसे के तैसा कह देना ही सत्य है, अतः वाणी की प्रतिष्ठा सत्य ही है। विष्णु स्मृति में कहा गया है कि हजार अश्वमेध यज्ञ के पुण्य और सत्य को तराजू में रखा जाय तो भी सत्य भारी पड़ता है- यही सब पुश यज्ञ की दक्षिणा अर्थात फल है ।)

तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य
तन्मरणमेवावभृथः ॥ ३. १७. ५ ॥


जैसे कि कहा जाता है कि यज्ञ से देव पुरुष सोमरस या अमृत कलश के साथ उत्पन्न होगा वैसे ही कहा जाता है कि माता का द्वारा पुरुष उत्पन्न होगा । यह यज्ञ और अनुष्ठान ही पुरुष का जन्म है और उसकी मृत्यु ही यज्ञ की समाप्ति रूप है। 

तद्धैतद्घोर् आङ्गिरसः कृष्णाय
देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव
सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि
प्राणसँशितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ ३. १७. ६ ॥
अंगिरा गोत्र के ऋषि घोर
आदित्प्रत्नस्य रेतसः ।
उद्वयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरँस्वः
पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म
ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥ ३. १७. ७ ॥



॥ इति सप्तदशः खण्डः ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक चतुर्दश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

ब्राह्मण उवाच - Sat, 10/04/2014 - 08:51

॥ चतुर्दशः खण्डः ॥


सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके
पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत
॥ ३. १४. १ ॥
    यह ब्रह्म ही सबकुछ है । यह समस्त संसार उत्पत्तिकाल में इसी से उत्पन्न हुआ है, स्थिति काल में इसी से प्राण रूप अर्थात जीवित है और अनंतकाल में इसी में लीन हो जायेगा । ऐसा ही जान कर उपासक को शांतचित्त और रागद्वेष रहित होकर परब्रह्म की सदा उपासना करे।जो मृत्यु के पूर्व जैसी उपासना करता है, वह जन्मांतर वैसा ही हो जाता है।

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प
आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः
सर्वमिदमभ्तः । अवाकी । अनादरः॥ ३. १४. २ ॥

  सच्चे मन से अनुग्रहीत होकर ( विवेक, विमोक, अभ्यास, क्रिया, कल्याण, अनवसाद और अनुद्धर्ष ये ७ साधनों से निर्मल किया गया मन ही ग्रहण करने योग्य है ) से ईश्वर की उपासना करने वाला शुद्ध प्राण व शरीर प्राप्त करता है और आकाश के समान स्वयं भी प्रकाशित होता है तथा दूसरों को भी प्रकाश देता है । वह दोष रहित सभी कर्म, भोग, गंध व रस प्राप्त करता है।   

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् ब्रीहेर्वा यवाद्वा
सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैष म
आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या
ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो
लोकेभ्यः ॥ ३. १४. ३

   यह आत्मा मेरे अन्तर्हृदय में धान, जौ, सरसों, सांवा, सांवा के चावल से भी सूक्ष्म अणु रूप में उपासना हेतु उपस्थित है और यही पृथ्वी, द्युलोक, अंतरिक्ष और सभी लोक-लोकान्तरों से भी विशालकाय है। 

सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः
सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय
एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा
न विचिकित्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः
॥ ३. १४. ४

सभी कर्म, भोग, गंध व रस प्राप्त कराने वाला वह ब्रह्म हमारे अन्तर्हृदय में जीवन देने के लिए ही स्थित है। इस शरीर की मृत्यु के पश्चात भी मैं पुनः ब्रह्म को प्राप्त होने वाला ही हूँ। जो उपासक ऐसा समझ ले, उसकी भगवत प्राप्ति में कोई संदेह नहीं रह जाता है। महर्षि शांडिल्य ने यह बात अपने शिष्य से कही है।  

॥ इति चतुर्दशः खण्डः ॥


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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

ब्राह्मण उवाच - Mon, 07/07/2014 - 12:38
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
वेद का पालन करते हुए शुद्ध ह्रदय से परब्रह्म की उपासना के अंग स्वरुप पञ्च देव-द्वारपालों की उपासना करनी चाहिए। सबसे पहले पूर्व दिशा के द्वारपाल आदित्य की प्राण, तेज तथा अन्न के भोक्ता जानते हुए उपासक को उपासना करनी चाहिए।  (वराह उपनिषद में कहा गया है कि प्राण के देवता वायु, श्रवण इन्द्रिय के दिशा, नेत्रों के आदित्य, जिह्वा के वरुण, नासिका के अश्विनीकुमार, वाक् के अग्नि, हस्त के इंद्र, पाद के उपेन्द्र, पायु के यम, मन के देव चन्द्र, बुद्धि के ब्रह्मा, अहंकार के रूद्र, चित्त के क्षेत्रज और उपस्थ के देवता प्रजापति हैं)
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रँ
स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत
श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. २ ॥
   इसके पश्चात वेदानुसार दक्षिण दिशा के द्वारपाल चन्द्रमा की व्यान, प्रकीर्ति, यश, तथा संपत्ति प्राप्त करने की इच्छा से उपासक को उपासना करनी चाहिए। 
अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः
सा वाक्सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत
ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. ३ ॥
   तदन्तर वेद कहता है कि पश्चिम दिशा के द्वारपाल अग्निदेव की अपान, ब्रह्मवर्चस, तेज, तथा प्रचुर अन्न प्राप्त करने की इच्छा से उपासक को उपासना करनी चाहिए। 
अथ योऽस्योदङ्सुषिः स समानस्तन्मनः
स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत
कीर्तिमान्व्युष्टिमान्भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. ४ ॥
   वेदों में जैसा कहा गया है कि इसके अनन्तर उत्तर दिशा के द्वारपाल मेघ है वही मन है, वही समान है।  उपासक को कीर्ति और विलक्षण कान्ति की देहयष्टि हेतु इनकी उपासना करनी चाहिए।   
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः
स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी
महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. ५ ॥
जो उपासक वेद को जानते हुए ह्रदय के उर्ध्व द्वार उदान, वायु व आकाश देवता की उपासना करता है वह ओज व बल प्राप्त करता है और महान तेजस्वी हो जाता है। 
ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य
द्वारपाः। स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य
लोकस्य द्वारपान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते
स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य
लोकस्य द्वारपान्वेद ॥ ३. १३. ६ ॥
         भगवल्लोक के इन सभी ब्रह्मपुरुष देवों के गुणों को जानते हुए जो उपासक अपनी  उपासना करता है, उसके कुल में इन समस्त देवों के गुणों से युक्त संपन्न संतान उत्पन्न होती है, उपासक को प्ररब्रह्म के उस दिव्य लोक में स्थान प्राप्त होता है और वह आवागमन से मुक्त हो जाता है।
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु
सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव
तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ३. १३. ७ ॥
     इस विश्व लोक के ऊपर जो द्युलोक है, उसके भी ऊपर परब्रह्म की अलौकिक तथा परमदिव्य ज्योति विद्यमान है। उसी परमात्मा के प्रकाश से यह सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित है। इसी ज्योति स्वरुप के अंश से जीव के ह्रदय में जीवात्मा प्रकाशित होता है ।
तस्यैषा दृष्टिर्यत्रितदस्मिञ्छरीरे सँस्पर्शेनोष्णिमानं
विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव
नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च
श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद
य एवं वेद ॥ ३. १३. ८ ॥

इससे ही मनुष्य शरीर के स्पर्श से उष्णता को अनुभव करता है । यही जठराग्नि रुपी परमात्मा का दर्शन है। यही ज्ञान है। दोनों कानों को अँगूठे से बंद करके मनुष्य जो गर्जन व निनाद अथवा अग्नि के जलने की ध्वनि सुनता है, वह शरीर के भीतर उत्पन्न ध्वनि साक्षात् ब्रह्म के शब्द ही हैं। इस प्रकार मनुष्य आत्म साक्षात्कार करते हुए परमात्मा की उपासना करे। यही वेद है, यही वेदों के उपदेश हैं जो ब्रह्म की निश्चितता को सिद्ध करते हैं।  
॥ इति त्रयोदशः खण्डः ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक द्वादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

ब्राह्मण उवाच - Mon, 05/12/2014 - 07:37
छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक द्वादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)
                 ॥ द्वादश खण्ड॥


गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री
वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ ३. १२. १ ॥
इस जगत में जो कुछ भी है, निश्चय ही सब गायत्री अर्थात परब्रह्म ही है । वाणी से गायत्री का गान वास्तव में परमात्मा (परमात्मा के भूत, पृथ्वी, शरीर और ह्रदय ये चार पाद होते हैं) के नाम का ही उच्चारण मात्र है और यही गान परमात्मा के प्रथम पाद भूत के रूप में समस्त भूतों-प्राणियों की रक्षा करता है ।

या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्याँ हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ॥ ३. १२. २ ॥गायत्री रुपी परब्रह्म नारायण पृथ्वी के रूप में सबका पालन करते हैं। पृथ्वी ब्रह्म स्वरुप होने से ही सभी भूतों और प्राणिमात्र को धारण करने की क्षमता रख पाती है। इसीलिए परमात्मा के द्वितीय पाद ब्रह्मरूप इस पृथ्वी को कोई भी प्राणी लाँघ नहीं पाता। 

या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे
शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव
नातिशीयन्ते ॥ ३. १२. ३
परब्रह्म पृथ्वी पर धारित जो शरीर है वह परमात्मा का तृतीय पाद है, प्राण इसी में अवस्थित रहते हैं और इस शरीर का अतिक्रमण कभी नहीं करते ।
यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः
पुरुषे हृदयम् अस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव
नातिशीयन्ते ॥ ३. १२. ४ ॥

यही वह शरीर परमात्मा का तृतीय पाद है जिसके भीतर का ह्रदय परमात्मा का चौथा पाद है जिसमें प्राण सहित समस्त इन्द्रियाँ(प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय ये दस प्राण अथवा श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना, त्वचा, वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन्द्रियाँ )  स्थित हैं और ये सभी ब्रह्मरुपी ह्रदय को छोड़कर नहीं रह सकते हैं ।
सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तम्
॥ ३. १२. ५ ॥

इस चार चरण वाले परब्रह्म नारायण रुपी गायत्री के छः-छः अक्षरों का एक-एक पाद है और कुल चौबीस अक्षर हैं । यह षडविधा गायत्री कही गई है। (गानकर्मत्व, त्राणकर्मत्व, सर्वभूतप्रतिष्ठात्व, सर्वभूतनतिवर्तव्य, सर्वप्राणिप्राणप्रतिष्ठात्व तथा सर्वप्राणानतिवर्तव्य ये छः इसके लक्षण व मन्त्र, वाणी, पृथ्वी, शरीर, प्राण और ह्रदय इसके छः स्थान कहे गए हैं )  

तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ३. १२. ६ ॥

जो महिमा कही गई है वह इस ब्रह्म रुपी गायत्री की है क्योंकि उपासक इतना ही वर्णन कर सकता है और यही उसकी कुल क्षमता है जबकि अनंत ब्रह्माण्डनायक श्री परब्रह्म नारायण की महिमा तो अनंत ही है और समस्त सृष्टि का सारा ज्ञान तो प्रभु की महिमा का एक पाद ही है और बाकी तीन पाद तो परब्रह्म का सदा प्रकाशित रहने वाला लोक है अतः जो वर्णन किया जा सके वह तो एक छोटे तिनके जैसा अंश मात्र है ।
 
यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योयं बहिर्धा
पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ३. १२. ७ ॥
यही परब्रह्म नारायण हैं, ऐसा विश्वास करके परमात्मा के बाहर का प्रकाशमय लोक आकाश के समान है ऐसा विचार करना चाहिए ।  

अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष अकाशो यो वै सोऽन्तः
पुरुष आकाशः ॥ ३. १२. ८ ॥
शरीर के बाहर का जो प्रकाशमय आकाश है वही शरीर के भीतर का भी प्रकाशमय आकाश ही है । 

अयं वाव स योऽयन्तर्हृदय आकाश: ।  तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति
पूर्णमप्रवर्तिनीँ श्रियं लभते य एवं वेद ॥ ३. १२. ९ ॥


शरीर के भीतर का यह आकाश परमात्मा की कृपा से ह्रदय के भीतर होता है ।यह आकाश  ही ब्रह्म है । यह सर्वत्र, स्थिर, निरंतर, परम, परिपूर्ण, अप्रवर्तित और अपरिच्छिन्न है। वेद कहता है कि ऐसा जानने वाला उपासक सर्वदा के मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।      

                     ॥ इति द्वादश खण्ड ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक एकादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

ब्राह्मण उवाच - Wed, 04/16/2014 - 07:33
छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक एकादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)                 ॥ एकादश खण्ड ॥
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव
मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ ३. ११. १ ॥
इससे भी अधिक ऊपर अर्थात कल्प ( ब्रह्मा का एक दिन- मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के चौसठवें से तिहत्तरवें श्लोक में इस सम्बन्ध में कहा गया है कि कलियुग के 432000, द्वापर के 864000, त्रेता के 1296000 तथा सतयुग के 1728000 वर्ष को मिलकर कुल एक दिव्य-युग होता है और ऐसे हजार दिव्य-युगों को जोड़कर कुल ४३२००००००० चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों का ब्रह्मा का एक दिन  और इतनी ही बड़ी एक रात्रि होती है) की समाप्ति के बाद प्राणिमात्र के उदय या अस्त होने की या ऐसा कहें कि जन्म और मृत्यु की स्थिति समाप्त हो जाती है और गम-आगम से प्राणी मुक्त हो जाता है, अमर हो जाता है और भगवान के चरणों में सदैव निवास करता है । उस सम्बन्ध में यह श्लोक मात्र है ।
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन ।
देवास्तेनाहँसत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ ३. ११. २
उस आदित्य मुक्त समय में सदा ही परमात्मा का प्रकाश होता है तथा उदय-अस्त या सुख-दुःख जैसा कोई भी द्वन्द्व नहीं होता ।  ब्रह्म के इस प्रकार का वर्णन करते समय मुझसे सत्य के अतिरिक्त कुछ भी विरोध स्वरुप भाषा न निकले ।  
न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै
भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३. ११. ३ ॥जो उपासक इस ब्रह्म विद्या को जान लेता है वह भी सदा ही ऐसे प्रकाश में निवास करता है जहाँ हमेशा ही दिन है और वह वहाँ निरंतर ब्रह्म के साथ साक्षात्कार करता है।  

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे
मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय
पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ३. ११. ४ ॥
सर्वप्रथम इस रहस्य को ब्रह्मा ने सृष्टि और प्रजा की रक्षा के लिए प्रजापति को बतलाया था, तदन्तर यह मनु और उनकी प्रजा राजा इक्ष्वाकु आदि से होते हुए अरुण ऋषि और उनके पुत्र उद्दालक आरुणि तक प्राप्त हुआ ।   
इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म
प्रब्रूयात्प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ३. ११. ५ ॥
अतः इस ब्रह्म विद्या ( तृतीय प्रपाठक के प्रथम से एकादश खण्ड तक यह ब्रह्मोपनिषद) का रहस्य पिता को अपने ज्येष्ठ पुत्र को अथवा प्राण-तुल्य अपने शिष्य को उपदेश करना चाहिए।
नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां
धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव
ततो भूय इति ॥ ३. ११. ६ ॥
यदि समुद्र से घिरी और समस्त धन-धान्य और भोगों से संपन्न इस सारी पृथ्वी भी कोई देवे तब भी उपासक को इस विद्या को अपने पुत्र और शिष्य के अतिरिक्त किसी को नहीं देना चाहिए क्योंकि यह रहस्य अधिक मूल्यवान है।   

॥ इति एकादश खण्ड ॥

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छान्दोग्योपनिषद ( तृतीय प्रपाठक: दशम खण्ड के हिंदी भावार्थ सहित)

ब्राह्मण उवाच - Thu, 03/06/2014 - 12:34
॥ दशम खण्ड ॥


अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. १०. १ ॥
आदित्य के मध्य का कंपन सा प्रभाव ही पाँचवा अमृत है जिसका  बारह साध्य देव (अनुमन्ता, प्राण, नर, वीर्य्य यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु ये बारह साध्य देव है जो दक्षपुत्री और धर्म की पत्नी साध्या से उत्पन्न हुए है) ब्रह्मा के चतुर्मुख मुख से पान करते हैं और सदा तृप्त रहते हैं। इसकी उपासना से उपासक को साक्षात् परब्रह्म नारायण की प्राप्ति हो जाती है । 
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. १०. २ ॥
ये सभी बारह साध्य देव इस पाँचवे अमृत के उद्देश्य की प्राप्ति से निरंतर उत्साहित होते रहते है ।
स य एतदेवममृतं वेदसाध्यानामेवैको भूत्वा
ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. १०. ३ ॥
जो उपासक इस कंपन रुपी पाँचवे अमृत को जान लेता है और प्राप्त कर लेता है वह पूर्ण तृप्त हो जाता है ।

स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता
द्विस्तावदूर्ध्वं उदेतार्वागस्तमेता साध्यानामेव
तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. १०. ४
वह उपासक सूर्य के समस्त दिशाओं में उदय और अस्त होने के सम्पूर्ण काल से भी दुगने समय तक के लिए बारह साध्य देवों के आधिपत्य और स्वाराज्य को प्राप्त करेगा ।

॥ इति दशम खण्ड ॥

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सामवेदीय उपाकर्म में प्रातः संध्या पाठ

ब्राह्मण उवाच - Fri, 02/14/2014 - 13:52
सामवेदीय उपाकर्म     प्रातःसन्ध्या                              तत्र सव्यहस्ते कुशत्रयं दक्षिणहस्ते कुशद्वयं धृत्वा आचम्य- “मम् उपात्तदुरितक्षयार्थं ब्रह्मवर्चसतेजकामार्थं प्रातः सन्ध्योपासनमहं करिष्ये” इति संकल्प्य, दक्षिणहस्तेन जलामादय, प्रदक्षिणं परितः सिंञ्चनात्मरक्षां कुर्यात्।  ततः ऋष्यादीन् संस्मृत्य मार्जनं कुर्यात् । ॐकारस्यब्रह्मा ऋषिः दैवी गायत्री छन्दः अग्निर्देवता सर्व कर्मारम्भे विनियोगः। व्यहृतीनां विश्वामित्र-जमदग्नि-भरद्वाजा गायत्र्युषि्णगनुष्टुवग्निवायुसूर्याः, तत्सवितुर्विश्वामित्रो गायत्री सविता, आपोहिष्ठेति तिसृणां सिन्धुद्वीपो गायत्र्यायः मार्जने विनियोगः। ततो दक्षिणहस्ते कुशत्रयमादाय, जलाशयस्थं स्थले पात्रस्थं वामहस्तस्थं वा कुशाग्रैर्ज्जलमादाय, मार्जनं कुर्यात्।                          ॐभूर्भुवःस्वःतत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।                         ॐ आपो हि ष्ठा मयो भुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयते हनः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरङ्गमामवो। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः।     एभिर्मन्त्रैःशिरसि मार्जनं कृत्वा ध्यानावाहने कुर्यात्।              पूर्व सन्ध्या तु गायत्री रक्तांगी रक्तवाससा ।              अक्षसूत्रधरा देवी कमण्डलुसमन्विता ॥              हंसस्कंधसमारूढा तथा च ब्रह्म देवता ।              कुमारी ऋग्वेदमुखी ब्रह्मणा सह आवह ॥              आयाहि वरदे देवी त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनी ।              गायत्रि च्छन्दसां मातर्ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते ॥                               ततः प्राणायामः। भूरादीनां विश्वामित्र-जमदग्नि-भरद्वाज गौतमाऽत्रिवसिष्ठ-कश्यपाः ऋषयः, गायत्र्युषि्णगनुष्टुप्-वृहती-पंक्ति-त्रिष्टुब्-जगत्योऽग्निवायु-सूर्य-बृहस्पतिवरुणेन्द्र विश्वेदेवाः, तत्सवितुर्विश्वामित्रो गायत्री सविता, आपो ज्योतिः प्रजापतिर्यजुर्ब्रह्माग्निवायुसूर्याः प्राणायामे विनियोगः।                            ततोऽअँगुष्ठतर्जनीभ्यां नासापुटद्वयं धृत्वा, मुखनासासंञ्चारिणंवायु निरुन्ध्य, मनसा भूरादि जपन्प्राणायामं कुर्यात् ।                            ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यं ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो योनः प्रचोदयात । ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूऽर्भुवः स्वरोम् ।                            एवं त्रिरावृत्या एकः प्राणायामः । इत्थं प्राणायाम त्रयं कृत्वा आचमनं कुर्यात ।                            सूर्यश्चेति नारायण ऋषिः प्रकृति छन्दः सूर्यो देवता आचमने विनियोगः । ततो हस्ते जलमादाय ।                            ‘ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यद्रात्र्या पापमकारिषं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्या मुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा”। इति मन्त्रेणाचम्य तूष्णीं द्विराचामेत् ।                            ततोऽञ्जलीमक्षेपः। हस्तेनैकेन जलमादाय, ऋतंञ्चेघमर्षणोंऽनुष्टुब्भाववृतः  अश्वमेधावभृथे  विनियोगः ।               ॐ ऋतञ्च सत्यंचा भीद्धात्तपसोऽध्यजायत ।              ततो रात्र्थजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥              समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायतः ।             अहोरात्राणिविदधद्विश्वस्य भिषतो वशी ॥                            इमं मन्त्रमायतासुः सकृदनायतासुर्वा त्रिःपठित्वा, जलं प्रक्षिप्योत्थाय, हस्ताभ्यां जलामादाय, सप्रणवव्याहृतिकां गायत्रीमुञ्चार्य सूर्याभिमुखोऽञ्जलित्रयं प्रक्षिपेत् ।                           ततः प्रदक्षिणमवृत्त्याचम्य, स्वस्तिका कृतिकृतहस्तः सूर्यमुपतिष्ठेत् । उदुत्यं प्रस्कण्वो गायत्री सूर्यः,चित्रङ्कुत्सस्त्रिष्टुप् सूर्यः उपस्थाने विनियोगः ।                           ॐ उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यंम्॥ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याऽग्नेः। आप्राद्यावा पृथिवी अंतरिक्ष ग्वं सूर्यं आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥                          ततः प्रणवव्याहृति गायत्रीणामृष्यादिन्पूर्ववत्स्मृत्वा ‘जपे विनियोगः’ इत्युक्त्वा, करमालया नाभौ उत्तानघृतकरो मौनी प्रणवव्याहृति युतां गायत्रीमष्टोत्तरशतमष्टाविंशति वा सजप्य संकल्पं कुर्यात्। ‘अनेन गायत्र्यामत्कृतेन जाप्येन ब्रह्मात्मा रविः प्रीयताम् नममः’। ततः-              उत्तर शिखरे जाता भूम्यां पर्वतवासिनी ।               ब्रह्मणा समनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् ॥               इति विसृज्य द्विराचामेत् ॥ 
                         ॥  इति प्रातःसन्ध्या ॥ 
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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक, अष्टम एवँ नवम् खण्ड के हिंदी भावार्थ सहित )

ब्राह्मण उवाच - Mon, 02/03/2014 - 08:39
              ॥ अष्टम खण्ड ॥
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. ८. १ ॥
                  सूर्य के कृष्ण स्वरूपी तीसरे अमृत को बारह आदित्य देवता  (महाभारत के अनुसार धाता, मित्र, अयमा, शक्र,अरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा, और वामन भगवान यह बारह आदित्य देव हैं ) अपने वरुण मुख से पीकर जीवन धारण करते है। निश्चित ही वे सभी आदित्य देव न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है और समस्त ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं।
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ८. २ ॥
                  वे बारह आदित्य इस कृष्ण अमृत के अनुभव मात्र से ही उदासीनता और उत्साह का अनुभव कर सकते हैं ।
स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ८. ३
                     इसी प्रकार परब्रह्म नारायण का जो उपासक एकाग्रचित्त होकर अपने वरुण मुख से सूर्य के इस कृष्ण रूपी अमृत को जान लेता है वह स्वयं भी आदित्य स्वरूप हो जाता है पूर्ण रूप से तृप्तता को प्राप्त करके सम्पन्नता, यश, ऐश्वर्य और उत्साह का अनुभव करता रहता है ।  

स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता
द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेतादित्यानामेव
तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ८. ४
                     इस प्रकार वह उपासक भी रुद्रों से भी दुगने समय तक आदित्यों के स्वराज्य और अधिपत्य को पाकर परम आनन्द प्राप्त करता रहेगा ।   
                    ॥ इति अष्टम खण्ड ॥


           ॥ नवम खण्ड ॥

अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. ९. १ ॥

                  सूर्य के उत्कृष्ट कृष्ण (अतिशय कृष्ण) स्वरूपी चौथे अमृत को चन्द्रमुख से उनचास मरुत देवता  (वायुपुराण  के अनुसार सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यक् ज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित, सत्यजित, सुषेणा, सेन जित, सत्यमित, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधाराय, ध्वन्ति, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक, अन्यादृक, यादृक, प्रतिकृत, ऋ क्, समिति, संरम्भ, ईदृक्ष, पुरुष, अन्यादृक्ष, चेतस, समिता, सर्मिदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मारुती, सरत, देव, दिश, यजुः, अनुद्रुक, साम, मानुष, और विश्       यह उनचास मरुत देवता हैं ) अपने वरुण मुख से पीकर जीवन धारण करते है। निश्चित ही वे सभी आदित्य देव न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है और समस्त ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं।
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ९. २ ॥



ये सभी मरुत देव इस अति कृष्ण रूप के अमृत को अनुभव करने के उद्देश्य से निरंतर उत्साहित होते है ।
स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ९. ३
जो उपासक इस अमृत को जान लेता है और प्राप्त कर लेता है वह पूर्ण तृप्त हो जाता है । 

स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता
द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव
तावदाधिपत्य्ँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ९. ४ ॥



वह उपासक जब तक आदित्य उदय और अस्त होते रहेंगें उससे भी दुगुने काल तक के लिए मरुतों के आधिपत्य और स्वाराज्य को प्राप्त करेगा । 




॥ इति नवमः खण्डः ॥
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श्री महागणेश ढुण्डीराज स्तोत्रम्

ब्राह्मण उवाच - Sun, 02/02/2014 - 14:29

श्री महागणेश ढुण्डीराज स्तोत्रम् ढुण्डीराजः प्रियः पुत्रो, भवान्यः शंकरस्य च ।तस्य पूजन मात्रेण, त्रयोऽपि वरदाः सदा ॥स्त्रवन्मद घटा सक्त संगुञ्जलि संकुलः ।लसात्सिन्दूर पूरोऽसौ, जयति श्रीगणाधिपः॥गृहमेध्यत्र विश्वेशो, भवानी तत्कुटुम्बिनी ।सर्वेभ्यः काशीसंस्थेभ्यो,मोक्ष भिक्षां प्रयच्छति ॥शान्ति कन्थाल सत्कण्ठो, मनःस्थाली मिलत्करः।त्रिपुरारी पुराद्वारि, कदस्यां मोक्ष भिक्षुकः ॥   ॥  श्रीमहागणेश ढुण्डीराज स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥      
श्रीमहागणेश ढुण्डीराज स्तोत्र का भावानुवाद जिसपर काशी की स्थानीय भाषा में स्तुति और भजन किया जाता है।स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में इसका वर्णन आता है।(पारवती सिव के अति पियारे, ढुण्डीराज जुवराज दुलारे ।तिन्हके पूजन से सन्तोषै, तीनहु देत वरहि नित पोषै ।स्त्रवत दान जल लोभ परि, गूँजत भँवर समूह ।सेंधुर पूरित तन जयति, गज नायक गजमूँह ।  इह गृहस्थ विस्वेस हैं,धरनी मातु भवानी ।कासीवासि सब लोग हित, भुक्ति भीख की दानि ।सांतिरूप कथरी को ओढौं, अथवा कंठ लपेटौ ।मन सरूप बटलोही भीतर, कबहूँ न हाथ समेटौ ।श्रीत्रिपुरारी राज की नगरी, फाटक ऊपर जैहों ।
कब धौ भीख मुक्ति की पैहों, भिच्छुक रूप बनैहों ।)
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ಮನವ ಶೋಧಿಸಬೇಕೋ (ಶ್ರೀ ಪುರಂದರದಾಸರು)

Stotra sangraha - Fri, 01/03/2014 - 08:18

ಮನವ ಶೋಧಿಸಬೇಕೋ ನಿಚ್ಚ
ದಿನದಿನವು ಮಾಡುವ ಪಾಪಪುಣ್ಯದ ವೆಚ್ಚ || ಪ ||

ಧರ್ಮ-ಅಧರ್ಮ ವಿಂಗಡಿಸಿ ನೀ
ಅಧರ್ಮದ ನರಗಳ ಬೇರೆ ಕತ್ತರಿಸಿ
ನಿರ್ಮಲಾಚಾರವ ಚರಿಸಿ ಪರ
ಬ್ರಹ್ಮ ಮೂರುತಿ ಪಾದಕಮಲವ ಭಜಿಸಿ || ೧ ||

ತನುವ ಖಂಡಿಸಿ ಒಮ್ಮೆ ಮಾಣೋ ನಿನ್ನ
ಮನವ ದಂಡಿಸಿ ಪರಮಾತ್ಮನ್ನ ಕಾಣೋ
ಕೊನೆಗೆ ನಿನ್ನೊಳು ನೀನೇ ಜಾಣೋ ಮುಕ್ತಿ
ನಿನಗೆ ದೂರಿಲ್ಲವೋ ಅದೇ ಒಂದು ಗೇಣೋ || ೨ ||

ಆತನ್ನ ನಂಬಿ ಕೇಡಿಲ್ಲ ಅವ
ಪಾತಕ ಪತಿತ ಸಂಗವ ಮಾಳ್ವನಲ್ಲ
ನೀತಿವಂತರೆ ಕೇಳಿರೆಲ್ಲ ನಮ-
ಗಾತನೆ ಗತಿಯೀವ ಪುರಂದರ ವಿಠಲ || ೩ ||


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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक, षष्ठ खण्ड एवं सप्तम खण्ड का हिन्दी भावार्थ सहित)

ब्राह्मण उवाच - Thu, 01/02/2014 - 09:50

                       ॥ षष्ठ खण्ड ॥
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै
देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा
तृप्यन्ति ॥ ३. ६. १ ॥
                 वेद रूपी इस प्रथम अमृत( लोहित, शुक्ल, कृष्ण, अतिकृष्ण और कंपन ये पाँच अमृत कहे गए है। ) का समस्त अष्टवसु ( धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल,प्रत्यूष और प्रभाष ये आठ वसु हैं ) अपने अग्नि मुख से पान करके जीवन धारण करते हैं । निश्चित ही देवता न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है । त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ६. २ ॥              वे इस अमृत के अनुभव मात्र से ही आवश्यकतानुसार उदासीनता और उत्साह का अनुभव कर सकते हैं ।
स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ६. ३
              इसी प्रकार जो उपासक एकाग्रचित्त होकर अपने मुख से इस अमृत का पान कर लेता है वह स्वयं भी वसुरूप हो जाता है पूर्ण रूप से तृप्तता को प्राप्त करके उत्साह का अनुभव करता रहता है ।   
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता
वसूनामेव तावदाधिपत्य ग्वं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ६. ४ ॥
            इस प्रकार वह उपासक भी वसुओं के समान ही स्वराज्य और अधिपत्य को पाकर परम आनन्द प्राप्त करता रहेगा, जब तक सूर्य पूर्व दिशा से उदय होता रहेगा और पश्चिम से अस्त होता रहेगा ।  

                ॥ इति षष्ठ खण्ड ॥
                ॥ सप्तम खण्ड ॥
अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. ७. १ ॥
                   सूर्य के शुक्ल रूपी दूसरे अमृत को ग्यारह रूद्र ( मृगव्याध, सर्प, निऋति, अजैकपाद, अहिर्बुधन्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु और भग यह ग्यारह रूद्र हैं ) अपने इंद्र मुख से पीकर जीवन धारण करते है। निश्चित ही वे सभी रूद्रदेव न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है और समस्त ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं।

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ७. २ ॥

              वे इस शुक्ल अमृत के अनुभव मात्र से ही आवश्यकतानुसार उदासीनता और उत्साह का अनुभव कर सकते हैं । 

स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ७. ३ ॥


इसी प्रकार जो उपासक एकाग्रचित्त होकर अपने मुख से सूर्य के इस शुक्ल रूप अमृत को जान लेता है वह स्वयं भी रूद्र रूप हो जाता है पूर्ण रूप से तृप्तता को प्राप्त करके सम्पन्नता,ऐश्वर्य और उत्साह का अनुभव करता रहता है । 
 
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता
द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव
तावदाधिपत्य ग्वं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ७. ४ ॥


                इस प्रकार वह उपासक भी रुद्रों के समान ही स्वराज्य और अधिपत्य को पाकर परम आनन्द प्राप्त करता रहेगा, जब तक सूर्य पूर्व दिशा से उदय होता रहेगा और पश्चिम से अस्त होता रहेगा ।  

                      ॥ इति सप्तम खण्ड ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक, चतुर्थ खण्ड एवं पञ्चम खण्ड का हिन्दी भावार्थ सहित)

ब्राह्मण उवाच - Fri, 12/27/2013 - 10:09
         चतुर्थ खण्ड
अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो
मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत
इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥ ३. ४. १ ॥
   इसकी उत्तर की किरणें ही उत्तर की मधुनाड़ियाँ हैं, अथर्ववेद भ्रमर और इतिहास-पुराण इसके पुष्प के समान है।  ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपूराणमभ्यतपँ
स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियां
वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ ३. ४. २    अथर्व वेद के मन्त्र इन्ही इतिहास और पुराण रुपी भ्रमर के अमृत रस का चूषण करते हैं। इनके अभितप्त होने से ही यश, तेज, ऐश्वर्य, इन्द्रियों की शक्ति, वीर्य और अन्नरुपी रस उत्पन्न होता है। 
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा
एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णँरूपम् ॥ ३. ४. ३
   यही रस निर्झर होकर आदित्य के चारों ओर एकत्रित हो गया है। यही सूर्यनारायण का कृष्ण स्वरुप है जिनकी हम सब उपासना करते हैं। 

॥ इति चतुर्थ खण्ड ॥


                       पञ्चम खण्ड
अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा
मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव
पुष्पं ता अमृता आपः ॥ ३. ५. १ ॥


             आदित्य से उर्ध्व जाने वाली रश्मियाँ इसकी उर्ध दिशा की मधुनाड़ियाँ हैं। परम गुह्य मंत्रो के उपदेश ही मधु का उपार्जन करते हैं और ब्रह्म रुपी पुष्प से अमृत रस की वर्षा करते है।  

ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपँ
स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ ३. ५. २ ॥


         इन्ही मन्त्रों के उपदेशों से जब परमेश्वर की तपस्या की गई तो उस परब्रह्म की उपासना से से यश और ऐश्वर्य के साथ-साथ अन्न भी उत्पन्न हुआ। 

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा
एतद्यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३. ५. ३ ॥


               यही खाद्य था जिससे तेज और शक्ति रुपी रस प्राप्त हुआ जो सूर्य के सब ओर फ़ैल गया। यह सूर्य के मध्य में भी चक्र की भांति दिखलाई पड़ता है।
 
ते वा एते रसानाँरसा वेदा हि रसास्तेषामेते
रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा
ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ३. ५. ४ ॥


                    यह सब ( तेज, यश, ऐश्वर्य,शक्ति, ज्ञान, अन्न आदि) रसों के भी सूक्ष्म रस है जो वेद रुपी परम रस से ही उत्पन्न हुए हैं। यही अमृतों के भी अमृत है। वेद मन्त्रों कि ऋचाओं से आराधना करने पर ही इस अमृत का पान किया जाना संभव है।

॥ इति पञ्चम खण्ड ॥

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ganapatistavah

स्तुतिमण्डल - Sun, 12/22/2013 - 16:45
Ganapati Stavah by Brahma-Vishnu-Mahesh from Ganesh Purana at Stutimandal


(Click on the above link for the full poem)

Brahmā Visnu and Maheśa spoke: We should worship Ganeśa, Who is unborn, Who is free from change, Who is beyond taking forms (or actions), Who is unique, Who is without a support, Who is without a second, Who is bliss, Who is complete, Who is supreme, Who is beyond qualities, Who is absolute, Who is without passion, Who is supreme, and Who is Brahman.[1] 
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