ब्राह्मण उवाच

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Updated: 1 week 2 days ago

तीन गुण

Thu, 10/05/2017 - 20:13
तीन गुण
*******
जीवन के तीन गुण
सफलता
सम्पन्नता
और अवस्था
अपनी तरफ खींचती है।
मित्रों को..
विरोधियों को भी...
सदा से ।
सभी बन जाते हैं मित्र।
छलकने लगता है प्रेम।
पर...
यह 'पर' बड़ा
गहरा सूचक है।
जैसे ही यह तीनों
ढलान पर
क्षीण होते है,
साफ दिखने लगता है सबका..
... प्रेम।
क्योंकि...
उनमें से कुछ
प्रेम करते हैं...
हृदय से,
कुछ देह से,
और कुछ...
बुद्धि से।
एक निष्काम, रहेगा सर्वदा।
दूसरा सकाम...
चला जाएगा,
और...
तीसरा,
जो प्रेम की आड़ में है,
पूर्ण विलोम।
रे...बचना इसी से है...
रहना है..
सा व धा न।
Categories: Stotra - Pooja

रावण

Sat, 09/30/2017 - 19:21
रावण
*****
आज फिर याद करके उसकी गलतियों को
पुतला जलाएँगे हम।
पर अपने अंदर...
फिर भी सम्भाल कर रखेंगे।
जिससे हम डरते है....
उसका पुतला जला
तसल्ली कर लेते हैं।
बरसों से..युगों से..
बचा के रखा तो है हमने उसे।
और अब तो कलयुग है प्रभु!
वह तो त्रेता में भी बलशाली था।
वह सचिदानंद न सही,
सर्वव्यापी तो है ही..
आज भी..
क्या नहीं है?
हर बार...
हर साल जलाने पर भी मरता नहीं है वो।
सुरसा की तरह बढ़ता ही जा रहा है..
पर हनुमान भी तो आते नहीं..।
अनेक कुबेरों पर
एक छत्र अधिकार उसका ही तो है।
स्वर्णजटित जल, पहाड़, प्रकृति को
खोद-उलीच कर दोहन कर रहा है।
वह फिर-फिर जी उठता है.. हर बार..
रक्तबीज के जैसे।
पर महाकाली भी तो आती नहीं...
बढ़ता जाता है...
जलकुम्भी की तरह ... जल में।
बबूल की तरह ...स्थल में
धूल और धुँए की तरह...
आकाश में।
और....
पाप की तरह ...मन में।
बल्कि....
वह कभी मरा ही नहीं ।
क्योंकि....
नाभि का अमृत
उसका हटा नहीं है।
पर राम ...
आते नहीं।
हाँ..जिस राम का रूप
बनाने की हिम्मत उसने कभी
की न थी।
उस राम के भेष में
बहुरूपिये चारो तरफ हैं।
वह तो एक ही था
तब..
अब तो सब जगह है, सर्वव्यापी, सर्वत्र...।
Categories: Stotra - Pooja

क्यों नहीं आते ईश्वर पृथ्वी पर

Fri, 09/15/2017 - 21:03
क्यों नहीं आते ईश्वर पृथ्वी पर
**********************
एक पुरानी कहानी है।
उन दिनों....
ईश्वर ने नई-नई दुनिया बनाई ही थी।
अपनी रचना, अपनी कोई भी कृति सबको सुंदर लगती ही है।
वह भी देखता रहता था ऊपर से कि कहाँ पर क्या हो रहा है।
अब तो थक गया,
ऊब गया। सब जगह शांति...
कोई हलचल नहीं...
...और फिर उसने
बेमन से...
थोड़ी -थोड़ी कमियों के साथ मनुष्य को बनाना आरम्भ कर दिया।
एक-एक अंधा लँगड़ा भी बना दिया।
उनके पूर्व जन्म के कर्मों के हिसाब से...
....और उस अँधे और लँगड़े को भी देखने लगा...
कब तक देखता रहे।
बड़े परेशान होते थे वे...
अपनी ही सृष्टि को देख दया आने लगी उसे ...
बड़ी दया आयी।
उसने सोचा...
.. कि इन दोनों को ठीक कर दूं जाकर।
आया।
दोनों नाराज होकर एक दूसरे से, अलग-अलग वृक्षों के नीचे बैठे थे।
हाँ-हाँ उन दिनों पृथ्वी पर काफी वृक्ष हुआ करते थे।
वे दोनों...
विचार कर रहे थे कि किस तरह..
अंधा सोच रहा था कि इस लँगड़े की आंखें किस तरह फोड़ दूं।
बड़ी अकड़ बनाए हुए है आंखों की।
  ...और लंगड़ा सोच रहा था कि इस अंधे की टाँग कैसे तोड़ दूं।
तभी ईश्वर पधारे।
उसने पूछा पहले अंधे से...
उसने सोचा कि जब मैं अंधे से पूछंगा कि तू कोई एक वरदान मांग ले...
...तो वह मांगेगा वरदान कि मेरी आंखें ठीक कर दो।
या कि मेरे लँगड़े मित्र की टाँगें अच्छी हो जाय।
जब उसने अंधे से कहा कि तू एक वरदान मांग ले।
...तो अंधे ने कहा कि 'हे प्रभु! जब दे ही रहे हों—इतना दिल दिखा रहे ही हो, तो एक काम करो कि इस लंगड़े की आंखें फोड़ दो'
...और यही लंगड़े ने भी किया।
ईश्वर तो बहुत चौंका।
तभी से तो नीचे...
पृथ्वी पर आता नहीं कि ये बड़े खतरनाक है।
ये दुनिया...सबलोग...
सचमें..हैं...
"ख त र ना क"
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हरि अनंत हरि कथा अनंता। A Gateway to the God

Fri, 09/01/2017 - 21:19
हरि अनंत हरि कथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए।
कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥

श्री हरि विष्णु अनंत हैं उनका कोई पार नहीं पा सकता और इसी प्रकार उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से सुनते और सुनाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते।

यह प्रसंग मैं कहा भवानी।
हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।
सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥

शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती! मैंने यह बताने के लिए इस प्रसंग को कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवान की माया से मोहित हो जाते हैं। प्रभु कौतुकी व लीलामय हैं और शरणागत का हित करने वाले हैं। वे सेवा करने में बहुत सुलभ और सब दुःखों के हरने वाले हैं।

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥

देवता, मनुष्य और मुनियों में ऐसा कोई नहीं है, जिसे भगवान की महान बलवती माया मोहित न कर दे। मन में ऐसा विचारकर उस महामाया के स्वामी श्री रामजी का भजन करते रहना चाहिए।
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समानता कबीर और बुद्ध की।

Fri, 09/01/2017 - 21:15
कबीर और बुद्ध
***********
मन रे जागत रहिये भाई।
गाफिल होइ बसत मति खोवै।
चोर मुसै घर जाई।
षटचक्र की कनक कोठरी।
बस्त भाव है सोई।
ताला कुंजी कुलक के लागै।
उघड़त बार न होई।
पंच पहिरवा सोई गये हैं,
बसतैं जागण लागी,
जरा मरण व्यापै कछु नाही।
गगन मंडल लै लागी।
करत विचार मन ही मन उपजी।
ना कहीं गया न आया,
कहै कबीर संसा सब छूटा।
राम रतन धन पाया।

बुद्ध एक गांव के पास से गुज़रे।
लोगों ने गालियाँ दी,अपमान किया।
बुद्ध ने कहा,क्या मैं जाऊँ,अगर बात पूरी हो गई हो?क्योंकि दूसरे गांव मुझे जल्दी पहुँचना है। लोगो ने कहा,
हमने भद्दे से भद्दे शब्दों का प्रयोग किया है,
क्या तुम बहरे हो गए?
क्या तुमने सुना नहीं?
बुद्ध ने कहा कि सुन रहा हूँ।पूरे गौर से सुन रहा हूँ।
इस तरह सुन रहा हूँ,जैसा पहले मैने कभी सुना ही न था, लेकिन तुम ज़रा देर करकेआए।
दस साल पहले आना था।
अब मैं जाग गया हूँ।
अब चोरों को भीतर घुसने का मौका न रहा।
तुम गाली देते हो।
मैं देखता हूँ।
गाली मेरे तक आती है और लौट जाती है।
 ग्राहक मौजूद नहीं है ।
तुम दुकानदार हो।
तुम्हें जो बेचना है, तुम ले आए हो।
लेकिन ग्राहक मौजूद नहीं है।
ग्राहक दस साल हुए मर गया।
पीछे के गांव में कुछ लोग मिठाइयां लाए थे।
मेरा पेट भरा था,तो मैने उससे कहा,वापिस ले जाओ।
मैं तुमसे पूछता हूं, वे क्या करेगें?
किसी ने भीड़ में से कहा, जाकर गांव में बांंट देंगे,खा लेंगे। बुद्ध ने कहा,तुम क्या करोगे?
तुम गालियों के थाल सजाकर लाए।
मेरा पेट भरा है। दस साल से भर गया।
तुम ज़रा देर करके आए।अब तुम क्या करोगे?
इन गालियों को वापिस ले जाओगे, बांटोगे,
या खुद खाओगे?
मैं नहीं लेता।
तुम गलत आदमी के पासआ गये।
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श्रीरामजानकी जी रूपध्यान

Fri, 09/01/2017 - 21:12
श्रीरामजानकी जी रूपध्यान
**********************
पद राजीव बरनि नहिं जाहीं।
मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥
बाम भाग सोभति अनुकूला।
आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥

 भगवान के उन ऐसे चरणकमलों का वर्णन कैसे किया जा सकता है जिनमें भक्त मुनियों के मन बसते हैं। भगवान के बाएँ भाग में सदा अनुकूल रहने वाली, शोभा की राशि जगत की मूलकारण रूपा आदिशक्ति श्री जानकीजी सुशोभित हैं॥

जासु अंस उपजहिं गुनखानी।
अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई।
राम बाम दिसि सीता सोई॥

जिनके अंश से गुणों की खान अगणित लक्ष्मी, पार्वती और ब्रह्माणी त्रिदेवों की शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंह के इशारे मात्र से ही जगत की रचना हो जाती है, वही भगवान की स्वरूपा शक्ति श्री सीताजी श्री रामचन्द्रजी की बाईं ओर स्थित हैं॥
Categories: Stotra - Pooja

क्या माँगे भगवान से

Fri, 09/01/2017 - 21:12
जे निज भगत नाथ तव अहहीं।
जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥

सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति
सोइ निज चरन सनेहु।
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु
हमहि कृपा करि देहु॥

हे नाथ! आपके जो भी परम् भक्त जन हैं, व आपके सानिध्य से जो अलौकिक,अखंड और दिव्य सुख पाते हैं और जिस परम गति को प्राप्त होते हैं,
हे प्रभो! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही अपने चरणों में प्रेम, वही ज्ञान और वही रहन-सहन कृपा करके हमें दीजिए॥
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आस्था..श्रद्धा और विश्वास।

Sun, 08/20/2017 - 21:29
एक गाँव था...
छोटा सा।
गाँव मे एक वृद्ध साधुबाबा भी रहते थे।
गाँव से थोड़ी सी दूरी पर एक मंदिर था,
बड़ा दिव्य।
वह बाबाजी उसमें कन्हैया की पूजा-अर्चना करते। प्रतिदिन का उनका एक नियम था कि अपनी झोपड़ी से निकल के कर मंदिर जाते और सायंकाल भगवान के सम्मुख दीपक जलाते।
उसी गांव में एक नास्तिक व्यक्ति भी रहता था।
जैसे ही वह साधु दीपक जलाते और घर के लिए वापस निकलते, यह व्यक्ति भी प्रतिदिन मंदिर में जाकर दीपक को बुझा देता था।
साधु ने कई बार उसे समझाने का प्रयत्न किया पर वह व्यक्ति कहता- भगवान हैं तो स्वयं ही आकर मुझे दीपक बुझाने से क्यों नहीं रोक देते।
यह क्रम महीनों, वर्षों से चल रहा था ।
एक दिन की बात,
मौसम कुछ ज्यादा ही खराब था,
आँधी और तूफान के साथ मूसलाधार वर्षा ज्यों थमने का नाम ही न ले रही थी।
साधू ने बहुत देर तक मौसम साफ होने की प्रतीक्षा की, और सोचा
"इतने तूफान में यदि मैं भीगते, परेशान हुए मंदिर गया भी और दीपक जला भी दिया तो वह शैतान नास्तिक आकर बुझा ही देगा,
रोज ही बुझा देता है" अब आज नहीं जाता हूँ।
कल प्रभु से क्षमा माँग लूँगा।
वैसे भी भगवान कौन सा दर्शन ही दे देंगें।
यह सब सोच वह घर में दुबका रहा।
उधर....
नास्तिक को पता था कि साधु मंदिर जरूर आएगा...
और दीपक जलाएगा, वह अपने नियत समय पर मंदिर पहुँचा, घंटों प्रतीक्षा करता रहा और जब साधु नही आया तो गुस्से में भरकर निर्णय लिया कि मैं तो दिया बुझाऊँगा ही भले ही जलाके बुझाऊँ,
यह सोच उसने वहां रखे दीपक में घी भरा और
उसे जला दिया।
बस फिर क्या था।
भगवान उसी समय प्रकट हो गए।
बोले- उस साधु से भी अधिक श्रद्धा और विश्वास तुम्हारे अंदर है,
इतने तूफान में भीग कर भी तुम यहाँ आ गए,
आज ही तो मुझे आना था,
जो आया,
उसने पाया।
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कथा 2

Sat, 08/19/2017 - 19:00
सारद दारुनारि सम स्वामी।
रामु सूत्रधर अंतरजामी॥
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी।
कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥

शारदा-सरस्वती अर्थात बुद्धि-वाणी-विद्वत्ता आदि तो कठपुतली के समान हैं और अंतर्यामी स्वामी राम (सूत पकड़कर कठपुतली को नचानेवाले) सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कवि पर वे कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगन में सरस्वती को वे नचाया करते हैं।
उनकी *कृपा बिन* कुछ भी सम्भव नहीं है।
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कथा 1

Sat, 08/19/2017 - 18:59
सती के रूप में दक्षयज्ञ में अपने प्राण त्यागने के पश्चात शक्ति ने पार्वती के रूप में हिमाचल के घर जन्म लिया। घनघोर तप कर पुनः शिव को प्राप्त किया।
पूर्व जन्म के संदेह को याद कर पुनः शिव से पूछा-

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती।
सादर जपहु अनँग आराती॥
रामु सो अवध नृपति सुत सोई।
की अज अगुन अलखगति कोई॥

है प्रभु! हे कामदेव के शत्रु! आप दिन-रात राम-राम जपा करते हैं- ये राम वही अयोध्या के राजा के पुत्र हैं? या अजन्मे, निर्गुण और अगोचर कोई और राम हैं?॥

तब शिव ने प्रवति जी को राम कथा सुनाई। बोले-

बंदउँ बालरूप सोइ रामू।
सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरने वाले और श्री दशरथजी के आँगन में खेलने वाले बालरूप श्री रामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें॥
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आक्रोश

Tue, 08/15/2017 - 14:56
ये कहना ही बहुत नहीं
कि बातों में गहराई है।
व्यंग्य बहुत पैना है
सीने पे चोट खाई है।
बहुतों से बहुत आगे
सोचने का माद्दा है।
यादों में अतीत है औ..
भविष्य की सच्चाई है।
ये वर्तमान समय साथी
शीर्ष पर ले जा रहा
इसका प्रयोग तो अर्थ है
रह गया तो फिर व्यर्थ है।
चिंगारी जब सुलग जाए
तब लौ को लपट बनने दो।
व्यथित मन उदगार सारे
लावा बन के बहने दो।


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भगवान आखिर क्यों नहीं सुनते हमारी

Sat, 08/12/2017 - 22:28
भगवान आखिर क्यों नहीं सुनते हमारी
******************************

मैं तो प्रति...दिन सुबह जल्दी भोर ही उठ जाता हूँ।
फिर नहा धो कर आपके मंदिर में घण्टी बजाता हूँ।

सोया हुआ समझकर भगवान् को जगाता हूँ।
और गंगाजली उठाकर स्नान भी कराता हूँ।

स्वच्छ पंचामृत से मैने चरण उनके धोए है
चंदन से टीका तिलक करना मैं कभी भूला नहीं,

नित नए नूतन वस्त्र भी मैने उन्हें पहनाए हैं
और गंध, अक्षत मिलाकर ये पुष्प भी तो चढ़ाए हैं।

पर क्यों नही सुनता मेरी तू....

अक्सर सभी के मन में यह प्रश्न रहता हैं कि हम दिन-रात भगवान से प्रार्थना करते हैं लेकिन भगवान हमारी प्रार्थना सुनते क्यों नहीं हैं ?

पर ये तय है कि भगवान हमारी हर प्रार्थना सुनते है, लेकिन उसमें प्रेम हो, करुणा हो, और सबसे बढ़कर पूर्ण समर्पण हो, अर्थात भक्ति का भाव हो। चाहे वह निष्काम ही या सकाम।

हम कितना भी मनका फेर लें, हम चाहे लाख बार राम कहे, चाहे करोड़ बार, लेकिन यदि एक बार ह्रदय से राम नाम कहा गया तो वो राम नाम लाख बार नाम लेने से कहीं अधिक होगा।

भगवान हमारे मन की बात जानते है क्योंकि वहीं तो वे विराजते हैं।

यह भी तय है कि कई सौ बार राम का नाम लेने पर कोई एक आध बार ही स्थितियाँ ऐसी बनती है कि जब वह नाम उनके परम ध्यान के साथ लिया गया हो अन्यथा अधिकांश बार मुँह पर राम के नाम के साथ मस्तिष्क में घर, गृहस्थी, ऑफिस और दुनियादारी ही चलती रहती है।

भगवान ने बड़ी सीधी बात कही है।
उन्हें कोई ढोंग और दिखावा पसंद ही नहीं है।
वे कहते हैं-

निर्मल मन जन सो मोहि पावा,
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।

जब तक मन शुद्ध नहीं होगा, कितनी भी पूजा अर्चना की जाय, लाभ होने कठिन है।

मीरा बाई जब भगवान कृष्ण के भजन गाती थी तो उसमें डूब जाती थी,यही ध्यान की परमस्थिति है।

सूरदास जी जब पद गाते थे तब भी भगवान सुनते थे।उनसे बातें भी किया करते थे।

निराकार राम के उपासक कबीरदास जी ने तो कहा है कि-

एक चींटी कितनी छोटी होती है, अगर उसके पैरों में भी घुंघरू बाँध दे तो उसकी आवाज को भी भगवान सुनते है।

उनको पुकारने के लिए ढोल, नगाड़े और लाउडस्पीकर की आवश्यकता नहीं है।

यहाँ तक कि मन में ही उसे पुकार लें तो भी प्रार्थना वहाँ तक पहुंचती है, इसमे कोई संशय नहीं है। प्रभु की मानसिक पूजा को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है।

एक छोटी सी कथा है :-

एक भक्त श्री हरिदास हुए हैँ, उन्होंने 20 साल तक लगातार नारायण कवच का पाठ नित्य, बड़ी श्रद्धा के साथ किया।

भगवान ने उनकी परीक्षा लेते हुए कहा -
अरे भक्त! तुझे क्या लगता है,  मैं तेरे पाठ से प्रसन्न हूँ, तो ये तेरा वहम है।
मैं तेरे पाठ से बिलकुल भी प्रसन्न नही हुआ।

जैसे ही भक्त हरिदास ने सुना तो वो नाचने लगे, गाने लगे और झूमने लगे।

भगवान बोले-
 तू निरा पागल है, मैंने कहा मैं तेरे पाठ करने से प्रसन्न नही हूँ और तू नाच रहा है।
हरिदास बोले "प्रभ!आप प्रसन्न हो या नहीं हो ये बात मैं नही जानता लेकिन मैं तो इसलिए नाच कर प्रसन्न हूँ कि आपने मेरा पाठ कम से कम सुना तो सही।

ये होता है निष्काम भक्ति का भाव...

गजेंद्र- ग्राह की कथा तो आपने सुनी ही है।

जब गजेन्द्र हाथी ने ग्राह से बचने के लिए भगवान को रोकर पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना.?

बिल्कुल सुना और भगवान अपना भोजन छोड़कर नंगे पैर दौड़े चले आये।

इसी प्रकार जब द्रौपदी  ने भगवान कृष्ण को पुकारा तो भगवान ने नहीं सुना ?

दुःशासन उसके बाल खींचता रहा...द्रौपदी भगवान को पुकारती और साथ ही अपने पूरे बल से विरोध भी करती रही।

चीरहरण के समय भी वो कृष्ण को पुकारती रही और अपने दोनों हाथों से , अपने दांतों से वस्त्र को बचाती रही।
पर जब उसने पूर्ण समर्पण श्रीकृष्ण के चरणों मे कर दिया तो ....
भगवान ने सुना भी और लाज भी बचाई ।

जब भी भगवान को याद करें , पूर्ण समर्पण और प्रेम भाव से ही उनका नाम नाम संकीर्तन और जप करें।

कोई संदेह मत करें बस ह्रदय से उनको पुकारें।

वे अवश्य आपकी सुन रहे हैं, सुनेंगे। यह तय ही है।

यदि किसी कारणवश वे नहीं सुन रहे हैं तो इसमें भी कुछ अच्छा ही है।क्योंकि उन्हें पता है कि आप के लिए अच्छा क्या है।
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एक छलाँग आनंद की ओर

Thu, 06/22/2017 - 21:31
पूरे जीवन मे...
एक क्षण ऐसा भी आता है...
जब,
आकांक्षा आनंद की ओर धकेलती है।
परम आनंद की ओर....
यह आनंद अच्छे भोजन, वस्त्र या धन का कदापि नही।
मायिक भोग-विलास और चतुर्पुरुषार्थ का भी नहीं।
क्षणिक नहीं....
यह तो परब्रह्म की प्राप्ति का आनंद है।
वेदनारायण ने कहा-
"आनंदो ब्रह्मेति व्यजानाति"
ब्रह्म ही आनंद है,परमानंद।
वह रस से युक्त है, बल्कि परम रस वह स्वयं है।
उपनिषद कहते हैं "रसो वै सः"
मात्र पुरुष ने ही आनंद की इच्छा नहीं की,
वह परब्रह्म भी स्वयं आतुर है उस पुरुष को मिलाने को...
अपने-आप से।
आग दोनों ही तरफ है बराबर लगी हुई।
कभी छलाँग लगाने की इच्छा हो उस आग में...
तो चूकना मत...रुकना मत।
हिम्मत का यह क्षण कभी ही आता है,
घटना घट जाय तो घट जाय।
रुके तो चूके।
बाद में मौका मिले, न मिले।

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अपेक्षाओं का शून्य

Sun, 04/09/2017 - 09:43
              अपेक्षाओं का शून्य


परमात्मा ने आदमी को बनाया और कहा....
अद्वितीय हो तुम.....
तुमसे बेहतर कोई भी नहीं...
और यही बात उसने सभी को कह दी..
तबसे आदमी यही ख्याल लिए जीता है,
कि उससे अच्छा कोई भी नहीं।
वह आत्ममुग्ध है और ...
स्वयं ही कहता फिरता है..
ईश्वर की सर्वोत्तम कृति वही है।
इसी दंभ में जीता है...सदा..
और पाता है अनन्य दुःख
क्योंकि अपेक्षाएँ बढ़ा लेता है,
जो पूरी कभी नहीं होती।
अनंत हैं उसकी अपेक्षाएँ...
और जीवन बहुत छोटा है..
जितना ज्यादा चाहोगे...
दुःख बढ़ेगा..
एक बार अपनी अपेक्षाओं को..
शून्य करके देखो..
जो मिल जाय, उसके प्रति धन्यवाद का भाव हो...
कृतज्ञता का भाव..
वही सच्चे आस्तिक की प्रतिक्रिया होगी।
जो मिला है..बहुत है...
मगर देखो तो..
एक आदमी मरने जा रहा था..
जिस नदी में वह कूदना चाहता था...
कूद कर जान दे देना..
किनारे उसी नदी के एक फकीर बैठा था...
रोका उसने... क्या कर रहे हो...
क्यों मरना चाहते हो?
अब मत रोको..बस अब बहुत हुआ..
जीवन बेकार है...
जो चाहा नहीं मिला... जो नहीं चाहा वही मिला...
तो फिर.. मैं भी क्यों स्वीकार करूँ ये जीवन..
क्यों? क्या तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है?
फ़कीर ने पूछा-
कुछ भी तो नहीं... नहीं तो मरने क्यों आता..
फकीर बोला-“चलो...चलो मेरे साथ...
जो कुछ थोडा तुम्हारे पास है..
उसके बदले में गाँव का सेठ
बहुत कुछ दे-देगा।
मेरा बड़ा मान रखता है वह...
दोनों सेठ के पास गए..
सेठ ने आदमी को बड़े गौर से देखा....
कहा.. तेरी दोनों आँखों के बदले में एक लाख दूंगा।
आदमी घबराया...आँख मेरी बेच दूं..
दस लाख में भी नहीं दूंगा...
अच्छा ग्यारह लाख ले लो...सेठ ने कहा...
नहीं...नहीं.. आदमी चिल्लाया...
अच्छा कान बेच दो...या नाक...बेचोगे?
आदमी बोला.. क्या पागलपन है?
मजाक करते हो ...
यह धंधा करना ही क्यों?
पर अभी तो तुमने कहा..
“कुछ भी नहीं है मेरे पास”
जान दे रहे थे..
आँख.. कान.. नाक..
पूरा का पूरा शरीर छोड़ रहे थे..
अब क्या हुआ..
अरे! जो कुछ मिला है तुझे..
दिखाई क्यों नहीं पड़ता..
मांस से बनी ये.. पारदर्शी आँख..
प्रकृति की कितनी
सुंदरता दिखलाती है...
फूल, पर्वत, तारे...
हड्डी और चमड़ी से बने कान...
इनसे तुम सुनते हो सुन्दर संगीत...
सुन्दर हवा..
तुम्हारे शरीर को छू-छू जाती है...
समझो... क्या-क्या नहीं मिला है तुम्हे...
परमात्मा का प्रसाद ही तो है...
बदले में कुछ भी तो नहीं माँगा है उसने...
जो मिला ...बिना कुछ दिए ही...
वह बहुत है...
सोचो...
सोचो..
जीवन में जितना अधिक चाहोगे...मांगोगे...
उतना ही दुःख बढ़ेगा।
जो मिला... जितना मिला...
उसे प्रसन्न हो... स्वीकार करें...
वरण करें..
सच में तुम...
इसकी...इस अनंत ब्रह्माण्ड की...
अनुपम... सर्वोत्तम कृति हो।
परमात्मा ने आदमी को बनाया और कहा....
अद्वितीय हो तुम.....
तुमसे बेहतर कोई भी नहीं...
और यही बात उसने सभी को कह दी..
तबसे आदमी यही ख्याल लिए जीता है,
कि उससे अच्छा कोई भी नहीं।
वह आत्ममुग्ध है और ...
स्वयं ही कहता फिरता है..
ईश्वर की सर्वोत्तम कृति वही है।
इसी दंभ में जीता है...सदा..
और पाता है अनन्य दुःख
क्योंकि अपेक्षाएँ बढ़ा लेता है,
जो पूरी कभी नहीं होती।
अनंत हैं उसकी अपेक्षाएँ...
और जीवन बहुत छोटा है..
जितना ज्यादा चाहोगे...
दुःख बढ़ेगा..
एक बार अपनी अपेक्षाओं को..
शून्य करके देखो..
जो मिल जाय, उसके प्रति धन्यवाद का भाव हो...
कृतज्ञता का भाव..
वही सच्चे आस्तिक की प्रतिक्रिया होगी।
जो मिला है..बहुत है...
मगर देखो तो..
एक आदमी मरने जा रहा था..
जिस नदी में वह कूदना चाहता था...
कूद कर जान दे देना..
किनारे उसी नदी के एक फकीर बैठा था...
रोका उसने... क्या कर रहे हो...
क्यों मरना चाहते हो?
अब मत रोको..बस अब बहुत हुआ..
जीवन बेकार है...
जो चाहा नहीं मिला... जो नहीं चाहा वही मिला...
तो फिर.. मैं भी क्यों स्वीकार करूँ ये जीवन..
क्यों? क्या तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है?
फ़कीर ने पूछा-
कुछ भी तो नहीं... नहीं तो मरने क्यों आता..
फकीर बोला-“चलो...चलो मेरे साथ...
जो कुछ थोडा तुम्हारे पास है..
उसके बदले में गाँव का सेठ
बहुत कुछ दे-देगा।
मेरा बड़ा मान रखता है वह...
दोनों सेठ के पास गए..
सेठ ने आदमी को बड़े गौर से देखा....
कहा.. तेरी दोनों आँखों के बदले में एक लाख दूंगा।
आदमी घबराया...आँख मेरी बेच दूं..
दस लाख में भी नहीं दूंगा...
अच्छा ग्यारह लाख ले लो...सेठ ने कहा...
नहीं...नहीं.. आदमी चिल्लाया...
अच्छा कान बेच दो...या नाक...बेचोगे?
आदमी बोला.. क्या पागलपन है?
मजाक करते हो ...
यह धंधा करना ही क्यों?
पर अभी तो तुमने कहा..
“कुछ भी नहीं है मेरे पास”
जान दे रहे थे..
आँख.. कान.. नाक..
पूरा का पूरा शरीर छोड़ रहे थे..
अब क्या हुआ..
अरे! जो कुछ मिला है तुझे..
दिखाई क्यों नहीं पड़ता..
मांस से बनी ये.. पारदर्शी आँख..
प्रकृति की कितनी
सुंदरता दिखलाती है...
फूल, पर्वत, तारे...
हड्डी और चमड़ी से बने कान...
इनसे तुम सुनते हो सुन्दर संगीत...
सुन्दर हवा..
तुम्हारे शरीर को छू-छू जाती है...
समझो... क्या-क्या नहीं मिला है तुम्हे...
परमात्मा का प्रसाद ही तो है...
बदले में कुछ भी तो नहीं माँगा है उसने...
जो मिला ...बिना कुछ दिए ही...
वह बहुत है...
सोचो...
सोचो..
जीवन में जितना अधिक चाहोगे...मांगोगे...
उतना ही दुःख बढ़ेगा।
जो मिला... जितना मिला...
उसे प्रसन्न हो... स्वीकार करें...
वरण करें..
सच में तुम...
इसकी...इस अनंत ब्रह्माण्ड की...
अनुपम... सर्वोत्तम कृति हो।
परमात्मा ने आदमी को बनाया और कहा....
अद्वितीय हो तुम.....
तुमसे बेहतर कोई भी नहीं...
और यही बात उसने सभी को कह दी..
तबसे आदमी यही ख्याल लिए जीता है,
कि उससे अच्छा कोई भी नहीं।
वह आत्ममुग्ध है और ...
स्वयं ही कहता फिरता है..
ईश्वर की सर्वोत्तम कृति वही है।
इसी दंभ में जीता है...सदा..
और पाता है अनन्य दुःख
क्योंकि अपेक्षाएँ बढ़ा लेता है,
जो पूरी कभी नहीं होती।
अनंत हैं उसकी अपेक्षाएँ...
और जीवन बहुत छोटा है..
जितना ज्यादा चाहोगे...
दुःख बढ़ेगा..
एक बार अपनी अपेक्षाओं को..
शून्य करके देखो..
जो मिल जाय, उसके प्रति धन्यवाद का भाव हो...
कृतज्ञता का भाव..
वही सच्चे आस्तिक की प्रतिक्रिया होगी।
जो मिला है..बहुत है...
मगर देखो तो..
एक आदमी मरने जा रहा था..
जिस नदी में वह कूदना चाहता था...
कूद कर जान दे देना..
किनारे उसी नदी के एक फकीर बैठा था...
रोका उसने... क्या कर रहे हो...
क्यों मरना चाहते हो?
अब मत रोको..बस अब बहुत हुआ..
जीवन बेकार है...
जो चाहा नहीं मिला... जो नहीं चाहा वही मिला...
तो फिर.. मैं भी क्यों स्वीकार करूँ ये जीवन..
क्यों? क्या तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है?
फ़कीर ने पूछा-
कुछ भी तो नहीं... नहीं तो मरने क्यों आता..
फकीर बोला-“चलो...चलो मेरे साथ...
जो कुछ थोडा तुम्हारे पास है..
उसके बदले में गाँव का सेठ
बहुत कुछ दे-देगा।
मेरा बड़ा मान रखता है वह...
दोनों सेठ के पास गए..
सेठ ने आदमी को बड़े गौर से देखा....
कहा.. तेरी दोनों आँखों के बदले में एक लाख दूंगा।
आदमी घबराया...आँख मेरी बेच दूं..
दस लाख में भी नहीं दूंगा...
अच्छा ग्यारह लाख ले लो...सेठ ने कहा...
नहीं...नहीं.. आदमी चिल्लाया...
अच्छा कान बेच दो...या नाक...बेचोगे?
आदमी बोला.. क्या पागलपन है?
मजाक करते हो ...
यह धंधा करना ही क्यों?
पर अभी तो तुमने कहा..
“कुछ भी नहीं है मेरे पास”
जान दे रहे थे..
आँख.. कान.. नाक..
पूरा का पूरा शरीर छोड़ रहे थे..
अब क्या हुआ..
अरे! जो कुछ मिला है तुझे..
दिखाई क्यों नहीं पड़ता..
मांस से बनी ये.. पारदर्शी आँख..
प्रकृति की कितनी
सुंदरता दिखलाती है...
फूल, पर्वत, तारे...
हड्डी और चमड़ी से बने कान...
इनसे तुम सुनते हो सुन्दर संगीत...
सुन्दर हवा..
तुम्हारे शरीर को छू-छू जाती है...
समझो... क्या-क्या नहीं मिला है तुम्हे...
परमात्मा का प्रसाद ही तो है...
बदले में कुछ भी तो नहीं माँगा है उसने...
जो मिला ...बिना कुछ दिए ही...
वह बहुत है...
सोचो...
सोचो..
जीवन में जितना अधिक चाहोगे...मांगोगे...
उतना ही दुःख बढ़ेगा।
जो मिला... जितना मिला...
उसे प्रसन्न हो... स्वीकार करें...
वरण करें..
सच में तुम...
इसकी...इस अनंत ब्रह्माण्ड की...
अनुपम... सर्वोत्तम कृति हो।
परमात्मा ने आदमी को बनाया और कहा....
अद्वितीय हो तुम.....
तुमसे बेहतर कोई भी नहीं...
और यही बात उसने सभी को कह दी..
तबसे आदमी यही ख्याल लिए जीता है,
कि उससे अच्छा कोई भी नहीं।
वह आत्ममुग्ध है और ...
स्वयं ही कहता फिरता है..
ईश्वर की सर्वोत्तम कृति वही है।
इसी दंभ में जीता है...सदा..
और पाता है अनन्य दुःख
क्योंकि अपेक्षाएँ बढ़ा लेता है,
जो पूरी कभी नहीं होती।
अनंत हैं उसकी अपेक्षाएँ...
और जीवन बहुत छोटा है..
जितना ज्यादा चाहोगे...
दुःख बढ़ेगा..
एक बार अपनी अपेक्षाओं को..
शून्य करके देखो..
जो मिल जाय, उसके प्रति धन्यवाद का भाव हो...
कृतज्ञता का भाव..
वही सच्चे आस्तिक की प्रतिक्रिया होगी।
जो मिला है..बहुत है...
मगर देखो तो..
एक आदमी मरने जा रहा था..
जिस नदी में वह कूदना चाहता था...
कूद कर जान दे देना..
किनारे उसी नदी के एक फकीर बैठा था...
रोका उसने... क्या कर रहे हो...
क्यों मरना चाहते हो?
अब मत रोको..बस अब बहुत हुआ..
जीवन बेकार है...
जो चाहा नहीं मिला... जो नहीं चाहा वही मिला...
तो फिर.. मैं भी क्यों स्वीकार करूँ ये जीवन..
क्यों? क्या तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है?
फ़कीर ने पूछा-
कुछ भी तो नहीं... नहीं तो मरने क्यों आता..
फकीर बोला-“चलो...चलो मेरे साथ...
जो कुछ थोडा तुम्हारे पास है..
उसके बदले में गाँव का सेठ
बहुत कुछ दे-देगा।
मेरा बड़ा मान रखता है वह...
दोनों सेठ के पास गए..
सेठ ने आदमी को बड़े गौर से देखा....
कहा.. तेरी दोनों आँखों के बदले में एक लाख दूंगा।
आदमी घबराया...आँख मेरी बेच दूं..
दस लाख में भी नहीं दूंगा...
अच्छा ग्यारह लाख ले लो...सेठ ने कहा...
नहीं...नहीं.. आदमी चिल्लाया...
अच्छा कान बेच दो...या नाक...बेचोगे?
आदमी बोला.. क्या पागलपन है?
मजाक करते हो ...
यह धंधा करना ही क्यों?
पर अभी तो तुमने कहा..
“कुछ भी नहीं है मेरे पास”
जान दे रहे थे..
आँख.. कान.. नाक..
पूरा का पूरा शरीर छोड़ रहे थे..
अब क्या हुआ..
अरे! जो कुछ मिला है तुझे..
दिखाई क्यों नहीं पड़ता..
मांस से बनी ये.. पारदर्शी आँख..
प्रकृति की कितनी
सुंदरता दिखलाती है...
फूल, पर्वत, तारे...
हड्डी और चमड़ी से बने कान...
इनसे तुम सुनते हो सुन्दर संगीत...
सुन्दर हवा..
तुम्हारे शरीर को छू-छू जाती है...
समझो... क्या-क्या नहीं मिला है तुम्हे...
परमात्मा का प्रसाद ही तो है...
बदले में कुछ भी तो नहीं माँगा है उसने...
जो मिला ...बिना कुछ दिए ही...
वह बहुत है...
सोचो...
सोचो..
जीवन में जितना अधिक चाहोगे...मांगोगे...
उतना ही दुःख बढ़ेगा।
जो मिला... जितना मिला...
उसे प्रसन्न हो... स्वीकार करें...
वरण करें..
सच में तुम...
इसकी...इस अनंत ब्रह्माण्ड की...
अनुपम... सर्वोत्तम कृति हो।
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ईश्वर की खोज

Fri, 08/19/2016 - 11:34

मैं ईश्वर को खोजता था, बहुत-बहुत जन्मों से...अनेक बार, दूर किसी पथ पर उसकी झलक दिखलाई पड़ी।मैं भागता.. भागता.. उसकी तरफपर तब तक वह निकल चुका होता... और दूर...मेरी तो सीमा थी पर उस असीम की, उस सत्य की कोई सीमा न थी।जन्मों- जन्मों भटकता रहा मैं..कभी-कभी झलक मिलती थी उसकी किसी तारे के पास जब मैं पहुँचता उस तारे तक...तब तक वह कहीं और निकल चुका होता था।आखिर बहुत थका..बहुत परेशान..और बहुत प्यासा...एक दिन मैं उसके द्वार पर पहुँच ही गया।मैं उसकी सीढियाँ चढ़ गया।परमात्मा के भवन की सीढ़ियाँ मैंने पार कर लीं ।मैं उसके द्वार पर खड़ा हो गया..सांकल मैंने हाथ में ले लीबजाने को ही था..तभी...मुझे ख्याल आया...अगर कहीं वह मिल ही गया तो क्या होगा?फिर मैं क्या करूँगा?अब तक तो एक बहाना था चलाने का.. कि.. ईश्वर को ढूँढता हूँ..फिर तो बहाना भी नहीं रहेगा।अपने समय को काटने का एक बहानाअपने को व्यर्थ न मानने का...सार्थक बनाए रखने की एक कल्पना थी।द्वार पर खड़े होकर घबराया..कि द्वार खडकाऊं कि न खडकाऊं।क्योंकि खटकाने के बाद उसका मिलना तय है। आखिर भवन है उसका।वह मिल जाएगा..फिर..मैं उससे मिलना भी चाहता हूँ?या फिर एक बहाना था केवलअपने आपको चलाये रखने का.. क्या प्यास है इतनी मिलने की... उससे..सचमुच चाहता हूँ मैं उससे मिलना?और तब.. मन बहुत घबरायाऔर सोचा... नहीं...दरवाजा मत खटखटाओयदि वह मिल गया.. सामने आ गया तो फिर क्या करोगे?फिर सब करना गया।फिर सब खोजना गया।फिर सब दौड़ भी गई।फिर तो सारा जीवन ही गया।तब मैं डर गया...सचमुच डर गया..मैंने सांकल आहिस्ता से छोड़ीकि कहीं वह सुन ही न ले।और मैंने अपने जूते पैर से निकाल लिए।कि कहीं...सीढ़ियाँ उतरते समय आवाज न हो जाय ।कहीं वह आ ही न जाय।और मैं भागा उसके द्वार से...मैं भागता गया, भागता गया...जब मैं बहुत दूर निकल आया... तब...ठहरा... रुका.. संतोष की सांस ली।और तब से मैं फिर उसका मकान.. उसका पता..ढूंढ रहा हूँ।क्योंकि ढूढने में जिन्दगी चलाने का एक बहाना है।मुझे भली-भांति पता है कि..उसका मकान कहाँ है।पर मैं बच के निकल जाता हूँ।खोज जारी है...जो भी मिलता है, पूछता हूँ वह कहाँ मिलेगा?  ऐसे जिन्दगी मजे में चल रही है।एक ही डर लगता है कि कहीं..किसी दिन उससे मिलना न हो जाय।मकान उसका मुझे पता है।बड़ी अजीब सी बात है।पर हम सबके साथ ऐसा ही है,हम सबको पता है कि.. उसका मकान कहाँ है ।हमें मालूम है किबस थोडा खटकाएँऔर...द्वार खुल जाएँगे…बस तैयार होने की बात है।(ओशो रजनीश ने लगभग 50 वर्ष पूर्व दिए गए प्रवचन में टैगोर की कही हुई कविता का सन्दर्भ देते हुए बताया था इस कविता का यही आधार है)




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श्री अनिल जी मेहता अजमेर के मधुर गीत

Thu, 04/28/2016 - 19:54
हाटकेश्वर चतुर्दशी का पर्व नागर ब्राह्मणों के द्वारा बड़ी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। आज-कल की इस भागम-भाग और अतिव्यस्त जीवन शैली के बाद भी जहाँ कहीं भी नागर ब्राह्मणों के कुछ परिवार साथ होते हैं, इस दिन समय निकाल ही लेते है। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी के इस दिन नागर ब्राह्मण अपने इष्टदेव भगवान हाटकेश्वर महादेव की पूजा अर्चना करते हैं और भगवान के नैवेद्य के पश्चात भोजन आदि की भी व्यवस्था होती है। अजमेर में भी ऐसी परंपरा चली आ रही है। यहाँ पर नागरों  के ४०-५० परिवार थे जो लगातार कम होते जा रहे हैं पर नागर समाज के संरक्षक श्री गिरधारी लाल जी नागर जी, श्री रमणीक भाई मेहता जी और कुलदीप भाई दवे जी के अथक परिश्रम से यह परंपरा ७५ से भी अधिक वर्षों से अनवरत चली आ रही है। समाज द्वारा शिवरात्रि तथा नवरात्री बे सभी ९ दिनों में भी विधिवत पूजा बड़े विधि-विधान से होती है और अधिकाश परिवार इस दिन एकत्रित होकर भजन व गरबे आदि का आयोजन भी करते है। २० अप्रैल २०१६ को हाटकेश्वर चतुर्दशी के दिन समाज के तथा अजमेर शहर में प्रतिष्ठित और मेरे आदरणीय भाई श्री अनिल मेहता जी भी उपस्थित थे और उन्होंने हमारे आग्रह पर अपने बेहद मधुर कंठ से एक-दो गीत प्रस्तुत किये और मेरे अनुरोध पर उन्होंने मुझे ये गीत लिख कर भी दिए। इनमे से एक उनका स्वरचित है और दूसरा बेहद पुराना संकलन। इन्हें मैं ब्लॉग पर पोस्ट करने का लोभ संवरण न कर सका। प्रस्तुत है ये उनके द्वारा संकलित पहला गीत-  मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....जो सोते हैं उनको जगाए चला जा ॥ मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....निराकार प्रभु है सभी में समाया.....यहाँ सब है अपने न कोई पराया......घृणा, बैर दिल से निकाले चला जा...मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....चुराना नहीं लोभवश धन किसी का....दुखाना नहीं तुम कभी मन किसी का....यह सन्देश घर-घर सुनाये चला जा....मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....गुरु पीर मुर्शीद न तू देवता बन...किसी दीन के दर्द की तू दवा बन...यह सन्देश घर-घर सुनाये चला जा....मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....अविद्या अँधेरे में जो फँस रहे हैं....कुकर्मों के कीचड़ में जो धँस रहे हैं....प्रकाश आर्य नेकी बताये चला जा....मधुर प्रेम वीणा बजाये चला जा....संकलनश्री अनिल भाई मेहता जीडी-मधुबन कालोनीनाका मदारअजमेर राजस्थान  09252197733दूसरा गीत अगले ब्लॉग में........






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सुप्रसिद्ध आरती ॐ जय जगदीश हरे का हिंदी अनुवाद

Mon, 12/21/2015 - 15:01

सुप्रसिद्ध आरती ॐ जय जगदीश हरे  का हिंदी अनुवाद(प्रत्येक हिंदू मात्र नें इस सुप्रसिद्ध आरती को एक न एक बार अवश्य ही गाया होगा, पढ़ा होगा आइये एक प्रयास करते हैं कि इस आरती का, ध्यान का शाब्दिक अर्थ है क्या?)

प्रणवस्वरुप मैं समस्त जगत के स्वामी की जय-जयकार करता हूँ, जो कि शरण में आये अपने सभी भक्त और दास के संकट को क्षण में ही दूर कर देते हैं। आप का ध्यान करने से न केवल मन के समस्त दुःख दूर हो जाते हैं, बल्कि तन के कष्टों से मुक्ति मिलती है और सुख-संपत्ति भी प्राप्त होती है। आप ही मेरी माता है और आप ही मेरे पिता, और किसके पास मैं शरण लूँ। आप के सिवा मेरा कोई भी नहीं है जिससे मैं आशा कर सकता हूँ। आप पूर्ण परमात्मा हैं। आप अंतर्यामी है। आप ही परब्रह्म परमेश्वर और समस्त लोकों के स्वामी हैं। आप श्रीराम के रूप में करुणा के सागर हैं तो श्रीनारायण के रूप में पालनकर्ता भी। मैं मूर्ख, अज्ञानी, दुष्ट तथा कामी हूँ, प्रभु ! आप  मेरे स्वामी हैं, मुझपर कृपा करें। आप अगोचर है, निराकार हैं और इस रूप में समस्त चराचर के ह्रदय में निवास करने वाले प्राणों के स्वामी भी। हे दयामय ! मैं दुर्बुद्धि आपसे कैसे मिलूँ? हे मेरे प्रभु कृपा करके आप मुझे अपनी शरण में ले लेवें। आप दीनबंधु और दीनों के नाथ हैं। आप दुखों का हरण करने वाले हैं। आप ही स्वामी हैं, आप ही ठाकुर, आप ही भर्तार हैं और आप ही रक्षक। मैं तो आपके द्वार पर पड़ा हूँ, मेरे प्रभु ! आपने हाथ बढाकर मुझे अपनी शरण में ले लेवें, जिससे मेरे सभी विषय विकार मिट जाएँ, पाप विनष्ट हो जाएँ मैं संतों की मैं सेवा करूँ और आपमें मेरी श्रद्धा और भक्ति निरंतर बदती रहे। ॐकारस्वरुप ऐसे समस्त जगत के स्वामी की जय हो, जय हो । 
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श्रीकृष्ण प्रात:स्मरणम्

Sat, 06/20/2015 - 20:57
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेव 
प्रद्युम्न दामोदर विश्वनाथ 
मुकुंद विष्णो: भगवन् नमस्ते ॥
करारविन्देन पदारविन्दम्  मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥

कृष्णाय वासुदेवाय हरयेपरमात्मने
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:
नमोस्त्वनन्ताय सहस्त्रमूर्तये
सहस्त्रपादाक्षिशिरोरूबाहवे।

सहस्त्रनाम्ने पुरूषाय शाश्वते
सहस्त्रकोटी युग धारिणे नम:॥
भवे भवे यथा भक्ति: पादयोस्तव जायते
तथा कुरूष्व देवेश नाथस्त्वं नो यत: प्रभो
नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपाप प्रणाशनम्
 प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्
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छान्दोग्योपनिषद तृतीय प्रपाठक सप्तदश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित

Sat, 06/20/2015 - 20:16
छान्दोग्योपनिषद तृतीय प्रपाठक सप्तदश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित 


स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य
दीक्षाः ॥ ३. १७. १ ॥


यज्ञ रुपी पुरुष की दीक्षाएँ भी यही हैं कि वह खाने(भोजन) और पीने की इच्छा रखता है और रमण करने अर्थात रति कर्म की इच्छा नहीं रखता है ।
अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ॥ ३. १७. २ ॥
जो खाने, पीने के साथ रमण भी करता है वह उपसद अर्थात कार्यकर्त्ता या ऋत्विक के समान है । 
अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव
तदेति ॥ ३. १७. ३ ॥

और जो पुरुष हँसता है, खाता है (सात्विक भक्षण) और रमण करता है (धर्मपत्नी के साथ ऋतु काल में रत) वह सभी प्रकार के स्तोत्र और शस्त्र( सामगान में गाए जाने वाली ऋचाएँ स्तुत व नहीं गाए जाने वाली ऋचाएँ शस्त्र कहलाती हैं)  को प्राप्त करता है। (गीता के सत्रहवें अध्याय में परब्रह्म श्रीकृष्ण ने बताया है कि आयु, ज्ञान, आरोग्य और प्रीति बढ़ाने वाले रसदार, चिकने, स्थाई और चित्त को भाने वाले आहार सात्विक पुरुषों को प्रिय होते है ।  कड़वे, खट्टे, नमकीन, गर्म, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले जो रोग और दुःख उत्पन्न करते हैं वह राजस् पुरुष को तथा बासी, रसहीन, दुर्गन्धयुक्त, जूठा आहार तामसी प्रकृति के पुरुष को प्रिय होता है। ) 
अथ यत्तपो दानमार्जवमहिँसा सत्यवचनमिति
ता अस्य दक्षिणाः ॥ ३. १७. ४ ॥

और तप, दान, अहिंसा तथा सत्य बोलना आदि इस यज्ञ पुरुष की दक्षिणा है । ( वेदों के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने के सोद्देश्य उपवास आदि कर्मो के द्वारा शरीर को सुखाने को तप, न्याय से उपार्जित धन को सत्पात्र या वेदज्ञ पुरुषों को श्रद्धा से दिए जाने को दान कहते है । दान से द्वेष करने वाले भी मित्र हो जाते है अतः इसे सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। गीता के सत्रहवें अध्याय के अनुसार कर्त्तव्य समझकर देश, काल, सत्पात्र को दिया गया दान सात्विक, पुनः फल की अभिलाषा से दिया गया दान राजस तथा बिना सत्कार के और अपात्रों को देना तामस दान कहलाता है । रामानुज भाष्य तथा जाबालद उपनिषद में इसी प्रकार मन, वाणी और कर्म के द्वारा किसी को भी कष्ट देना हिंसा कहा गया है ।देखि , सुनी और समझी गई बात को जैसे के तैसा कह देना ही सत्य है, अतः वाणी की प्रतिष्ठा सत्य ही है। विष्णु स्मृति में कहा गया है कि हजार अश्वमेध यज्ञ के पुण्य और सत्य को तराजू में रखा जाय तो भी सत्य भारी पड़ता है- यही सब पुश यज्ञ की दक्षिणा अर्थात फल है ।)

तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य
तन्मरणमेवावभृथः ॥ ३. १७. ५ ॥


जैसे कि कहा जाता है कि यज्ञ से देव पुरुष सोमरस या अमृत कलश के साथ उत्पन्न होगा वैसे ही कहा जाता है कि माता का द्वारा पुरुष उत्पन्न होगा । यह यज्ञ और अनुष्ठान ही पुरुष का जन्म है और उसकी मृत्यु ही यज्ञ की समाप्ति रूप है। 

तद्धैतद्घोर् आङ्गिरसः कृष्णाय
देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव
सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि
प्राणसँशितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ ३. १७. ६ ॥
अंगिरा गोत्र के ऋषि घोर
आदित्प्रत्नस्य रेतसः ।
उद्वयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरँस्वः
पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म
ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥ ३. १७. ७ ॥



॥ इति सप्तदशः खण्डः ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक चतुर्दश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

Sat, 10/04/2014 - 08:51

॥ चतुर्दशः खण्डः ॥


सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके
पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत
॥ ३. १४. १ ॥
    यह ब्रह्म ही सबकुछ है । यह समस्त संसार उत्पत्तिकाल में इसी से उत्पन्न हुआ है, स्थिति काल में इसी से प्राण रूप अर्थात जीवित है और अनंतकाल में इसी में लीन हो जायेगा । ऐसा ही जान कर उपासक को शांतचित्त और रागद्वेष रहित होकर परब्रह्म की सदा उपासना करे।जो मृत्यु के पूर्व जैसी उपासना करता है, वह जन्मांतर वैसा ही हो जाता है।

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प
आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः
सर्वमिदमभ्तः । अवाकी । अनादरः॥ ३. १४. २ ॥

  सच्चे मन से अनुग्रहीत होकर ( विवेक, विमोक, अभ्यास, क्रिया, कल्याण, अनवसाद और अनुद्धर्ष ये ७ साधनों से निर्मल किया गया मन ही ग्रहण करने योग्य है ) से ईश्वर की उपासना करने वाला शुद्ध प्राण व शरीर प्राप्त करता है और आकाश के समान स्वयं भी प्रकाशित होता है तथा दूसरों को भी प्रकाश देता है । वह दोष रहित सभी कर्म, भोग, गंध व रस प्राप्त करता है।   

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् ब्रीहेर्वा यवाद्वा
सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैष म
आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या
ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो
लोकेभ्यः ॥ ३. १४. ३

   यह आत्मा मेरे अन्तर्हृदय में धान, जौ, सरसों, सांवा, सांवा के चावल से भी सूक्ष्म अणु रूप में उपासना हेतु उपस्थित है और यही पृथ्वी, द्युलोक, अंतरिक्ष और सभी लोक-लोकान्तरों से भी विशालकाय है। 

सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः
सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय
एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा
न विचिकित्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः
॥ ३. १४. ४

सभी कर्म, भोग, गंध व रस प्राप्त कराने वाला वह ब्रह्म हमारे अन्तर्हृदय में जीवन देने के लिए ही स्थित है। इस शरीर की मृत्यु के पश्चात भी मैं पुनः ब्रह्म को प्राप्त होने वाला ही हूँ। जो उपासक ऐसा समझ ले, उसकी भगवत प्राप्ति में कोई संदेह नहीं रह जाता है। महर्षि शांडिल्य ने यह बात अपने शिष्य से कही है।  

॥ इति चतुर्दशः खण्डः ॥


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