ब्राह्मण उवाच

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

Mon, 07/07/2014 - 12:38
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
वेद का पालन करते हुए शुद्ध ह्रदय से परब्रह्म की उपासना के अंग स्वरुप पञ्च देव-द्वारपालों की उपासना करनी चाहिए। सबसे पहले पूर्व दिशा के द्वारपाल आदित्य की प्राण, तेज तथा अन्न के भोक्ता जानते हुए उपासक को उपासना करनी चाहिए।  (वराह उपनिषद में कहा गया है कि प्राण के देवता वायु, श्रवण इन्द्रिय के दिशा, नेत्रों के आदित्य, जिह्वा के वरुण, नासिका के अश्विनीकुमार, वाक् के अग्नि, हस्त के इंद्र, पाद के उपेन्द्र, पायु के यम, मन के देव चन्द्र, बुद्धि के ब्रह्मा, अहंकार के रूद्र, चित्त के क्षेत्रज और उपस्थ के देवता प्रजापति हैं)
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रँ
स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत
श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. २ ॥
   इसके पश्चात वेदानुसार दक्षिण दिशा के द्वारपाल चन्द्रमा की व्यान, प्रकीर्ति, यश, तथा संपत्ति प्राप्त करने की इच्छा से उपासक को उपासना करनी चाहिए। 
अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः
सा वाक्सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत
ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. ३ ॥
   तदन्तर वेद कहता है कि पश्चिम दिशा के द्वारपाल अग्निदेव की अपान, ब्रह्मवर्चस, तेज, तथा प्रचुर अन्न प्राप्त करने की इच्छा से उपासक को उपासना करनी चाहिए। 
अथ योऽस्योदङ्सुषिः स समानस्तन्मनः
स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत
कीर्तिमान्व्युष्टिमान्भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. ४ ॥
   वेदों में जैसा कहा गया है कि इसके अनन्तर उत्तर दिशा के द्वारपाल मेघ है वही मन है, वही समान है।  उपासक को कीर्ति और विलक्षण कान्ति की देहयष्टि हेतु इनकी उपासना करनी चाहिए।   
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः
स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी
महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ३. १३. ५ ॥
जो उपासक वेद को जानते हुए ह्रदय के उर्ध्व द्वार उदान, वायु व आकाश देवता की उपासना करता है वह ओज व बल प्राप्त करता है और महान तेजस्वी हो जाता है। 
ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य
द्वारपाः। स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य
लोकस्य द्वारपान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते
स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य
लोकस्य द्वारपान्वेद ॥ ३. १३. ६ ॥
         भगवल्लोक के इन सभी ब्रह्मपुरुष देवों के गुणों को जानते हुए जो उपासक अपनी  उपासना करता है, उसके कुल में इन समस्त देवों के गुणों से युक्त संपन्न संतान उत्पन्न होती है, उपासक को प्ररब्रह्म के उस दिव्य लोक में स्थान प्राप्त होता है और वह आवागमन से मुक्त हो जाता है।
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु
सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव
तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ३. १३. ७ ॥
     इस विश्व लोक के ऊपर जो द्युलोक है, उसके भी ऊपर परब्रह्म की अलौकिक तथा परमदिव्य ज्योति विद्यमान है। उसी परमात्मा के प्रकाश से यह सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित है। इसी ज्योति स्वरुप के अंश से जीव के ह्रदय में जीवात्मा प्रकाशित होता है ।
तस्यैषा दृष्टिर्यत्रितदस्मिञ्छरीरे सँस्पर्शेनोष्णिमानं
विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव
नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च
श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद
य एवं वेद ॥ ३. १३. ८ ॥

इससे ही मनुष्य शरीर के स्पर्श से उष्णता को अनुभव करता है । यही जठराग्नि रुपी परमात्मा का दर्शन है। यही ज्ञान है। दोनों कानों को अँगूठे से बंद करके मनुष्य जो गर्जन व निनाद अथवा अग्नि के जलने की ध्वनि सुनता है, वह शरीर के भीतर उत्पन्न ध्वनि साक्षात् ब्रह्म के शब्द ही हैं। इस प्रकार मनुष्य आत्म साक्षात्कार करते हुए परमात्मा की उपासना करे। यही वेद है, यही वेदों के उपदेश हैं जो ब्रह्म की निश्चितता को सिद्ध करते हैं।  
॥ इति त्रयोदशः खण्डः ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक द्वादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

Mon, 05/12/2014 - 07:37
छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक द्वादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)
                 ॥ द्वादश खण्ड॥


गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री
वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ ३. १२. १ ॥
इस जगत में जो कुछ भी है, निश्चय ही सब गायत्री अर्थात परब्रह्म ही है । वाणी से गायत्री का गान वास्तव में परमात्मा (परमात्मा के भूत, पृथ्वी, शरीर और ह्रदय ये चार पाद होते हैं) के नाम का ही उच्चारण मात्र है और यही गान परमात्मा के प्रथम पाद भूत के रूप में समस्त भूतों-प्राणियों की रक्षा करता है ।

या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्याँ हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ॥ ३. १२. २ ॥गायत्री रुपी परब्रह्म नारायण पृथ्वी के रूप में सबका पालन करते हैं। पृथ्वी ब्रह्म स्वरुप होने से ही सभी भूतों और प्राणिमात्र को धारण करने की क्षमता रख पाती है। इसीलिए परमात्मा के द्वितीय पाद ब्रह्मरूप इस पृथ्वी को कोई भी प्राणी लाँघ नहीं पाता। 

या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे
शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव
नातिशीयन्ते ॥ ३. १२. ३
परब्रह्म पृथ्वी पर धारित जो शरीर है वह परमात्मा का तृतीय पाद है, प्राण इसी में अवस्थित रहते हैं और इस शरीर का अतिक्रमण कभी नहीं करते ।
यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः
पुरुषे हृदयम् अस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव
नातिशीयन्ते ॥ ३. १२. ४ ॥

यही वह शरीर परमात्मा का तृतीय पाद है जिसके भीतर का ह्रदय परमात्मा का चौथा पाद है जिसमें प्राण सहित समस्त इन्द्रियाँ(प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय ये दस प्राण अथवा श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना, त्वचा, वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन्द्रियाँ )  स्थित हैं और ये सभी ब्रह्मरुपी ह्रदय को छोड़कर नहीं रह सकते हैं ।
सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तम्
॥ ३. १२. ५ ॥

इस चार चरण वाले परब्रह्म नारायण रुपी गायत्री के छः-छः अक्षरों का एक-एक पाद है और कुल चौबीस अक्षर हैं । यह षडविधा गायत्री कही गई है। (गानकर्मत्व, त्राणकर्मत्व, सर्वभूतप्रतिष्ठात्व, सर्वभूतनतिवर्तव्य, सर्वप्राणिप्राणप्रतिष्ठात्व तथा सर्वप्राणानतिवर्तव्य ये छः इसके लक्षण व मन्त्र, वाणी, पृथ्वी, शरीर, प्राण और ह्रदय इसके छः स्थान कहे गए हैं )  

तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ३. १२. ६ ॥

जो महिमा कही गई है वह इस ब्रह्म रुपी गायत्री की है क्योंकि उपासक इतना ही वर्णन कर सकता है और यही उसकी कुल क्षमता है जबकि अनंत ब्रह्माण्डनायक श्री परब्रह्म नारायण की महिमा तो अनंत ही है और समस्त सृष्टि का सारा ज्ञान तो प्रभु की महिमा का एक पाद ही है और बाकी तीन पाद तो परब्रह्म का सदा प्रकाशित रहने वाला लोक है अतः जो वर्णन किया जा सके वह तो एक छोटे तिनके जैसा अंश मात्र है ।
 
यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योयं बहिर्धा
पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ३. १२. ७ ॥
यही परब्रह्म नारायण हैं, ऐसा विश्वास करके परमात्मा के बाहर का प्रकाशमय लोक आकाश के समान है ऐसा विचार करना चाहिए ।  

अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष अकाशो यो वै सोऽन्तः
पुरुष आकाशः ॥ ३. १२. ८ ॥
शरीर के बाहर का जो प्रकाशमय आकाश है वही शरीर के भीतर का भी प्रकाशमय आकाश ही है । 

अयं वाव स योऽयन्तर्हृदय आकाश: ।  तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति
पूर्णमप्रवर्तिनीँ श्रियं लभते य एवं वेद ॥ ३. १२. ९ ॥


शरीर के भीतर का यह आकाश परमात्मा की कृपा से ह्रदय के भीतर होता है ।यह आकाश  ही ब्रह्म है । यह सर्वत्र, स्थिर, निरंतर, परम, परिपूर्ण, अप्रवर्तित और अपरिच्छिन्न है। वेद कहता है कि ऐसा जानने वाला उपासक सर्वदा के मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।      

                     ॥ इति द्वादश खण्ड ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक एकादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)

Wed, 04/16/2014 - 07:33
छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक एकादश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित)                 ॥ एकादश खण्ड ॥
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव
मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ ३. ११. १ ॥
इससे भी अधिक ऊपर अर्थात कल्प ( ब्रह्मा का एक दिन- मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के चौसठवें से तिहत्तरवें श्लोक में इस सम्बन्ध में कहा गया है कि कलियुग के 432000, द्वापर के 864000, त्रेता के 1296000 तथा सतयुग के 1728000 वर्ष को मिलकर कुल एक दिव्य-युग होता है और ऐसे हजार दिव्य-युगों को जोड़कर कुल ४३२००००००० चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों का ब्रह्मा का एक दिन  और इतनी ही बड़ी एक रात्रि होती है) की समाप्ति के बाद प्राणिमात्र के उदय या अस्त होने की या ऐसा कहें कि जन्म और मृत्यु की स्थिति समाप्त हो जाती है और गम-आगम से प्राणी मुक्त हो जाता है, अमर हो जाता है और भगवान के चरणों में सदैव निवास करता है । उस सम्बन्ध में यह श्लोक मात्र है ।
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन ।
देवास्तेनाहँसत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ ३. ११. २
उस आदित्य मुक्त समय में सदा ही परमात्मा का प्रकाश होता है तथा उदय-अस्त या सुख-दुःख जैसा कोई भी द्वन्द्व नहीं होता ।  ब्रह्म के इस प्रकार का वर्णन करते समय मुझसे सत्य के अतिरिक्त कुछ भी विरोध स्वरुप भाषा न निकले ।  
न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै
भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३. ११. ३ ॥जो उपासक इस ब्रह्म विद्या को जान लेता है वह भी सदा ही ऐसे प्रकाश में निवास करता है जहाँ हमेशा ही दिन है और वह वहाँ निरंतर ब्रह्म के साथ साक्षात्कार करता है।  

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे
मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय
पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ३. ११. ४ ॥
सर्वप्रथम इस रहस्य को ब्रह्मा ने सृष्टि और प्रजा की रक्षा के लिए प्रजापति को बतलाया था, तदन्तर यह मनु और उनकी प्रजा राजा इक्ष्वाकु आदि से होते हुए अरुण ऋषि और उनके पुत्र उद्दालक आरुणि तक प्राप्त हुआ ।   
इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म
प्रब्रूयात्प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ३. ११. ५ ॥
अतः इस ब्रह्म विद्या ( तृतीय प्रपाठक के प्रथम से एकादश खण्ड तक यह ब्रह्मोपनिषद) का रहस्य पिता को अपने ज्येष्ठ पुत्र को अथवा प्राण-तुल्य अपने शिष्य को उपदेश करना चाहिए।
नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां
धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव
ततो भूय इति ॥ ३. ११. ६ ॥
यदि समुद्र से घिरी और समस्त धन-धान्य और भोगों से संपन्न इस सारी पृथ्वी भी कोई देवे तब भी उपासक को इस विद्या को अपने पुत्र और शिष्य के अतिरिक्त किसी को नहीं देना चाहिए क्योंकि यह रहस्य अधिक मूल्यवान है।   

॥ इति एकादश खण्ड ॥

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छान्दोग्योपनिषद ( तृतीय प्रपाठक: दशम खण्ड के हिंदी भावार्थ सहित)

Thu, 03/06/2014 - 12:34
॥ दशम खण्ड ॥


अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. १०. १ ॥
आदित्य के मध्य का कंपन सा प्रभाव ही पाँचवा अमृत है जिसका  बारह साध्य देव (अनुमन्ता, प्राण, नर, वीर्य्य यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु ये बारह साध्य देव है जो दक्षपुत्री और धर्म की पत्नी साध्या से उत्पन्न हुए है) ब्रह्मा के चतुर्मुख मुख से पान करते हैं और सदा तृप्त रहते हैं। इसकी उपासना से उपासक को साक्षात् परब्रह्म नारायण की प्राप्ति हो जाती है । 
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. १०. २ ॥
ये सभी बारह साध्य देव इस पाँचवे अमृत के उद्देश्य की प्राप्ति से निरंतर उत्साहित होते रहते है ।
स य एतदेवममृतं वेदसाध्यानामेवैको भूत्वा
ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. १०. ३ ॥
जो उपासक इस कंपन रुपी पाँचवे अमृत को जान लेता है और प्राप्त कर लेता है वह पूर्ण तृप्त हो जाता है ।

स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता
द्विस्तावदूर्ध्वं उदेतार्वागस्तमेता साध्यानामेव
तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. १०. ४
वह उपासक सूर्य के समस्त दिशाओं में उदय और अस्त होने के सम्पूर्ण काल से भी दुगने समय तक के लिए बारह साध्य देवों के आधिपत्य और स्वाराज्य को प्राप्त करेगा ।

॥ इति दशम खण्ड ॥

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सामवेदीय उपाकर्म में प्रातः संध्या पाठ

Fri, 02/14/2014 - 13:52
सामवेदीय उपाकर्म     प्रातःसन्ध्या                              तत्र सव्यहस्ते कुशत्रयं दक्षिणहस्ते कुशद्वयं धृत्वा आचम्य- “मम् उपात्तदुरितक्षयार्थं ब्रह्मवर्चसतेजकामार्थं प्रातः सन्ध्योपासनमहं करिष्ये” इति संकल्प्य, दक्षिणहस्तेन जलामादय, प्रदक्षिणं परितः सिंञ्चनात्मरक्षां कुर्यात्।  ततः ऋष्यादीन् संस्मृत्य मार्जनं कुर्यात् । ॐकारस्यब्रह्मा ऋषिः दैवी गायत्री छन्दः अग्निर्देवता सर्व कर्मारम्भे विनियोगः। व्यहृतीनां विश्वामित्र-जमदग्नि-भरद्वाजा गायत्र्युषि्णगनुष्टुवग्निवायुसूर्याः, तत्सवितुर्विश्वामित्रो गायत्री सविता, आपोहिष्ठेति तिसृणां सिन्धुद्वीपो गायत्र्यायः मार्जने विनियोगः। ततो दक्षिणहस्ते कुशत्रयमादाय, जलाशयस्थं स्थले पात्रस्थं वामहस्तस्थं वा कुशाग्रैर्ज्जलमादाय, मार्जनं कुर्यात्।                          ॐभूर्भुवःस्वःतत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।                         ॐ आपो हि ष्ठा मयो भुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयते हनः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरङ्गमामवो। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः।     एभिर्मन्त्रैःशिरसि मार्जनं कृत्वा ध्यानावाहने कुर्यात्।              पूर्व सन्ध्या तु गायत्री रक्तांगी रक्तवाससा ।              अक्षसूत्रधरा देवी कमण्डलुसमन्विता ॥              हंसस्कंधसमारूढा तथा च ब्रह्म देवता ।              कुमारी ऋग्वेदमुखी ब्रह्मणा सह आवह ॥              आयाहि वरदे देवी त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनी ।              गायत्रि च्छन्दसां मातर्ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते ॥                               ततः प्राणायामः। भूरादीनां विश्वामित्र-जमदग्नि-भरद्वाज गौतमाऽत्रिवसिष्ठ-कश्यपाः ऋषयः, गायत्र्युषि्णगनुष्टुप्-वृहती-पंक्ति-त्रिष्टुब्-जगत्योऽग्निवायु-सूर्य-बृहस्पतिवरुणेन्द्र विश्वेदेवाः, तत्सवितुर्विश्वामित्रो गायत्री सविता, आपो ज्योतिः प्रजापतिर्यजुर्ब्रह्माग्निवायुसूर्याः प्राणायामे विनियोगः।                            ततोऽअँगुष्ठतर्जनीभ्यां नासापुटद्वयं धृत्वा, मुखनासासंञ्चारिणंवायु निरुन्ध्य, मनसा भूरादि जपन्प्राणायामं कुर्यात् ।                            ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यं ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो योनः प्रचोदयात । ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूऽर्भुवः स्वरोम् ।                            एवं त्रिरावृत्या एकः प्राणायामः । इत्थं प्राणायाम त्रयं कृत्वा आचमनं कुर्यात ।                            सूर्यश्चेति नारायण ऋषिः प्रकृति छन्दः सूर्यो देवता आचमने विनियोगः । ततो हस्ते जलमादाय ।                            ‘ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यद्रात्र्या पापमकारिषं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्या मुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा”। इति मन्त्रेणाचम्य तूष्णीं द्विराचामेत् ।                            ततोऽञ्जलीमक्षेपः। हस्तेनैकेन जलमादाय, ऋतंञ्चेघमर्षणोंऽनुष्टुब्भाववृतः  अश्वमेधावभृथे  विनियोगः ।               ॐ ऋतञ्च सत्यंचा भीद्धात्तपसोऽध्यजायत ।              ततो रात्र्थजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥              समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायतः ।             अहोरात्राणिविदधद्विश्वस्य भिषतो वशी ॥                            इमं मन्त्रमायतासुः सकृदनायतासुर्वा त्रिःपठित्वा, जलं प्रक्षिप्योत्थाय, हस्ताभ्यां जलामादाय, सप्रणवव्याहृतिकां गायत्रीमुञ्चार्य सूर्याभिमुखोऽञ्जलित्रयं प्रक्षिपेत् ।                           ततः प्रदक्षिणमवृत्त्याचम्य, स्वस्तिका कृतिकृतहस्तः सूर्यमुपतिष्ठेत् । उदुत्यं प्रस्कण्वो गायत्री सूर्यः,चित्रङ्कुत्सस्त्रिष्टुप् सूर्यः उपस्थाने विनियोगः ।                           ॐ उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यंम्॥ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याऽग्नेः। आप्राद्यावा पृथिवी अंतरिक्ष ग्वं सूर्यं आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥                          ततः प्रणवव्याहृति गायत्रीणामृष्यादिन्पूर्ववत्स्मृत्वा ‘जपे विनियोगः’ इत्युक्त्वा, करमालया नाभौ उत्तानघृतकरो मौनी प्रणवव्याहृति युतां गायत्रीमष्टोत्तरशतमष्टाविंशति वा सजप्य संकल्पं कुर्यात्। ‘अनेन गायत्र्यामत्कृतेन जाप्येन ब्रह्मात्मा रविः प्रीयताम् नममः’। ततः-              उत्तर शिखरे जाता भूम्यां पर्वतवासिनी ।               ब्रह्मणा समनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् ॥               इति विसृज्य द्विराचामेत् ॥ 
                         ॥  इति प्रातःसन्ध्या ॥ 
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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक, अष्टम एवँ नवम् खण्ड के हिंदी भावार्थ सहित )

Mon, 02/03/2014 - 08:39
              ॥ अष्टम खण्ड ॥
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. ८. १ ॥
                  सूर्य के कृष्ण स्वरूपी तीसरे अमृत को बारह आदित्य देवता  (महाभारत के अनुसार धाता, मित्र, अयमा, शक्र,अरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा, और वामन भगवान यह बारह आदित्य देव हैं ) अपने वरुण मुख से पीकर जीवन धारण करते है। निश्चित ही वे सभी आदित्य देव न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है और समस्त ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं।
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ८. २ ॥
                  वे बारह आदित्य इस कृष्ण अमृत के अनुभव मात्र से ही उदासीनता और उत्साह का अनुभव कर सकते हैं ।
स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ८. ३
                     इसी प्रकार परब्रह्म नारायण का जो उपासक एकाग्रचित्त होकर अपने वरुण मुख से सूर्य के इस कृष्ण रूपी अमृत को जान लेता है वह स्वयं भी आदित्य स्वरूप हो जाता है पूर्ण रूप से तृप्तता को प्राप्त करके सम्पन्नता, यश, ऐश्वर्य और उत्साह का अनुभव करता रहता है ।  

स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता
द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेतादित्यानामेव
तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ८. ४
                     इस प्रकार वह उपासक भी रुद्रों से भी दुगने समय तक आदित्यों के स्वराज्य और अधिपत्य को पाकर परम आनन्द प्राप्त करता रहेगा ।   
                    ॥ इति अष्टम खण्ड ॥


           ॥ नवम खण्ड ॥

अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. ९. १ ॥

                  सूर्य के उत्कृष्ट कृष्ण (अतिशय कृष्ण) स्वरूपी चौथे अमृत को चन्द्रमुख से उनचास मरुत देवता  (वायुपुराण  के अनुसार सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यक् ज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित, सत्यजित, सुषेणा, सेन जित, सत्यमित, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधाराय, ध्वन्ति, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक, अन्यादृक, यादृक, प्रतिकृत, ऋ क्, समिति, संरम्भ, ईदृक्ष, पुरुष, अन्यादृक्ष, चेतस, समिता, सर्मिदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मारुती, सरत, देव, दिश, यजुः, अनुद्रुक, साम, मानुष, और विश्       यह उनचास मरुत देवता हैं ) अपने वरुण मुख से पीकर जीवन धारण करते है। निश्चित ही वे सभी आदित्य देव न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है और समस्त ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं।
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ९. २ ॥



ये सभी मरुत देव इस अति कृष्ण रूप के अमृत को अनुभव करने के उद्देश्य से निरंतर उत्साहित होते है ।
स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ९. ३
जो उपासक इस अमृत को जान लेता है और प्राप्त कर लेता है वह पूर्ण तृप्त हो जाता है । 

स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता
द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव
तावदाधिपत्य्ँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ९. ४ ॥



वह उपासक जब तक आदित्य उदय और अस्त होते रहेंगें उससे भी दुगुने काल तक के लिए मरुतों के आधिपत्य और स्वाराज्य को प्राप्त करेगा । 




॥ इति नवमः खण्डः ॥
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श्री महागणेश ढुण्डीराज स्तोत्रम्

Sun, 02/02/2014 - 14:29

श्री महागणेश ढुण्डीराज स्तोत्रम् ढुण्डीराजः प्रियः पुत्रो, भवान्यः शंकरस्य च ।तस्य पूजन मात्रेण, त्रयोऽपि वरदाः सदा ॥स्त्रवन्मद घटा सक्त संगुञ्जलि संकुलः ।लसात्सिन्दूर पूरोऽसौ, जयति श्रीगणाधिपः॥गृहमेध्यत्र विश्वेशो, भवानी तत्कुटुम्बिनी ।सर्वेभ्यः काशीसंस्थेभ्यो,मोक्ष भिक्षां प्रयच्छति ॥शान्ति कन्थाल सत्कण्ठो, मनःस्थाली मिलत्करः।त्रिपुरारी पुराद्वारि, कदस्यां मोक्ष भिक्षुकः ॥   ॥  श्रीमहागणेश ढुण्डीराज स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥      
श्रीमहागणेश ढुण्डीराज स्तोत्र का भावानुवाद जिसपर काशी की स्थानीय भाषा में स्तुति और भजन किया जाता है।स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में इसका वर्णन आता है।(पारवती सिव के अति पियारे, ढुण्डीराज जुवराज दुलारे ।तिन्हके पूजन से सन्तोषै, तीनहु देत वरहि नित पोषै ।स्त्रवत दान जल लोभ परि, गूँजत भँवर समूह ।सेंधुर पूरित तन जयति, गज नायक गजमूँह ।  इह गृहस्थ विस्वेस हैं,धरनी मातु भवानी ।कासीवासि सब लोग हित, भुक्ति भीख की दानि ।सांतिरूप कथरी को ओढौं, अथवा कंठ लपेटौ ।मन सरूप बटलोही भीतर, कबहूँ न हाथ समेटौ ।श्रीत्रिपुरारी राज की नगरी, फाटक ऊपर जैहों ।
कब धौ भीख मुक्ति की पैहों, भिच्छुक रूप बनैहों ।)
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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक, षष्ठ खण्ड एवं सप्तम खण्ड का हिन्दी भावार्थ सहित)

Thu, 01/02/2014 - 09:50

                       ॥ षष्ठ खण्ड ॥
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै
देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा
तृप्यन्ति ॥ ३. ६. १ ॥
                 वेद रूपी इस प्रथम अमृत( लोहित, शुक्ल, कृष्ण, अतिकृष्ण और कंपन ये पाँच अमृत कहे गए है। ) का समस्त अष्टवसु ( धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल,प्रत्यूष और प्रभाष ये आठ वसु हैं ) अपने अग्नि मुख से पान करके जीवन धारण करते हैं । निश्चित ही देवता न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है । त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ६. २ ॥              वे इस अमृत के अनुभव मात्र से ही आवश्यकतानुसार उदासीनता और उत्साह का अनुभव कर सकते हैं ।
स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ६. ३
              इसी प्रकार जो उपासक एकाग्रचित्त होकर अपने मुख से इस अमृत का पान कर लेता है वह स्वयं भी वसुरूप हो जाता है पूर्ण रूप से तृप्तता को प्राप्त करके उत्साह का अनुभव करता रहता है ।   
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता
वसूनामेव तावदाधिपत्य ग्वं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ६. ४ ॥
            इस प्रकार वह उपासक भी वसुओं के समान ही स्वराज्य और अधिपत्य को पाकर परम आनन्द प्राप्त करता रहेगा, जब तक सूर्य पूर्व दिशा से उदय होता रहेगा और पश्चिम से अस्त होता रहेगा ।  

                ॥ इति षष्ठ खण्ड ॥
                ॥ सप्तम खण्ड ॥
अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण
मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३. ७. १ ॥
                   सूर्य के शुक्ल रूपी दूसरे अमृत को ग्यारह रूद्र ( मृगव्याध, सर्प, निऋति, अजैकपाद, अहिर्बुधन्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु और भग यह ग्यारह रूद्र हैं ) अपने इंद्र मुख से पीकर जीवन धारण करते है। निश्चित ही वे सभी रूद्रदेव न तो भोजन को खाते हैं और न जल पीते हैं पर इस परम अमृत के साक्षात्कार से ही तृप्त हो जाते है और समस्त ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं।

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ ३. ७. २ ॥

              वे इस शुक्ल अमृत के अनुभव मात्र से ही आवश्यकतानुसार उदासीनता और उत्साह का अनुभव कर सकते हैं । 

स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव
रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३. ७. ३ ॥


इसी प्रकार जो उपासक एकाग्रचित्त होकर अपने मुख से सूर्य के इस शुक्ल रूप अमृत को जान लेता है वह स्वयं भी रूद्र रूप हो जाता है पूर्ण रूप से तृप्तता को प्राप्त करके सम्पन्नता,ऐश्वर्य और उत्साह का अनुभव करता रहता है । 
 
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता
द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव
तावदाधिपत्य ग्वं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ३. ७. ४ ॥


                इस प्रकार वह उपासक भी रुद्रों के समान ही स्वराज्य और अधिपत्य को पाकर परम आनन्द प्राप्त करता रहेगा, जब तक सूर्य पूर्व दिशा से उदय होता रहेगा और पश्चिम से अस्त होता रहेगा ।  

                      ॥ इति सप्तम खण्ड ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक, चतुर्थ खण्ड एवं पञ्चम खण्ड का हिन्दी भावार्थ सहित)

Fri, 12/27/2013 - 10:09
         चतुर्थ खण्ड
अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो
मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत
इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥ ३. ४. १ ॥
   इसकी उत्तर की किरणें ही उत्तर की मधुनाड़ियाँ हैं, अथर्ववेद भ्रमर और इतिहास-पुराण इसके पुष्प के समान है।  ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपूराणमभ्यतपँ
स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियां
वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ ३. ४. २    अथर्व वेद के मन्त्र इन्ही इतिहास और पुराण रुपी भ्रमर के अमृत रस का चूषण करते हैं। इनके अभितप्त होने से ही यश, तेज, ऐश्वर्य, इन्द्रियों की शक्ति, वीर्य और अन्नरुपी रस उत्पन्न होता है। 
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा
एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णँरूपम् ॥ ३. ४. ३
   यही रस निर्झर होकर आदित्य के चारों ओर एकत्रित हो गया है। यही सूर्यनारायण का कृष्ण स्वरुप है जिनकी हम सब उपासना करते हैं। 

॥ इति चतुर्थ खण्ड ॥


                       पञ्चम खण्ड
अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा
मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव
पुष्पं ता अमृता आपः ॥ ३. ५. १ ॥


             आदित्य से उर्ध्व जाने वाली रश्मियाँ इसकी उर्ध दिशा की मधुनाड़ियाँ हैं। परम गुह्य मंत्रो के उपदेश ही मधु का उपार्जन करते हैं और ब्रह्म रुपी पुष्प से अमृत रस की वर्षा करते है।  

ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपँ
स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ ३. ५. २ ॥


         इन्ही मन्त्रों के उपदेशों से जब परमेश्वर की तपस्या की गई तो उस परब्रह्म की उपासना से से यश और ऐश्वर्य के साथ-साथ अन्न भी उत्पन्न हुआ। 

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा
एतद्यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३. ५. ३ ॥


               यही खाद्य था जिससे तेज और शक्ति रुपी रस प्राप्त हुआ जो सूर्य के सब ओर फ़ैल गया। यह सूर्य के मध्य में भी चक्र की भांति दिखलाई पड़ता है।
 
ते वा एते रसानाँरसा वेदा हि रसास्तेषामेते
रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा
ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ३. ५. ४ ॥


                    यह सब ( तेज, यश, ऐश्वर्य,शक्ति, ज्ञान, अन्न आदि) रसों के भी सूक्ष्म रस है जो वेद रुपी परम रस से ही उत्पन्न हुए हैं। यही अमृतों के भी अमृत है। वेद मन्त्रों कि ऋचाओं से आराधना करने पर ही इस अमृत का पान किया जाना संभव है।

॥ इति पञ्चम खण्ड ॥

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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक का तृतीय खण्ड हिन्दी भावार्थ सहित)

Fri, 11/15/2013 - 08:00
              ॥ तृतीय खण्ड ॥

अथ येऽस्य प्रत्यंञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो
मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं
ता अमृता आपः ॥ ३. ३. १ ॥
     सूर्य के पश्चिम दिशा से आती हुई किरणें इसकी पश्चिम की मधु नाड़ियाँ हैं ।
तानि वा एतानि सामान्येतँ सामवेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ ३. ३. २ ॥
    सामवेद के मंत्र भ्रमर और साक्षात् सामवेद पुष्प है। जब साम के स्रोतों से सामवेद को तपाया जाता है तो उससे ही रस,यश,तेज,ऐश्वर्य, शक्ति और अन्नादि उत्पन्न होते हैं। 
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा
एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्णँरूपम् ॥ ३. ३. ३ ॥
    यही रस जो आदित्य नाम रुपी भगवान के चारों ओर एकत्रित हुआ है वह ही भगवान का कृष्ण स्वरुप है। 

॥ इति तृतीय खण्ड ॥






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छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक द्वितीय खण्ड हिन्दी भावार्थ सहित)

Tue, 10/22/2013 - 07:40
                        द्वितीय खण्ड
अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा
मधुनाड्यो यजूँष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं
ता अमृत आपः ॥ ३. २. १ ॥
इस प्रकार आदित्य की दक्षिण दिशा की रश्मियाँ ही दक्षिण की मधु नाड़ियाँ हैं । यजुर्वेद के मन्त्र ही मधु उत्पन्न करने वाली मधुमक्खियाँ, स्वयं यजुर्वेद ही पल्लवित पुष्प और यही अमृत है ।
तानि वा एतानि यजूँष्येतं
यजुर्वेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यँरसोजायत ॥ ३. २. २ ॥
यजुर्वेद के इन्ही मन्त्रों से तप करके यश, तेज और रस की उत्पत्ति हुई।
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा
एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लँ रूपम् ॥ ३. २. ३
यह रस ही आदित्य के चारों ओर उपस्थित है जो सूर्य का शुक्ल रूप है।

      इति द्वितीय खण्ड



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छान्दोग्योपनिषद तृतीय प्रपाठक (हिंदी भावार्थ सहित)

Mon, 10/14/2013 - 12:10
छान्दोग्योपनिषद तृतीय प्रपाठक (हिंदी भावार्थ सहित)

              प्रथम खण्ड


ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव
तिरश्चीनवँशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ ३. १. १ ॥भगवान के आदित्य नाम की भक्ति करनी चाहिए जो देवों के मधु के समान है। इसका द्यौ लोक और आदित्य लोक ही तिर्यक-वंश है जहाँ इस मधु का छत्ता लगता है । अंतरिक्ष रूपी मधुकोश में ही उसकी किरणे मधु के संचय का कार्य करती हैं।

तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः ।
ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता
आपस्ता वा एता ऋचः ॥ ३. १. २ उस आदित्य की प्राची दिशा की किरणे पूर्व दिशा की मधु नाड़ियाँ हैं। ऋचाएँ मधु उत्पन्न करने वाली मधु मक्खियाँ और ऋग्वेद सुगंधित पल्लव युक्त पुष्प हैं। इसके स्तोत्र ही अमृत रस हैं।

एतमृग्वेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज
इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ ३. १. ३ ॥इस ऋग्वेद रुपी पुष्प को तप कर उसके स्तोत्रों का गान करके ही हमें यश, तेज, ऐश्वर्य, इन्द्रियों रुपी शक्ति और अन्न प्राप्त हुआ।

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा
एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितँरूपम् ॥ ३. १. ४ यह बहता हुआ रस आदित्य को चारों ओर से आच्छादित करके रक्त स्वरुप प्रदान करता है अर्थात भगवान से निकल कर यह रस सूर्य में समाविष्ट हो गया है। 

                    इति प्रथम खण्ड

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छान्दोग्योपनिषद् (द्वितीय प्रपाठक, द्वादश खण्ड से चतुर्विंश खण्ड सम्पूर्ण) हिंदी भावार्थ सहित

Mon, 09/16/2013 - 20:02
                               त्रयोदश खण्ड


उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ २. १३. १

स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते
सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २. १३. २ ॥स्त्री तथा पुरुष के परस्पर संसर्ग का प्रतिक्षण भी हिंकार, प्रस्ताव व उद्-गीथ रुपी वामदेव्य साम ही है। इन्हें पति व पत्निव्रत धारण करना चाहिए।   ऐसे वामदेव्य साम को जानने वाले सद्-गृहस्थ को वेद मिथुन कहा जाता है। ऐसे दम्पति का आपस में वियोग नहीं होता, अर्थात वे विधुर या विधवा नहीं होते। विवाहित से ही उत्पन्न होते हैं, दीर्घायु होते हैं और महान कीर्तिवान होते हैं। इनके लिए परस्त्री पर कुदृष्टि न डालना तथा किसी भी प्रकार के व्यभिचार से दूर रहना ही व्रत है।         चतुर्दश खण्ड
उद्यन्हिंकार उदितः प्रस्तावो मध्यंदिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद्बृहदादित्ये प्रोतम् ॥ २. १४. १ ॥

स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १४. २ ॥
    सूर्योदय के पूर्व का उषाकाल हिंकार, उदित सूर्य प्रस्ताव, मध्यान्ह ही उद्-गीथ, इसके बाद का प्रहर प्रतिहार तथा सूर्य का अस्ताचल को जाना ही निधन है। यह वृहद्-आदित्य साम है । जो इसे इस प्रकार से जान लेता है, परम तेजस्वी तथा अन्नवान होता है। अपनी पूर्ण आयु भोगता है, महान प्रज्ञावान, पशुवान और र्कीर्तिवान होता है।  परम तेज वाले सूर्य की उपेक्षा और निंदा न करना ही उसका व्रत है।          पञ्चदश खण्ड


अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम्
॥ २. १५. १ ॥

स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपँश्चपशूनवरुन्धे
सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १५. २ ॥

इधर-उधर विचरते छोटे-छोटे बादलों का समूह हिंकार, मेघ बनकर घुमड़ना प्रस्ताव, वर्षा ही उद्-गीथ, विद्युत का गर्जन व चमकना प्रतिहार तथा वर्षा की समाप्ति निधन है । वेदों में गाया जाने वाला यह वैरूप साम है । जो इसको जान लेता है, अत्यंत सुरूप पशुवान होता है। अपनी सम्पूर्ण आयु भोगता है, महान प्रज्ञावान और र्कीर्तिवान होता है।  बरसते मेघों की निंदा न करना ही उसका व्रत है।    षोडश खण्ड

वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम् ॥ २. १६. १

स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति
ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यर्तून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १६. २


 वसंत ऋतु हिंकार, ग्रीष्म प्रस्ताव, वर्षा उद्-गीथ, शरद प्रतिहार तथा हेमंत ऋतु ही निधन है ऐसा ऋतुओं का वैराज साम कहता है। वेदों में ऋतुओं के साम को वैराज साम कहा गया है। जो इसको जान लेता है, प्रजा, पशु एवं ब्रह्मतेज से युक्त होकर अपनी सम्पूर्ण आयु जीता है, महान प्रज्ञावान और र्कीर्तिवान होता है।  प्रत्येक ऋतु में भगवान की ही महिमा को जानना और किसी भी ऋतुओं की निंदा न करना ही उसका व्रत है।   सप्तदश खण्ड

पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो
लोकेषु प्रोताः ॥ २. १७. १ ॥

स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १७. २


यह पृथ्वी हिंकार, अंतरिक्ष प्रस्ताव, द्युलोक उद्गीथ, दिशाएँ प्रतिहार तथा समुद्र निधन है ।यह शक्वरी साम के नाम से जान कर सम्पूर्ण प्रकृति को साम स्वरुप समझने वाला भगवान के परम लोक को प्राप्त करता है।  किसी भी लोक की निन्दा न करना ही उसका व्रत है।  
              
       अष्टादश खण्ड
अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः ॥ २. १८. १ ॥

स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान्भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति
महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १८. २ ॥

 बकरी हिंकार, भेड़ प्रस्ताव, गायें उद्-गीथ, घोड़े प्रतिहार तथा पुरुष निधन हैं। यह रेवती साम है। उसे नाना प्रकार की योनियों में भगवान के दर्शन करने चाहिए और पशुओं की निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए।          एकोनविंश खण्ड

लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो माँसमुद्गीथोस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु
प्रोतम् ॥ २. १९. १ ॥

स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥ २. १९. २ ॥लोम हिंकार, त्वचा प्रस्ताव, मांस उद्-गीथ, अस्थि प्रतिहार तथा मज्जा निधन हैं। यह यज्ञा-यज्ञीय साम के रूप में मनुष्य के शरीर के सभी अंगों में ओत-प्रोत है। यह मात्र भगवान की महिमा के कारण ही संभव है ऐसा समझना चाहिए। यह यज्ञा-यज्ञीय साम जानने वाला कभी किसी अंगों से कुरूप नहीं होता है।   माँस–मज्जा न खाना ही उसका व्रत है।  
विंश खण्ड

अग्निर्हिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं
देवतासु प्रोतम् ॥ २. २०. १ ॥

स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाँसलोकताँसर्ष्टिताँसायुज्यं गच्छति
सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. २०. २ ॥अग्नि हिंकार, वायु प्रस्ताव, सूर्य उद्-गीथ, नक्षत्र प्रतिहार तथा चन्द्र निधन हैं।इस राजन नाम के साम का उपासक सर्व सिद्धि-समृद्धि, देवलोक तथा भगवान का सायुज्य प्राप्त करता है। ब्राह्मणों की निन्दा न करना ही उसका व्रत है।  
एकविंश खण्ड

त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि
वयाँसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥ २. २१. १

स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्वँ ह भवति ॥ २. २१. २ ॥

तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणी-त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ २. २१. ३ ॥

यस्तद्वेद स वेद सर्वँ सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासित तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ २. २१. ४ ॥




क्रमशः................
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छान्दोग्योपनिषद् द्वितीय प्रपाठक

Wed, 08/07/2013 - 07:28
छान्दोग्योपनिषद्


द्वितीय प्रपाठक


प्रथम खण्ड



समस्तस्य खलु साम्न उपासनँ साधु यत्खलु साधु

तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ २. १. १ ॥

तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव

तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपगादित्येव तदाहुः ॥ २. १. २ ॥

अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव

तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ २. १. ३ ॥

स य एतदेवं विद्वानसाधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनँ

साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ २. १. ४ ॥




क्रमशः ..................
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छान्दोग्योपनिषद

Sat, 07/06/2013 - 09:22
छान्दोग्योपनिषद
छान्दोग्योपनिषद सामवेदीय उपनिषद के ताण्डय महाब्राह्मण का ही एक अंश है जिसमें ४० प्रपाठक हैं। प्रथम २५ प्रपाठक या अध्याय को पंचविश और अगले पांच को षड्विश ब्राह्मण कहते हैं । इसके साथ ८ प्रपाठक छान्दोग्योपनिषद और २ प्रपाठक मन्त्रब्राह्मण मिलाकर ४० अध्याय ही तांड य महाब्राह्मण कहा जाता है वेद के यही मन्त्र ‘छन्दस्’ कहे जाते हैं और पढने और गान करने वाले ब्राह्मण ‘छान्दोग’। इनमें सात प्रमुख छंद होते हैं-गायत्री, उणिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती । इनके भी ८ प्रकार हैं -  आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजपत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची और ब्राह्मी । इस प्रकार कुल ५६ भेद कहे जाते हैं । इसके पश्चात भी ७ अतिछंद, ७ विछंद आदि के साथ अनेक भेद हो जाते हैं । इन्ही की संहिता ग्रन्थ को छान्दोग्य कहा गया। ज्ञान के यही रहस्य जो गुरु के समीप रहकर प्राप्त किये गए हैं, उपनिषद कहलाये। इनमें वेदों का तत्व-सिद्धांत और सार है, यही वेदांत हैं ।   छान्दोग्योपनिषद जिसका मंगला चरण है-ॐ आप्यावान्तु ममांगानि वाक् प्राणश्चक्षु: श्रोत्रमथो बल मिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्व ब्रह्मौपनिषदम्। माहंब्रह्म निराकुर्याम्। मामा ब्रह्मनिराकरोद्। अनिराकरणं में अस्तु। अनिरा करणं में अस्तु।  तदात्मनि निरतेय उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: ! हे परब्रह्म परमेश्वर! मेरे सर्वांग, वाणी, चक्षु, कर्ण, बल और सभी इन्द्रियाँ पुष्टता प्राप्त करें । समस्त प्रकार का ब्रह्म ज्ञान इन उपनिषदों में ही है । मैं उस ब्रह्म की, ब्रह्मज्ञान की उपेक्षा कदापि न करूँ। जिससे मेरी उपेक्षा न हो । हे ब्रह्म! मेरी उपेक्षा न हो । जब मेरी आत्मा शांत हो जावे तो वे सभी धर्म मुझमें आ जावें जो सब उपनिषदों में वर्णित हैं। वे सभी धर्म मुझमें ही निवास करें। मेरे सभी शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक दुःख दूर हो जावें और मुझे त्रिविध शांति प्राप्त हो जावे।    

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उपनिषद्

Fri, 07/05/2013 - 07:31
पुरातन काल से ही भारतवर्ष पूरे विष का अध्यात्मिक और धार्मिक गुरु रहा है । अनेक देशों से लोग आते और यहाँ के मुनियों-महात्माओं से समस्त प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर अपने देशों में जाते और वहाँ इस ज्ञान का प्रचार करते थे। शिक्षा का माध्यम गुरुकुल हुआ करते थे। गांव-घर में हो या ज्ञानियों का जमावड़ा, चौपालें हों या राज दरबार, वन-उपवन, आश्रम, धर्मशालाएँ सभी जगहों पर वेदों की चर्चाएँ, उपनिषदों की कथाएँ, पुरानों की चर्चा और धर्म सम्बन्धी श्लोकों-स्तोत्रों का गायन होता था। यहाँ तक की वाद-विवाद तथा प्रतियोगिताओं का विषय भी वेद और धर्म ग्रन्थ ही हुआ करते थे। लोगों की आम बोल चल की भाषा भी संस्कृत ही थी अतः स्मृतियों-श्रुतियों पर आधारित पुस्तकें भी संस्कृत में ही लिखी व पढ़ी जाती थी। इससे लोगों को आत्मिक शान्ति तथा संतुष्टि का अनुभव होता था। संभवतया यही तो सतयुग था। भारत के यही धर्म ग्रन्थ असल मायने में बड़े ही गूढ़ और गंभीर विषयों का कोष हैं। पाश्चात्य सभ्यता के आगमन के साथ-साथ ही संस्कृत का प्रचलन कम होता चला गया और इन विषयों को अध्ययन की इच्छा रखने वालों के लिए भी संस्कृत को न समझने के कारण स्वाध्याय कठिन अवश्य हो गया है पर असंभव नहीं है। रूस, जर्मनी तथा ब्रिटेन के विद्वानों ने इन ग्रंथों को पढ़ने के लिए संस्कृत भाषा को अपनाया। इन्टरनेट के इस युग में सभी पुस्तकें लगभग प्रत्येक भाषा और रूपों में ढूँढने पर प्राप्त हो ही जाती हैं। वेदों के उपदेश एक ओर तो यज्ञ कर्मों के द्वारा समझे जाते हैं वहीँ दूसरी तरफ ब्रह्म ज्ञान के लिए

 वेदों का प्रतिष्ठा भाग और ज्ञानमय सिद्धांत भी इसका सार है । यही ‘वेदांत’ है और यही वेदों का

 गूढ़ तत्व तथा रहस्य भी । यही उपनिषद हैं। इन्ही उपनिषदों पर चर्चा करें।
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श्रीराम षट्पदी स्तुति

Tue, 06/11/2013 - 10:31
श्रीराम षट्पदी स्तुति
तरणिकुलजलतरणे तरुणतरणितेजसा विभातरणे ।
कृतविदशदशमुखमुखतिमिरगणेऽन्तस्तमो नुद मे ॥ १॥

शयविधृतशरशरासन निखिलखलोज्जासनप्रथितसुयशाः ।
मथितहृदयान्तरालं दुष्कृतिजालं ममापनय ॥ २॥

सुरुचिरमरीचिनिचयांश्चरणनखेन्दूनुदाय मम हृदये ।
हृदयेश विकलतापं स्वसकलतापं किलापहर ॥ ३॥

इन्दीवरदलसुन्दर वरदलसद्वामजानकीजाने ।
जाने त्वामखिलेशं लेशलसल्लोकलोकेशम् ॥ ४॥

शं कुरु शङ्करवल्लभ यल्लभतामाश्वयं त्वदंघ्रियुगे ।
अनुरक्तिदृढां भक्तिं चिरस्य चिन्ताब्धिभवभक्तिम् ॥ ५॥

वैराजराजराजोऽप्यभूत्सुसाकेतराजनरराजः ।
वानरराजसहायो लीलाकैवल्यमेतद्धि ॥ ६॥

जगदसुसुतासुपरवसुमुदे यदेषा स्तुतिः कृता स्फीता ।
सा रामषट्पदीयं विलसतु तत्पादजलजाते ॥ ७॥

॥ इति श्रीमन्मालवीयशुक्ल श्रीमन्मथुरानाथप्रणीता रामषट्पदी ॥
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संकठानामाष्टकम्

Thu, 05/16/2013 - 09:03



संकठानामाष्टकम्
आनन्दकानने देवी संकठा नाम विश्रुता।वीरेश्वरोत्तरे भागे पूर्वं चन्द्रेश्वरस्य च    ॥१॥
शृणु नामाष्टकं तस्याः सर्वसिद्धिकरं नृणां ।संकठा प्रथमं नाम द्वितीयं विजया तथा ॥२॥
तृतीयं कामदा प्रोक्तं चतुर्थं दुःखहारिणी।शर्वाणी पञ्चमं नाम षष्ठं कार्त्यायनी तथा॥३॥
सप्तमं भीमनयना सर्वरोगहराष्टमंनामाष्टकमिदं पुण्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः
यः पठेत् पाठयेद्वापि नरो मुच्येत संकठा॥४॥
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हनुमत्कृत सीताराम स्तोत्रम्

Tue, 05/07/2013 - 08:31



         हनुमत्कृत सीताराम स्तोत्रम्

                    ॥ ध्यानम् ॥

मन्दाराकृति पुण्यधाम विलसत् वक्षस्थलं कोमलम्
शान्तं कान्तमहेन्द्रनील रुचिराभासं सहस्राननम् ।

वन्देहं रघुनन्दनं सुरपतिं कोदण्ड दीक्षागुरुं
रामं सर्वजगत् सुसेवितपदं सीतामनोवल्लभम् ॥

                  ॥ स्तोत्रम् ॥

अयोध्यापुरनेतारं मिथिलापुरनायिकाम् ।
राघवाणामलंकारं वैदेहानामलंक्रियाम् ॥१॥

रघूणां कुलदीपं च निमीनां कुलदीपिकाम् ।
सूर्यवंशसमुद्भूतं सोमवंशसमुद्भवाम् ॥२॥

पुत्रं दशरथस्याद्यं पुत्रीं जनकभूपतेः ।
वशिष्ठानुमताचारं शतानन्दमतानुगाम् ॥३॥

कौसल्यागर्भसंभूतं वेदिगर्भोदितां स्वयम् ।
पुण्डरीकविशालाक्षं स्फुरदिन्दीवरेक्षणाम् ॥४॥

चन्द्रकान्ताननांभोजं चन्द्रबिंबोपमाननाम् ।
मत्तमातङ्गगमनम् मत्तहंसवधूगताम् ॥५॥

चन्दनार्द्रभुजामध्यं कुंकुमार्द्रकुचस्थलीम् ।
चापालंकृतहस्ताब्जं पद्मालंकृतपाणिकाम् ॥६॥

शरणागतगोप्तारं प्रणिपादप्रसादिकाम् ।
कालमेघनिभं रामं कार्तस्वरसमप्रभाम् ॥७॥

दिव्यसिंहासनासीनं दिव्यस्रग्वस्त्रभूषणाम् ।
अनुक्षणं कटाक्षाभ्यां अन्योन्येक्षणकांक्षिणौ ॥८॥

अन्योन्यसदृशाकारौ त्रैलोक्यगृहदंपती।
इमौ युवां प्रणम्याहं भजाम्यद्य कृतार्थताम् ॥९॥

अनेन स्तौति यः स्तुत्यं रामं सीतां च भक्तितः ।
तस्य तौ तनुतां पुण्यास्संपदः सकलार्थदाः ॥१०॥

एवं श्रीराचन्द्रस्य जानक्याश्च विशेषतः ।
कृतं हनूमता पुण्यं स्तोत्रं सद्यो विमुक्तिदम् ।
यः पठेत्प्रातरुत्थाय सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥११॥

॥ इति हनुमत्कृतसीतारामस्तोत्रं संपूर्णम्॥


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जामदग्न्यकृतं श्रीशिवस्तोत्रं

Tue, 04/02/2013 - 10:46


जामदग्न्यकृतं श्रीशिवस्तोत्रं ईश त्वां स्तोतुमिच्छामि सर्वथा सतोतुमक्षमम् ।  अक्षराक्षरबीजं च किं वा स्तौमि निरीहकम् ॥१॥न योजनां कर्तुमीशो देवेशं स्तौमि मूढधीः।वेदा न शक्ता यं स्तोतुं कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥२॥बुद्धेर्वाग्मनसोः पारं सारात्सारं परात्परम् ।ज्ञानबुर्द्धेरसाध्यं च सिद्धं सिद्धैर्निषेवितम् ॥३॥यमाकाशमिवाद्यन्तमध्यहीनं तथाव्ययम् ।विश्वतन्त्रमतन्त्रं च स्वतन्त्रं तन्त्रबीजकम् ॥४॥ध्यानासाध्यं दुराराध्यमतिसाध्यं कृपानिधिम्।त्राहि मां करुणासिन्धो दीनबन्धोऽतिदीनकम् ॥५॥अद्य मे सफ़लं जन्म जीवितं च सुजीवितम् । स्वप्रादृष्टं च भक्तानां पश्यामि चक्षुषाधुना ॥६॥शक्रादयः सुरगणाः कलया यस्य सम्भवाः ।चराचराः कलांशेन तं नमामि महेश्वरम् ॥७॥यं भास्करस्वरूपं च शशिरूपं हुताशनम् ।जलरूपं वायुरूपं तं नमामि महेश्वरम् ॥८॥स्त्रीरूपं क्लीबरूपं च पुंरूपं च बिभर्ति यः ।सर्वाधारं सर्वरूपं तं नमामि महेश्वरम् ॥९॥देव्या कठोरतपसा यो लब्धो गिरिकन्यया । दुर्लभस्तपसां यो हि तं नमामि महेश्वरम् ॥१०॥सर्वेषां कल्पवृक्षं च वाञ्छाधिकफ़लप्रदम् ।आशुतोषं भक्तबन्धुं तं नमामि महेश्वरम् ॥११॥अनन्तविश्वसृष्टीनां संहर्तारं भयकरम् । क्षणेन लीलामात्रेण तं नमामि महेश्वरम् ॥१२॥यः कालः कालकालश्च कालबीजं च कालजः । अजः प्रजश्च यः सर्वस्तं नमामि महेश्वरम् ॥१३॥इत्यवमुक्त्वा स भृगुः प्रपात चरणाम्बुजे ।आशिषं च ददौ तस्मै सुप्रसन्नो बभूव सः ॥१४॥जामदग्न्यकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिसंयुतः ।सर्वपापविनिर्मुक्ते शिवलोके सवाप्नुयात् ॥१५॥॥ इति श्री ब्रह्मवैवर्तपुराणे गणपतिखण्डे जामदग्न्यकृतं श्रीशिवस्तोत्रं संपूर्णं॥
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