वेद-सार

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वेद हमारे सबसे पुराने ग्रन्थ हैं. सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने अपना ईश्वरीय ज्ञान चार ऋषियों - अग्नि आदित्य वायु और अंगिरा के माध्यम से पृथ्वी पर भेजा था . वेद चार हैं - ऋगवेद, यजुर्वेद ,सामवेद और अथर्व वेद . वेद में हैं अनेकोनेक श्रुतियां - जो की संस्कृत में लिखे मंत्र या श्लोक के रूप में हैं . इन श्रुतियों में क्या वर्णित है , उनकी चर्चा हम करेंगे इस ब्लॉग वेद-सार में.Mahendra Aryanoreply@blogger.comBlogger52125
Updated: 1 week 18 hours ago

निशा मन्त्र

Fri, 01/30/2015 - 16:05
निशा मन्त्र - १ओम् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवतं सुप्तस्य तथैवैति दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं यन्मे मनः शिव सन्कल्पमस्तु ( य ३४/१ - यजुर्वेद )Our mind travels with amazing speed. It takes us to the unbelievable distances when we are awake. It makes us travel far and wide even when we are asleep. The mind is free of restrictions. May this mind of mine be of divine qualities and of noble thoughts!यह मन क्यों इतना भाग रहाइसकी गति क्यों इतनी चंचलतन सोया है मन जाग रहा
क्यों सीमाओं से मुक्त है मनक्यों इच्छाओं से युक्त है मनयह मन क्यों है इतना पागलयह गाता अपना राग रहा
इतनी विनती तुमसे भगवनचाहे कितना भी भागे मनइसमें हरदम सुविचार रहेबस इतना तुमसे मांग रहा
निशा मन्त्र - २येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः ! यद्पूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्मस्तु !!(य 34/2)May the mind that enables energetic, thoughtful and determined individuals to perform acts of bravery, heroism and sacrifice, the mind that is so unique a sense with such adorable quality ; may that mind of  mine be of noble desires and determination.मन  ही देता प्रेरणा , मन ही शक्ति अपार मन ज्ञानी का आइना, मन ही  पुण्य विचार
मन के कारण धर्म है , मन के कारण कार्य मन के कारण व्यग्रता , मन के कारण धैर्य
प्रभु मेरा मन शुद्ध हो , शुद्ध रहे संकल्प इन्द्रियो का स्वामि मन , मन का नही विकल्पनिशा मन्त्र - ३यत्प्रज्ञानमुत चेतोधृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु !यस्मान्न ऋते किञ्चिन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्मस्तु !!(य 34/3)Mind which experiences new as well as past experiences, that recollects the memories of the past, that provides a shield of endurance in difficult times, which works like a lighthouse in stormy times of senses, and without whose determination nothing can be done; may that mind of mine be of noble thoughts and aspirations .मन के कारण चेतन मैं , प्रभु !मन से है व्यवहार मन में भरे पुरातन अनुभव मन में नए विचार
वर्तमान के साथ चले मन मन  में रहे अतीत  मन भविष्य के भेद समझता हर क्षण होय व्यतीत
मन मेरा जीता हर क्षण को मन नित होय प्रबुद्ध मन में भरो विचार प्रभो यूँ मन हो निर्मल शुद्धनिशा मन्त्र - ४येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्  !येन यज्ञस्तायते सप्तहोता  तन्मे मनः शिवसंकल्मस्तु !!(य 34/4)Mind that is the source of all knowledge and perception of the past, present and future and that performs the yajna of life with seven performers; that mind of mine be of noble resolves and aspirations !मन मेरा है जोड़ता वर्तमान से भूत और भविष्य की सोच से कर देता अविभूत
इन कड़ियों के जोड़ से जीवन बनता यज्ञ आहुति जिसमे डालते होता सात सुविज्ञ
जीवन मेरा यज्ञमय बना  रहे परमेश  मन में ऐसी प्रेरणा देते रहें हमेश
निशा मन्त्र - ५यस्मिन्नृचः सामयजू न्षि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभिवारा: !यस्मिश्चित्तम् सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्मस्तु !!(य 34/5) Mind, like a wheel of chariot, is fitted with spokes of hymns of Vedas and that is overwhelmed with energy of all living beings; that mind of mine be of noble thoughts and resolves.रथ के पहिये को सँभालते जैसे है शहतीर देते हैं मजबूती रथ को जिसे चलाते वीर
तन भी तो है रथ के सदृश्य सड़कें समय समान जीवन है एक रण  मनुष्य कामन के हाथ कमान
मेरे रथ के चारों पहिये चारों वेद समानऔर बने शहतीर ऋचाएंमन में निर्मल ज्ञान 
निशा मन्त्र - ६
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान नेनीयते भीषुजिर्वाजिन इव !हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्मस्तु !!(य 34/6)Mind like the controller of a speedy chariot controls the movement by pulling and releasing the leashes; that mind of mine be good controller of my life and be of noble resolves and thoughts. अश्व खींचते जैसे रथ को शक्ति से अविराम किन्तु सारथी उन अश्वों की खींचे नित्य लगाम
बिना सारथी रथ के घोड़े रथ को देंगे तोड़ बिना नियंत्रण के हर शक्ति ले विनाश का मोड़
इन्द्रियाँ सारी चले अश्व सी मेरा सारथी मन शुभ संकल्पों वाला ये मन
करे नियंत्रित तन
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ईशोपनिषद मन्त्र - १७

Fri, 06/27/2014 - 08:55
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम यो सावादित्ये पुरुषः सोसावाहम्  I  औम  खं  ब्रह्म II 17 II  
तू है व्याप्त सदा इस जग में सूर्य चन्द्र ग्रह  तारों में तेरा रूप सदा दिखता  है फूलों और बहारों में 
यह मेरा ही अंधापन है मुझको नहीं दिखाई दे जग की झूठी चमक दमक में तेज तेरा न दिखाई दे 
प्रभु ! मेरे ये चक्षु खोल दो तुझको जान सकूं, भगवन मैं क्या हूँ , मुझमें क्या है इतना पहचान सकूँ , भगवन 
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ईशोपनिषद मन्त्र -१६

Fri, 06/27/2014 - 08:54
अग्ने नये सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्म्ज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां  ते नम उक्तिं विधेम II 16 II 
हो ज्ञान के भण्डार तुम , हो दिव्य पालनहार तुम तुम कर्म सबके जानते , धन धान्य के आगार तुम 
हम तुच्छ प्राणी विश्व के , हैं हाथ फैलाये खड़े कर दो सुखी संसार तुम , ऐश्वर्य के भण्डार तुम 
दुर्बुद्धि को हर लीजिये , दुखों से मुक्ति दीजिये करते हो बेडा पार तुम , हो विश्व के करतार तुम 

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ईशोपनिषद मन्त्र -१५

Fri, 06/27/2014 - 08:52
वायुरनिलम मृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् । 
औम् ऋतो स्मर । क्लिवे स्मर । कृतं स्मर II 15 II 
पञ्च महाभूतों से निर्मित तन - जिसमें तल्लीन है पञ्च महाभूतों में इक दिन मिल कर होय विलीन हैं 
उस क्षण को तू सोच अभी ले प्राण पखेरू जाते जब जीवन को तू उसी सोच से यूँ परिपक्व बना ले अब 
सब कुछ नश्वर है तेरा बस अमर आत्मा होती है उत्तम कर्म सुमर  जीवन के वो  निधि संचित होती है इस शरीर के बाद नहीं है इस शरीर का मान रे यात्रा का अंतिम पड़ाव है सब का ही शमशान रे 
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ईशोपनिषद मन्त्र -१४

Fri, 06/27/2014 - 08:51
विध्यां चा विध्यां च यस्तद्वेदो भयं सह । अबविध्यया मृत्युं तीर्त्वा विध्यया मृतमश्नुते II 14 II 
विद्या और अविद्या में बस इतना अंतर होता है मोक्ष हमेशा इस जीवन के तदनंतर ही होता है 
जीवन की भौतिकता को जो जीवन में ही जान गए ईश्वर  की महती सत्ता को समझो वो पहचान गए 
केवल भौतिक ज्ञान अधूरा आधा है अध्यात्म भी जन्म मृत्यु और मोक्ष से जुडा आत्म और परमात्म भी 
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ईशोपनिषद मन्त्र -१३

Fri, 06/27/2014 - 08:49
अन्य देवाहु र्विध्याया अन्यदहुरविध्यायाः । इति शुश्रुम् धीराणां ये नस्त द्विचचक्षिरे II 13 II  
कुछ कहते - सब कुछ यह जीवन जीवन को हर पल  जी लो भौतिकता में है सुख सारा भौतिकता का रस पी लो !
और कहे कुछ ज्ञानी ऐसे यह जीना बेकार है ईश्वर  के चिंतन में बस सुख मिथ्या सब संसार है 
जीवन की सच्चाई यह है दोनों ही तो सुखमय है भौतिक सुख के संग संग चिंतन ऐसा अगर समन्वय है 
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ईशोपनिषद मन्त्र -१२

Fri, 06/27/2014 - 08:48
अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये विध्यामुपासते । 
ततो भूय इव ते तमो य उ विध्यायां रताः   II 12 II 
भौतिकता का ज्ञान जरूरी किन्तु नहीं यह अंतिम छोर जीवन में आगे बढ़ने को यह तो है बस साधन डोर 
ज्ञान शास्त्र का भी आवश्यक किन्तु नहीं यह पूरण इष्ट चिंतन बढ़ता स्वाध्याय से चिंतन से मिलता अभीष्ट 
अंधकार में पड़े हुए वो जो भौतिकता तक सीमित उससे गहन अँधेरे में वो डूबे ग्रंथों में नियमित 


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ईशोपनिषद मन्त्र -११

Fri, 06/27/2014 - 08:47
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्यामृतमश्नुते II 11 II 
नहीं निरर्थक ये जग जीवन ना ही सृष्टि अपार है नर का तन मन पाया हमने प्रभु का ही उपकार है 
जीवन के इन भोगों से हम जीवन नैया पार करें मन में इतना ज्ञान भरा हो मृत्यु से भी प्यार करें 
ओजस्वी हो जीवन इतना ऐसे अपने कर्म हो मोक्ष मिले - उद्देश्य हो इसका जीवन का ये धर्म हो   
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ईशोपनिषद मन्त्र -१०

Fri, 06/27/2014 - 08:45
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात । इति शुश्रुम् धीराणां ये नस्त्द्विचचक्षिरे II 10 II 
अध्ययन करे इस सृष्टि का इस धरा का , और वृष्टि का जो खोजते आरोग्य को हर वस्तु  को हर भोग्य को उपदेश देकर ज्ञान का उपकार कर इंसान का 
अध्यात्म को कुछ मानते ईश्वर को जो पहचानते जो ढूंढते उस शक्ति को वो कर रहे तप  भक्ति को उपकार वो भी कर रहे कल्याण जग का कर रहे 
हैं रास्ते  दोनों सुनो तुम रास्ता जो भी चुनो इस लोक का कल्याण हो उस लोक की पहचान हो उपकार करना विश्व का कल्याण  करना विश्व का 
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ईशोपनिषद मन्त्र -९

Fri, 06/27/2014 - 08:44
अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये सम्भूति मुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः II 9 II 
बस प्रकृति  को ही जानते बस सत्य उसको मानते जो पूजते जड़ प्रकृति कोसच मानते इस प्रवृति को वो डूबते संसार में वो डूबते अंधकार में !
जो ढूंढते हैं सृष्टि में अपनी ही कल्पित दृष्टि में उस शक्ति दिव्य स्वरुप को इक कल्पना के रूप को वो भी हैं यूँ कुछ अटकते अंधकार में ही भटकते !

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ईशोपनिषद मंत्र -८

Fri, 06/27/2014 - 08:42
स पर्य गाच्छुक्रम्कायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविधम । कविर्मनीषि परिभूः स्वयम्भू र्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः  II 8 II                               हर जगह छाया हुआ वह, पर हमें दिखता नहीं पहुँचता वह हर समय है , पर हमें मिलता नहीं
शुद्ध है निर्मल है वह, ना कोई तन-देह हैकोई नस नाड़ी नहीं , फिर भी ना संदेह हैआता जाता हर जगह है, फिर भी वह चलता नहीं
ना कोई कर्ता है उसका , ना कोई कारण कहीं श्रृष्टि का निर्माण करता, करता वह धारण जमीं भूमि हिल जाती है कतिपय , वह मगर हिलता नहीं  
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ईशावास्योपनिषद मन्त्र -7

Wed, 06/19/2013 - 14:31


यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।  तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः  II 7II 

One who is in full knowledge and spiritual wisdom – the whole world becomes one and a part of the Supreme Lord; for him there is no illusion or delusion nor is there any sorrow. 

                                 क्या मोह करूँ  क्या शोक करूँ  सब कुछ मेरा  सब कुछ तेरा 
जब भेद नहीं  मतभेद नहीं  फिर राग नहीं  फिर द्वेष नहीं 
जब मैं सब में  जब तू सब में  फिर कष्ट  कहाँ  फिर दुःख कहाँ 
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ईशावास्योपनिषद मन्त्र -6

Tue, 06/18/2013 - 14:29


यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्ने वानुपश्यति सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विचिकित्सति  II 6 II 

One who perceives all living beings in Him, the Supreme Lord, and the Supreme Lord pervading in all living beings- will never drift away from the reality of the world hence will never do any sinful act and will not nurture any hatred for anyone.

               सब मुझ में हैं  मैं सब में हूँ  सब उसमें हैं  मैं उसमें हूँ 
फिर मैं क्या हूँ  फिर सब क्या हैं  हम हैं क्या कुछ  बस वो सब कुछ 
वो मेरा है  मैं उसका हूँ सब उसका है  वो सबका है 
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ईशावास्योपनिषद मन्त्र -5

Mon, 06/17/2013 - 14:27


तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तदु अन्तिके तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः  II 5 II 

He, the Supreme Lord, moves all without moving himself; is extremely far yet extremely near; he is inside all yet outside everyone.

                  वह चल रहा , वो चलायमान  वो थमा हुआ है विद्यमान  जो चला रहा ब्रह्माण्ड को  जो जानता हर कांड को 
जो है दूर यूँ दिखता  नहीं  वो है पास पर मिलता नहीं  वो घुला हुआ है जगत से   पर भी  अलग है जगत से  
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ईशावास्योपनिषद मन्त्र -4

Sun, 06/16/2013 - 14:24


अनेजदेकम् मनसो जवीयो नैनद्दवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।  तध्दावतो न्यानतेति  तिष्ठ्त्त स्मन्न्पो मातरिश्वा दधाति II 4 II  


He, the Supreme Lord  does not move, yet he is faster than even mind; he can never be felt by human senses because he is way ahead of their capabilities; he remains static yet he overtakes all those sprinters with great speeds; only the soul can get the knowledge of all his actions with their efforts.


तीव्र है गति आँधियों की , तीव्रतर तूफ़ान तीव्रतम  मन - ईश पर , उससे भी वेगवान 
वह खड़ा भी भागता है , भागता भी खड़ा  इन्द्रियां करती न अनुभव , इन्द्रियों से बड़ा 
जल है भारी , वायु हलकी , फिर भी है बादल  वायु को सामर्थ्य देता , बादलों को  जल 
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ईशावास्योपनिषद मन्त्र -3

Sat, 06/15/2013 - 14:21


असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तम्सवृताः ।  तान्स्ते प्रेत्यापि गछ्छन्ति ये के चात्महनो जनाः  II 3 II  

Those who kill their conscience are destined to go into the blind dark world of Asurya-loka – the region without any sun and its light and energy.


मार कर जो व्यक्ति अंतरात्मा  भूल जाते देखता परमात्मा  जान कर भी कर रहे दुष्कर्म जो  असुर नर पिशाच सा अधर्म जो 
जिनकी कथनी और करनी भिन्न है  उनसे खुशियाँ मन की रहती खिन्न है  वो अविद्या के तिमिर में धंस रहे  मूर्खता अज्ञान में है फंस रहे 
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ईशावास्योपनिषद मन्त्र -2

Fri, 06/14/2013 - 14:16


कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः I  एवं त्वयि न अन्यथा अस्ति , न कर्म लिप्यते नरे II  (यजु. ४०/२)
O man ! You wish to live for a hundred years by doing work ; but without attachment. Thus alone , and not otherwise, do your deeds. There is no other better way to live this life .
कर्म करता कर चल सदा , सोच मत तू फल सदा सौ बरस के यज्ञ में , बन के हविषा जल सदा
कर्म के बिन कुछ नहीं , कर्म बिन तू कुछ नहीं कर्म के बिन रास्ता , बन गया दलदल सदा     
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ईशावास्योपनिषद मन्त्र -१

Thu, 06/13/2013 - 14:14

ईशा वास्यम् इदम् सर्वम् , यत् किञ्च जग्त्यम् जगत् । 
तेन् त्यक्तेन् भुञ्जिथा : , मा ग्रुध : कस्य् स्वित् धनम् ।। 1 ।।  (यजु. ४०/1) 

He, the Supreme Lord, is present in all the animate and inanimate of the world and he is providing the energy and movement to this world. One can enjoy the wealth of this world not by coveting to possess it but by being benefitted with a feeling that The Lord is the owner of it all. This conscious awareness will keep one away from worldly grief and will provide purest form of pleasure of life.


गति कोई तो देता है कण कण में  गति को गति देता है जो  क्षण क्षण में 
पूरे ब्रह्माण्ड का जो इक स्वामी है  मौजूद हर जगह अंतर्यामी है 
सब कुछ उसका  , उसकी ही सत्ता है  उसकी मर्जी से हिलता पत्ता है 
धरती वाले तू इतना जान ले  ना  है तेरा अपना कुछ , मान ले
उपभोग करो इस जग की संपत्ति का  उपकार समझ करइसको भूपति का
निर्लिप्त भाव से जीवन को जी ले   उसकी किरपा का अमृत रस पी ले 
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