surendra.shastram

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Updated: 1 week 4 days ago

manurapyaaha !

Sun, 08/28/2016 - 22:04
//श्रीः//

मनुरप्याह -

निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः /
तस्य शास्त्रेSधिकारोSस्ति ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित् //

योऽनधीत्य द्विजो वेदानन्यत्र कुरुते श्रमम् /
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः //

ततो ध्येयमिदम् -

समाजस्य समुद्धारो न बुद्ध्या न च तर्कतः /
विज्ञानशिल्पतो नापि स तु वेदनिषेवणात् //
वेदो हि पूर्वजः सर्वधर्माणामेव नो भुवि /
सर्वेषां मूलमैक्यं स मातेव बोधयिष्यति //
वैदिकं जीवनं वस्तु सामरस्यसुखोदयम् /
सर्वेषु मित्रचक्षुर्नो विश्वमैत्रीं समाहरेत् //
ॐ नमो ब्रह्मणे कृत्वा स्वार्पणं यद् दिने दिने /
सन्ध्याकाले कथं भूयात् कामक्रोधादिर्दुर्ग्रहः ? //
बहुज्ञानेन को लाभो मस्तिष्कस्यैव भारदम् /
ज्ञात्वा'ल्पमपि कर्तव्यं कर्ता पण्डित उच्यते //

सु मो मिश्रः / 
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vedavidyaalayaH !

Sun, 08/28/2016 - 14:05
ॐ 

प्रतिग्रामं पञ्चके वा ग्रामाणां यज्ञमण्डपः /
वेदविद्यालयोपेतः स्याद्वै श्रोत्रियमण्डितः //

सन्ध्यास्वाध्यायसंस्काराः संस्कृतञ्च दिने दिने /
शिक्षेरन् तत्र जनता आबालवृद्धसज्जनाः  //

शिखा सूत्रं शिखी शाखा चतुष्कं न हि यस्य भोः /
कुत्रत्यं तस्य विप्रत्वं जातिब्राह्मण एव सः    //

ब्राह्मणैरुद्धृतं राष्ट्रं न्यक्कृतं ब्राह्मणेन किम् /
तस्मिन्नुन्नीयमाने स्याद्राष्ट्रवैभवसौरभम्  //

विद्यायोनितपोगुप्तो ब्राह्मणो जयति क्षितिम् /
योनिमात्रेण  भोवादी  यथा  बुद्धेन  भाषितम्   //

सु मो मिश्रः /

  
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braahmaNasya tu lakshaNam

Sun, 08/28/2016 - 13:39
ॐ 

सन्ध्यास्वाध्यायसंस्काराः संस्कृतं च चतुष्टयम् /
दिने  दिने  प्रकुर्वाणो  द्विजन्मा  केन  जीयते    // 

द्विजत्वं सर्वसुलभं तपः कष्टं परं नृणाम् /
वेदज्ञा बहुधा लोके पञ्चषा विरला द्विजाः //

रोप्यन्ते पादपा दिक्षु दीक्षितो ब्राह्मणो वटुः /
स वटः पादपः केन रोप्यते ब्रह्मसत्फलः //

सन्ध्ययात्मानमभ्येति स्वाध्यायेनाखिलं जगत् /
संस्कारैः संस्कृततनुः संस्कृतेनार्यतां व्रजेत्   //

सु मो मिश्रः /
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shriNuyaama vadema paThema bhoH !

Sun, 08/28/2016 - 13:08
ॐ 
शृणुयाम वदेम पठेम भोः 
विदधीम लिखेम च भारतीम् /
जगती भवतीह समर्चिता 
श्रुतिगिरा गुरुभारतगौरवम् // 

सु मो मिश्रः 
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vicaarayema !

Wed, 08/03/2016 - 07:06
" वेदान्नो वैदिकाः शब्दाः सिद्धा लोकाच्च लौकिकाः /  अनर्थकं व्याकरणम् " इत्यत्र सत्यमस्ति वा  ??  //नाधीत्य वेदान्न च लोकवृत्त्या                           शिष्टप्रयोगान् ननु शिक्षमाणः  /तन्त्रं प्रधानं कुरुते मनस्वी                            किं तेन वाक् सिध्यति सूत्रवृत्त्या ? // यथोपवीतसूत्रेण तन्मात्रेण न वै द्विजः / तथा प्रयोगविधुरः सूत्रज्ञो याति हास्यताम् //
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paaniniiyaah subodhema !

Wed, 08/03/2016 - 06:45
पाणिनीयमहातन्त्रं पथ्यं संस्कृतसेविनाम् /
पाणिन्यत्यन्ततन्त्रत्वं चिन्त्यं संस्कृतभूतये //
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KALIPANDITAAH !

Thu, 12/03/2015 - 16:52
असंस्कृतपदन्यासा  अशास्त्रकृतषण्मुखाः   /
अनाचारवशारम्भाः पण्डिताः कलिमण्डनाः //
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VAARAYAAMAASA TAAN GHANAAN !

Wed, 12/02/2015 - 22:41
                               //श्रीः//
ॐ  धृते गोवर्धने शैले परित्राणाय गोकुळे  /अस्माभिर्वलिभिर्जुष्टो वारयामास तान् घनान्  //         // स्वाहा ! //
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raashtrabhaashaa !

Wed, 12/02/2015 - 09:24
हंहो सा राष्ट्रभाषेति कस्य चित्ते न निश्चयः /
विदुषोSविदुषो वापि देशिनो वा विदेशिनः !   //
संस्कृतं राष्ट्रभाषेति विश्वे ते गुरवो वयं   /
के वयं विश्वपटले विना संस्कृतसंस्कृतिम् ? //
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VIDVAAMSO 'PI SUVIDVAAMSAH.........!

Thu, 11/26/2015 - 09:30
संस्कृतोन्नयनी वाणी व्यक्ता, ज्ञाता न केवलम्  /
विद्वांसोSपि सुविद्वांसो नाशयन्ति शतंअ समाः ! //
अ. शतायुर्वै पुरुषः !
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KAUMAARASAMBHAVADINE..........!

Wed, 11/25/2015 - 23:44
कौमारसम्भवदिने कविकालिदासः 
स्मर्येत नूनमिह काव्यरसोत्सवैस्तैः /
स्मर्येत सा वसुमती गिरिजा गिरीशं 
स्वीकर्तुमास तपसा कथमम्बुजाक्षी // 1//
स्वर्गञ्च मर्त्यमिह गर्वमदोद्धतोSसौ 
खर्वीचकार वत तारकदैत्यराजः  /
तं सर्ववंशसहितं सबलं निहन्तुं 
दाक्षी कुमारजननीत्वमलञ्चकार // 2//
तस्यै नमः सकलराक्षसनाशनायै 
तस्यै नमः सदवतारपरांबिकायै  //
तस्यै नमः सकलराज्यश्रिये श्रुतायै 
तस्यै नमः परमवैभवराष्ट्रगोप्त्र्यै // 3//
षाण्मातुराय वरदाय  



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GIITAA SUGIITAA KARTAVYAA ! - S'ankarah

Wed, 11/25/2015 - 09:10
यदा  गीता  तदा  त्यागः  प्रजासु   च  सुराजसु /
गीताजयन्त्यतोअ हन्त कालशक्तिधनव्ययः ! // 
अ. अतः = तद्भिन्नहेतुना पर्वतया  पालिता सतीति भावः /

गीताव्यक्तिः कदा स्यान्नः समष्टिर्गीतया पुनः /
कदा समाजं  राष्ट्रञ्च  विश्वं  गीता  प्रचोदयात् //

गीता  गङ्गा  च  गायत्री  त्रयमेतत्सनातनम् /
उद्धृता उद्धरन्त्येताः बुध्य भारत बुध्य भोः ! //

सर्वाणि संविधानानि  भेदकृन्ति  पदे  पदे /
गीतैका संविधानं नः परस्यआ  च नरस्य च    //
आ. परस्य = परमात्मनः / गीता मे परमं रूपं गीता मे परमं पदम् / गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रीन्लोकान्पालयाम्यहमिति पाद्मोक्तेः /
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palaayase mitra katham kva gantaa !

Tue, 11/24/2015 - 23:47
पलायसे मित्र कथं क्व गन्ता 
गेहं स्वदेशं स्वजनञ्च हित्वा    /
येनासि गन्ता वत सुज्ञ तेन 
किं ते न साक्षाद् भविता परत्र ? //
प्रेम्णा जनास्त्वां जयिनं जनन्या:
पुत्रं कलाकान्तमथो श्रयन्ते      /
जयन्त्यजस्रं सुखसारपद्माः 
सद्मस्वनन्तेषु विमृश्य चित्रम् //

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navavarshamangalam !

Wed, 01/02/2013 - 01:48
अयि नवीन वर्ष ! वर्ष सुजलं पर्जन्य इव !
सदा  स्मारय सुकृत-कुकृतानि चेतनाम्बेव  !
सा दामिनी हाक्व गता निर्भयाख्या प्रतिभयान्तः !
भरतात्माsद्य रोदिति चत्वरेषु रहो लुठति !
कलेरवधिः समाप्नुयादत्र वा प्रसरीसर्ति  !
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samskritasaptAhaH

Sun, 08/26/2012 - 00:43
अयि संस्कृतसप्ताह ! सप्ताहोभिर्महो हर /संस्कृतेर्विश्वनीडं तत्त्वखिलं संस्कृतं कृथाः //
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Haa Hanta SamskRitaM kutra !

Sat, 03/10/2012 - 01:55
" mlecchanto mlecchayanto 'mRita-vacana-jharIM shoSayantaH sthaviSThAH tathyaM tattvaM padArthaM parama-sukRitiSu prApayanto manISAm / dhanyA dhIrA vadAtA vaTu-viTapa-mahAraNya-nirvANa-niSThA nirvANaM saMskRitasyA py atha dadhati shanair durnivAraH svabhAvaH //"
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HolikAgniH !

Fri, 03/09/2012 - 01:42
// shrIH //
citrair varNaish citrite bhAratAsyehindolAyAM dolite kriSnacandre /svArtham dhIraH svAhayan holikAgnaurASTraM dhattAM vishvabhUtiM vareNyam //

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dhanyA vayam !

Wed, 01/04/2012 - 08:00
// s'rI.h //
"dhanyA vaya.m suragavI-paripAlanenavaiku.n.tha-sammita-sukha.m bhuvi sevamAnA.h /ki.m tAbhir Abhir uditAbhir as'e.sa-gAbhiralpAyuraamaya-vikAra-vitAninIbhi.h //"
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pratna.m var.sam !

Fri, 12/09/2011 - 19:52
" Pratna.m ki~ncid yaati var.sa.m naviina.m sametiida.m nuutna-bhaavaan dadhaanam / krai.s.ta.m saadho saadhutara.m bhaven na.h cetasy aarye vaaci karma.sv adiinaM // "
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26/11 : SA SANDES'O GHORA.H !

Sat, 11/26/2011 - 23:00
" AATATAAYINAM AAYAANTA.M JIGHAASANTA.M JANAAN PURA.H / PAS'YA.MS TARKAPARO RAAJAA DES'ADROHII NA SA.MS'AYA.H //"
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