संस्कृत-प्रसृति:

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A blog about institutional and other periodic programs for propagation of Sanskrit
Updated: 16 hours 27 min ago

17th World Sanskrit Conference, Vancouver, Canada, July 9-13, 2018

Thu, 08/17/2017 - 12:30
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From: adheesh sathaye via INDOLOGY <indology@list.indology.info> Subject: [INDOLOGY] 17th World Sanskrit Conference: Second Circular Date: August 16, 2017 Dear Colleagues,

On this Indian Independence Day, we are delighted to release the Second Circular for the 17th World Sanskrit Conference, to be held in Vancouver, BC, Canada, July 9-13, 2018.

The printable circular can be downloaded here: https://wsc.ubcsanskrit.ca/wp-content/uploads/2017/08/WSC-2018-second-circular.pdf (1.8MB, PDF file).

This second release contains new information about the conference’s academic program, including announcements of the plenary speakers, public events, and special panels. You will also find important practical information about registration, accommodations, travel/visa arrangements, and the conference excursions to take place on July 14, 2018. You will also find an updated list of key dates and deadlines to remember, and a call for individual papers.

As a reminder: individual paper abstracts are due October 1, 2017, and may be submitted through the online submissions portal: https://wsc.ubcsanskrit.ca/ocs/wsc/2018/schedConf/cfp.

For further information, please contact the WSC 2018 Secretariat at wsc2018@ubcsanskrit.ca(mailto:wsc2018@ubcsanskrit.ca) , and be sure always to consult the official conference website, wsc.ubcsanskrit.ca, for the most up-to-date information.

With all best wishes,


Dr. Adheesh Sathaye
Associate Professor of Sanskrit Literature and South Asian Folklore
Dept. of Asian Studies || University of British Columbia
408-1871 West Mall || Vancouver, BC CANADA V6T1Z2
adheesh@mail.ubc.ca || +1.604.822.5188

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Sanskrit-learning initiatives by MHRD

Wed, 03/22/2017 - 07:26

(A) MHRD provides SWAYAM courses. Course on Secondary Sanskrit is an on-line course of 43 tutorials and 1 test, being conducted by Mr. R. N. Meena. Medium of instruction is mentioned as English. At this link https://swayam.gov.in/course/181-secondary-sanskrit one also gets to read the Overview, which is detailed in Sanskrit. The course already commenced on 15/11/2016 and would end on 14/5/2017.

The course contents are detailed as –

संस्कृतभाषा विश्वस्य प्राचीनतमा भाषा अस्ति। अस्यां भाषायां ज्ञान-विज्ञानयोः अनेके ग्रंथाः लिखिताः; ये आधुनिकस्य विज्ञानस्यापि अध्ययने सहायकाः सन्ति। न केवलं भारतस्य सर्वासु भाषासु अस्याः प्रभावः स्पष्टतया दृश्यते अपितु ‘अवेस्ता’ आदि वैदेशिकभाषास्वपि वर्तते। अतएव इमां भाषां ज्ञात्वा वयं अन्याः भाषाः अपि सारल्येन ज्ञातुं शक्नुमः। नवशब्दनिर्माणे अस्याः भाषायाः सामर्थ्यमनुपमम् वर्तते। संस्कृतभाषायाः अध्ययनेन वयं भारतस्य प्राचीनतमां संस्कृतिम् अपि ज्ञातुं शक्नुमः। एषः पाठ्यक्रमः सम्प्रेषण-आधरितोSस्ति। एषः माध्यमिक-स्तरीयछात्राणां मार्गदर्शनार्थं निर्मितोSस्ति। अनेन छात्राः संस्कृतभाषायां निहितनैतिकमूल्यैः अपि परिचिताः भविष्यन्ति स्वजीवने च तानि धरयितुं समर्थाः भविष्यन्ति। राष्ट्रनिर्माणेSपि ते अधिकाधिकं सहायकाः भविष्यन्ति।

विशिष्ट- उद्देश्यानि

श्रवणकौशलम्

क. छात्राः संस्कृतस्य विशिष्टध्वनीन् श्रुत्वा अवगमिष्यन्ति। उदा.-पदान्तस्वरः पदान्तव्यंजनम्, विसर्गः, अनुस्वारः संयुक्ताक्षरम् इत्यादीनि।

ख.        संस्कृतस्य सरलवाक्यानि तेषामर्थं श्रुत्वा ज्ञास्यान्ति तदनुसारेण च व्यवहारं करिष्यन्ति।

वाचनकौशलम्

क.       संस्कृते प्रयुक्तानां विशिष्टध्वनीनां सम्यक्-उच्चारणं करिष्यन्ति (उदा-स्वरः, मात्रा, व्यंजनम्,  संयुक्ताक्षराणि इत्यादि)

ख.        संस्कृतवाक्यानां सम्यक् उच्चारणं करिष्यन्ति।

ग.         पद्यरचनानां सस्वरवाचनं करिष्यन्ति।

घ.         पठितसामग्रीम् आश्रितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि दास्यन्ति।

पठनकौशलम्

क.        संस्कृतगद्यांशानां, पद्यांशानां, नाट्यांशानां सारम् अवगमिष्यन्ति।

लेखनकौशलम्

क.        पठितपदानि वाक्यानि च श्रुत्वा शुद्धवर्तन्यां लेखितुं शक्ष्यन्ति।

ख.        सन्धियुक्तपदानां समासयुक्तपदानां च वाक्यानाम् अनुलेखनं करिष्यन्ति।

ग.         पठितकथायाः तस्याः अंशानां वा सारं संस्कृतवाक्येषु लेखितुं शक्ष्यन्ति।

घ.         चित्राणि दृष्ट्वा संस्कृतभाषायां तेषां वर्णनं कर्तुं शक्ष्यन्ति।

घ          प्रदत्तानि वाक्यानि घटनाक्रमानुसारेण लेखितुं शक्ष्यन्ति।

(B) MHRD also has two courses for Sanskrit  under “e-Pathashala” initiative. 

  1. Sanskrit (M. A.) Course No. 36 comprises of 16 papers providing number of modules for each paper. At this link http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=36 one has to select Paper No. and Its Module No. Note, number of downloads will be 16 multiplied by (the number of modules of each paper)
  2. Acharya in Sanskrit Vyakarana Course No. 1043 also comprises of 16 papers providing number of modules for each paper. At this linkhttp://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=1043 one has to select Paper No. and Its Module No. Note, number of downloads will be 16 multiplied by (the number of modules of each paper)

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संस्कृत-पत्रकारिता : इतिहास एवं अधुनातन स्वरूप

Sun, 11/27/2016 - 19:45

              संस्कृत-पत्रकारिता : इतिहास एवं अधुनातन स्वरूप…

  • डॉ. बलदेवानन्द सागर  

          संस्कृत-पत्रकारिता के बारे में कुछ कहने से पहले मैं सुधी पाठकों को ये बताना चाहूँगा कि भले ही, सामान्यरूप से हिन्दी, अंग्रेजी या अन्य प्रचलित भाषाओं की पत्रकारिता के समान संस्कृत-पत्रकारिता की चर्चा न होती हो; पर आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज, इस इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे आधे दशक में भी, भारत के प्रायः सभी राज्यों और कुछ विदेशों में भी संस्कृत-पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं |

          एक प्रामाणिक समीक्षक के रूप में संस्कृत-पत्रकारिता के विषय में कुछ कहने के लिए अभी मैं मनोमन्थन करके आपके सामने जो कुछ रखने जा रहा हूँ, वो मात्र एक लेखक के रूप में ही नहीं, परन्तु पिछले ४२ वर्षों से आकाशवाणी के साथ-साथ, २२ वर्षों के दूरदर्शन के भी संस्कृत-समाचारों के सम्पादन, अनुवाद और प्रसारण के दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर “संस्कृत-पत्रकारिता के इतिहास एवं अधुनातन स्वरूप” की व्याख्या करने का विनम्र प्रयास कर रहा हूँ |

संस्कृत-पत्रकारिता का इतिहास-

                       जब भी हिन्दी-पत्रकारिता की बात होती है तो हिन्दी के प्रथम पत्र “उदन्त-मार्तण्ड” [ १८२६ ई., सम्पादक- पं. जुगलकिशोर-शुकुल] का सन्दर्भ अवश्य दिया जाता है | ठीक उसी तरह से, संस्कृत-पत्रकारिता के इतिहास में ईस्वी सन् १८६६ में पहली जून को काशी से प्रकाशित “काशीविद्यासुधानिधिः” का उल्लेख अवश्य होता है | संस्कृत-पत्रकारिता की इस प्रथम-पत्रिका का दूसरा नाम था –“ पण्डित-पत्रिका |”

                      अभी, जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ तो संस्कृत-पत्रकारिता के १५० वर्ष और प्रायः दो महीने पूरे हो रहे हैं | इस बात को ध्यान में रखकर संस्कृत-प्रेमियों और संस्कृतज्ञों के एक राष्ट्रव्यापी स्वैच्छिक-संघठन “भारतीय संस्कृत-पत्रकार संघ” [पञ्जी.] ने इस पूरे वर्ष में राष्ट्रीय-स्तर पर अनेक कार्यशालाओं और संगोष्ठियों के आयोजन का संकल्प किया है | यह तथ्य, इस बात का द्योतक है कि संस्कृत-पत्रकारिता को व्यावहारिक रूप में राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए संस्कृत-कर्मी दिन-रात अथक प्रयास कर रहे हैं |

                    संस्कृत-पत्रकारिता के इतिहास की बात दोहराते हुए कहना चाहूँगा कि “काशीविद्यासुधानिधिः” [१-जून,१८६६] से शुरू हुयी इस संस्कृत-पत्रकारिता की यात्रा में अनेक छोटे-बड़े पड़ाव आये | इस बिन्दु को समझने के लिए लोकमान्य तिलक जी के मराठी-भाषिक ‘केसरी’ का उल्लेख करना चाहूँगा |

                     भारत की भाषाई-पत्रकारिता के इतिहास में, वैसे तो अनेक दैनिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है किन्तु ‘केसरी’ की बात कुछ ख़ास है | विष्णु शास्त्री चिपलूणकर, बालगंगाधर तिलक, वामन शिवराम आप्टे, गणेश कृष्ण गर्दे, गोपाल गणेश आगरकर और महादेव वल्लभ नामजोशी के हस्ताक्षरों के साथ ‘केसरी’ का उद्देश्य-पत्र १८८० ईस्वी. की विजयादशमी को मुम्बई के ‘नेटिव-ओपिनियन’ में प्रकाशित कराया गया | ‘केसरी’ के प्रकाशन का निर्णय तो हो गया लेकिन मुद्रण के लिए पूँजी की समस्या थी | अन्ततः नामजोशी की व्यावहारिक-कुशलता के साथ ४-जनवरी १८८१ को पुणे से साप्ताहिक ‘केसरी’ [मराठी] का प्रति मंगलवार को प्रकाशन होने लगा |

                    जिस बात की ओर मैं संकेत करना कहता हूँ, वह है पण्डितराज जगन्नाथ के “भामिनीविलास” का वह समुपयुक्त संस्कृत-श्लोक, जो ‘केसरी’ के उद्देश्य और कार्य को द्योतित करता है | विष्णु शास्त्री चिपलूणकर द्वारा चुना गया और ‘केसरी’ के मुखपृष्ठ पर छपा यह श्लोक इस प्रकार है –

“स्थितिं नो रे दध्याः क्षणमपि मदान्धेक्षण-सखे !, गज-श्रेणीनाथ ! त्वमिह जटिलायां वनभुवि |   

 असौ कुम्भि-भ्रान्त्या खरनखरविद्रावित-महा-गुरु-ग्राव-ग्रामः स्वपिति गिरिगर्भे हरिपतिः ||”

[ अर्थात् हे गजेन्द्र ! इस जटिल वन-भूमि में तुम पलभर के लिए भी मत रूको, क्योंकि यहाँ पर पर्वत-गुफा में वह केसरी [हरिपति] सो रहा है जिसने हाथी के माथे-जैसी दिखने की भ्रान्ति में बड़ी-बड़ी शिलाओं को भी अपने कठोर नाखूनों से चूर-चूर [विद्रावित] कर दिया है ]   

               मेरा विनम्र मन्तव्य यही है कि तत्कालीन भाषाई-पत्रकारिता के लेखक- सम्पादक-प्रकाशक बहुतायत संख्या में या तो संस्कृत के जानकार या विशेषज्ञ थे या संस्कृत के प्रति निष्ठावान् थे और पत्रकारिता के समर्पित कार्य के लिए संस्कृत के समृद्ध साहित्य का आश्रय लेते थे | चूँकि स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए जन-सामान्य की भाषा में संचार और सम्वाद करना ज़रूरी था, इसलिए विभिन्न भारतीय भाषाओं में तुलनात्मक-रूप से अधिक और संस्कृत में कम, पत्र-पत्रिकाएँ छपती रहीं | किन्तु भारत के सभी राज्यों से प्रकाशित होने वाली संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो किसी एक प्रान्तीय-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी या अंग्रेजी-उर्दू की तुलना में समग्ररूपसे संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं की संख्या अधिक मानी जा सकती है | शोध के आधार पर  यह संख्या १२० से १३० के बीच की कही जा सकती है |                                                     

                 इस छोटे-से आलेख में पूरे डेढ़-सौ सालों के इतिहास को विस्तार से देना तो सम्भव नहीं है किन्तु कुछ मुख्य संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन करें, तो दो प्रकार की संस्कृत-पत्रिकाएँ बहुतायत से मिलती हैं | एक तो वे जो मुख्यरूप से शोध-पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती रहीं और शोध-लेखों, प्राचीन-ग्रन्थों और पाण्डुलिपिओं को ही प्रकाशित करती रहीं | दूसरी वें, जो एक सामान्य साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक पत्रिका के कलेवर में प्रकाशित की जाती थीं, जिनमें प्रायः सभी विषयों की सामग्री छपी मिलती थीं | आज स्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन हुआ है | ऐसा लग रहा है कि संस्कृत-पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है | आश्वस्ति के साथ कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब युवा पीढ़ी के अधिकाधिक युवक-युवतियाँ संस्कृत पढ़ना-लिखना और बोलना पसन्द करेंगे और सामाजिक संचार-माध्यमों में सभी भाषाओं की अपेक्षा संस्कृत-विद्या का अधिक प्रयोग होगा

               आइये, अब कुछ विशेष पत्र-पत्रिकाओं की बात करें –

               संस्कृतपत्रकारिता स्वतन्त्रता-संग्राम की एक विशिष्ट उपलब्धि है | नवीन विचारों के सूत्रपात और राष्ट्रीयता की वृद्धि में इस ने अभूतपूर्व योगदान किया है | शोध से ये तथ्य सामने आया है कि ईस्वी सन् १८३२ में बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी ने अंग्रेजी और संस्कृत में एक द्विभाषी शोध-पत्रिका प्रकाशित की थी | इस पत्रिका में संस्कृत साहित्य की गवेषणाओं एवं पुरातन सामग्री से आपूरित लेखादि प्रकाशित होते थे | इसने अंग्रेजी पढ़े-लिखे संस्कृतज्ञों के हृदय में नवीन चेतना का संचार किया और राष्ट्र, भाषा एवं साहित्य के प्रति गौरव का भाव जागृत किया |

              जैसा कि पहले उल्लेख कर चुके हैं, १ जून, १८६६ ई. को काशी-स्थित  गवर्नमेण्ट संस्कृत कॉलेज ने “काशी-विद्यासुधा-निधिः” अथवा “पण्डित” नामक मासिक-पत्र का प्रकाशन किया | काशी से ही १९६७ ई. में “क्रमनन्दिनी” का प्रकाशन आरम्भ हुआ | विशुद्ध संस्कृत की ये दोनों पत्रिकाएँ प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का प्रकाशन करती थीं | इनमें विशुद्ध समाचार-पत्रों के लक्षण नहीं थे | एप्रिल, १८७२ ई. में लाहौर से “विद्योदयः” नए साज-सज्जा के साथ शुद्ध समाचार-पत्र के रूप में अवतरित हुआ | हृषीकेश भट्टाचार्य के सम्पादकत्व में इस पत्रिका ने संस्कृत-पत्रकारिता को अपूर्व सम्बल प्रदान किया | “विद्योदयः” से प्रेरणा पाकर संस्कृत में अनेक नयी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं |

             बिहार का पहला संस्कृत-पत्र १८७८ ई. में “विद्यार्थी” के नाम से पटना से निकला | यह मासिक पत्र १८८० ई. तक पटना से नियमित निकलता रहा और बाद में उदयपुर चला गया, जहाँ से पाक्षिक रूप में प्रकाशित होने लगा | कुछ समय बाद, यह पत्रिका श्रीनाथद्वारा से प्रकाशित होने लगी | आगे चल कर यह हिन्दी की “हरिश्चन्द्र-चन्द्रिका” और “मोहनचन्द्रिका” पत्रिकाओं में मिलकर प्रकाशित होने लगी | यह संस्कृत-भाषा का पहला पाक्षिक-पत्र था जिसके सम्पादक पं. दामोदर शास्त्री थे एवं इसमें यथानाम प्रायः विद्यार्थिओं की आवश्यकता और हित को ध्यान में रखते हुए सामग्री प्रकाशित की जाती थी |         

            १८८० ई. में पटना से मासिक ‘धर्मनीति-तत्त्वम्’ का प्रकाशन हुआ, किन्तु इसके विषय में कोई ख़ास जानकारी नहीं मिल पाती है और नहीं इसका कोई अंक उपलब्ध है |

            १७-अक्टूबर, १८८४ ई. को कुट्टूर [केरल] से ‘विज्ञान-चिन्तामणिः’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ | कुछ समय बाद, प्रचारातिरेक के कारण यह पत्रिका पाक्षिक, दशाह्निक और अन्ततः साप्ताहिक हो गयी | नीलकान्त शास्त्री के सम्पादकत्व में यह पत्रिका संस्कृत-पत्रकारिता के विकास में मील का पत्थर सिद्ध हुयी |

               संस्कृत की समृद्धि, प्रतिष्ठा और शिक्षाप्रणाली के परिष्कार के लिए पं. अम्बिकादत्त व्यास द्वारा १८८७ ई. में स्थापित संस्था ‘बिहार-संस्कृत-संजीवन-समाजः’, संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रहा | इसकी पहली बैठक ५-एप्रिल, १८८७ ई. में हुयी, जिसकी अध्यक्षता पॉप जॉन् बेन्जिन् ने की थी | इसमें अनेक राज्यों से बहुत-सारे लोग आये थे | सचिव स्वयं पं. अम्बिकादत्त व्यास जी थे | इस समाज द्वारा १९४० ई. में त्रैमासिक के रूप में ‘संस्कृत-सञ्जीवनम्’ का प्रकाशन आरम्भ किया गया था |                                                           

               १९वीँ शताब्दी के अन्तिम दो दशकों में बहुत-सारी संस्कृत-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ | राष्ट्रिय-आन्दोलन की दृष्टि से, इन सब में “संस्कृत-चन्द्रिका” और “सहृदया” का विशेष स्थान है | पहले कोलकोता और बाद में कोल्हापुर से प्रकाशित होने वाली “संस्कृत-चन्द्रिका” ने अप्पाशास्त्री राशिवडेकर के सम्पादकत्व में अपार ख्याति अर्जित की | अपने राजनीतिक लेखों के कारण अप्पाशास्त्री को कई बार जेल जाना पड़ा | संस्कृत-भाषा का पोषण और सम्वर्धन, संस्कृत-भाषाविदों में उदार दृष्टिकोण का प्रचार तथा सुषुप्त संस्कृतज्ञों को राष्ट्र-हित के लिए जगाना आदि उद्देश्यों को ध्यान में रखकर “सहृदया” ने राष्ट्रिय-आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी |

                २०वीं शताब्दी के आरम्भ में लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में सारे देश ने स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया था | संस्कृत-पत्रकारिता के लिए ये सम्वर्धन का युग था | उस अवधि में देश के विभिन्न भागों से अनेक संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिनमें ‘भारतधर्म’ [१९०१ ई.], ‘श्रीकाशीपत्रिका’ [१९०७ ई.], ‘विद्या’ [१९१३ ई.], ‘शारदा’ [१९१५ ई.], ’संस्कृत-साकेतम्’ [१९२० ई.] वगैरह प्रमुख थीं |  ‘अर्वाचीन संस्कृत साहित्य’ के अनुसार १९१८ ई. में पटना से पाक्षिक ‘मित्रम्’ का प्रकाशन शुरू हुआ था | इसका प्रकाशन ‘संस्कृत-संजीवन-समाज’ करता था |

             स्वतन्त्रता संग्राम के दिनों में दूसरी प्रमुख संस्कृत-पत्रिकाएँ थीं – ‘आनन्दपत्रिका’ [१९२३ ई.], ‘गीर्वाण’ [१९२४ ई.], ‘शारदा’ [१९२४ ई.], ‘श्रीः’ [१९३१ ई.], ‘उषा’ [१९३४ ई.], ‘संस्कृत-ग्रन्थमाला’ [१९३६ ई.], ‘भारतश्रीः’ [१९४० ई.] आदि | १९३८ ई. में कानपुर से अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मलेन का मासिक मुखपत्र “संस्कृत-रत्नाकरः” आरम्भ हुआ | श्रीकेदारनाथ शर्मा इसके सारस्वत सम्पादक-प्रकाशक थे | १९४३ ई. में राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ की त्रैमासिक पत्रिका “गंगानाथ झा रिसर्च जर्नल” आरम्भ की गई |    

            स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद की प्रमुख संस्कृत-पत्रिकाओं में, ‘ब्राह्मण-महासम्मेलनम्’ [१९४८ ई.], ‘गुरुकुलपत्रिका’ [१९४८ ई.], ‘भारती’ [१९५० ई.], ‘संस्कृत-भवितव्यम्’ [१९५२ ई.], ‘दिव्यज्योतिः’ [१९५६ ई.], ‘शारदा’ [१९५९ ई.], ‘विश्व-संस्कृतम्’ [१९६३ ई.], ‘संविद्’ [१९६५ ई.], ‘गाण्डीवम्’ [१९६६ ई.], ‘सुप्रभातम्’ [१९७६ ई.], ‘संस्कृत-श्रीः’ [१९७६ ई.] ‘प्रभातम्’ [१९८० ई.], ‘लोकसंस्कृतम्’ [१९८३ ई.], ‘व्रजगन्धा’ [१९८८ ई.], ‘श्यामला’ [१९८९ ई.] आदि गिनी जाती हैं |

               इसी अवधि में [१९७० ई. में] संस्कृत-पत्रकारिता के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक घटना हुयी जिसके महानायक थे – मैसूरू, कर्नाटक के सुप्रसिद्ध संस्कृत-विद्वान्, गीर्वाणवाणीभूषण, विद्यानिधि, पण्डित-कळले-नडादूरु-वरदराजय्यङ्गार्य, जिन्हों ने मैसूरू से “सुधर्मा” नामक दैनिक संस्कृत समाचार-पत्र प्रकाशित कर के विश्व-पत्रकारिता के मञ्च पर संस्कृत-पत्रकारिता का ध्वज फहरा दिया | यद्यपि १९०७ ई., १-जनवरी को थिरुअनन्तपुरम् [केरळ] से “जयन्ती” नामक दैनिक संस्कृत-समाचार-पत्र प्रकाशित कर के श्रीकोमल-मारुताचार्य और श्रीलक्ष्मीनन्द-स्वामी ने एक अभूतपूर्व साहस किया था किन्तु धन और ग्राहक-पाठक के अभाव में इस संस्कृत-दैनिक का प्रकाशन कुछ दिनों बाद ही बन्द करना पड़ा | कालान्तर में, कानपुर से भी कुछ समय तक “सुप्रभातम्” नाम का दैनिक संस्कृत-समाचार-पत्र निकलता रहा किन्तु पाठक-ग्राहक के अभाव में बन्द करना पड़ा |

संस्कृत-पत्रकारिता का अधुनातन स्वरूप –                              

                  संस्कृत भारत की सांस्कृतिक-धरोहर है | इस राष्ट्र की पहचान और अस्मिता है | स्वतन्त्र-भारत की भाषाई नीति के चक्रव्यूह में न पड़कर आज संस्कृतपत्रकारिता   के क्षेत्र में नित-नूतन हो रहे प्रयोगों की पड़ताल करें तो लगता है कि विश्व की अधिकाधिक भाषाएँ, इस वैज्ञानिक और गणितात्मक वाणी-विज्ञान से लाभान्वित हो रही हैं | computational linguistic science को परिपोषित और सम्वर्धित करने में संस्कृत के शब्दानुशासन से अधिकाधिक मदद ली जा रही है | ऐसे परिदृश्य में किन्हीं कारणों से शिथिल-गति वाली संस्कृत-पत्रकारिता अब, आधुनिक संचार माध्यमों के सर्वविध क्षेत्रों में और सामाजिक संचार माध्यमों में  अपनी उपयोगिता और प्रभाव को स्थापित कर रही है |

               यदि हम संस्कृत-पत्रकारिता के आधुनिक-युग को इक्कीसवीं शताब्दी का आरम्भ-काल मानें, तो थोड़ा सिंहावलोकन करके बीसवीं शताब्दी के अन्तिम तीन दशकों में हुयी सूचना-क्रान्ति और तकनीकी विकास-प्रक्रिया की समीक्षा को भी व्यापक-परिधि में समझना होगा | आप सुधी पाठक मेरा संकेत समझ गए होंगे |

               अभी-अभी हमने, संक्षेप में संस्कृत-पत्रकारिता के डेढ़सौ वर्षों के संक्षिप्त इतिहास का विहंगम-अवलोकन किया | इसी शृंखला में एक और ऐतिहासिक घटना हुयी और भारत-सरकार के सूचना-प्रसारण-मन्त्रालय ने आरम्भ में प्रयोगात्मक-रूप से १९७४ ई. के ३०-जून को सुबह ९-बजे, आकाशवाणी के दिल्ली-केंद्र से संस्कृत-समाचारों का प्रसारण करके उन तमाम भ्रान्तियों और मिथकों को ध्वस्त कर दिया, जो कहते थे कि संस्कृत, आम बोलचाल की भाषा नहीं हो सकती है या तकनीकी विचारों को संस्कृत में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है | इस राष्ट्रिय समाचार-प्रसारण की लोकप्रियता और सर्वजन-ग्राह्यता के कारण, कुछ महीनों बाद, पाँच-मिनिट का संस्कृत-समाचारप्रसारण का एक और बुलेटिन शाम को [६.१० बजे] प्रसारित होने लगा | इतना ही नहीं, १९९४ ई. में २१-अगस्त, रविवार को दूरदर्शन ने साप्ताहिक संस्कृत-समाचार प्रसारण आरम्भ करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया | सौभाग्य से, दूरदर्शन से प्रथम संस्कृत-समाचार प्रसारण का सौभाग्य इन पंक्तियों के लेखक को मिला | कुछ वर्षों बाद दूरदर्शन का यह साप्ताहिक प्रसारण, प्रतिदिन पाँच मिनिट के लिए कर दिया गया |

              इसी काल-खण्ड में, एक और ऐतिहासिक घटना के कारण संस्कृत-पत्रकारिता की मन्द गति तीव्रतर बन गयी | संस्कृत के कुछ उत्साही युवा इन दशकों में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के लिए संगठनात्मक-रूप से सक्रिय थे और राष्ट्रव्यापी अभियान के तहत यह कार्य कर रहे थे | बंगलूरु में कार्यरत “हिन्दू-सेवा-प्रतिष्ठानम्” और अधुनातनरूप में,   “संस्कृत-भारती” तथा “लोकभाषा-प्रचार-समितिः” आदि कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हों ने संस्कृत-पत्रकारिता के अधुनातन स्वरूप को व्यवस्थित और व्यापक बनाकर प्रत्येक संस्कृत-अनुरागी को आश्वस्त किया कि वह दिन दूर नहीं जब भारत का युवा नागरिक संस्कृत में धाराप्रवाह अपनी बात कह सकेगा | इस शृंखला में “संस्कृत-भारती” ने १९९९ ई. में बंगलूरू से मासिक-पत्रिका “सम्भाषण-सन्देशः” प्रकाशित करना आरम्भ किया | यह मासिक-पत्रिका अपनी साज-सज्जा, सरल भाषा और विषय-वैविध्य के कारण देश-विदेश में बहुत लोकप्रिय है |

                        इसी प्रकार से कुछ और पत्र-पत्रिकाएँ हैं – संवित् [ पाक्षिकं पत्रम् ], संस्कृत-बाल-संवादः [ मासिकं पत्रम् ], गीर्वाणी [ मासिकं पत्रम् ], महास्विनी [ षाण्मासिकं पत्रम् ], आरण्यकम् [ षाण्मासिकं पत्रम् ], संस्कृत-सम्मेलनम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], अर्वाचीन-संस्कृतम्      [ त्रैमासिकं पत्रम् ], आर्षज्योतिः [ मासिकं पत्रम् ], संस्कृत-प्रतिभा [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-मञ्जरी [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-वार्त्ता [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-विमर्शः [ वार्षिकं पत्रम् ], अभिव्यक्ति-सौरभम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], अतुल्यभारतम् [ मासिकं पत्रम् ], संस्कृतवाणी [ पाक्षिकं पत्रम् ], संस्कृत-सम्वादः [ पाक्षिकं पत्रम् ], संस्कृत-रत्नाकरः [ मासिकं पत्रम्], दिशा-भारती [ त्रैमासिकं पत्रम् ], देव-सायुज्यम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-वर्तमानपत्रम् [ दैनिकं पत्रम् ], विश्वस्य वृत्तान्तम् [ दैनिकं पत्रम् ], संस्कृत-साम्प्रतम् [ मासिकं पत्रम् ], निःश्रेयसम् [षाण्मासिकं पत्रम् ], श्रुतसागरः [ मासिकं पत्रम् ], सेतुबन्धः [ मासिकं पत्रम् ], हितसाधिका [पाक्षिकी पत्रिका], दिव्यज्योतिः [ मासिकं पत्रम् ], रावणेश्वर-काननम् [ मासिकं पत्रम् ], रसना [ मासिकं पत्रम् ], दूर्वा [ त्रैमासिकं पत्रम् ], नाट्यम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], सागरिका [ त्रैमासिकं पत्रम् ], ऋतम् [ द्विभाषिकं मासिकं पत्रम् ], स्रग्धरा [ मासिकं पत्रम् ], अमृतभाषा [ साप्ताहिकं पत्रम् ], प्रियवाक् [ द्वैमासिकं पत्रम् ], दिग्दर्शिनी [ त्रैमासिकं पत्रम् ], वसुन्धरा [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-मन्दाकिनी [ षाण्मासिकं पत्रम् ], लोकप्रज्ञा [ वार्षिकं पत्रम् ], लोकभाषा-सुश्रीः [ मासिकं पत्रम् ], लोकसंस्कृतम् [त्रैमासिकं पत्रम् ], विश्वसंस्कृतम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], स्वरमङ्गला [ त्रैमासिकं पत्रम् ], भारती [ मासिकं पत्रम् ], रचना-विमर्शः [ त्रैमासिकं पत्रम् ], सरस्वती-सौरभम् [ मासिकं पत्रम् ] संस्कृतश्रीः [ मासिकं पत्रम् ], वाक् [ पाक्षिकं पत्रम् ], अजस्रा [ त्रैमासिकं पत्रम् ], परिशीलनम्    [ त्रैमासिकं पत्रम् ], प्रभातम् [ दैनिकं पत्रम् ], व्रजगन्धा [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संगमनी [ त्रैमासिकं पत्रम् ], विश्वभाषा [ त्रैमासिकं पत्रम् ], भास्वती [ षाण्मासिकं पत्रम् ], कथासरित् [ षाण्मासिकं पत्रम् ], दृक् [ षाण्मासिकं पत्रम् ], वाकोवाकीयम्  [ षाण्मासिकं पत्रम् ], वैदिक-ज्योतिः [षाण्मासिकं पत्रम् ], अभिषेचनम् [षाण्मासिकं पत्रम्], अभ्युदयः [षाण्मासिकं पत्रम्] सत्यानन्दम् [ मासिकं पत्रम् ], संस्कृत-साहित्य-परिषत्-पत्रिका [ त्रैमासिकं पत्रम् ] आदि | इन्होंने संस्कृत-पत्रकारिता के क्षेत्र को अधिक सक्रिय बना दिया है | इसके अलावा संस्कृत की एक न्यूज-एजेन्सी है- News in Sanskrit [ News agency ] Hindustan Samachar | अभी-अभी सूचना मिली है कि पूर्वी दिल्ली से पिछले कुछ दिनों से “सृजन-वाणी” नाम का  दैनिक संस्कृत-समाचार-पत्र प्रकाशित किया जा रहा है | इन सब संस्कृत-पत्रकारों और संस्कृत-कर्मियों को हार्दिक अभिनन्दन और मंगलकामनाएँ !

                बहुत-सारी ई-पत्रिकाएँ हैं जिनमें प्राची प्रज्ञा [मासिकी ई-पत्रिका ], जान्हवी [ त्रैमासिकी ई-पत्रिका ], संस्कृत-सर्जना [ त्रैमासिकी ई-पत्रिका ] और सम्प्रति वार्त्ताः [दैनिकं ई-पत्रम् ] आदि प्रमुख हैं |

              सुधी पाठकों को यह जानकर सुखद आश्चर्य भी होगा कि पिछले तीन साल से www.divyavanee.in के नाम से संस्कृत-भाषिक-कार्यक्रमों को प्रसारित करने वाला एक चौबीस घन्टे का online radio भी है जो कि पाण्डिचेरी से डॉ. सम्पदानंद मिश्र के नेतृत्व में चलाया जा रहा है |  

             राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान और श्रीलाल-बहादुर-शास्त्री-राष्ट्रिय-संस्कृत-विद्यापीठ-जैसे संस्थानों और विश्वविद्यालयों ने संस्कृत-पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों को आरम्भ कर दिया है | आशा की जा सकती है कि कुछ ही समय में इन संस्थानों से प्रशिक्षित हो कर संस्कृत के पूर्णकालिक पत्रकार सक्रिय हो जायेंगे |     

              पिछले दो वर्षों में केरल में चार लघु-चलचित्र संस्कृत-भाषा में बन कर दर्शकों को दिखाए जा चुके हैं | थिरुवनंतपुरम् से मलयालम-भाषिक दृश्यवाहिनी “जनम्” ने २०१५ ई. के २-ओक्टोबर से नियमितरूपसे प्रतिदिन १५-मिनिट्स के लिए संस्कृत-समाचारों का प्रसारण आरम्भ  किया है | इन सब तथ्यों के मद्देनज़र, पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि संस्कृत-पत्रकारिता का भविष्य सकारात्मक और उज्जवल है |  

                 

 

 


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Sixth Batch of Learn Sanskrit Modules Starts on November 1, 2016

Mon, 10/17/2016 - 19:11

Dr. Y. N. Rao conducts an e-mail-based Sanskrit Basics’ Course titled ‘LEARN SANSKRIT MODULES’ through the Internet.

This Course is aimed at those aspirants who are at the grass-root level and want to learn the Sanskrit language right from its very basics (Including the Devanagari Script).

The Medium of this Course is English.

This Course is conducted under the aegis of ‘Shri Aurobindo Foundation for Indian Culture’ (SAFIC), Shri Aurobindo Aashram, Puducherry (Pondicherry) and Certificates will be awarded to the successful candidates by SAFIC.

There is no fee. Persons wanting to undertake the course need to only request the prescribed application form  by sending an email to doctorynrao@yahoo.co.in with Cc to jssastry@gmail.com Last date for receiving emails is Monday, October 31, 2016.

Dr. Y. N. Rao is Course Director and Mr. J. S. Sastry is Course-Coordinator.

Happy Learning !

शुभमस्तु !

-o-O-o-

 


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Online Sanskrit Tests / Exams

Wed, 05/11/2016 - 05:02

Prompted by a report received of results of on-line Sanskrit tests conducted in Mumbai (Photo attached) I just did internet search on “online Sanskrit exam” and got information of a whole lot of such initiatives at https://www.google.co.in/webhp?sourceid=chrome-instant&ion=1&espv=2&ie=UTF-8#q=online%20sanskrit%20exam

Here is the photo –


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Lecture on Pāṇini’s Derivational System, Hyderabad 11th Feb 2015

Sat, 02/07/2015 - 10:25

The Department of Sanskrit Studies, University of Hyderabad is organising a
lecture on the “Aspects of Pāṇini’s Derivational System” by distinguished
Prof. George Cardona on 11th february 2015 at 3:00 PM.

Venue: Lecture Hall
School of Humanities
University of Hyderabad

All are welcome.


Regards ,

S.Pavan Kumar
Research Scholar
Department of Sanskrit Studies
University of Hyderabad
Prof C.R road
Gacchibowli
Hyderabad – 500046
Mob: +91 9052954529


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Symposium on Sanskrit Tradition in the Modern World

Wed, 02/04/2015 - 12:30

STIMW – The Sanskrit Tradition in the Modern World

Call for Papers

32nd Annual STIMW Symposium

Fri 29 May, 2015 11 am – 5 pm

University of Manchester

STIMW offers a forum for the discussion of papers on varied aspects of
Indian religions. Proposals are now being invited for this year’s
Symposium. STIMW papers are presented by leading scholars in the field as
well as by research students. They are sent to participants in advance, so
that they can be read and discussed in detail. They are available to those
who cannot attend for a small charge.

Please ensure that your proposal reaches Jackie Hirst (
jacqueline.hirst@manchester.ac.uk) by Fri 27 Feb 2015.

http://www.alc.manchester.ac.uk/stimw/
<http://l.facebook.com/l.php?u=http%3A%2F%2Fwww.alc.manchester.ac.uk%2Fstimw%2F&h=MAQGKnwnE&enc=AZMAgH4tR-mPwb02ldD06pN2Kr82gRuMv6qVcqlf8S85Z1ON09rrtVDEsRssJE7Pwl4XwDe0f4dphau7Wd1O8GLLpLxRTQ9tro0fVLwiPFx_w4eFOcpJDXFow2wuqjvGdmYOyJMx8mt4B9iSNsdB74Ux6QbvI2qo5psL9U39KosJ4Q&s=1&skip_shim_verification=1>

Please use this long link while the site is migrating, if the short link
above is not working:
http://www.alc.manchester.ac.uk/…/relig…/events/conferences/
<http://www.alc.manchester.ac.uk/subjects/religionstheology/events/conferences/>

Special edition of Religions of South Asia 6.2 (2012) Tradition and the
Re-Use of Indic Texts, guest ed. Jacqueline Suthren Hirst, including STIMW
papers: http://www.equinoxjournals.com/index.php/ROSA


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Seminar 13-15 March 2015 at Gurukul Kangdi, Hardwar

Tue, 12/16/2014 - 00:15

Subject – Relevance of Vedas in Perspectives of Global Knowledge Systems

For details contact – Prof. Dineshchandra Shastri<abvs15@gmail.com>

Mobile (+91) 94101 92541

Being Jointly organized by Veda-Vibhag of Gurukul Kangadi Vishwa-vidyalay, Hardwar and Maharshi Sandipani Veda-Vidya Pratishthan, Ujjain


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One Year Course on Sanskrit Computational Linguistics

Sun, 12/14/2014 - 22:55

Email from Mr. Krishnamurthi CG <cgkmurthi@gmail.com>: Dec 13, 2014

http://sanskrit.uohyd.ac.in/~sanskrit/pgdip-portal/index.php

Friends,

Follow the link for one year course on Sanskrit Computational Linguistics.

Eligibility: M.A. Sanskrit any discipline.

Course-contents in brief

In this course one can learn in depth on portions of Vyakarana, Maths & Statistics (including portions from Chandas Shastra), NLP-Linguistics and Computer Programming. A good course for Sanskrit students to learn contemporary tools and technologies and also some of our shastras in-depth.

Please visit the link and enroll for the Entrance exam

Regards
CG Krishnamurthi
Research Scholar
Sanskrit Studies
University of Hyderabad


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Opportunity to take the Cambridge International Examinations (CIE) in Sanskrit

Sun, 02/09/2014 - 10:01

We are happy to bring to your attention that Chinmaya International Foundation (CIF) assisted by St James School in London, UK have a collaborative agreement in offering the students of Sanskrit an opportunity to take the Cambridge International Examinations (CIE) in Sanskrit. 

The examinations are to be conducted in Three Levels:

1.      IGCSE Option A/Option B
2.      Advanced Subsidiary Level (AS)

3.      Advanced Level (A)

CIF is happy to reach out this examination to all our students and Sanskrit enthusiasts to further their Sanskrit learning and achieve International Certification in Sanskrit.

Please find below the details of the Examinations and its pertaining Syllabus and our recommendation to help you choose the Examination Level that you would be able to appear:

1. IGCSE Option A/Option B

Examination Syllabus
Option A (basic level): Grammar
Option B (higher level) : Grammar and Sandhi    
Link to Syllabus Content, Study Material, Past Exam Question Papers; http://www.sanskritexams.org. uk/option-a-syllabus.html
Exam dates: 7th and 8th of May 2014
Exam Fee: 46.50 British Pound (INR 5022) and Center Fee INR 3000 (Total INR 8022)*
Option A: Recommended for Easy Sanskrit Students, IGNOU Certificate Programme Sanskrit Students, Chinmaya International Residential School Class X Students
Option B: Recommended for Advanced Sanskrit Students
Last date for registration is 10th Feb
Contact Class for Exam Preparation at CIF: May 1st to 6th 2014
Contact Class Fee: Inclusive of boarding, lodging, study material, travel to and fro from exam centre
With Non AC Accommodation: INR 5700
With AC Accommodation: INR 8000

Examination Center: Global Public School, Ernakulam (5 kms away from CIF)

 2. Advanced Subsidiary Level (AS Level)

Examination Syllabus
Link to Syllabus Content, Study Material, Past Exam Question Papers,
http://www.sanskritexams.org. uk/About-AS-Level.html
Exam dates: 5th and 6th of June, 2014
Exam Fee: 46.50 British Pound (INR 5022) and Center Fee INR 3000 (Total INR 8022)*
Recommended for Advanced Sanskrit Students, Sandeepany Sadhanalaya 15th batch Students
Last date for registration is 10th Feb
Contact Class for Exam Preparation at CIF: 30th May to 4th June 2014
Contact Class Fee: Inclusive of Boarding, lodging, study material, travel to and fro from exam centre  With Non AC Accommodation: INR 5700 With AC Accommodation: INR 8000 Examination Center: Global Public School, Ernakulam (5 kms away from CIF)3. Advanced Level (A Level)

Examination Syllabus
Link to Syllabus Content, Study Material, Past Exam Question Papers
http://www.sanskritexams.org. uk/A-Level-Syllabus.html
Exam dates: 3rd, 5th and 6th of June, 2014
Exam Fee: 46.50 British Pound (INR 5022) and Center Fee INR 3000 (Total INR 8022)*
Recommended for Advanced Sanskrit Students, Sandeepany Sadhanalaya 15th batch Students, BA Sanskrit and above
Last date for registration is 10th Feb
Contact Class for Exam Preparation at CIF: 28st May to 2nd June 2014
Contact Class Fee: Inclusive of Boarding, lodging, study material, travel to and fro from exam centre
With AC Accommodation: INR 6850
With Non AC Accommodation: INR 10000

Examination Center: Global Public School, Ernakulam, (5 kms away from CIF)

*In case the CIE Exam Fee and Center Fee is not affordable for you we have a bursary programme offered by St. James School,  London who have kindly agreed to assist sincere students and Sanskrit enthusiasts who cannot financially afford. Please confirm the same in the form attached. 

 

Residential Contact Class for Exam preparations:

CIF would be providing the students who would be appearing for the exam, 6 days of refresher and coaching to ensure that the student is fully prepared to take up the Examinations. The classes would be conducted by CIF Sanskrit teachers/ Acharyas who will cover the Exam Syllabus and practice the past exam question papers. Arrangements for the travel to and fro from the exam center will be arranged. Boarding and lodging will be provided on a twin sharing basis. One may chose AC or Non Ac accommodation.

 

Please note that this fee for the Refresher and Coaching Class is compulsory and there is no sponsorship facility available for the same.

 

Registration Procedure:

  • Last date for email confirmation for writing the exam is 10th Feb, 2014. Please fill in the attached Pre Registration Application form and along with scan copy of Date of Birth Proof (Birth Certificate/Passport copy) and send by email latest by 10th Feb to easysa…@chinfo.org
  • Please send the hard copy of the attached form, duly filled along with Date of Birth Proof (self attested copy) and the Exam and Centre Fee(INR 8022) and Residential Contact Class Fee as applicable to the following address: Ms Kalavathy, Administrator, Home Study Courses, Chinmaya International Foundation, Adi Sankara Nilayam, Veliyand PO, Ernakulam District, Kerala 682313. Ph no. +91 484-2749676. This should reach along with the Exam and Centre Fees as well as Contact Class Fee latest by 15th of Feb
  • Payment option of Exam Fee: Cheque /Draft of INR 8022 to be favoring “GPS-CIE Curriculum”, payable at Ernakulam
  • Payment of Residential Contact Class Fee, Cheque/Draft favouring “Chinmaya International Foundation” payable at Ernakulam

Overseas students who would like to take up these Examinations may apply directly to an Examination Center near their residence and correspond with them directly. Please find more details about the centers at http://www.cie.org.uk/i-want- to/find-a-cambridge-school/#\

 

Checklist of Documents:

1.Hard copy of the attached form
2.Self attested proof of date of birth
3. Cheque/Draft of Exam fee and Centre Fee of INR 8022 favouring “GPS- CIE Curriculum”

4. Cheque/Draft of Residential Contact Class Fee favouring Chinmaya International Foundation   Important Dates to remember:

1. Feb 10th for submitting the confirmation and attached application by email
2. Feb 15th for receipt of hard copy of the attached form, duly filled along with Date of Birth Proof (self attested copy) and the Exam and Centre Fee(INR 8022) and Residential Contact Class Fee
3. Exam Dates: IGCSE 7th and 8th of May, AS – 5th and 6th of June, A- 3rd, 5th , 6th of June 20144.Contact Class dates: IGCSE – 1st to 8th May, AS – 30th May to June 4th, A – 28th May to June 6th

Kindly send in your confirmation asap – latest by 10th Feb, 2014.

Above information obtained from message from Dr.V.Sheeba, Deputy Director, CIFSS, Adisankaranilayam, Veliyanadu,  Kerala
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Changed schedule for संस्कृत-भारती’s पत्राचारः and गीतासोपानम् exams in Chennai

Sun, 12/15/2013 - 05:03
Changed schedule for संस्कृत-भारती’s पत्राचारः and गीतासोपानम् exams in Chennai is as follows:   1.  पत्राचारः – Morning 10:00 AM.   2.  गीतासोपानम्  – Afternoon 3:00 PM.    Date : 2nd February(Sunday) 2014.   Venue : Sarada Vidyalaya Girls High School, Burkit Road, T.Nagar, Chennai- 600017.  

Please note the change from the earlier announced schedule of Jan 26 th


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American Sanskrit Institute

Fri, 12/13/2013 - 23:35

Do visit http://www.americansanskrit.com/

On the page “About us” it is said, “.. The American Sanskrit Institute was created in 1989 by Vyaas Houston with a vision of Sanskrit as a direct means to access a personal experience of profound truths described in ancient sacred texts …”

 


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Samskrita Sambhashana Shibiram at Ajman (UAE) 28/9 to 6/10/2013

Sun, 09/29/2013 - 22:33

From: Balasubramanian <balas.skt@gmail.com>
Date: Thu, Sep 26, 2013 at 9:23 AM
Subject: Shibiram – Ajman
Samskrita Sambhashana Shibiram has been arranged at AJMAN from 28th SEP to 6th OCT 2013. The classes will be held in the evening for two hours i.e. from 7:30 pm to 9:30 pm.

All those who are interested in learning this language and willing to attend on all the days without fail may please contact  050 7446370 / 050 7495916 / 055 6329194 to register for the free course.  No prior knowledge of Samskritam is needed to attend this course.

Exact location details will be provided upon registration.  

Please pass on this information to like-minded friends.


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How Sanskrit would grow upon one !

Sun, 08/25/2013 - 09:48

Here is link to an article -

http://www.openthemagazine.com/article/art-culture/a-historical-sense

by Aatish Taseer


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Orientation Course in exploring manuscripts, inscriptions etc.

Thu, 08/15/2013 - 11:01

An orientation course on paleography is being conducted

at Veda Vani Vitan, Oriental Research Institute, Birla Road, Kolgawan,Satna-485001(M.P.)

from 21st September to 3rd October 2013.

It is sponsored by “Rashtriya Sanskrit Sansthan, Deemed University, New Delhi.

Who will benefit – It is beneficial to the students willing to gain special knowledge of scriptology and exploring bright future in manuscripts, inscriptions etc.

Eligibility – The students of M.A.,Acharya, research-scholars are entitled to join the course.

No fee will have to be paid by students. Instead, the stipend @50/=Rs. per day will be disbursed to selected students.

Appeal to professors, experts of the subject – They are cordially invited to deliver special lectures on the subject for one or two days. Along with T.A,D.A. and local hospitality, the certificate of special lecture will be presented to them that will serve the purpose of career advance scheme of the U.G.C. New Delhi. The honorarium will also be paid to the resource persons. So, please spare the time for sending willingness and share with us. I have every hope that you will diffuse the fragrance of experience and expertize up to our students.

Dr. Sudyumna Acharya

Director-Veda Vani Vitan, Oriental Research Institute, Birla Road, Kolgawan,Satna-485001(M.P.)

Email- drsudyumna.acharya@gmail.com


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“प्रत्यभिज्ञाहृदयम्”-विषये कार्यशाला 24-तः 30 जुलै-दिनाङ्केषु कुरुक्षेत्रे

Fri, 07/19/2013 - 13:41

प्राप्तमस्ति निवेदनम् सुरेन्द्रमोहन-मिश्र-महोदयेभ्यः -
“क्षेमराजकृतं प्रत्यभिज्ञाहृदयम्”-विषये अस्त्येका कार्यशालायोजिता सप्ताहतावता 24-तः 30 जुलै-दिनाङ्केषु
कुरुक्षेत्रे कुरुक्षेत्र-विश्वविद्यालये |
अधिकाय विवरणाय संपर्कः कर्तव्यः

  1. सुरेन्द्रमोहन-मिश्र-महोदयः (चलितभाषं – 098960 86579)
  2. अरविन्दकुमार-महोदयः (चलितभाषं – 094660 45738)

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4-Level Correspondence Course from Dubai

Fri, 07/19/2013 - 11:34

Welcome to the beautiful and enriching world of Samskritam, through correspondence

 

Samskritam is one of the world’s ancient languages. Most of the eastern world’s ancient literatures on Philosophy, Social structure, Civilizations, History, Science etc. are available only in Samskritam. Learning Samskritam is the only way to open the doors to the ancient treasure of knowledge and is the gateway to the rich scientific heritage.

 

The Movement called ‘Speak Samskrit Movement’ was started during 1981 in Bangalore and it was later named and registered as Samskrita Bharati in 1995 in Delhi. Samskrita Bharati is an organization of dedicated volunteers, who strive for the popularization of Samskritam, Samskriti and the Knowledge Tradition of Bharat.

 

Here is an opportunity to learn this great language. Patralayadwaara Samskrita Padanam (Learning Samskritam through correspondence) is a structured educational programme developed by Samskrita Bharati, to spread the essence of Samskritam across the globe. This course is developed in a way that it is easy for any student to understand the language and to use the language fluently. Study materials for this unique correspondence programme are available in English, Hindi, Malayalam, Tamil, Telugu, Kannada, Marathi and Gujarati languages.

The programme constitutes of 4 levels (Pravesha, Parichaya, Shikshaa and Kovidaa).  Each level can be completed in a period of 6 months.  Course fee (Inclusive of study materials and exam fee) for each level is AED 30/-. Exams will be conducted twice a year (November and May in UAE). Certificate of completion will be awarded to the students on successful completion of each level.

 

 

Registration for level 1 – Pravesha has just started.

Highlights of Level 1 – Pravesha course:

§    Understand Samskritam/Devanagri lipi

§    Enrich vocabulary significantly

§    Express freely in Samskritam for normal day-to-day conversation

§    Knowledge on basics of Samskritam grammar to converse in simple Samskritam

§    Understand many words and meanings of Samskritam sloka

 

Individuals who are interested in this course may contact us for registration with the following details:

 

Name :

Age :

Postal Address in UAE  :

Contact Number (UAE) :

Email ID :

Education / Occupation :

Postal address in Bharat :

Study materials to be delivered at :

Preferred Language :

Course  :  Pravesha / Parichaya / Shikshaa / Kovidaa

 

We prefer to deliver the study materials at your postal address in Bharat.  Alternatively, study materials can be made available here in UAE for those who opt for the same. For further details please contact 055 1074749 / 050 7446370 or write to samskritabharati.dubai@gmail.com

 

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Email: samskritabharati.dubai@gmail.com
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