संस्कृत की दुनिया

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Updated: 2 days 22 hours ago

संस्कृतविश्व-- डॉ.प्रमोद पाठक

Wed, 05/17/2017 - 01:27
संस्कृत विश्व ( दुनिया )

-- डॉ.प्रमोद पाठक

इस धारावाहिक का शीर्षक “संस्कृतविश्व” होगा तथा यह 13 से 20

भागोंमे प्रसारित करनेका मनोदय है.

आधा घंटा (30 मि.) चलनेवाली यह धारावाहिकाका प्रत्येक भाग

(एपिसोड ) चार विभागोंमे ( सेगमेंटस् ) प्रसारित किया जायेगा-

प्रारंभिक नांदी तथा विषय परिचय-- -- -- -- - 2 मि.

1) धरोहर -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- - 8 मि.

2) संस्कृत भाषा परिचय-- -- -- -- -- 8 मि.

3) रोजगार उपलब्धी-- -- -- -- -- -- -- -- -- - 2 मि.

4) वार्ता विशेष-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- - 2 मि.

अंतीम निवेदन-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- 2 मि.

24 मि.
यह धारवाहिका का प्रारंभ संस्कृत नाटकों का प्रारंभ जिस प्रकारसे

नांदी नमन से होता है, सुत्रधार और नटी निवेदन करते है, उस

प्रकारसे होगा.

हर भाग ( एपिसोड ) की नांदी नयी और अलग-अलग संस्कृत

नाटकोंसे, उस नाटक का उल्लेख करके प्रस्तुत किया जायेगा. तथा

भाग दौरान उसही नाटकके पात्र निवेदन करेंगे. (There will be no

separate anchor as discussed. The narration by these

characters will be regarding the theme of the episode and

will be in a continuous flow.)
इसका उद्देश प्रेक्षकों को (अनायास) उन एकेक नाटक के तथा

उसके रचयिता के बारेमे जानकारी मिलेगी, ये होगा. अंतमे उसी

नाटक का अंतिम चरण या तो नाटक का सुभाषित विशेष प्रस्तुत कर,

पूर्ण विराम दिया जायेगा.

धारावाहिका का स्वरूप स्पष्ट होने के लिए 30 – 35 मि. की

झलक ( ट्रेलर) प्रस्तुत किया जायेगा.

झलक की रूपरेखा (Trailer)

1-- - प्रारंभिक निवेदन -- -- 2 मि.

नांदी -- -- 2 मि.

चुने हुऐ दो नाटकों की नांदी प्रस्तुत की जायेगी—4 मि.

2-- - धरोहर

दो प्रस्तुतीया
अ-- -- - वाराणसी—भारतीय संस्कृती की अनादी काल से नींव

बना शहर -- -- - 8 मि.

ब-- -- - ऋग्वेद परिचय 8 मि.

3-- - सुलभ संस्कृत

भाग पहला

अ-- -- - संस्कृत भाषा,का सुगम परिचय

ब-- -- - चारो प्राकृत अभिजात(CLASSICAL) महाराष्ट्री,

अर्धमागधी, शौरसेनी, पैशाची. भाषाओं का मूलस्त्रोत

क-- -- प्राचीन कालमे अखिल भारत को जोडने वाली भाषा (LINK

LANGUAGE) और कई भाषाओंकी जननी

ड -- -- संस्कृत भाषाका अभिन्न अंग “सुभाषित” संग्रह

भाग दूसरा

, संस्कृत भाषा की विशेषता—नाम, प्रत्यय, क्रियापद, संधी, व्यंजन,

कोई दुसरी भाषा मे नही है. व्दिवचन केवल Lithuania की युरोपिय

भाषा मे है.

प्रत्ययों का उच्चारण और उनका प्रयोग किसी नाम और क्रियापद के

साथ.

पाच दैनंदिन वाक्यों का प्रयोग.

एक सुभाषित पठन.

एक सुभाषित पहेली( उत्तर अगले भाग मे)

3-- - जिविका वृत्ति (रोजगार उपलब्धी)
Employment News के अंकों मे छपी हुयी विज्ञापन की जानकारी

4-- -- वार्ता विशेष

इसमे दैनंदिन वार्ता न देकर खास तरह की रोचक वार्ता देनेका

प्रयास होगा. उनके कुछ उदाहरण दिये है-- -

1. Underground search for the ghost particle – neutrinos

(Indian Express 29/3/2017

ब. Galactic challenge to Einstein’s Gravity

क आकाशस्थ तारकाओं की गिनती 10 24 उसके लिए संस्कृत भाषा

गणना

धरोहर

प्रस्तुती

पुण्यनगरी काशी

इसका चित्रांकन काशी मे किया जायेगा.
1) काशी की महत्ता-- - पुराणों के संदर्भ श्लोक .

इन पुराणों के पुस्तकों के मुखपृष्ठ दिखाये जायेंगे. काशी का सबसे

प्राचीन निर्देश-- - साहित्य के संदर्भ.

2) काशी का पुरातत्व-- - वाराणसी के वस्तुसंग्रहालय का चित्रिकरण

तथा निर्देशक का साक्षात्कार (Director of Museum)और

3—4 वाक्योंमे जानकारी.

3) काशी नरेशों की नामावली तथा विद्यमान काशी नरेश का

साक्षात्कार 2-3 वाक्योंमे.

4) काशी विश्वनाथ मंदिर तथा काशी के घाटों का चित्रण.

5) काशी परिक्रमा की जानकारी तथा काशी का नक्क्षा
परिक्रमा को

लगनेवाला अवधी.
6) काशी के प्रसिध्द गुरूकुल जहा वेद तथा पारंपारिक शास्त्रों का

पारंपारिक पध्दतीसे पठन का चित्रण. विद्यार्थी तथा अध्यापक

गणोंका चित्रीकरण.

7) काशी विश्वविद्यालय तथा संपूर्णानंद विश्वविद्यालय

8) काशी के विद्यमान वैदिक तथा शास्त्री, विव्दानों का साक्षात्कार.

धरोहर

प्रस्तुती

ऋग्वेद की घरोहर

1) इसका प्रारंभ अग्निमिळे से होगा

2) वेदों का उच्चारण किसी तरहसे गलत न हो उसके लिए पाठ

पध्दती, अष्टाविकृति, शब्दक्रम आकडों मे तथा अक्षरोंमे

दिखाया जायेंगा- 1-2- 3, 1-2, 2-1, 2-3 इ. पद, क्रम, जटा,

घन इ.का सस्वर पाठ.

3) ऋग्वेद के मंडल, सूक्त, ऋचा, इनकी जानकारी.

4) ऋग्वेद के कुछ ऋषि, ऋषिकाओं के सूक्तों की जानकारी.

5) ऋग्वेद के संवाद सूक्त जो आगे चलकर नाट्य लेखकों की प्रेरणा

बने. (यहा राजा रविवर्मा का चित्र पुरूरवा – उर्वशी)

6) ऋग्वेद का पारंपारिक अध्ययन करने मे सहाय्यभूत

ग्रंथ—निघण्टु, निरूक्त, सायण भाष्य इ. पर 3-5 वाक्यों मे

जानकारी.

7) ऋग्वेद के आधुनिक भाषांतरकार तथा

भाष्यकार—मँक्समुल्लर, म. दयानंद, सातवळेकर इ.

8) ऋग्वेद के गूढ सूक्त—नासदीय सूक्त, देवानाम् सूक्त,

अस्यवामीय सूक्तों का निर्देश.

9) ऋग्वेद मे निर्देशित कुछ entities का आधुनिक दृष्टिसे स्वरूप

जैसे- वृत्र, अपांनपात इ.

समारोप

प्रारंभ मे जिसका निर्देश किया उस नाटकसे कोई उचीत सुभाषित, वचन या

अंतीम वाक्य . इसके दौरान सभी पात्र प्रेक्षकों के सामने प्रस्तुत करेंगे.












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महाभारत में परिलक्षित भारतीय तत्वज्ञान

Fri, 03/17/2017 - 22:13





।। श्री ।।शोध हेतु परियोजना की रूपरेखामहाभारत में परिलक्षित भारतीय तत्वज्ञान
भांडारकर प्राच्यविद्या शोधसंस्था के तत्वावधान में उपरोक्त संशोधन ग्रंथ का कार्य प्रस्तावित करने का औचित्य है। संस्था की स्थापना सौ वर्ष पूर्व सन १९१७ में हुई। संस्था द्वारा संपादित " Critical Edition of Mahabharat -- (महाभारत ग्रंथ की क्रिटिकल एडिशन) के Prologue में ही प्रमुख संपादक श्री व्ही. एस्. सुखथनकर लिखते हैं कि संस्थाने शैशवावस्था में ही (१९१८) में यह कार्य हाथ में लिया (और १९३३ में पूर्ण किया)
वे लिखते हैं '' The rea ------ ------ -------- ---- ---- - -- ----- ----- महाभारत की Critical editiar के प्रकाशन ( १९३३) के बाद जो दूसरा काम हाथमें लिया वह Cultural Indexing का काम जो...... से ...... चला.
महाभारत संसार का सर्वाधिक विस्तार वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता महर्षि व्यास को वेदव्यास नामसे भी संबोधित किया गया है। मान्यता है कि वेदों की एक लक्षसे भी अधिक ऋचाओंको उनके स्वभावनुसार व विषयानुसार चार वेदों मे अनुक्रमित करने का कार्य वेदव्यासने ही किया है । तो कोई आश्चर्य नही कि वेदों मे निहित अधिकांश विज्ञान , कथ्य व तत्वज्ञान भी महाभारत में प्रतिबिम्बित हो । सही अर्थेंमें माना जा सकता है कि जहाँ महाभारत मे ही तबतक वर्णित तत्वचिंतन की सूत्रबूद्ध और क्रत्तबुद्ध किया। साथ ही कुछ नये अध्याय अपनी ओर से उसमें जोडे ।
इसी परम्परा कोआगे हढाते हुएभांडारकर संस्थाउपरोक्त प्रकार के अध्ययन की व्यवस्था करे यह अनुपंद्यन केंद्र आगे बढाये सर्वथोपरी । 
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दिनांक- १६-०३-२०१७विषय- भांडारकर संस्थेमार्फत महाभारतावरील परियोजना (प्रोजेक्ट) राबविण्याबाबत.प्रति,श्री बहुलकर, मानदसचिव, भांडारकर प्राच्यविद्या शोध संस्था,महोदय,आपल्याशी झालेल्या चर्चेप्रमाणे भांडारकर संस्थेसाठी "महाभारतातपरिलक्षित भारतीय तत्वज्ञान " या विषयावर मी विस्तृत अभ्यास करावा असे स्थूलमानाने ठरले व संस्थेला ही संकल्पना मान्य असल्याचेआपण मला कळविले आहे. तरी या परियोजनेबाबत विस्ताराने हा प्रस्ताव देत आहे.परियोजनेची उद्दिष्टे आणि औचित्य - वेगळे टिप्पणपरियोजनेचे नावं - महाभारत में परिलक्षित भारतीय तत्वज्ञानपरियोजनेची भाषा - हिंदीपरियोजनेचा कालावधी- ३ वर्षे ( सुमारे) -- परियोजनेचे फलित१) दर सहा महिन्यातून एक विस्तृत लेख (सुमारे ३००० ते ४००० शब्द संख्या) ज्या मधे या विषयाशी निगडित एकेका पैलूचा उलगडा असेल २) तीन वर्षाच्या कालावधीनंतर वरील विषयावर एक दर्जेदार असे पुस्तक

परियोजनेकामी भांडारकर संस्थेचे दायित्व --या परियोजनेवर काम करण्यासाठी २ प्रोजेक्ट असोसिएटसची नेमणूक तंयांच्याकामासाठी -१ संगणकमासिक नेमणुकीवर असलेल्या वाहन- चालकाचा पगार फेब्रु २०१७ पासून लागूपरियोजनेवरिल अपेक्षित खर्च एकूण रू. ६० लाख -- वेगळी टिप्पणीतरी संस्थेच्या नियमाप्रमाणे आवश्यक बाबींची पूर्तता करून वरील परियोजनेस मान्यता कळविणेत यावी. दरम्यान मी हा अभ्यास हाती घेतलेला आहे हे आपण जाणताच.कळावे, आपली स्नेहांकित,
लीना मेहेंदळे-------------------------------------------------------------------------------------------------






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चतुरंगिनी सेना की छोटी इकाइयाँ

Thu, 03/16/2017 - 09:24
(नारायण प्रसादकी पोस्टसे)
चतुरंगिनी सेना के लिए प्रयुक्त 'अक्षौहिणी' शब्द से आप सभी लोग परिचित होंगे । इसमें 21870 हाथी, 21870 रथ, 65610 अश्व और 109350 पैदल होते थे । परन्तु चतुरंगिनी सेना के लिए अन्य प्रयुक्त छोटी इकाइयों का उल्लेख साधारणतः मिलता नहीं । यद्यपि इन सभी इकाइयों का उल्लेख पृथक्-पृथक् शब्दों के रूप में वामन आप्टे आदि के संस्कृत कोशों में मिलते हैं, परन्तु एकत्र सामान्यतः नहीं । निम्नलिखित पद्य मुझे बारहवीं शताब्दी के कन्नड कवि नागवर्मा प्रथम के वस्तुकोश में मिला ।

ऒंदुसामजमॊंदुतेर् मूऱश्वमय्दुकालाळ्गळुं पत्तियक्कुं ।
संद पत्ति मूऱागॆ सेनामुखं मूऱऱिं गुल्मं मूऱुगुल्म ॥
क्कॊंदुगणमवु मूऱु वाहिनि तत्रयं पृतनाख्यॆ पृतनॆगळ् मू ।
ऱॊंदितोऱॆ चमु मूऱुमनीकिनि पत्तनीकिनियक्षौहिणियॆनिक्कुं ॥ 327 ॥

इसके अनुसार -
पत्ति = सेना का सबसे छोटा दस्ता जिसमें 1 हाथी, 1 रथ, 3 अश्व और 5 पैदल होते थे ।
सेनामुख = 3 पत्ति
गुल्म = 3 सेनामुख
गण = 3 गुल्म
वाहिनी = 3 गण 
पृतना = 3 वाहिनी
चमू = 3 पृतना
अनीकिनी = 3 चमू
अक्षौहिणी = 10 अनीकिनी
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तुलसीदास के रामचरितमानस में राम द्वारा समुद्र पर सेतु बान्धने पर रावण आश्चर्य से १० मुहों से समुद्र के १० नाम कहता है-
बान्ध्यो वननिधि (समुद्र) नीरनिधि जलधि पयोधि नदीश। सत्य तोयनिधि कम्पति (कम्= जल, पति =स्वामी) उदधि सिन्धु वारीश॥
वन-निधि में जो यात्रा करता है, वह वानर है। समुद्र पार सीता को खोजना, फिर रावण से युद्ध करना था, अतः श्रीराम ने वानरों से मैत्री की। वानर का अपभ्रंश बन्दर का अर्थ आज भी समुद्र का पत्तन (जहां लंगर = कलम्ब गिरता है) है। जैसे-बोर्निओ का बन्दर-श्रीभगवान्, गुजरात का पोरबन्दर, मुम्बई का बोरी-बन्दर (बोरी, पोर-दोनों पुर के अपभ्रंश हैं)-अरुण कुमार उपाध्याय, ९४३७०३४१७२
अजित वडनेरकर <wadnerkar.ajit@gmail.com> 



वन में जलवाची अर्थवत्ता है । मूलतः व वर्ण में जल, गति, शक्ति जैसे भाव समाहित हैं । संस्कृत वन से ही तमिल में वर्षा के लिए वाण है । मोनियर विलियम्स के कोश में भी वन का आशय पानी, सोता, झरना आदि हैं । रामविलास शर्मा ने भाषा और भारतीय समाज पुस्तक में बांग्ला के वन्या और वान/बान शब्दों का संदर्भ जलप्लावन के लिए दिया है ।
Thangam Pushpa <rtpushpa@gmail.com> 



अजित जी,
मेरी जानकारी के अनुसार वर्षा के लिए वान शब्द का प्रयोग तेलुगू भाषा में होता है। तमिल में वर्षा के लिए मळे शब्द प्रयुक्त होता है।










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मराठी शाळेत मराठी टंकलेखन प्रशिक्षणाचा उपक्रम

Tue, 02/21/2017 - 08:29
अहवाल (रिपोर्ट)कौशलम् न्यास व रोटरी क्लब मगरपट्टासिटी हडपसर पुणे यांमार्फत मराठी शाळेत मराठी टंकलेखन प्रशिक्षणाचा उपक्रमदिनांकः १४/११/२०१५ ते २२/११/२०१५.पूर्वचर्चा- श्रीमती. लीना मेहेंदळे (कौशलम् न्यासच्या मुख्य संरक्षक) व श्रीमती. पद्मजा शास्त्री (मेंबर रोटरी क्लब, मगरपट्टासिटी हडपसर) यांच्या पूर्व परिचयाने त्यांच्या रोटरी क्लब कडे असलेल्या पुरोगामी माध्यमिक विद्यालयातील ७ वी ते १० वी वर्गातील विध्यार्थ्यांना दिवाळीच्या सुट्टीमध्ये संगणकावर मराठी टंकलेखन शिकवण्याबाबत चर्चा झाली. सदर बाबत दिनांक २१/१०/२०१५ रोजी कौशलम् ट्रस्ट यांचेकडून पद्मजा शास्त्री व रोटरी क्लब मगरपट्टासिटी, हडपसर पुणे चे एज्युकेशन डायरेक्टर श्री. सुर्यकांत चौधरी यांना इमेल द्वारे प्रशिक्षणाबाबतची माहीती देण्यात आली. त्यानंतर दिवाळी सुट्टीमधील तारखा दिनांक १४/११/२०१५ ते २२/११/२०१५ व प्रशिक्षण हे दोन बॅचेसमध्ये ठरविण्यात आले. मुख्याध्यापक पवार सर यांच्या मान्यतेवरून वेळ १०-०० ते ११-३० मुलींसाठी व ११-३० ते ०१-०० मुलांसाठी ठरविण्यात आली.शाळेचे योगदान - या प्रशिक्षणासाठी पुरोगामी माध्यमिक विद्यालयाने दोन संगणक कक्ष उपलब्ध करूनदिले ज्यामध्ये एकूण ३० संगणक उपलब्ध होते. उपलब्ध विद्यार्थी मुले व मुली बॅच नुसारः बॅच १ - मुली संख्या ६२ वेळ १०-०० ते ११-३० बॅच २ - मुले संख्या ४५ वेळ ११-३० ते ०१-००दिवस १ ते ९ दिनांक १४/११/२०१५ ते २२/११/२०१५प्रत्यक्ष प्रशिक्षणाचा रिपोर्ट- पहिल्या दिवशी दोन्ही ही बॅचेसला सर्वप्रथम इन्स्क्रिप्ट ही संगणक प्रणाली कशी सुरू करतात वत्यामध्ये भाषा मराठी निवडून माक्रोसॉफ्टच्या विन्डोज सेव्हन ऑपरेटींग सिस्टीम मध्ये  ती उपयोगातकशी आणतात हे शिकवले.
Start ---> Control Panel ---> Regional and Language option ---> Regionaloption Tab Select Language 'Marathi(India)' ---> Click Apply
त्यानंतर टास्कबार वर एक लँगवेज बार तयार होतो. व त्यामधून मराठी भाषानिवडून टंकलेखन करावयास शिकवले. सुरुवातीपासूनच आठही बोटे वापरून टंकन करण्याबाबतकटाक्ष ठेवण्यांत आला.  त्यामध्ये सुरूवातीला अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ,अं, अः ही अक्षरे पहील्या दिवशी शिकवली व त्यासाठी विद्यार्थ्यांचा प्रतिसाद चांगला मिळाल्यानेमग दुस-या दिवशी क, ख, ग, घ शिकवले व त्यावरून विद्यार्थ्यांकडून प्रत्येक अक्षरावरील बाराखडीशिकवली. त्यानंतर च, छ, ज, झ पासून ते क्ष, ज्ञ पर्यंत अक्षरे व त्यावरील बाराखडी पूर्ण केलीव वारंवार सराव करून घेतला. त्यामुळे त्यांना अक्षर ओळख व शब्दांना काना, मात्रा, वेलांटी, उकारयांसारख्या गोष्टीचा ही चांगला सराव होतो. त्याबाबतीत ही सर्व विद्यार्थ्यांनी काना, मात्रा, वेलांटी,उकार चांगल्या प्रकारे समजाउन घेतले. बाराखडीचा चांगला सराव झाला आहे हे लक्षात आल्यानंतरत्याच्या दुस-या दिवशी शब्द-जोडशब्द शिकवून त्याचा ही चांगला सराव करवून घेतला. त्यानंतरविद्यार्थ्यांना काही परिश्चेद टाईप करण्यासाठी दिले ते ही त्यांना व्यवस्थीत आठही बोटांचा वापरकरून टाईप केले. व शेवटच्या दिवशी 'मराठी टायपिंगचा क्लास कसा वाटला' या बाबत प्रतिक्रियाम्हणून विद्यार्थ्यांना ८-१० ओळी निबंध लिहुन आणन्यास सांगितला होता. व तो स्वतः विद्यार्थ्यांनीलिहीलेले निबंध विद्यार्थ्यांनी टाईप करून संपूर्ण इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखन ९ दिवस केलेल्याप्रशिक्षणाची सांगता झाली.कौशलम् न्यास व रोटरी क्लब हडपसर यांचे योगदान- सदरहू इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखन शिकवू शकणारे दोन प्रशिक्षक कौशलम् न्यासाने उपलब्धकरावे व त्यांचे मानधन रोटरी क्लबने परस्पर त्यांनाच द्यावे असे ठरले होते त्याप्रमाणे 'कौशलम् न्यासानेश्री योगश जांभळे व कु. प्राजक्ता जांभळे यांची योजना केली. त्या दोघांनी 'रोटरी क्लब मगरपट्टा सिटी हडपसर पुणे'यांच्या उपक्रमाअंतर्गत पुरोगामी माध्यमिक विद्यालयातील मुली-मुलांना शिकवून हे कार्य पूर्ण केले वत्याबद्दलचे मानधन हे 'रोटरी क्लब मगरपट्टा सिटी हडपसर पुणे' यांच्या एज्युकेशन डायरेक्टरांकडून कौशलम् न्यास च्या परस्पर रू. ७०००/- रोख देण्यात आले, प्रत्येकी ३०००/- अधिक प्रवासभत्ता ५००/- असे.इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखनाचा सोपेपणा - हे मराठी टंकलेखन अतिशय सोप्या पद्धतीचे आहे. त्यामध्ये मराठी वर्णमालेनुसार की-बोर्डाची मांडणीकेली आहे. त्यामुळे कि-बोर्डवरील मराठी अक्षरांचे अनुक्रम लक्षात ठेवण्याची कटकट संपते व अतिशय सोप्या पध्दतीने कमी शिक्षण झालेल्या लोकांना इंग्रजी न शिकता ही मराठी टायपिंग अवगत करता येते. या मराठी टंकलेखनाचे वैशिष्ठ्य म्हणजे डाव्या बाजूला स्वर, काना, मात्रा तर उजव्या बाजूला सर्व व्यंजने आहेत. त्यामुळे एकाआड एक दोन्हीं हातांनी टंकन केले जाऊन टंकलेखनाचा वेग वाढण्यास मदत होते. इन्स्क्रिप्ट पद्धतीने केलेले मराठी टंकलेखन इंटरनेटवर टिकून राहते तसेच ते एडीटेबल (Editable) फॉर्म मध्ये जसेच्या तसे उपलब्ध असते. त्याला इंटंरनेटवर टाकण्यासाठी पीडीफ फाइल करावी लागत नाही.इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखनाचे थोडक्यात फायदे- विद्यार्थ्यांनी पहीली इयत्तेत प्रवेश घेतल्यानंतर पुढे शिकत असताना इयत्ता आठवी पर्यंत शिकत येईतोपर्यंत 70 टक्के विद्यार्थी संख्या कमी होऊन जाते, असे संपूर्ण महाराष्ट्र राज्याचा सर्वे आहे. अशा गळालेल्या मुलीमुलांना इंग्रजीचा नेहमीच बाऊ वाटतो. त्यामुळे शिक्षणापासुन वंचित असलेल्या या मुलांना इंग्रजी शिकवणे व पारंगत बनवणे तितके सोपे नाही. संगणकीय कि-बोर्ड हा रोमन मध्ये जरी असला तरी रोमनच्या आधारे मराठी स्पेलिंग करणे या मुलांना कठिणच असते.  त्यामुळे शिक्षणापासून वंचित मुले संगणकापासून वंचितच रहातील असा त्यांचा व आपलादेखील समज असतो. परंतू मराठी वर्णमाला, तसेच मराठी भाषा त्यांना अवगत असते.  अशा  मराठी येणा-या प्रत्येक व्यक्तीला आपण संगणकावर इन्स्क्रिप्ट पध्दतीने मराठी टंकन शिकवू शकतो. त्यांनी ते शिकल्यानंतर सरावाने ते संगणकावर मराठीमध्ये वेगाने टंकन करु शकतात व याचा वापर करून ते नोकरी देखील मिळवू शकतात. पंतप्रधानाच्या 'डिजिटल भारत' या संकल्पनेत संगणकीय ज्ञान व त्याआधारे इंटरनेटचा सुगमतेने वापर अभिप्रेत आहे. ते म्हणतात, 'डिजिटल भारत' या योजनेत प्रत्येक भारतीयाला संगणक हा हाताळता यायला हवा.  याचसाठी इंग्रजी टंकलेखन शिकवण्याच्या मर्यादा विचारात घेऊन इन्स्क्रिप्ट पद्धतीने मराठी टंकन शिकवल्यास एरवी शिक्षणात फारशी प्रगति न करू शकणारी मुलीमुलेदेखील संगणक साक्षर होतात व त्यांना इंटरनेटवरील मराठीतून उपलब्ध असलेला समग्र ज्ञानसाठा तसेच शासनाने ऑनलाइन पुरवलेल्या सर्व सोई उपलब्ध राहू शकतात. याप्रमाणे संगणकावर मराठी टंकशिक्षणाचा उपयोग रोजगार, ज्ञानवृद्धि तसेच शासकीय योजनांचा लाभ अशा तीनही प्रकारे होऊ शकतो.सांगता- मराठी टंकलेखनाचे हे प्रशिक्षण  पुरोगामी माध्यमिक विद्यालयातील १०७ विद्यार्थ्यांनी पूर्ण केले व शेवटच्या दिवशी या प्रशिक्षणाच्या समारोपाच्यावेळी रोटरी क्लबच्या सदस्य तसेचं रोटरी क्लबच्या डायरेक्टरांनी ही सर्व विद्यार्थ्यांना आठही बोटांनी परिच्छेद टंकन करताना पाहीले तेव्हा त्यांनी विद्यार्थ्यांच्या प्रगतिबाबत समाधान व्यक्त केले व रोटरी क्लब तर्फे त्यांच्याकडे दिलेल्या बाकी शाळांमध्येही अशा प्रकारच्या पशिक्षणाबाबत पुढे नियोजन करण्याचे ठरले.----------------------------------------------------------
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रामायणमें शंकू, महाशंकू, खर्व,पद्म इत्यादि

Tue, 12/06/2016 - 17:23
श्री पिटके ंकडून प्राप्तरामायणातील गणित शास्त्र !!!लेखक: श्री. पु. ज्ञा. कुलकर्णीनिवृत्त विद्युत अभियंता व गणितज्ञपुणेप्राचीन काळातील ऋषीमुनींना सूक्ष्मासह मोठमोठ्या संख्यावाचनासाठीचे आवश्यक तेव्हढे उत्तम नि सखोल ज्ञान होते, हे रामायणासारख्या ग्रंथातील श्लोकांचा अभ्यास केल्यास ध्यानांत येते. आजरोजी आपण मात्र येवढ्या मोठ्या संख्या वाचण्याच्या फंदातच पडत नाही हेच खरे. लक्षांश, शतांश, दशांश आणि एक, दहा, शंभर, हजार, लाख, कोटी, अब्ज इथपर्यंतच आपली सर्वसाधारण मजल जाते. यापुढील संख्यावाचनाची आपल्याला प्रत्यक्ष जरी गरज भासत नसली तरी जेव्हा केव्हा अशी गरज भासते तेव्हा आपण दहा लाख, शंभर कोटी,हजार कोटी, हजार अब्ज अशा संज्ञा वापरतो. वाल्मीकी रामायणात अशा संख्याचे नेमक्या शब्दात वर्णन करणारे श्लोक युद्धकांड सर्गात आले आहेत, ते पाहणे व समजून घेणे आपल्याला निश्चितच मनोरंजक वाटेल असे वाटते. कोटीच्या पुढील संख्यांसाठी येथे शंकू, महाशंकू, खर्व,पद्म इ. सारख्या संज्ञांची योजना केली आहे. असो.      
रामायणाच्या युद्धकांड सर्गातील श्लोक ३३ ते ४० हे यादृष्टीने जास्त महत्वाचे आहेत. जिज्ञासूनीं हे श्लोक अवश्य अभ्यासावेत. किंबहूना संपूर्ण रामायण या निमित्ताने अभ्यासावे आणि आपला हा ऐतिहासिक ठेवा किती अमोल नि महत्वाचा आहे हे जाणून घ्यावे. आपल्या पूर्वजांचे गणिती ज्ञान किती समृद्ध होते ते जाणून घावे. ’गणित’ या शब्दात इतर सर्व शास्त्रांचा समावेश होतो असे मला वाटते. येथे ते मूळ संस्कृत श्लोक दिले असून त्याखाली त्याचे मराठीत रुपांतर दिले आहे आणि त्याखाली त्या संख्या घातांकासह मुद्दाम आपल्या माहितीसाठी लिहून दाखवल्या आहेत. यादृष्टीने संस्कृत चा अभ्यास किती महत्वाचा आहे हेही ध्यानात येईल. हा अभ्यास आपण स्वतःहून करावा लागणार आहे, हे ध्यानात घेऊया.    
डॉ.प्र.न.जोशी संपादित सार्थ वाल्मीकिरामायण भाग-३-युद्धकांड अष्टाविंश सर्गः श्लोक३३-४० पुढे नमूद केल्याप्रमाणे होत.
शतं शतसहस्राणां कोटिमाहुर्मनीषिणः । शतं कोटिसहस्राणां शंकुरित्यभिधीयते ॥३३॥
शतं शंकुसहस्राणां महाशंकुरिति स्मृतः। महाशंकुसहस्राणां शतं वृंदमिहोच्यते ॥३४॥
शतं वृंदसहस्राणां महावृंदमितिस्मृतम्‍ । महावृंदसहस्राणां शतं पद्ममिहोच्यते ॥३५॥
शतं पद्मसहस्राणां महापद्ममितिस्मृतम्‍ । महापद्मसहस्राणां शतं खर्वमिहोच्यते ॥३६॥ शतं खर्वसहस्राणां महाखर्वमितिस्मृतम्‍ । महाखर्वसहस्राणां समुद्रमभिधीयते।
शतं समुद्रसाहस्रमोघ इत्यभिधीयते ॥३७॥
शतमोघसहस्राणां महौघा इति विश्रुतः । एवं कोटिसहस्रेण शंकूणां च शतेन च ।  महाशंकुसहस्रेण तथा वृंदशतेन च ॥३८॥
महावृंदसहस्रेण तथा पद्मशतेन च । महापद्मसहस्रेण तथा खर्वशतेन च॥३९॥
समुद्रेण च तेनैव महौघेन तथैव च । एष कोटिमहौघेन समुद्रसदृशेन च ॥४०॥
या श्लोकांचे श्लोकनिहाय मराठीत रुपांतर पुढे दिल्यानुसार होते ते याप्रमाणे—
शंभरलाखएककोटि,शंभरसहस्रकोटिएकशंकू; एकलाखशंकूएकमहाशंकू;एकलाखमहाशंकूएकवृंद॥३३-३४॥ एकलाखवृंदएकमहावृंद;एकलाखमहावृंदएकपद्म;एकलाखपद्मएकमहापद्म;एकलाखमहापद्मएकखर्व॥३५-३६॥ एकलाखखर्व एकमहाखर्व; एकसहस्रमहाखर्व एकसमुद्र; एकलाखसमुद्र एकओघ;॥३७॥ एकलाखओघ एक महौघ; १सहस्रकोटि, शंभरशंकू, १सहस्रमहाशंकू, शंभरवृंद,॥३८॥ सहस्रमहावृंद, शंभरपद्म,सहस्रमहापद्म, शंभरखर्व,॥३९॥
शंभरसमुद्र, शंभरमहौघ, समुद्रसमुद्र, शंभरकोटिमहौघ.॥४०॥असे हे मराठी रुपांतर पाहून त्याचा नेमका बोध होत नाही. कारण हे शब्द आपल्या वापरातील नाहीत,परिचयाचे नाहीत. त्यासाठी त्याचे श्लोकनिहाय नेमक्या गणिती भाषेत रुपांतर करुन ते पुढे नमूद केलेआहेत.हे आपल्याला समजण्यास सुलभ वाटेल असे वाटते.  (येथे 107 म्हणजे 10 चा 7वा घात)
१०७ =१००लाख=१कोटी, १०१२=१०० सहस्रकोटी= १शंकू, १०१७=१लक्षशंकू= १महाशंकू,१०२२=१लक्षमहाशंकू= १वृंद,[३३-३४] १०२७=१लक्षवृंद= १महावृंद,१०३२=१लक्षमहावृंद=१पद्म, १०३७=१लक्षपद्म=१महापद्म, १०४२=१लक्षमहापद्म=१खर्व,[३५-३६] १०४७=१लक्षखर्व=१महाखर्व, १०५०=१सहस्रमहाखर्व=१समुद्र,१०५५=१लक्षसमुद्र=१ओघ, [३७]
१०६०=१लक्षओघ=१महौघ,१०३*१०७= एक सहस्रकोटि,१०२*१०१२=शंभरशंकू,१०३*१०१७=१सहस्रमहाशंकू,१०२*१०२२=शंभरवृंद,[३८]
१०३*१०२७=१सहस्रमहावृंद, १०२*१०३२=शंभरपद्म, १०३*१०३७=सहस्रमहापद्म,१०२*१०४२=शंभर खर्व [३९]
१०२*१०५०=शंभर समुद्र, १०२*१०६०=शंभर महौघ, १०५०*१०५०=१०१००=समुद्रसमुद्र,१०२*१०७*१०६०=शंभरकोटिमहौघ [४०]वर नमूद केलेला दहाचा ७ वा घात म्हणजे एक कोटी हे आपण समजू शकतो पण, दहाचा १००वा घात म्हणजे ’समुद्रसमुद्र’
होय. या संख्येची आपण कल्पनाच करुं शकत नाही. पण आमच्या पूर्वजांना हे चांगले ठाऊक होते. हे अभिमान वाटावे असेच आहे, असे वाटत नाही का? आणि म्हणून रामायण,महाभारत, उपनिषदे, वेद यांचा आपण मूळातून अभ्यास करण्याची गरज आहे. त्यासाठी संस्कृत आलेच पाहिजे, जुन्या कागदपत्रांचा अभ्यास करायचा असेल तर मॊडी लिपी माहित करुन घेतलीच पाहिजे. हे सारे राष्ट्रकार्य आहे असे समजून अभ्यासण्याची गरज आहे. हा ठेवा जास्तीत जास्त लोकांपर्यंत पोचविण्याची गरज
आहे.असो.  मोठ्याकालगणनेसाठी पंचागात मोठमोठ्या संख्यांचा विचार जसा केला जाई तसाच सूक्षकालगणनेसाठी लव,निमिष,पल अशा संज्ञाचा वापर केला जात असे. जाता जाता ही माहिती येथे देणे अप्रस्तुत ठरुं नये. पंचागाचा उपयोग करणार्‍याना या संज्ञा माहित असतात. मला लहानपणापासून पंचाग वाचण्याचा नाद आहे, संवय आहे. कालगणनेसाठी ’लव’ या संज्ञेचा वापर होत असे. ’लव’ म्हणजे शतपत्रातील एका कमलदलाचा भेद करण्यासाठी लोह शलाकेस लागणारा काळ होय. पण याचा नेमका अर्थ काय ते समजत नाही. येथे प्राचीन कालमापनासाठीच्या संज्ञा आपल्या माहितीसाठी देत आहे.
३०लव=१त्रुटी; ३० त्रुटि=१ कला; ३०कला =१ काष्ठा; ३० काष्ठा =१ निमिष, एक निमिष म्हणजे १ चुटकी वाजते तो वेळ होय.८ निमिष= १ मात्रा, एका मात्रेत एक श्वास पूर्ण होतो. ३६० निश्वास= १ घटिका, २ घटिका= १ मुहूर्त, ३० मुहूर्त = अहोरात्र व एक अहोरात्र म्हणजे १दिवस = २४ तास होय. ३६० दिवस=१ वर्ष. हे एक वर्ष म्हणजे देवाचा किंवा ईश्वराचा एक दिवस होय.१२००० ईश्वरी वर्षे म्हणजे एक चतुर्युग.एक हजार चतुर्युगे=ब्रह्माचा एक दिवस. यासच एक कल्प म्हणतात. याविषयी दासबोध दशक ६ समास ४ ओवी २ व ३ मध्ये ”ऐसी चतुर्युगें सहस्र | तो ब्रह्मयाचा येक दिवस ||६.४.२|| असा उल्लेख आलेला आहे. श्रीसूर्य सिद्धांतानुसार २७ महायुगे संपून २८ वे महायुग सध्या चालू आहे. यासंबंधीचा ” चतुर्युग सहस्त्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते” हा श्लोक पंचांगात पाहायला मिळतो. ब्रह्मदेवाचे आयुष्य १०० वर्षे समजले आते, यासच एक पर असे म्हणतात. याच्या अर्धा काळ ”परार्ध” होय.या प्राचीन भारतीय कालमापनाची तुलना सध्याच्या कालमापन पद्धतीशी कशी होते ते समजून घेतल्यास याचे थोडेफार आकलन होण्यास चांगली मदत होते. आंतरजालकावर ही माहिती मिळाली ती खालील प्रमाणे.
१] प्रतिविपल-०.००६ सेकंद; २] ६० प्रतिविपल -१ विपल--०.४.सेकंद; ३] ६०विपल- १पल-विघटी; ४] ६० पल- १ घटिका- दंडा, नाडी- २४ मिनिटे; ५] ६० घटीका– १ दिवस- दिन,वाट, वासर; ६] १० विपल- १प्राण- ४ सेकंद; ७] ६ प्राण-१पल-२४ सेकंद याजबरोबर गुरुवार मध्यरात्री १७-१८ फेब्रु ३१०२ बी.सी.ला कलियुग सुरु झाले असे येथे नमूद केले आहे. असो.कादिनव,टादिनव,पादिपंचक,याद्यष्टक,क्षशून्यम्‍। या सूत्राचा वापर करुन अनेकदा सांकेतिक भाषेत संख्यांचे सादरीकरण केले जात असे. या सूत्रानुसार ”कटपय=१,खठफर=२,गडबल=३,घढभव=४ड.णमश=५चत-ष-=६छथ-स-=७,जद-ह-=८झध-- =९ आणि क्ष=० याप्रमाणे प्रत्येक वर्णाक्षरास अंक कल्पून वेदिकगणितात दिलेल्या  ”शंकराच्य़ा स्तुतिपर स्तोत्राची” उकल, गोवर्धन पीठाचे जगद्गुरु शंकराचार्य भारती तिर्थकृष्ण महाराज यानी, करुन दाखवली. यात ’च’ आणि ’त’ गटातील अनुनासिकांचा वापर केला नसल्याचे दिसून येते. शून्यासाठी ’क्ष’ या वर्णाक्षराचा उपयोग केला आहे. यावरुन संस्कृत भाषेवर प्रभुत्व असणारी पंडित मंडळी या सूत्राचा वापर अत्यंत प्रभावीपणे करत असत असे दिसून येते. अगदी अशाच प्रकारे मराठी भाषेचा वापर करुन श्री समर्थानी गुप्त संदेश दिले असल्याचे अनेक ठिकाणी आढळते.      गोपीभाग्यमधुव्रात । शृंगिशोदधि संधिग । खल जीवित खाताव । गलहालार संधर ॥ हा श्लोक वरवर पाहाता श्रीशंकराची स्तुति करण्यासाठी योजला आहेपण प्रत्यक्षात मात्र हा श्लोक म्हणजे पाय या चिन्हाची ३२ अंकी किंमत आहे. वर्तुळाचा परिघ आणि त्याचा व्यास यांचे गुणोत्तर म्हणजे ’पाय’ होय. रोजच्या व्यवहारात आपण त्याची किंमत २२/७ किंवा ३.१४ इतकीच घेतोपण येथे मात्र ती प्रत्येक चरणात ८अंक याप्रमाणे ४ चरणात मिळून ३२ अंकी दिलेली आहे.वर दिलेला मंत्र या श्लोकातील अक्षरांचे अंकात रुपांतर करण्यासाठी उपयोगी पडतो.येथे ’गोपी’ म्हणजे गप=३१,भाग्यम म्हणजे भगम=४३५धुव्रात= ९४६ यावरुन पहिला चरण ३१४३५९४६ हे अंक दर्शवतो. २रा चरण शृंगि =५३,शोदधि=५८९,संधिग=७९३ म्हणजेच ५३५८९७९३ हे अंक दर्शवतो,३रा चरण खल=२३,जीवित=८४६,खाताव=२६४ म्हणजेच २३८४६२६४ हे अंक तर ४था चरण ”गल हालार संधर” = ३३८३२७९२ हे अंक दाखवतो. याप्रमाणे चारी चरणाचे सर्व अंक त्या अनुक्रमाने मांडल्यास पाय= ३.१४३५९४६ ५३५८९७९३ २३८४६२६४ ३३८३२७९२ अशी ३२ अंकी मिळते. असो.याप्रमाणे, भारतिय प्राचीन गणित किती समृद्ध आहे, याची ही नुसती झलक आहे. अजूनही बरेच कांही सांगता येण्यासारखे आहे. परंतु येथे केवळ त्याची तोंड ओळख करुन देणे येव्हढाच उद्देश्य आहे. ही ओळख करुन दिल्यावर आपण सखोल अभ्यासाला प्रवृत्त व्हाल अशी अपेक्षा आहे. निदान या प्राचीन ग्रंथांचा अभ्यास डोळसपणे करण्यासाठी प्रयत्‍नरत व्हाल तर या लेखाचा तो उद्देश्य सफल झाला असे समजता येईल. इदम्‍ न मम ! जयजय रघुविर समर्थ! श्रीरामकृष्णार्पणमस्तु !संदर्भ: १] सार्थ वाल्मीकिरामायण भाग ३- डॉ. प्र.न.जोशी आवृत्ती शके १९०६ २] सार्थ दासबोध-के.वि.बेलसरे ३] प.पू.शंकराचार्य भारति तिर्थकृष्ण महाराज यांच्या वेदिक गणितावर१९८० दरम्यान स्वतः अभ्यास करुन काढलेल्या टीपांच्या नोंदीवरुन.
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पठामि संस्कृतं १६५ वैदिक गणित

Sat, 12/03/2016 - 12:29
अयि मित्रगणाः स्वागतमस्तु। एतस्य रेडियो मधुबनस्य श्राव्यमंचे अहं लीना मेहेंदळे अद्य  पुनरपि एकवारं उपस्थिता अस्मि । पुनरपि एकवारं  भवन्तः श्रृण्वन्तु अस्माकं प्रिय कार्यक्रमम पठामि संस्कृतम् इति।अयि मित्रगणाः अद्य अहं वैदिक गणितस्य पञ्च सूत्राणि पठिष्यामः । एतानि सूत्राणि संख्यायाम् वर्गस्य गणनायै अतीव उपयक्ताः। एतानि सरलानि नास्ति। अतएव विशेषरूपेण ज्ञातव्याः, मन्तव्याः च।आगच्छन्तु, पठिष्यामः एतानि सूत्राणि ।






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एकवचनद्विवचनNominativeज्ञातव्याज्ञातव्येज्ञातव्याः Vocativeज्ञातव्ये ज्ञातव्येज्ञातव्याः Accusativeज्ञातव्याम्ज्ञातव्येज्ञातव्याःInstrumentalज्ञातव्यया ज्ञातव्याभ्याम्ज्ञातव्याभिःDativeज्ञातव्यायै ज्ञातव्याभ्याम्ज्ञातव्याभ्यःAblativeज्ञातव्यायाःज्ञातव्याभ्याम्jज्ञातव्याभ्यःGenitiveज्ञातव्यायाःज्ञातव्ययोः ज्ञातव्यानाम्Locativeज्ञातव्यायाम्ज्ञातव्ययोः ज्ञातव्यासु 
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BHARTEEY Kal Ganana

Sat, 12/03/2016 - 11:26

Received from Vinay, BangloreKal Ganana on Cosmic Scale(To verify)Kal Ganana for Cosmic Scale, is decided wrt Brahma.Brahma’s life span is 100 cosmic yrs, each cosmic yr comprising of 300 cosmic days & 300 cosmic nights. Brahma creates a Universe every cosmic day in the morning and destroys it every cosmic day in the evening. So, in his lifetime, He  creates  and destroys universe 30,000 times. Each creation is called Kalpa and its destruction called Kalpant. 
Kal  Ganana On Human Scale  is done wrt Kalpa. It consists of 4.32 billion yrs. Current Kalpa is called Svetvaraha Kalpa.Kalpa --> ManvantarOne Kalpa consists of 14 Manvantars & 15 Sandhyas (the gap between two Manvantars). The 14 Manvantars for this Kalpa are named as: Swayambhuva, Swarochisa, Uttama, Taamasa, Raivata, Chaakshusah, Vaivasvat, Savarni, Daksha-Savarni, Brahma-Savarni, Dharma-Savarni, Rudra-Savarni, Dev-Savarni & Indra-Savarni. Our current Manvantar is ‘Vaivasvat’ the 7th Manvantar.Manvantar --> MahayugEach Manvantar has 71 Mahayuga. The 15 Sandhyas together last for 6 Mahayuga. So, each Kalpa consists of [(14 x71) + 6] = 1000 Mahayugas.Mahayug --> KaliyugEach Mahayuga consists of 4.32 million yrs and is divided as follows: 1 Sat Yuga [17,28,000 yrs], 1 Treta Yuga [12,96,000 yrs], 1 Dwapar Yuga [8,64,000 yrs] and 1 Kali Yuga [4,32,000 yrs]. 1 Mahayuga is Kaliyuga x 10 = 4,32 0000 yrsCurrently we are in 28th MahayugaStart of Kali Yug is called Yugabda. Currently (starting from 22 March 2016)  we are in is the 5118th year of  Yugabda.So for the present Kalp, (Creation), 27 out of 1000 Mahayug have passed, each being 4,32,0000 yrs. In the 28 th Mahayug too, the Satya, Treta and Dwapar have passed (Together 4,32,000 x 9 = 3888000 yrs) and so also 5117 yrs of Kaliyug. Thus life of present Creation is 4320000 x 27 = 116640000 yrs + 3888000 yrs + 5117 yrsTotally  11,67,33117 yrs say 12 Karod Varsh(Looks like too small a figure)





























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संस्कृत-पत्रकारिता : इतिहास एवं अधुनातन स्वरूप... डॉ. बलदेवानन्द सागर

Sun, 11/27/2016 - 21:01
संस्कृत-पत्रकारिता : इतिहास एवं अधुनातन स्वरूप...
  • डॉ. बलदेवानन्द सागर
संस्कृत-पत्रकारिता के बारे में कुछ कहने से पहले मैं सुधी पाठकों को ये बताना चाहूँगा कि भले ही, सामान्यरूप से हिन्दी, अंग्रेजी या अन्य प्रचलित भाषाओं की पत्रकारिता केसमानसंस्कृत-पत्रकारिता की चर्चा न होती हो; परआप को यह जानकर आश्चर्य होगा किआज, इस इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे आधे दशक में भी, भारत के प्रायः सभी राज्यों और कुछ विदेशों में भी संस्कृत-पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं | एक प्रामाणिक समीक्षक के रूप में संस्कृत-पत्रकारिता के विषय में कुछ कहने के लिए अभी मैं मनोमन्थन करके आपके सामने जो कुछ रखने जा रहा हूँ, वो मात्र एक लेखक के रूप में ही नहीं, परन्तु पिछले ४२ वर्षों से आकाशवाणी के साथ-साथ, २२ वर्षों के दूरदर्शन के भी संस्कृत-समाचारों के सम्पादन, अनुवाद और प्रसारण के दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर “संस्कृत-पत्रकारिता के इतिहास एवं अधुनातन स्वरूप”की व्याख्या करने का विनम्र प्रयास कर रहा हूँ | संस्कृत-पत्रकारिता का इतिहास- जब भी हिन्दी-पत्रकारिता की बात होती है तो हिन्दी के प्रथम पत्र “उदन्त-मार्तण्ड” [ १८२६ ई., सम्पादक- पं.जुगलकिशोर-शुकुल] कासन्दर्भ अवश्य दिया जाता है | ठीक उसी तरह से, संस्कृत-पत्रकारिता के इतिहास में ईस्वी सन्१८६६ में पहली जून को काशी से प्रकाशित “काशीविद्यासुधानिधिः” का उल्लेख अवश्य होता है | संस्कृत-पत्रकारिता की इस प्रथम-पत्रिका का दूसरा नाम था –“ पण्डित-पत्रिका |” अभी, जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ तो संस्कृत-पत्रकारिता के १५० वर्ष और प्रायः दो महीने पूरे हो रहे हैं | इस बात को ध्यान में रखकर संस्कृत-प्रेमियों और संस्कृतज्ञों के एकराष्ट्रव्यापीस्वैच्छिक-संघठन “भारतीय संस्कृत-पत्रकार संघ” [पञ्जी.] ने इस पूरे वर्ष में राष्ट्रीय-स्तर पर अनेक कार्यशालाओं और संगोष्ठियों के आयोजन का संकल्प किया है | यह तथ्य, इस बात का द्योतक है कि संस्कृत-पत्रकारिता को व्यावहारिक रूप में राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए संस्कृत-कर्मीदिन-रातअथक प्रयास कर रहे हैं | संस्कृत-पत्रकारिता के इतिहास की बात दोहराते हुए कहना चाहूँगा कि “काशीविद्यासुधानिधिः” [१-जून,१८६६] से शुरू हुयी इस संस्कृत-पत्रकारिता की यात्रा में अनेक छोटे-बड़े पड़ाव आये | इस बिन्दु को समझने के लिए लोकमान्य तिलक जी केमराठी-भाषिक‘केसरी’ का उल्लेख करना चाहूँगा | भारत की भाषाई-पत्रकारिताकेइतिहास में,वैसे तो अनेक दैनिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है किन्तु ‘केसरी’ की बात कुछ ख़ास है | विष्णु शास्त्री चिपलूणकर, बालगंगाधर तिलक, वामन शिवराम आप्टे, गणेश कृष्ण गर्दे, गोपाल गणेश आगरकर और महादेव वल्लभ नामजोशी के हस्ताक्षरों के साथ ‘केसरी’ का उद्देश्य-पत्र १८८०ईस्वी. की विजयादशमी को मुम्बई के ‘नेटिव-ओपिनियन’ में प्रकाशित कराया गया | ‘केसरी’ के प्रकाशन का निर्णय तो हो गया लेकिन मुद्रण के लिए पूँजी की समस्या थी | अन्ततः नामजोशी की व्यावहारिक-कुशलता के साथ ४-जनवरी १८८१ को पुणे से साप्ताहिक ‘केसरी’ [मराठी] का प्रति मंगलवार को प्रकाशन होने लगा | जिस बात की ओर मैं संकेत करना कहता हूँ, वह है पण्डितराज जगन्नाथके “भामिनीविलास”का वह समुपयुक्त संस्कृत-श्लोक, जो ‘केसरी’ के उद्देश्य और कार्य को द्योतित करता है | विष्णु शास्त्री चिपलूणकर द्वारा चुना गया और ‘केसरी’ के मुखपृष्ठ पर छपा यह श्लोक इस प्रकार है – “स्थितिं नो रे दध्याः क्षणमपि मदान्धेक्षण-सखे !, गज-श्रेणीनाथ ! त्वमिह जटिलायां वनभुवि | असौ कुम्भि-भ्रान्त्या खरनखरविद्रावित-महा-गुरु-ग्राव-ग्रामः स्वपिति गिरिगर्भे हरिपतिः ||”[ अर्थात् हे गजेन्द्र ! इस जटिल वन-भूमि मेंतुम पलभर के लिए भी मत रूको, क्योंकि यहाँ पर पर्वत-गुफा में वह केसरी [हरिपति] सो रहा है जिसने हाथी के माथे-जैसीदिखने की भ्रान्ति में बड़ी-बड़ी शिलाओं को भी अपने कठोर नाखूनों से चूर-चूर [विद्रावित] कर दिया है ] मेरा विनम्र मन्तव्य यही है कि तत्कालीन भाषाई-पत्रकारिता के लेखक- सम्पादक-प्रकाशक बहुतायत संख्या मेंया तो संस्कृत के जानकार या विशेषज्ञ थे या संस्कृत के प्रति निष्ठावान्थेऔरपत्रकारिता केसमर्पित कार्य के लिए संस्कृत के समृद्ध साहित्य का आश्रय लेते थे | चूँकि स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए जन-सामान्य की भाषा में संचार और सम्वाद करना ज़रूरी था, इसलिए विभिन्न भारतीय भाषाओं में तुलनात्मक-रूपसेअधिक और संस्कृत में कम,पत्र-पत्रिकाएँ छपती रहीं | किन्तु भारत के सभी राज्यों से प्रकाशित होने वाली संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो किसी एक प्रान्तीय-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी या अंग्रेजी-उर्दू की तुलना में समग्ररूपसे संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं की संख्या अधिक मानी जा सकती है | शोध के आधार पर यह संख्या १२० से १३० के बीच की कही जा सकती है | इस छोटे-से आलेख में पूरे डेढ़-सौ सालों के इतिहास को विस्तार से देना तो सम्भव नहीं है किन्तु कुछ मुख्यसंस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन करें, तो दो प्रकार की संस्कृत-पत्रिकाएँ बहुतायत से मिलती हैं | एक तो वे जो मुख्यरूप से शोध-पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती रहीं और शोध-लेखों, प्राचीन-ग्रन्थों और पाण्डुलिपिओं को ही प्रकाशित करती रहीं | दूसरी वें, जो एक सामान्य साप्ताहिक, पाक्षिकया मासिक पत्रिका के कलेवर में प्रकाशित की जाती थीं, जिनमें प्रायः सभी विषयों की सामग्री छपी मिलती थीं | आज स्थिति मेंबहुत अधिक परिवर्तन हुआ है | ऐसा लग रहा है कि संस्कृत-पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है | आश्वस्ति के साथ कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब युवा पीढ़ी के अधिकाधिक युवक-युवतियाँ संस्कृत पढ़ना-लिखना और बोलना पसन्द करेंगे और सामाजिक संचार-माध्यमों में सभी भाषाओं की अपेक्षा संस्कृत-विद्या का अधिक प्रयोग होगा आइये, अब कुछ विशेष पत्र-पत्रिकाओं की बात करें – संस्कृतपत्रकारिता स्वतन्त्रता-संग्राम की एक विशिष्ट उपलब्धि है | नवीन विचारों के सूत्रपात और राष्ट्रीयता की वृद्धि में इस ने अभूतपूर्व योगदान किया है | शोध से ये तथ्य सामने आया है कि ईस्वी सन् १८३२ मेंबंगाल की एशियाटिक सोसाइटी ने अंग्रेजी और संस्कृत में एक द्विभाषी शोध-पत्रिका प्रकाशित कीथी| इस पत्रिका में संस्कृत साहित्य की गवेषणाओं एवं पुरातन सामग्री से आपूरित लेखादि प्रकाशित होते थे | इसने अंग्रेजी पढ़े-लिखे संस्कृतज्ञों के हृदय में नवीन चेतना का संचार किया और राष्ट्र, भाषा एवं साहित्य के प्रति गौरव का भाव जागृत किया | जैसा कि पहले उल्लेख कर चुके हैं,१ जून,१८६६ ई. को काशी-स्थित गवर्नमेण्टसंस्कृतकॉलेज ने “काशी-विद्यासुधा-निधिः” अथवा “पण्डित” नामक मासिक-पत्र का प्रकाशन किया | काशी से ही १९६७ ई. में “क्रमनन्दिनी” का प्रकाशन आरम्भ हुआ | विशुद्ध संस्कृत की ये दोनों पत्रिकाएँ प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का प्रकाशन करती थीं | इनमें विशुद्ध समाचार-पत्रों के लक्षण नहीं थे | एप्रिल, १८७२ ई. में लाहौर से “विद्योदयः” नए साज-सज्जा के साथ शुद्ध समाचार-पत्र के रूप में अवतरित हुआ | हृषीकेश भट्टाचार्य के सम्पादकत्व में इस पत्रिका ने संस्कृत-पत्रकारिता को अपूर्व सम्बल प्रदान किया | “विद्योदयः” से प्रेरणा पाकर संस्कृत में अनेक नयी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं | बिहार का पहला संस्कृत-पत्र १८७८ ई. में “विद्यार्थी” के नाम से पटना से निकला | यह मासिक पत्र १८८० ई. तक पटना से नियमित निकलता रहा और बाद में उदयपुर चला गया, जहाँ से पाक्षिक रूप में प्रकाशित होने लगा | कुछ समय बाद, यह पत्रिका श्रीनाथद्वारा से प्रकाशित होने लगी | आगे चल कर यह हिन्दी की “हरिश्चन्द्र-चन्द्रिका” और “मोहनचन्द्रिका” पत्रिकाओं में मिलकर प्रकाशित होने लगी | यह संस्कृत-भाषा का पहला पाक्षिक-पत्र था जिसके सम्पादक पं. दामोदर शास्त्री थे एवं इसमें यथानाम प्रायः विद्यार्थिओं की आवश्यकता और हित को ध्यान में रखते हुए सामग्री प्रकाशित की जाती थी | १८८० ई. में पटना से मासिक ‘धर्मनीति-तत्त्वम्’ का प्रकाशन हुआ, किन्तु इसके विषयमेंकोई ख़ास जानकारी नहीं मिल पाती है और नहीं इसका कोई अंक उपलब्ध है | १७-अक्टूबर, १८८४ ई. को कुट्टूर [केरल] से ‘विज्ञान-चिन्तामणिः’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ | कुछ समय बाद, प्रचारातिरेक के कारण यह पत्रिकापाक्षिक, दशाह्निक और अन्ततः साप्ताहिक हो गयी | नीलकान्त शास्त्री के सम्पादकत्व में यह पत्रिका संस्कृत-पत्रकारिता के विकास में मील का पत्थर सिद्ध हुयी | संस्कृत की समृद्धि, प्रतिष्ठा और शिक्षाप्रणाली के परिष्कार के लिए पं. अम्बिकादत्त व्यास द्वारा १८८७ ई. में स्थापित संस्था ‘बिहार-संस्कृत-संजीवन-समाजः’, संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रहा | इसकी पहली बैठक ५-एप्रिल, १८८७ ई. में हुयी, जिसकी अध्यक्षता पॉप जॉन्बेन्जिन्ने की थी | इसमें अनेक राज्यों से बहुत-सारे लोग आये थे | सचिव स्वयं पं. अम्बिकादत्त व्यास जी थे | इस समाज द्वारा १९४० ई. में त्रैमासिक के रूप में ‘संस्कृत-सञ्जीवनम्’ का प्रकाशन आरम्भ किया गयाथा| १९वीँ शताब्दी के अन्तिम दो दशकों में बहुत-सारी संस्कृत-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ | राष्ट्रिय-आन्दोलन की दृष्टि से, इन सब में “संस्कृत-चन्द्रिका” और “सहृदया” का विशेष स्थान है |पहले कोलकोता और बाद में कोल्हापुर से प्रकाशित होने वाली “संस्कृत-चन्द्रिका” ने अप्पाशास्त्री राशिवडेकर के सम्पादकत्व में अपार ख्याति अर्जित की | अपने राजनीतिक लेखों के कारण अप्पाशास्त्री को कई बार जेल जाना पड़ा | संस्कृत-भाषा का पोषण और सम्वर्धन, संस्कृत-भाषाविदों में उदार दृष्टिकोण का प्रचार तथा सुषुप्त संस्कृतज्ञों को राष्ट्र-हित के लिए जगाना आदि उद्देश्यों को ध्यान में रखकर “सहृदया” ने राष्ट्रिय-आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी | २०वीं शताब्दी के आरम्भ में लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में सारे देश ने स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया था| संस्कृत-पत्रकारिता के लिए ये सम्वर्धन का युग था | उस अवधि में देश के विभिन्न भागों से अनेक संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिनमें ‘भारतधर्म’ [१९०१ ई.], ‘श्रीकाशीपत्रिका’ [१९०७ ई.], ‘विद्या’ [१९१३ ई.], ‘शारदा’ [१९१५ ई.], ’संस्कृत-साकेतम्’ [१९२० ई.] वगैरह प्रमुख थीं | ‘अर्वाचीन संस्कृत साहित्य’ के अनुसार १९१८ ई. में पटना से पाक्षिक ‘मित्रम्’ का प्रकाशन शुरू हुआ था | इसका प्रकाशन ‘संस्कृत-संजीवन-समाज’ करता था | स्वतन्त्रता संग्राम के दिनों में दूसरी प्रमुख संस्कृत-पत्रिकाएँ थीं – ‘आनन्दपत्रिका’ [१९२३ ई.], ‘गीर्वाण’ [१९२४ ई.], ‘शारदा’ [१९२४ ई.], ‘श्रीः’ [१९३१ ई.], ‘उषा’ [१९३४ ई.], ‘संस्कृत-ग्रन्थमाला’ [१९३६ ई.], ‘भारतश्रीः’ [१९४० ई.] आदि | १९३८ ई. में कानपुर से अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मलेन का मासिक मुखपत्र “संस्कृत-रत्नाकरः” आरम्भ हुआ | श्रीकेदारनाथ शर्मा इसके सारस्वत सम्पादक-प्रकाशक थे | १९४३ ई. में राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ की त्रैमासिक पत्रिका “गंगानाथ झा रिसर्च जर्नल” आरम्भ की गई | स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद की प्रमुख संस्कृत-पत्रिकाओं में, ‘ब्राह्मण-महासम्मेलनम्’ [१९४८ ई.],‘गुरुकुलपत्रिका’[१९४८ ई.], ‘भारती’ [१९५० ई.], ‘संस्कृत-भवितव्यम्’ [१९५२ ई.], ‘दिव्यज्योतिः’ [१९५६ ई.], ‘शारदा’ [१९५९ ई.], ‘विश्व-संस्कृतम्’ [१९६३ ई.], ‘संविद्’ [१९६५ ई.], ‘गाण्डीवम्’ [१९६६ ई.], ‘सुप्रभातम्’ [१९७६ ई.], ‘संस्कृत-श्रीः’ [१९७६ ई.] ‘प्रभातम्’ [१९८० ई.], ‘लोकसंस्कृतम्’ [१९८३ ई.], ‘व्रजगन्धा’ [१९८८ ई.], ‘श्यामला’ [१९८९ ई.] आदि गिनी जाती हैं | इसी अवधि में[१९७० ई.में]संस्कृत-पत्रकारिता के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक घटना हुयी जिसके महानायक थे – मैसूरू, कर्नाटकके सुप्रसिद्ध संस्कृत-विद्वान्, गीर्वाणवाणीभूषण, विद्यानिधि,पण्डित-कळले-नडादूरु-वरदराजय्यङ्गार्य, जिन्होंनेमैसूरू से“सुधर्मा” नामक दैनिक संस्कृत समाचार-पत्र प्रकाशित कर केविश्व-पत्रकारिता के मञ्चपर संस्कृत-पत्रकारिता का ध्वज फहरा दिया | यद्यपि १९०७ ई., १-जनवरी को थिरुअनन्तपुरम् [केरळ] से “जयन्ती” नामक दैनिक संस्कृत-समाचार-पत्र प्रकाशित कर के श्रीकोमल-मारुताचार्य और श्रीलक्ष्मीनन्द-स्वामी ने एक अभूतपूर्व साहस किया था किन्तु धन और ग्राहक-पाठक के अभाव में इससंस्कृत-दैनिकका प्रकाशनकुछ दिनों बादहीबन्द करना पड़ा | कालान्तरमें,कानपुर सेभीकुछसमयतक“सुप्रभातम्” नाम का दैनिक संस्कृत-समाचार-पत्र निकलता रहा किन्तु पाठक-ग्राहक के अभाव मेंबन्द करना पड़ा |संस्कृत-पत्रकारिता का अधुनातन स्वरूप – संस्कृत भारत की सांस्कृतिक-धरोहर है | इस राष्ट्र की पहचान और अस्मिता है | स्वतन्त्र-भारत की भाषाई नीति के चक्रव्यूह में न पड़कर आज संस्कृतपत्रकारिता के क्षेत्र में नित-नूतन हो रहे प्रयोगों की पड़ताल करें तो लगता है कि विश्व की अधिकाधिक भाषाएँ, इस वैज्ञानिक और गणितात्मक वाणी-विज्ञान से लाभान्वित हो रही हैं | computational linguistic science को परिपोषित और सम्वर्धित करने में संस्कृत के शब्दानुशासन से अधिकाधिक मदद ली जा रही है | ऐसे परिदृश्य में किन्हीं कारणों से शिथिल-गति वाली संस्कृत-पत्रकारिता अब, आधुनिक संचार माध्यमों के सर्वविध क्षेत्रों में और सामाजिक संचार माध्यमों में अपनी उपयोगिता और प्रभाव को स्थापित कर रही है | यदि हम संस्कृत-पत्रकारिता के आधुनिक-युग को इक्कीसवीं शताब्दी का आरम्भ-काल मानें, तो थोड़ा सिंहावलोकन करके बीसवीं शताब्दी के अन्तिम तीन दशकों में हुयी सूचना-क्रान्ति और तकनीकी विकास-प्रक्रिया की समीक्षा को भी व्यापक-परिधि में समझना होगा | आप सुधी पाठक मेरा संकेत समझ गए होंगे | अभी-अभी हमने, संक्षेप में संस्कृत-पत्रकारिता के डेढ़सौ वर्षों के संक्षिप्त इतिहास का विहंगम-अवलोकन किया | इसी शृंखला में एक और ऐतिहासिक घटना हुयी और भारत-सरकार के सूचना-प्रसारण-मन्त्रालय ने आरम्भ में प्रयोगात्मक-रूप से १९७४ ई. के ३०-जून को सुबह ९-बजे, आकाशवाणी के दिल्ली-केंद्र से संस्कृत-समाचारों का प्रसारण करके उन तमाम भ्रान्तियों और मिथकों को ध्वस्त कर दिया, जो कहते थे कि संस्कृत, आम बोलचाल की भाषा नहीं हो सकती है या तकनीकी विचारों को संस्कृत में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है | इस राष्ट्रिय समाचार-प्रसारण की लोकप्रियता और सर्वजन-ग्राह्यता के कारण, कुछ महीनों बाद, पाँच-मिनिट का संस्कृत-समाचारप्रसारण का एक और बुलेटिन शाम को [६.१० बजे] प्रसारित होने लगा | इतना ही नहीं, १९९४ ई. में २१-अगस्त, रविवार को दूरदर्शन ने साप्ताहिक संस्कृत-समाचार प्रसारण आरम्भ करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया | सौभाग्य से, दूरदर्शन से प्रथम संस्कृत-समाचार प्रसारण का सौभाग्य इन पंक्तियों के लेखक को मिला | कुछ वर्षों बाद दूरदर्शन का यह साप्ताहिक प्रसारण, प्रतिदिन पाँच मिनिट के लिए कर दिया गया | इसी काल-खण्ड में, एक और ऐतिहासिक घटना के कारण संस्कृत-पत्रकारिता की मन्द गति तीव्रतर बन गयी | संस्कृत के कुछ उत्साही युवा इन दशकों में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के लिए संगठनात्मक-रूप से सक्रिय थे और राष्ट्रव्यापी अभियान के तहत यह कार्य कर रहे थे | बंगलूरु में कार्यरत “हिन्दू-सेवा-प्रतिष्ठानम्” औरअधुनातनरूप में, “संस्कृत-भारती”तथा “लोकभाषा-प्रचार-समितिः” आदि कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हों ने संस्कृत-पत्रकारिता के अधुनातन स्वरूप को व्यवस्थित और व्यापक बनाकर प्रत्येक संस्कृत-अनुरागी को आश्वस्त किया कि वह दिन दूर नहीं जब भारत का युवा नागरिक संस्कृत में धाराप्रवाह अपनी बात कह सकेगा |इस शृंखला में “संस्कृत-भारती” ने १९९९ ई. में बंगलूरू से मासिक-पत्रिका “सम्भाषण-सन्देशः” प्रकाशित करना आरम्भ किया | यह मासिक-पत्रिका अपनी साज-सज्जा, सरल भाषा और विषय-वैविध्य के कारण देश-विदेश में बहुत लोकप्रिय है | इसी प्रकार से कुछ और पत्र-पत्रिकाएँ हैं - संवित् [ पाक्षिकं पत्रम् ], संस्कृत-बाल-संवादः [ मासिकं पत्रम् ], गीर्वाणी [ मासिकं पत्रम् ], महास्विनी [ षाण्मासिकं पत्रम् ], आरण्यकम् [ षाण्मासिकं पत्रम् ], संस्कृत-सम्मेलनम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], अर्वाचीन-संस्कृतम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], आर्षज्योतिः [ मासिकं पत्रम् ], संस्कृत-प्रतिभा [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-मञ्जरी [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-वार्त्ता [ त्रैमासिकं पत्रम् ], संस्कृत-विमर्शः [ वार्षिकं पत्रम् ], अभिव्यक्ति-सौरभम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ], अतुल्यभारतम् [ मासिकं पत्रम् ], संस्कृतवाणी [ पाक्षिकं पत्रम् ],संस्कृत-सम्वादः [ पाक्षिकं पत्रम् ],संस्कृत-रत्नाकरः [ मासिकं पत्रम्],दिशा-भारती [ त्रैमासिकं पत्रम् ],देव-सायुज्यम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ],संस्कृत-वर्तमानपत्रम् [ दैनिकं पत्रम् ],विश्वस्य वृत्तान्तम् [ दैनिकं पत्रम् ],संस्कृत-साम्प्रतम् [ मासिकं पत्रम् ],निःश्रेयसम् [षाण्मासिकं पत्रम् ],श्रुतसागरः [ मासिकं पत्रम् ],सेतुबन्धः [ मासिकं पत्रम् ],हितसाधिका [पाक्षिकी पत्रिका],दिव्यज्योतिः [ मासिकं पत्रम् ],रावणेश्वर-काननम् [ मासिकं पत्रम् ],रसना [ मासिकं पत्रम् ],दूर्वा [ त्रैमासिकं पत्रम् ],नाट्यम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ],सागरिका [ त्रैमासिकं पत्रम् ],ऋतम् [ द्विभाषिकं मासिकं पत्रम् ],स्रग्धरा [ मासिकं पत्रम्],अमृतभाषा [ साप्ताहिकं पत्रम् ],प्रियवाक् [ द्वैमासिकं पत्रम् ],दिग्दर्शिनी [ त्रैमासिकं पत्रम् ],वसुन्धरा [ त्रैमासिकं पत्रम् ],संस्कृत-मन्दाकिनी [ षाण्मासिकं पत्रम् ],लोकप्रज्ञा [ वार्षिकं पत्रम् ],लोकभाषा-सुश्रीः [ मासिकं पत्रम् ],लोकसंस्कृतम् [त्रैमासिकं पत्रम् ],विश्वसंस्कृतम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ],स्वरमङ्गला [ त्रैमासिकं पत्रम् ],भारती [ मासिकं पत्रम् ],रचना-विमर्शः [ त्रैमासिकं पत्रम् ],सरस्वती-सौरभम् [ मासिकं पत्रम् ] संस्कृतश्रीः [ मासिकं पत्रम् ],वाक् [ पाक्षिकं पत्रम् ],अजस्रा [ त्रैमासिकं पत्रम् ],परिशीलनम् [ त्रैमासिकं पत्रम् ],प्रभातम् [ दैनिकं पत्रम् ],व्रजगन्धा [ त्रैमासिकं पत्रम् ],संगमनी [ त्रैमासिकं पत्रम् ],विश्वभाषा [ त्रैमासिकं पत्रम् ],भास्वती [ षाण्मासिकं पत्रम् ],कथासरित् [ षाण्मासिकं पत्रम् ],दृक् [ षाण्मासिकं पत्रम् ],वाकोवाकीयम् [ षाण्मासिकं पत्रम् ],वैदिक-ज्योतिः [षाण्मासिकं पत्रम् ],अभिषेचनम् [षाण्मासिकं पत्रम्], अभ्युदयः [षाण्मासिकं पत्रम्]सत्यानन्दम् [ मासिकं पत्रम् ],संस्कृत-साहित्य-परिषत्-पत्रिका [ त्रैमासिकं पत्रम् ] आदि | इन्होंने संस्कृत-पत्रकारिता के क्षेत्र को अधिक सक्रिय बना दिया है |इसके अलावा संस्कृत की एक न्यूज-एजेन्सी है- News in Sanskrit[ News agency ] Hindustan Samachar| अभी-अभी सूचना मिली है कि पूर्वी दिल्ली से पिछले कुछ दिनोंसे “सृजन-वाणी” नाम का दैनिक संस्कृत-समाचार-पत्र प्रकाशित किया जा रहा है | इन सब संस्कृत-पत्रकारों और संस्कृत-कर्मियों को हार्दिक अभिनन्दन और मंगलकामनाएँ ! बहुत-सारी ई-पत्रिकाएँहैं जिनमेंप्राची प्रज्ञा [मासिकी ई-पत्रिका ], जान्हवी [ त्रैमासिकी ई-पत्रिका], संस्कृत-सर्जना[ त्रैमासिकी ई-पत्रिका] और सम्प्रति वार्त्ताः [दैनिकं ई-पत्रम् ] आदि प्रमुख हैं | सुधी पाठकों को यह जानकर सुखद आश्चर्य भी होगा कि पिछले तीन साल से www.divyavanee.inके नाम से संस्कृत-भाषिक-कार्यक्रमों को प्रसारित करने वाला एक चौबीस घन्टे का online radio भी है जो कि पाण्डिचेरी से डॉ. सम्पदानंद मिश्र के नेतृत्व में चलाया जा रहा है | राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान और श्रीलाल-बहादुर-शास्त्री-राष्ट्रिय-संस्कृत-विद्यापीठ-जैसे संस्थानों और विश्वविद्यालयों ने संस्कृत-पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों को आरम्भ कर दिया है | आशा की जा सकती है कि कुछ ही समय में इन संस्थानों से प्रशिक्षित हो कर संस्कृत के पूर्णकालिक पत्रकार सक्रिय हो जायेंगे | पिछले दो वर्षों में केरल में चार लघु-चलचित्र संस्कृत-भाषा में बन कर दर्शकों को दिखाए जा चुके हैं | थिरुवनंतपुरम् से मलयालम-भाषिकदृश्यवाहिनी “जनम्”ने २०१५ ई. के २-ओक्टोबर से नियमितरूपसे प्रतिदिन १५-मिनिट्स के लिए संस्कृत-समाचारों का प्रसारण आरम्भ किया है | इन सब तथ्योंके मद्देनज़र, पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि संस्कृत-पत्रकारिता का भविष्य सकारात्मक और उज्जवल है |


















































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Mantra -- explained

Sun, 11/20/2016 - 16:32
On Mantra and Beejas, if you are really interested, I would recommend the following books:
१. मंत्रशास्त्र श्रीमत् शंकराचार्य श्री योगेश्वरानंद (खरेशास्त्री) संपादक श्री गो.प्र.भावे
२. Tantras parts 1&2 by Sir John Woodroffe Aka Arthur Avalon
3. Garland of Letters by Sir John Woodroffe Aka Arthur Avalon
4. Shakti and Shalt by ibid
5. The Serpent Power by ibidThere are many Tantra and Yamal Granthas on the subject.Mantra is the sound body of consciousness. The spiritual efficacy of OM is heard, not by the ears but by the heart .  It surcharges the innermost being of man with vibrations of the highest reality.  The frequency of OM is 7.83 Hz , which in inaudible to the ear, as the human ear  cannot discern sounds of frequency less than 20 hertz.  We can hear only the harmonics. Ohm- 7.83 Hz Gam - 14 Hz Hleem - 20 Hz Hreem - 26 Hz Kleem - 33 Hz Krowm - 39 Hz Sreem - 45 Hz  
Sound vibrations are intimately connected to our "prana" or "life energy".  Quantum Physics has seconded our Vedas and proved that our "universe" is being projected through thought-sound frequencies based on our perception. In between the white invader injected poison into our beej mantras using  Raja Ram Mohan Roy -  wanna see an example? 1. Brahman : rhim 2. Kshatriya : shrim 3. Vaishya : klim 4. Shudra : aim Two or more beejas are sometimes combined. This results in greater diversity, in the energy of the mantra . Example: rheem shreem, kreem  is a conjoined bijamantra.    All the three bijas are various forms of the same energy - rheem = the Great Illusion (Maya),  shreem = Lakshmi and kreem = Kali.   Thus these 3 beejas represent creation, sustenance and destruction respectively. Energy of beej mantra frequency activates requisite chakras and channelizes nadis. The modern world has woken up to the potential of using  the power of longitudinal wave sound vibration . Our ancient maharishis  used sound in its gross and subtle states to penetrate the planes of human consciousness and to reach brahmAn.  As I said, beej mantras are seed mantra.  Each deity has a specific beej mantra.  At the first instance it stops the chatter of mind. Conscious repetition will morph into unconscious repetition.  Beej mantras for Ganesh, Vishnu, Lakshmi and Saraswathi can be practiced by any one.    But for Devi sadhanas ( shakti ) where every syllable matters, caution needs to be exercised.  For example wrong utterance of Kali mantra can have adverse effects. Bijamantras of the five cosmic elements (panchamahabhutas) 1. Prithvi (absolute earth) : lam 2. Apa (absolute water) : vam 3. Tej (absolute fire) : ram 4. Vayu (absolute air) : yam 5. Akash (absolute ether) : ham, kham The entire human brain is mapped with these Beej mantras.  Almost every Tantric chant is based on Beej Mantras.   No guru ever took favours by selling a mantra, as it was against his DHARMA -it was handed over to deserving disciples , who would offer  simple guru dakshina like flowers or fruits or simple labour as seva. Beej mantras, which are one-syllabled typically ending in anusvara (a simple nasal sound). These are derived from the name of deity; for example, deity Durga yields dum and deity Ganesha yields gam. The beej mantras are one-syllable seed sounds that, when said aloud, activate the energy of the chakras in order to purify and balance the mind and body. When you speak the bija mantras, you resonate with the energy of the associated chakra.--as mentioned in the  Jabala Darsana Upanishad in 5000 BC. Maha ganapati mool Mantra - "Om Shreem Hreem Kleem Klowm Gam Ganapathaye Maha ganapati mool Mantra - "Om Shreem Hreem Kleem Klowm Gam Ganapathaye Vara Varatha Sarvajanamay Vashamaanaya Swaha" Beej mantras are prefixed and appended to other mantras , creating complex mantras.  In tantra, these mantras have supernatural powers, and they are transmitted by a guru to a disciple as an initiation ritual. Mantras are Scalar energy based sounds which resonate in the Zero Point Field Aakashik hyperspace. Mantras reprogramme your DNA. The human DNA can produce longitudinal scalar waves . Mantra is a carrier wave with potent information within it.  Mantras vibrations on DNA , chakras and pineal gland purifies and raises human consciousness. Mantras have immediate soothing effect makes the brain produce and release magic healing chemicals. Errant and disturbing thought are killed! DNA is like the master tuning fork in the body. It would strike a particular frequency and certain other molecules would follow-- the waves are LONGITUDINAL -- rather field like-- Emotions like anger and fear can "compress" DNA,  However, emotions like joy, gratitude and love unwind the the DNA, decompress it! A simple emotion like FEAR can cause terrible damage to your body and mind. It will cause migraines You have a choice of consuming an over the counter tablet like paracetamol or uttering a mantra with intention. The mantra heals you.  The chemical drugs ravages your liver-among many other things.  Every cell of your body contains the creative power of the universe. Every DNA has its own melody, as energy and matter is musical in nature. . The human body is mainly water. Molecules of water are affected by our thoughts, words, and feelings. Our DNA program can be "rewritten" as an acoustic genetic code.  Today our DNA is 97%  junk DNA . We can reverse this. Quantum Beej mantras understands that our reality is a vibratory reality - from sub nuclear level to atomic, molecular, and macro levels.  Every thing oscillates  between two states of rest we Hindus call SPANDA.  Everything produces a longitudinal vibration, --  a "sound of music ". Vibrations of mantras  reach the subconscious level where our karmic patterns are stored. The practice of mantra increases concentration, memory, purifies our heart and helps erase the effects of past karma. Proper recitation of mantras and chants helps invoke the latent power within us . A mantra holds  mystical energy encased in a sound carrier structure.  Every mantra contains within its vibration a certain power.   Upon concentration and repetition of a given mantra, its energy is liberated and takes form. Beej (Seed) mantras act directly on the nerves of astral body.  The other type of mantras, having a combination of words, and having some meaning  set up powerful vibrations in the body. When chanting a Mantra, it is extremely important not to change the raga and its key, because the rate of vibration on which the sound is based on integral part of the Mantra. There are several Chandas. The seven main ones are: Gayatri: 3 padas of 8 syllables containing 24 syllables in each stanza. Ushnuk : 4 padas of 7 syllables containing 28 syllables in each stanza. Anustubh: 4 padas of 8 syllables containing 32 syllables in each stanza. This is the typical shloka of classical Sanskrit poetry Brihati : 4 padas (8 + 8 + 12 + 8) containing 36 syllables in each stanza. Pankti : 4 padas (sometimes 5 padas) containing 40 syllables in each stanza. Tristubh: 4 padas of 11 syllables containing 44 syllabes in each stanza Jagati: 4 padas of 12 syllables containing 48 syllables in each stanza The mantra has got a Beeja or seed. The seed is a significant word, or series of words, which gives a special power to the Mantra. The Beeja is the essence of the Mantra. This represents the sound string defined by the Seers as being the repository of auditory energy sources. The Beeja gives the mantra in which it is used, its special power of self-generation and effects. Just as within a seed is hidden within tree, so too, the energy of the mantra is resident in the seed on which it is based. This helps the mantra to manifest itself into spiritual consciousness. 
Sun (Surya) Om hram hreem hraum sah suryaya namah Moon (Chandra) Om shram shreem shraum sah chandraya namah Mars (Mangal) Om kram kreem kraum sah bhaumaya namah Mercury (Budh) Om bram breem braum sah budhaya namah Jupiter (Guru) Om gram greem graum sah gurave namah Venus (Shukra) Om dram dreem draum sah shukraya namah Saturn (Shani) Om pram preem praum sah shanaicharaya namah Rahu Om bhram bhreem bhraum sah rahave namah Ketu Om shram shreem shraum sah ketave namah. Sound frequencies have been used to stimulate new cellular growth, resolve tumors, dissolve calcium deposits, stimulate new neurological development, deliver nourishment, detoxify, resolve paralysis, remove plaque and tooth decay, act as a carrier frequency to deliver higher forms of knowledge and information, even scan and harvest information.  Sonocytology is the study of cell sounds. Where there is vibration, there is sound and vice versa.  Modern science has slowly begun to realize the benefits of sound mantras used in Ayurveda fore body cell rejuvenation. While literally everything is vibrating, different things vibrate at different rates or frequencies. Some frequencies are perceived as light, some as sound, some as color, and some as solid matter. The rate at which something vibrates determines how dense it is and what we perceive it to be.  The human ear can discern only a very narrow band between 20 Hz to 20000 Hz.  The rest is inaudible. This is why NO cosmic sound can be heard by the human ear.  These cosmic sounds were heard by  maharishis in their spiritual trances which broadened their sense spectrums.  However our brain can register the vibrations. Diviners use OM resonance to find water in arid areas. The mantric power of Om emanates not only from its sound vibrations, but also from the inner attitude of the speaker-- his spiritual purity and his freedom from worldliness. The earth vibrates at 7.83 Hz and so does OM. When you blow a conch your body must be erect, as per the spirit level in the inner ear cochlea, to balance right and left brain lobes. The spiral in the inner ear also follows the Fibonacci series. Scalar waves and sound waves are LONGITUDINAL.  Rest are all transverse. Spirals which follow the Golden mean and Fibonacci series can create scalar waves.  Which means a conch can create scalar waves. The sound of the sea when you listen to the conch held to your ear is the sound of the Zero Point Field or Scalar Field or Brahman or OM.   In Hindu temples before and after a puja or arti the shank is blown.  Lord Shiva is also known as Shankara. Dead cells emitted a low rumbling like radio static. Distinguishing between the sound signatures of healthy and diseased cells WILL be a part of the medicine of the future. In the sixth fetal month, life inside the womb is full of sounds that the ear is capable of hearing. The uterus resounds with the sounds of the heart beating (approximately 50-60 beats per minute) and the blood swooshing through the arteries, the wavelike cadence of the breath (approximately 1,215 cycles per minute), and the external sounds and voices muted by the amniotic fluid. Before we are even born, we are attuned to the rhythms and sounds around us. As per our 7000 year old Vedas sound creates, organizes and forms all the basic fundamental shapes found throughout the known universe. Sound operates through the law of Resonance. Resonance eliminates the limitations of the "sender and receiver dynamic."    Resonance is where two become one, where minds join. Resonance is, in itself, a state of awareness and experiential knowing far beyond concept and mental, cognitive thinking. On the vibration field-form-body-time level, resonance is the experiential state of Oneness. Sound has the ability to affect whatever forms it comes into contact with by exposing that form to a different rate of frequency vibration. Sound has the ability to bring this place back into Oneness by changing its rate of vibration through sympathetic vibration - Resonance.   Depending on the frequencies being used, sound vibratory resonance can facilitate accessing a state of understanding and knowing without the need for limits, fears and defenses. Sound waves can travel below the order of mental cognitive defense structures and deliver a deeper experiential state of harmony. Resonance is not a mental idea. It is a visceral knowing-feeling state beyond question. We call this Sound Frequency Healing.  For any healing to be complete, it needs to take place at all levels - the body, the mind and the spirit. The smallest particles known to man are vibrations.  Thoughts are vibrations.  Words are vibrations.  Sounds are vibrations.  Light is a vibration.  Our planet is a vibration. Our entire universe and everything within it (seen and unseen) is a vibrating mass of atoms and subatomic particles. If the hydrogen bonding angles of one molecule are altered, those in the other molecules might be expected to follow suit (as in a domino effect). When a mantra is chanted , it vibrates the brain matter and connects new neural circuits. This effect comes after repeating the mantra for a long period of time and bringing in the resonance effect in the brain.  For this the seers developed various methods.   How much a mantra is to be chanted and how it is to be chanted etc.  were all given in the Mantra Shastra (Scripture of Mantras).   

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संस्कृत ! तुमची -आमची! (संस्कृत!आपकी-हमारी)

Sat, 11/05/2016 - 22:28
संस्कृत तुमची आमची -- मालिका -2 (2016) आमंत्रण
  1. कौशलम् न्यास,संस्कृत भारती व पणजी दूरदर्शन केंद्रातर्फे लवकरच संस्कृत तुमची आमची ही मालिका सादर होत आहे. यात भाग घेण्यासाठी ८वी ते १५वी या वर्गामध्ये संस्कृत शिकणारे विद्यार्थी-विद्यार्थिनी तसेच ज्यांनी त्यांच्या विद्यार्थि दशेत १०वी पर्यंत संस्कृत शिकले असेल अशा सर्वाना निमंत्रण आहे. इच्छुकांनी स्वतः ४-४ चे गट करुन नाव नोंदणी करावी. नोंदणीसाठी pathak.usha15@gmail.com हा ईमेल वापरावा. गटाची माहिती देतांना गट प्रमुखाचे नांव,वय, इयत्ता, मोबाईल क्रमांक, ईमेल व शाळेचे नाव, तसेच गटातील सर्वांचे वय, शाळा व मोबाईल क्रमांक द्यावेत. माजी विद्यार्थांनी त्यांची शाळा नमूद करावी. एकूण तीन गटात स्पर्धात्मक कार्यक्रम असेल. स्पर्धेसाठी तयारी करतांना यू टयुब वरील पठामि संस्कृतम् या श्रृंखलेतील कार्यक्रम हे संदर्भ म्हणून असतील. त्यावर आधारीत प्रश्न विचारले जातील.स्पर्धकांना ज्या महिन्यात भाग घ्यायचा असेल त्या प्रमाणे तयारी करावी.
जेस्वतःसंस्कृतविषयाचेशिक्षकअसतीलतेस्पर्धकअसूशकतनाहीत.परंतुत्यांनीपरीक्षकम्हणूनसहभागीहोण्यासाठीनांवनोंदणीकरावी. पठामिसंस्कृतम्यामालिकेतीलधडेखालीललिंकवर पहायलामिळतील---http://bhagvadgeeta-recital.blogspot.in/2015/11/blog-post_29.html
डिसें. २०१६मधीलशूटिंगसाठीपठामिसंस्कृतम्भाग१-१०जाने. २०१७मधीलशूटिंगसाठीपठामिसंस्कृतम्भाग११-२०फेब्रु२०१७मधीलशूटिंगसाठीपठामिसंस्कृतम्भाग१०३-१११-------------------------------------------------------------------------------------------
संस्कृत ! तुमची -आमची! (संस्कृत!आपकी-हमारी) - (2014)देववाणी संस्कृत को भारत के लोगोंके मन में और घर-घर में पहूँचानेका “संस्कृत तुमची आमची” ये एक अनोखा प्रयास है । संस्कृत तुमची आमची यह केवल संस्कृत भाषा को समर्पित ऐसी धारावाहिका है। कौशलम ट्रस्ट, संस्कृत भारती गोवा और पणजी दूरदर्शन गोवा व्दारा पुरस्कृत यह १२ भागोंकी (Episodes) धारावाहिका गोवा के पणजी दूरदर्शन पर जुन २०१४ से प्रसारित कि जा रही है। अबतक इस धारावाहिकाके ५ Episodes प्रसारित हुए है और प्रेक्षकोंका प्रतिसाद बडा ही उत्साहवर्धक और प्रेरणादायी है। यह धारावाहिका पणजी दूरदर्शनपर महिनेमें एक बार, माह के हर चौथे मंगलवार को शाम ५.३० से ६.०० तक प्रसारित की जाती है। धारावाहिका में ३ विभाग (Segments) होते है। प्रत्येक विभाग (Segments) ७-८ मि. का होता है। पहले दो विभागोमे (Segments) छात्र-छात्राओंके केवल संस्कृत भाषामें कार्यक्रम प्रसारित किये जाते है जिसमे बालवाडी से लेकर कॉलेज तक के छात्र-छात्राओंका सहभाग होता है। तिसरा विभाग (Segments) बडों के लिये होता है जिसमे संस्कृत भाषा से जुडी अनेक विषयोंके उपर विव्दान, जानकार और संस्कृत प्रेमी व्यक्तियोंसे चर्चा, साक्षात्कार या भाषण इस स्वरूप में कार्यक्रम सादर किये जाते है। हर महिने की विशेषता जानकर या उस महिने में आनेवाले राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, प्रांतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि. विषयोंको ध्यान में रखकर हर Episode का विषय, जिसे अंग्रजी मे थीम कहते है, वह निश्चित की गई है। उसी विषय(Theme) के अनुसार एपिसोड का स्वरूप तय किया गया है। क्योंकि यह धारावाहिका पणजी दूरदर्शनसे प्रसारित की जाती है, इसका निवेदन (Anchoring) गोवा राज्य की भाषा कोंकणी प्रस्तुत में होता है। लेकिन विभागोंका सादरीकरण केवल संस्कृत भाषा मे ही प्रस्तुत किया जाता है। इस धारावाहिकाकी एक और विशेषता ये है की, लोगोंका इसमे सक्रिय सहभाग हो इसलिये हर एपिसोडमे हम एक पहेलिका बताते है और उसका उत्तर अगले एपिसोडमे देनेकी विनंती करते है. और हमे आनंद है की,हर एपिसोड बाद हमे तुरंत फोन आते है, जिनमे स्कुली बच्चोंका सहभाग जादा होता है नवंबर मासतक प्रसारित हुए ५ कडीयोंका (एपिसोड) का विवरण -----------
एपिसोड नं.-२४ जून २०१४विषय (Theme)- वर्षाऋतु और पर्यावरण इस एपिसोड की जिम्मेदारी श्रीमती सुनीता फडणीस और श्रीमती श्रृती सरमोकदम इन्होंने उठाई थी। बालकेंद्र पर्वरी और हेडगेवार हायस्कूल, पणजी के छात्र-छात्राओंने इसमें सहभाग लिया था। पहले विभाग में वर्षाऋतु को लेकर बालिकाओने वर्षानृत्य प्रस्तुत किया। दुसरे विभाग में जंगल कटाई होनेसे जंगली जानवर मनुष्य वस्ती में आकर जो तबाही मचाते है उसका नाट्यीकरण प्रस्तुत किया। तिसरे विभाग में अथर्ववेद और पर्यावरण इस विषयपर डॉ. प्रमोद पाठक इनका साक्षात्कार प्रस्तुत किया गया। प्रेक्षकोंको संस्कृत भाषामें एक प्रहेलिका बताई गई और उसका उत्तर अगले एपिसोड में देने को कहा गया।
एपिसोड नं. - २२ जुलै २०१४विषय (Theme)- गुरुपौर्णिमा और भारत की गुरु-शिष्य परंपरा एपिसोड की जिम्मेदारी श्री. संतोष बेहरेजी इन्होंने उठाई थी। इसमें वागळे हायस्कूल, मंगेशी और मंगेशी हायस्कूल के छात्र-छात्राओंका का सहभाग था। इसमे बालक-बालिकाओंने गुरु को समर्पित श्लोकपठन सादर किया। उसके उपरांत भरत नाट्यम में महाभारत के एक प्रसंग पर नृत्य नाटिका सादर की। मंगेशी हायस्कूल के छात्रोने छ.शिवाजी महाराज और श्री रामदास स्वामी यह गुरु-शिष्य जोडीपर एक संस्कृत नाटिका प्रस्तुत की। गोवा स्थित संस्कृत के विव्दान श्री लक्ष्मण पित्रे इनके साथ भारत की गुरु-शिष्य परंपरा इस विषय पर साक्षात्कार प्रस्तुत किया गया। अंतमे उस महिने की प्रहेलिका प्रस्तुत की गई।
एपिसोड नं. - २६ ऑगस्ट २०१४विषय (Theme)- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और संस्कृत दिन. इस एपिसोड की जिम्मेदारी श्रीमती मेघना देव्हारी इन्होने संभाली थी। श्री आद्य शंकराचार्य रचित बालमुकुंदाष्टकम् स्तोत्र पर बालकृष्ण लीलाका भरत नाट्यम एवम् नृत्य नाटिका प्रबोधन एज्युकेशन सोसायटी के बालक-बालिकाओंने प्रस्तुत किया। उसके बाद स्वामी विवेकानंद जी के १५० वे जन्म शताब्दि को ध्यान में रखते हुए स्वामीजी के जीवनपर एक नाटिका प्रस्तुत कि गई। संस्कृत साहित्यका एक अनमोल रत्न भर्तृहरी के नीतिशतक के उपर चर्चा प्रस्तुत कि गई। चर्चा में गोवा के प्रसिध्द साहित्यकार श्री. दत्ता नाईक, श्रीमती मेघना देव्हारी, अखिलेश साठे, वेदांग पाटणकर इन्होंने सहभाग लिया।
एपिसोड नं. - २३ सप्टेंबर २०१४विषय (Theme)- गणेशचतुर्थी और नवरात्री इस एपिसोड के पहले सेग्मेंट की जिम्मेदारी श्रीमती शांता म्हाम्बरे इन्होने लि थी। मुश्टिफंड प्रायमरी स्कूल, पणजी के बालक- बालिकाओं ने सौ. उषा पाठक लिखित और सौ. सुनीता फडणीस व्दारा अनुवादित गणेश गीत का नृत्य सादर किया। दुसरे और तिसरे सेग्मेंट की जिम्मेदारी श्रीमती उषा पाठक और सौ. सुनीता फडणीस इन्होने संभाली थी। नवरात्री के उपलक्ष में नारी शक्ति को समर्पित यह विभाग वैदिक काल से लेकर आधूनिक काल तक की नौ महिलाओंके स्वगत रूप में प्रस्तुत किया गया।
एपिसोड नं. - २८ ऑक्टोबर २०१४विषय (Theme)- संस्कृत संभाषण वर्ग यह एपिसोड संस्कृत भारती गोवा व्दारा गोवा राज्य में संस्कृत प्रचार व प्रसार के लिये जो काम किया जाता है उसको समर्पित किया है। स्कूल कि छुट्टीयों मे इस संस्था व्दारा १० दिन के संभाषण वर्ग आयोजित किये जाते है। और गोवा के लोग इसमें बडे उत्साह से सहभाग लेते है। ऐसे ही एक वर्ग का चित्रिकरण इस एपिसोड मे प्रस्तुत किया गया है।


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पठामि संस्कृतम् भाग-३

Thu, 11/03/2016 - 13:59
पठामि संस्कृतम् भाग-
रेडियो मधुबन सुननेवालोंको लीना मेहेंदळे का अभिवादन। 90.4 FM पर मैं लेकर आई हूँ आपका पसंदीदा प्रोग्राम पठामि संस्कृतम्। आईये आज हम कुछ प्रश्न और उनके उत्तरो से आरंभ करते है। सबसे पहला हम किसीसे पूछते है कि तुम्हारा नाम क्या है? तो संस्कृत मे हम कहेंगे-
तव नाम किम् अस्ति यानाम किमस्ति तवयाकिम् नाम अस्ति तवयाकिमस्ति तव नामयाअस्ति किम् तव नामयहाँ, किम् अस्ति= किमस्ति -- यह संधि है।
तव नाम किम् अस्ति इसे हिंदी में पूछते हैं -- तुम्हारा नाम क्या है? लेकिन कई बार हम शब्दोंका उलटफेर भी कर लेते हैं। जैसे हम पूछ सकते है 
नाम क्या है तुम्हारा? --    नाम किमस्ति तव या क्या नाम है तुम्हारा -- किम् नाम अस्ति तव या क्या है नाम तुम्हारा -- किमस्ति तव नाम या है क्या तुम्हारा नाम -- अस्ति किम् तव नाम। किम् अस्ति= किमस्ति
तो देखा आपने ये है संस्कृत और हिंदी भाषा की खूबी की एक ही वाक्य के चार शब्द थे लेकिन हमने उन शब्दोंको चाहे जैसा भी उलट फेर कर दिया हो उससे ना तो अर्थ बदला और ना ही भाषा की सुंदरता में कोई कमी आई। लेकिन हाँ नाटकियता में काफी अंतर पड जाता है। इसिलिये संस्कृत में जब हमे नाटक या पद्यावली इत्यादि लिखने को तो हम इस खूबी का उपयोग कर लेते है कि हम शब्दोंका उलटफेर भी अगर करेंगे तो भी वाक्यों का अर्थ नही बदल सकता है।
अब चलिये हम ऐसे ६ शब्दोंको दोहराते है जो संस्कृत में काफी उपयोग में आते है और हम उन्हें अपने पहले पाठों में समझ दे चुके हैं। ये ६ शब्द हैं- मैं = अहं मेरा = मम मुझे = माम् / मा तू = त्वं तेरा = तव तुझे = त्वाम् / त्वा
तो ये जो हमारे संस्कृत के जो ६ शब्द है या ८ शब्द कह लिजिए इनका प्रयोग अगर हम सीख ले तो, चलो हमारा ऐसे ही १५-२० प्रतिशत काम तो हो ही गया। है ना। और जो पहली प्रार्थना जो हमने पढी थी- त्वमेव माता पिता त्वमेव तो उसमे हमने त्वम् शब्द का प्रयोग सिखा था जैसे-त्वम् मम मातात्वम् मम पितात्वम् मम सर्वम्या माम् सत्यम् गमय
तो यहाँ पर हर जगह हमने त्वम् अर्थात तुम शब्द का प्रयोग सिखा है। 
अब इसी प्रश्नोत्तर को आगे बढाते हुए कुछ और देख सखते है। कोई मुझसे पूछेगा, तव नाम किम अस्ति?तो मैं उत्तर दूँगी, मम नाम लीना अस्ति|, या मैं कह सकती हूँ, मम नाम लीना इति|और अपरिचित से नाम पूँछने के बाद उसे हम कुछ और भी प्रश्न पूछ लेते है जैसे तुम क्या करते हो, त्वं किं करोसि? उत्तर मिलता है अहं व्यापारकार्यं करोमि|मैं व्यापार का काम करता हूँ। प्रश्न हैं त्वं कुत्र वससि?तुम कहाँ रहते हो उत्तर मिलता है अहं आबू ग्रामे वसामि|मै आबू गाव में रहता हूँ फिर पहला आदमी कहता है तव आबू ग्रामः शोभनःअस्ति|कितना सीधा अर्थ है तुम्हारा आबू गाव जो है वो बहूत सुंदर है शोभिवंत है और सुननेवाला कहता है धन्यवादम् करोमि|मैं आपका धन्यवाद करता हूँ 
तो बस ऐसे ही छोटे-छोटे सरल शब्दोंके साथ, छोटे-छोटे वाक्योंके साथ हमारी पढाई आगे बढती चलेगी। और अब एक बहूत ही सुंदर श्लोक सुनते है जो की गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है रामचंद्रजी के लिये गोस्वामी कहते है-श्रीरामचंद्र कृपालु भज मनहरण भवभय दारुणं।नवकंज लोचन कंजमुखकरकंज पद कंजारुणम्।।अर्थात हे मेरे मन तु कृपालु श्री रामचंद्र जी को भज। हे मेरे मन तुम भजन करो कृपालु ऐसे रामचंद्रजी का। और इसके आगे वर्णन है- हरण भवभय दारुणं। वो हमे ये जो संसार है भव इसमे जो कई तरहके भय,विघ्न आते रहते है  हमे दारुण भय सताता है इसका हरण श्री रामचंद्रजी बडी कृपासे करते है। 
आगे श्री रामचंद्रजी की सुंदरता का वर्णन करने के लिए तुलसीदासजीने एक शब्द का प्रयोग किया है कंज। कंज का अर्थ होता है कमल। सुंदरता की उपमा कमल से दी जाती है। तो तुलसीदासजी बताते है श्री रामचंद्रजी कैसे है, कितने सुंदर है तो कहते है-- नव कंज लोचन -- इनके लोचन जो है वो नये खिले हुए कमल के समान सुंदर है। मुख भी उनका कमल की तरह सुंदर है। करकंज -- हाथ भी कमल की तरह सुंदर है और पद कंजारुणम् मतलब उनके पाँव भी लालिमा दिये हुए कमल की तरह सुंदर है। तो मै ये फिरसे पढती हूँ-श्रीरामचंद्र कृपालु भज मनहरण भवभय दारुणं।नवकंज लोचन कंजमुखकरकंज पद कंजारुणम्।---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

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व्याकरणपरक लेख

Sun, 10/30/2016 - 11:20

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चतुर्थी विभक्ति
१.नमः - नमस्कार करना
श्री गणेशाय नमः।
श्री गणेश को नमस्कार है।

२.स्वस्ति: - कल्याण
सर्वेभ्यः स्वस्ति।
सबका कल्याण हो।

३.स्वाहा - आहुति
अग्नये स्वाहा।
अग्नि के लिए आहुति है।

४.क्रुध - क्रोध
रामः रावणाय क्रुध्यति।
राम रावण पर क्रोध करता है।

५.द्रुह - द्रोह करना
विभीषणः रावणाय अद्रुह्यत।
विभीषण ने रावण से द्रोह किया।

६.दा - देना
अहम् निर्धनाय दानं ददामी।
मैं गरीबो को दान देती हु।

७.इर्ष्य - ईर्ष्या /जलन करना
बाली सुग्रीवाय इर्ष्यति।
बाली सुग्रीव से इर्ष्या करता है।

८.असूय  - निंदा करना
दुर्योधनः पांडवेभ्यः असुयति।
दुर्योधन पांडवो की निंदा करता है।
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द्वितीया विभक्ति

१.अभितः - चारो ओर
ग्रामम् अभितः क्षेत्राणि सन्ति।
गाव के चारो ओर खेत है।

२.सर्वतः - सब ओर
गृहं सर्वतः उद्यानानि सन्ति।
घर के सब ओर बगीचे है।

३.उभयतः - दोनों ओर
नदीम् उभयतः वृक्षाणी सन्ति।
नदी के दोनों ओर पेड़ है।

४.प्रति - ओर
रामः गृहं प्रति गच्छति।
राम घर की ओर जाता है

५.विना - बिना
त्वां विना अहम् न गमिष्यामि।
तुम्हारे बिना मैं नहीं जाऊंगा।

६.अंतरा: - बीच में
विद्यालयःमहाविद्यालयं अंतरा मम गृहं अस्ति। विद्यालय व महाविद्यालय के बीच में मेरा घर है।

७.अनु - पीछे
लक्ष्मण: रामं सीतां च अनुगच्छति। लक्ष्मण राम और सीता के पीछे चलता है।

८.धिक् - धिक्कार
मुर्खां धिक्।
मूर्खो का धिक्कार है
तृतीया  विभक्ति

१.सह, सार्धं, साकं - साथ
सीता रामेण सह वनं गच्छति
सीता राम के साथ वन जाती है

२.समं - समान
त्वया समं कोपि सुन्दरम् नास्ति
तुम्हारे समान कोई भी सुंदर नहीं है

३.अलं - मत
अलं कार्येण
काम मत करो

४.अंग विकार की स्थिति में
सीमा पादेन खंजः।
सीमा पैर से लंगड़ी है।

मंथरा चक्शुन्न काणः।
मंथरा आँख से कानी थी।
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★व्याकरणलेख-17★
हम दिनप्रतिदिन बहार की दुनिया के सानिध्य में आते है तो कुछ ऐसा देखते है जिसकी प्रशंसा करने की इच्छा होती है। सामान्यतया तो संस्कृत में " शोभनम्, उत्तमम्, रुचिकरम्" इत्यादि शब्दो का उपयोग करते है। लेकिन कुछ और भी शब्द है जिसका उपयोग करने से संस्कृतभाषा और मधुर लगने लगती है। उनके कुछ सूत्र आज करेंगे।
*61) प्रशंसायां रूपप्। (५।३।६६)*
यहा "तिङश्च" की अनुवृत्ति आकर अर्थ होता है, _प्रातिपदिक और तिङ् से प्रशंसा अर्थ में रूपप् प्रत्यय होता है।_
A) प्रातिपदिक से :-
यदि कोई चतुर हो तो हम कहते है, " सः अतीव पटु: अस्ति।"  इस सूत्र से हम ऐसा भी कह सकते है,
" सः पटुरूप: अस्ति। "
अर्थात् वह प्रशंसा करने योग्य इतना चतुर है।
पटुरूप:     पटुरूपौ    पटुरूपा:।
पटुरूपा     पटुरूपे     पटुरूपा:।
पटुरूपम्    पटुरूपे     पटुरूपाणि।
इस तरह राम/सीता/वन-शब्दावत् रूप बनते है।
पाणिनि वैयाकरणरूप: अस्ति।
पाणिनि प्रशंसनीय वैयाकरण है।

B) तिङन्त से :-
यदि कोई अच्छी रसोई करता हो तो हम कहेंगे, " सः सम्यक् पचति। "
इस सूत्रसे इस तरह भी कह सकते है,
" सः पचतिरूपम्। "
वह प्रशंसा की जाय इतना अच्छा पकाता है।
यहा "पचतिरूपम्" ऐसा नपुंसकलिंग ही रहेगा और इसके इस तरह रूप बनेंगे,
पचतिरूपम्  पचतोरूपम्  पचन्तिरूपम्।
राम: लिखतिरूपम्।
कृष्ण: नृत्यतिरूपम्।


व्यवहारमें हम किसी के विषय में बात करते समय उसको उपमा देते है। जैसे,
ये ऋत्विक की तरह dance करता है।
उपमा देने में थोड़ी न्यूनता तो रहती ही है। उपमेय पूर्ण रूपसे उपमान जैसा नही हो सकता। अर्थात् यहा वो ऋत्विक की अपेक्षा थोड़ा ही कम अच्छा नाचता है। इस तरह की वाक्यरचना के लिए संस्कृत में कुछ विशिष्ट शब्दप्रयोग किये जा सकते है। जैसे,
*62) ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः। (५।३।६७)*
ईषद-असमाप्ति = जो थोड़ा सा ही अपूर्ण हो।
कल्पप्, देश्य, देशीयर् = ये तीन प्रत्यय होते है।
और ये "प्रातिपदिक और तिङन्त" दोनों से होते है।
A) प्रातिपदिक से :-
वह थोड़ा सा ही कम चतुर है।
" सः पटुकल्प: अस्ति। "
" सः पटुदेश्य: अस्ति। "
" सः पटुदेशीय: अस्ति। "

वह थोड़ा सा ही कम विद्वान् है।
" सः विद्वत्कल्प:/ विद्वद्देश्य:/ विद्वद्देशीय: अस्ति।
पटुकल्प:    पटुकल्पौ    पटुकल्पा:।
पटुकल्पा    पटुकल्पे     पटुकल्पा:।
पटुकल्पम्   पटुकल्पे     पटुकल्पानि।
इस प्रकार पटुदेश्य/पटुदेशीय के भी तीनो लिङ्गो में रूप बनते है।

B) तिङन्त से :-
वह थोड़ा सा ही कम अच्छा पकाता है।
" सः पचतिकल्पम्। "
" सः पचतिदेश्यम्। "
" सः पचतिदेशीयम्। "
यहा भी नपुसंकलिङ्ग ही होता है। और रूप इस तरह बनते है,
पचतिकल्पम्   पचत:कल्पम्  पचन्तिकल्पम्।
पचतिदेश्यम्    पचतोदेश्यम्   पचन्तिदेश्यम्।
पचतिदेशीयम्   पचतोदेशीयम्  पचन्तिदेशीयम्।


अब इसी अर्थमें (ईषद-असमाप्ति अर्थमें) केवल सुबन्त से ही एक और ( बहुच् नामका ) प्रत्यय होता है,
*63) विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात् तु। (५।३।६८)*
इस सूत्रमें भी " ईषद-असमाप्ति:" की अनुवृत्ति आती है। लेकिन इस सूत्रमें तीन बातें विशेष है,
- यह बहुच्-प्रत्यय सिर्फ सुबन्त से ही होता है, तिङन्त से नही।
- यह बहुच्-प्रत्यय विकल्प से होता है। अर्थात् पक्ष में कल्पप्/देश्य/देशीयर् ये तीनो प्रत्यय तो होंगे ही।
- यह बहुच्-प्रत्यय सुबन्त से आगे लगता है, नही की पीछे।

" सः बहुपटु: अस्ति। "
वह थोड़ा सा ही कम चतुर है।
पक्ष में,
" सः पटुकल्प: अस्ति। "
" सः पटुदेश्य: अस्ति। "
" सः पटुदेशीय: अस्ति। " ये तीनो भी होते है।
यहा देख सकते है कि,
'पटुकल्प:' में कल्पप्-प्रत्यय पीछे लगा है। जबकि 'बहुपटु:' में बहुच्-प्रत्यय आगे लगा है।

" सः बहुपण्डित: अस्ति। "
वह थोड़ा सा ही कम पण्डित है।
बहुपण्डित:   बहुपण्डितौ    बहुपण्डिताः।
इस तरह लिंगानुसार रूप बनते है।


एक और प्रत्यय भी होता है।
*64) प्रकारवचने जातीयर्। (५।३।६९)*
यहा भी " सुप: " की अनुवृत्ति आकर अर्थ बना _सुबन्त से प्रकारवचन अर्थ में जातीयर्-प्रत्यय होता है।_
पण्डितजातीय:।
पटुजातीय:।
मृदुजातीय:। इत्यादि रूप बनते है।
 सारांश यह हुआ की,
>> प्रातिपदिक और तिङन्त से चार प्रत्यय होते है,    
 - रूपप् ( प्रशंसा )
 - कल्पप्/देश्य/देशीयर् ( ईषद-असमाप्ति)

>> सुबन्त से दो प्रत्यय होते है,
 - बहुच् ( ईषद-असमाप्ति)
 - जातीयर् ( प्रकार )

आज हमने चार सूत्र किये।
क्रमशः.........
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